Thursday, 14 December 2017

चारों धामों की स्थापना का सच

🌺🌺🌺 *चारों धामों की स्थापना शंकराचार्य ने नहीं की यह बौद्ध विहार थे* 🌸
कहां जाता है कि राम का जन्म द्वापरयुग (5000 से7000 वर्ष पूर्व) जन्म हुआ था। उसी समय के आसपास श्रवण अपने माता-पिता को चारो धाम की यात्रा कराई थी। अगर यह बात सच मान ली जाये  तो चार धामों की स्थापना आज से सात हजार साल पहले हुई होगी‌। इसका मतलब चार धामों की स्थापना शंकराचार्य ने 788ई०मे नहीं की। इन चारों धामों की यात्रा किसी और ने की‌, अगर पांच से सात हजार वर्ष पूर्व के इतिहास को देखा जाए तो चार धामों की स्थापना शूद्रों ने की, जो सम्भवतः शिक्षा केंद्र थे।

अगर यह माना जाए कि चार धामों की शंकराचार्य ने 788 ई० में की थी तो श्रवणकुमार ने चार धामों की यात्रा नहीं कराई होगी। निश्चित ही वह प्रसिद्ध व्यक्ति होगा जिसने शूद्रों द्वारा स्थापित चिकित्सकीय स्थलों या अन्य स्थलों की यात्रा कराई होगी ताकि उसके माता-पिता की दृष्टि वापस आ जाये। श्रवण के माता-पिता अंधे कैसे हुये इसका वर्णन कहीं नहीं मिलता। अगर अनुमान व थोड़ा सा तर्क लगाया जायेगा तो मुझे लगता है कि श्रवण के माता-पिता पिता दशरथ का कुछ ऐसा राज जानते होंगे, जिसके कारण दशरथ ने उन्हें अंधा कर दिया होगा। वह राज श्रवण कुमार के प्रयासों के चलते खुल सकते थे। जिससे दशरथ को भारी नुक़सान या बदनामी हो सकती थी। इसलिए श्रवण को दशरथ ने मार दिया और श्रवण की मौत के ग़म में उसके माता-पिता भी मर गये।  इस प्रकार दशरथ के राज दब गये।

या फिर दशरथ,श्रवण, राम का जन्म 788 ई के बाद हुआ होगा। जो सम्भव नहीं लगता।
इस प्रकार राम का जन्म, श्रवण की कहानी, शंकराचार्य द्वारा चार धामों की स्थापना सब फर्जी व मनगढ़ंत है। ये चार धाम निश्चित ही शूद्रों के पवित्र बौद्ध विहार होंगे जिन्हें शंकराचार्य ने कब्जा कर लिया होगा। शैलेन्द्र कुमार गौतम कानपुर नगर

Wednesday, 13 December 2017

डिजिटलीकरण के पीछे का सच

नोटबंदी व डिजिटल मनी व कैशलेश विश्व रणनीति का हिस्सा है----+--+++यदि हमें जरा सा भी अपने देश से प्रेम है तो हम नोटबंदी का भले विरोध न करे पर कैशलेश व डिजिटल मनी का विरोध करे,तथा कितनी भी मजबूरी क्यों न हो इसके प्रयोग से बचे। नही तो इसके घातक परिणामों का अंदाजा नीचे लिखे लेख से लगा सकते है।

हमारे देश के लोग कितने भोले-भाले है। उन्हें सिर्फ इतना पता है कि मोदी जी जो की रहे वह महज भ्रष्टाचार मिटाने व कालाधन निकालने के लिए ऩोटबंदी कर रहे है। परन्तु लोग तो क्या राजनीतिक दल तक यह नही सोच सके कि नोटबंदी का कारण भ्रष्टाचार व कालाधन मिटाना नही बल्कि अपने देश के लोगो को विदेशियों का गुलाम बनाने में सहयोग करना है।ऐसा नही कि राजनीतिक नोटबंदी के वास्तविक कारणों को नही जानते पर वे यह भी जानते है कि जिन विश्व के लोगो के इशारे पर नोटबंदी की गयी है वे हमें जिन्दा नही छोड़ेगे!  हम यदि ब्लादिमिर पुतीन के नीचे किये गये खुलासे पर जरा सा विश्वास कर ले, जिसने रूस जैसे शक्तिशाली देश में हार्डकैश व स्वर्ण मुद्राओंकी वकालत की है तथा रूसको कैशलेश करने से इन्कार कर दिया है,और एक बार secret planning of NWO पढ़ ले तो मोदी के नोटबंदी के पीछे के एजेण्डा ( hidden agenda) को बेहतर समझ सकते है।

आपको जानकारी देता चलू कि विश्व की अधिकॉश अर्थव्यवस्था विश्व के पॉच लोगो के हाथों की कठपुतली है। वे है Rothschild, Rockefeller, Du pont, Morgan, Bush.है। ये विश्व के वे ताकतवर अर्थव्यवस्था वाले लोग है जो चाहते है कि पूरे विश्व की आर्थिक सत्ता का control इनके हाथों में हो। जोकि तभी सम्भव है जब विश्व कैशलेश हो तथा प्रत्येक देश में डिजिटल मनी हो। डिजिटल इण्डिया व डिजिटल मनी व भारत को कैशलेश करने का कार्य मोदी जी इन्ही लोगो के इशारे में पर कर रहे है। भारत क्या यह व्यवस्था तो विश्व स्तर पर लागू की जानी है।
  भारत का प्रत्येक व्यक्ति को मोदी ने आर्थिक गुलामी में जकड़ने के लिये बीणा ले लिया है। आम आदमी तो मात्र कठपुतली की तरह होगा आम आदमी केवल कमाने वाले लोग होगे पर उनकी कमाई पर कंन्ट्रोल इन शातिर दिमाग के लोगो का होगा। NWO की योजना के माध्यम से जिस प्रकार ये लोग अपनी योजना धीरे धीरे लागू कर रहे है। उसे समझना बड़ा ही कठिन है।
   उदाहरण के लिये आधार कार्ड का पंजीकरण को ले ले। कभी आपने सोचा है कि एक अबोध पॉच साल से कम के बच्चे का आधार पंजीकरण की क्या जरूरत? आप सोचते होगे कि यह तो पहचान के लिये जरूरी है। क्या हमारी परसनालिटी, हमारी बनावट, हमारी बोली भाषा, हमारा नाक नक्श हमारी पहचान नही है? वैज्ञानिक तो महज नाक व सिर की बनावट से पहचान लेते है कि यह भारत का है या दूसरे देश का। तो फिर हमे अपने ही देश में पहचान की जरूरत पड़ क्यो पड़ रही है? जहॉ तक मेरी सोच व अध्ययन है उसके अनुसार यह सारा खेल NWO का है। जो हर व्यक्ति का पंजीकरण united States में कराना की योजना बना चुका है। ताकि वे विश्व के पॉच ताकतवर लोगो के विरुद्ध कोई षणयंत्र करे उसकी तत्काल पहचान कर समाप्त किया जा सके।
इसीप्रकार यह डिजिटल मनी होगी जिस पर आपका कंट्रोल नही होगा। करेंसी में तो रिजर्व बैंक का गवर्नर लिख कर देता है कि मै धारक को पॉच सौ, एक सौ,आदि रुपये अदा करने का वचन देता हूं। डिजिटल मनी में या कैशलेश में क्या सरकार या रिजर्व बैंक, या कोई संस्था यह वचन देती है? नही न, तो फिर आप कैसे अपने कमाई का उपयोग अपनी आवश्यकता के अनुसार कर सकेगे। एक क्लिक से पूरे विश्व की डाटामनी या डिजिटल मनी प्रतिबंधित की जा सकती है। अभी तो आप बैंक की लाइन में लगे है। 2021  के बाद आपका व आपकी आने वाली पीढी का क्या हाल होगा? आप कल्पना भी नही कर सकते।

Brave Vladimir Putin is pushing for a gold-backed currency, ditching fractional reserve banking, and delivering a defiant rebuke to the Western world’s move towards a digital-only cashless society, according to a report circulating in the Kremlin on Friday.

President Putin swears he will NEVER stop the circulation of cold hard cash because he considers digital-only cashless currency to be a New World Order tactic to gain control over the public.

President Putin has stated his desire to destroy the Illuminati in 2016, and according to Kremlin insiders he believes disrupting the global banking cartel’s plan to ban cash is a key campaign in his war against the New World Order.

The Rothschild controlled global banking lobby want a digital cashless system because this will give them even more control over us. They want to monitor and control every single transaction, while destroying real world currencies so they can issue money that doesn’t exist, creating impossible financial burdens for the masses, all the while accumulating extraordinary real wealth and power for themselves.

Populations relying on a fully digital cashless grid will be incredibly vulnerable in times of crisis, according to the report written by the Office of the President (OP). A terrorist or military attack, or even a storm or power outage, would mean the end of a functional economy. Payments would stop, the economy would grind to a halt, and life as we know it would end. A new, desperate climate would take hold, with entire populations left vulnerable and helpless, completely under the control of their government and the shadowy elites pulling the strings.

Why would Western governments ban cash when there are such disastrous consequences for humanity waiting just around the corner?

Because the shadowy elites and their banking cartels want us to be easily manipulated, cowed and controlled.

We must fight this

यदि इसके बाद भी समझ में न आये तो। हम भी करते है।
हर हर मोदी, घर घर मोदी, जय जय मोदी, अच्छे दिbन वाले मोदी।
शैलेन्द्र कुमार गौतम कानपुर नगर

Mob 9455615564

Saturday, 9 December 2017

क्या यही है अम्बेदकरवाद?

हम अक्सर अम्बेदकरवाद के नाम पर जयंतियां व अनेक सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करते हैं। जो नि: संदेह प्रचार प्रसार के लिए आवश्यक है। लेकिन इससे भी जरूरी बात यह है कि हम जो भी कार्यक्रम आयोजित करते हैं उनसे जहां एक ओर हम अपने विरोधियों को सतर्क करते हैं, वहीं दूसरी ओर उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत करते हैं। इन कार्यक्रमों के आयोजन से हम अपना तो प्रचार प्रसार कर लेते हैं। अम्बेडकर के नाम का गुणगान तो कर लेते हैं, पर क्या हम अम्बेदकर वाद की स्थापना करने में सफल होते हैं? अम्बेदकरवाद क्या है?
व्यक्ति के अन्त:मन में समता,बन्धुत्व, स्वतंत्रता,देशहित, कर्त्तव्यबोध, व सामाजिक, आर्थिक, न्यायिक  सद्भाव जागृत होना। आज हम चारों ओर देख रहे हैं कि बहुजन समाज के नवजवान बेरोजगार घूम रहे हैं, लड़कियों की शादी विवाह में भारी भरकम दहेज, बहुराष्ट्रीय कंपनियों की खुली लूट , साम्प्रदायिक तनाव, आदि तेजी से पनप रहे हो तो क्या अम्बेदकरवाद अधिक दिनों तक जीवित रह सकता है? क्या हमारे जयंतियां व सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित कर लेने मात्र से बाबा साहब अम्बेदकर का सपना पूरा हो जाएगा? एक बार फिर से हमें मूल्यांकन करने की आवश्यकता है। 
शैलेन्द्र कुमार बौद्ध कानपुर नगर

Monday, 4 December 2017

शूद्रों पर गैर सवर्णों द्वारा किया गया अत्याचार देशद्रोह से प्रेरित था

इस भारत भूमि को विदेशी गुलामी से मुक्त रखने के लिए बहुजन समाज आदि काल से संघर्ष करता रहा है। इस बहुजन समाज के संघर्ष करने का अपना तरीका और त्याग रहा। इस बहुजन समाज ने इस भारत भूमि की रक्षा के लिए घर से बेघर रहा, एक एक दाने को तरसा, एक एक बूंद पानी को तरसा। इस भारत भूमि की रक्षा के लिए आज यही शूद्र समाज विदेशी व्यवस्था से लड़ रहा है। चाहे वह नक्सली आंदोलन हो या सामाजिक राजनीतिक, आर्थिक,सांस्कृतिक, शैक्षिक आंदोलन हो। हालांकि कुछ बहुजन समाज के लोग भारत भूमि के लिए आंदोलन नहीं बल्कि सुविधाओं के लिए आंदोलन कर रहे हैं। जो विदेशी और बहुजन समाज के शोषण की व्यवस्था का हिस्सा है। शूद्र समाज के लोग आखिर किस मजबूरी के चलते गंदा पानी पीने व मरे पशुओं का मांस खाने को मजबूर थे। पर वे विदेशी व्यवस्था को स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। वहीं गैरशूद्र विदेशियों से मिलकर उन्हें मारने और शोषण करने के कार्य को देशभक्ति समझ रहा था। आज भी यदि हम बहुजन समाज के गरीब लोगों के मौलिक विचारों का अध्ययन करें तो वे भारत भूमि से असीम मोहब्बत झलकती है। वे भारत की प्राकृतिक संसाधनों को की रक्षा के लिए जितना संघर्षरत हैं उतना कोई नहीं है। शूद्र मरे पशुओं का भोजन व गंदा पानी,मजबूरी से अधिक स्वाभिमान के कारण, ग्रहण करते थे। यह उनका सविनय अवज्ञा आन्दोलन था। जिसे हमें समझना होगा। वे अच्छी तरह से जानते थे कि यह शरीर तो नस्वर है अगर भारत भूमि से जल जंगल जमीन समाप्त हो गये तो हमारी आने वाली पीढ़ी हमसे अधिक कष्ट में जियेगी या इसका अस्तीत्व नहीं बचेगा। उनकी यह सोच आज भी बहुजन समाज के अनुसरण कर रहे हैं। वे आज भी भारतीय संसाधनों की रक्षा के लिए संघर्षरत हैं। वहीं गैर शूद्र विदेशी कम्पनियों से मिल कर भारत के प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करने में लगे हैं।
शूद्र समुदाय से अलग समुदाय के लोगों ने भारत भूमि को लगातार अपने निजी स्वार्थों को दृष्टिगत रखते हुए बेचने में भी देशभक्ति समझता रहा। जिस समय भारत भूमि पर अंग्रेजी कम्पनियां अपने पांव पसार रही थी, और देशद्रोही समुदाय के लोग उन विदेशी कम्पनियों को स्थापित करने के लिए उनके साथ मिलकर ठीक उसी तरह देशभक्त बहुजन समुदाय के लोगों को मारने लगा था जिस प्रकार आज नक्सलियों को, विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को स्थापित करने के लिए, देशद्रोही व विकास विरोधी बता रहे हैं। विदेशी कंपनियों को अपने देश में स्थापित करने का विरोध करने वाला देशद्रोही होगा या विदेशी कंपनियों को  स्थापित करने वाला देशद्रोही होगा?
मैं उन देशभक्तों को भी इसी बलिदानी वर्ग में सम्मिलित करता हूं जो अंतरराष्ट्रीय षणयंत्र का हिस्सा आधार कार्ड का विरोध कर रहे हैं। और सरकार द्वारा दी जाने वाली सुविधाओं को भीख समझ रहे हैं। मैं सलाम करता हूं ऐसे योद्धाओं को जो आधार के विरोध में संघर्षरत हैं।

शैलेन्द्र कुमार बौद्ध कानपुर नगर 9455615564

Sunday, 3 December 2017

सार्वजनिक सम्पत्ति का प्रयोग सार्वजानिक रूप में होना चाहिए

जब मन्दिर सार्वजनिक जगह है।
तो वहॉ की सम्पत्ति भी सार्वजनिक होनी चाहिये। जिस का उपयोग, प्राकृतिक आपदाओं में,  वितरण प्रणाली में, गरीबों सहायता में, देश के  आर्थिक संकट में, देश की शिक्षा व्यवस्था में, होना चाहिये।

हमारे देश में सबसे बड़े राष्ट्रवादी वही लोग बनते है जो देश की 70℅  सार्वजनिक सम्पत्ति में में अपना कब्जा किये है। मेरी समझ में यह नही आ रहा है कि वे व्यक्ति राष्ट्रवादी कैसे हो सकते है? जो देश की अधिकॉश सार्वजनिक सम्पत्ति में कब्जा में किये हो। देश की आपत्तिकाल में भी रखी हुयी सार्वजनिक सम्पत्ति को देश हित में नही लगाना चाहते। जबकि आम जनता से राष्ट्रवादी होने की उम्मीद करते है।
   मेरा मानना है कि देश के विभिन्न मंदिरों में जमा अकूत दौलत देश की जनता की ही तो है, फिर उसे किसी वर्ग विशेष के लोग अपना कब्जा कैसे किये है। क्या यह भ्रष्टाचार नही है। भारत सरकार ने अभी तक मंदिरों में जमा इस सार्वजनिक सम्पत्ति के लिये क्या किया? अभी तक सरकार ने जिस कालाधन का आकलन केवल लोगो की प्रवाहगत पूंजी के रूप में देख रही है,उसे मंदिरों और ट्रस्टों ने जमा बेनामी जमा,अनुप्रयोगी सम्पत्ति के खुलासे के लिये क्या किया? अनुप्रयोगी सम्पत्ति इस लिये कि क्योकि मंदिरों में जमा सम्पत्ति बाजार में प्रयोग में नही है यदि इस सार्वजनिक सम्पत्ति को बाजार में लगा दिया जाये तो देश की बेरोजगारी, गरीबी उन्मूलन, एवं आर्थिक विकास के कार्यों के उपयोग में आ जाये ऐसे यह सम्पत्ति मात्र अप्रवाह पूंजी है जिस का देश निर्माण में कोई योगदान नही है। सरकार ने आखिर क्या इस सम्पत्ति को जब्त कर देश के विकास में लगाकर व देश के ऊपर चढ़ा विदेशी कर्जे का भुगतान करके कर्ज को कम किया जा सकता है। आखिर जनता ने मन्दिरों में, ट्रस्टों में, व अन्य संस्थाओं  में जो धन दान देकर  जमा किया है। उसका उपयोग देश हित में होना चाहिये।  जनता द्वारा जमा इस सार्वजनिक सम्पत्ति का प्रयोग सरकार कब करेगी? क्या यह सम्पत्ति मात्र किसी एक विशेष वर्ग के लिये ही जमा की गयी है, अगर ऐसा है तो फिर जनता ही को इसका निर्णय करना चाहिये। आखिर राष्ट्र हित की बात है। राष्ट्र हित में जब लोगो की सम्पत्ति को जब्त किया जा सकता है तो मन्दिरों या ट्रस्टों की सम्पत्ति को क्यो नही?

भाइयों एवं बहनों विचार करो और देश के इस संकट में सार्वजनिक सम्पत्ति का उपयोग हेतु सरकार को बाध्य करे।

आपका राष्ट्रवादी शैलेन्द्र कुमार गौतम कानपुर नगर उ प्र।  9455615564

Thursday, 30 November 2017

बेरोजगार से रोजगार मिलते ही

हमारे पढ़ें लिखे, शिक्षित व नौकरी पेशा लोग, जो खुद गरीबी के दलदल से निकल कर आये हुए होंगे, इनमें से कुछ भाग्यवान होंगे जिन्होंने खुद गरीबी एहसास नहीं की होगी।

अगर इन गरीब मजदूर समाज के लोग भी नौकरी पेशा पाकर उसी तरह वैभवपूर्ण, भरपूर दान दहेज मांगकर या अपने जैसी नौकरी पेशा से विवाह करने को लालायित रहते हैं। क्या कभी इन नौकरी पेशा वाले लोगों ने इस पर ध्यान दिया कि वे भी सवर्णों की तरह पूंजीवाद के समर्थक और धनलोलुपता के चक्कर में यह भी भूल जाते हैं कि जब वे बेरोजगार थे तब कोई नौकरी पेशे वाले व्यक्ति ने अपनी कन्या का प्रस्ताव लेकर कर गया? शायद उत्तर न ही हो! उस समय उनके जीवन साथी के रूप में कोई धनाढ्य व्यक्ति अपनी लड़की को आपके पहलू में देने को तैयार नहीं था, जबकि वह इस हैसियत में था कि वह आपको कोई न कोई रोजगार करा कर अपनी लड़की को आपके पहलू पर दे सकता था। परन्तु उसने बेरोजगार हुनरमंद नवजवान के घर एक गिलास पानी पीना भी गंवारा नहीं समझा। जैसे ही गरीब मजदूर के बेटे की नौकरी लगी वैसे ही धनाढ्य व्यक्ति अपनी लड़की का रिश्ता लेकर मंडराने लगते हैं। क्या हमारे नव रोजगार प्राप्त गरीब नवजवान अपने उस अपमान को भूल गये जो चन्द सिक्कों के लालच में आकर उस व्यक्ति की लड़की को अपना जीवन साथी बनाने को तैयार हो जाते हैं जो आपके दरवाजे पर दस्तक देना तो दूर पास से निकलना गुनाह समझता था।
क्या आप भूल जाते हैं कि जो व्यक्ति अपनी लड़की के विवाह में लाखों खर्च कर करता है और भारी भरकम दहेज के खरीदकर बनियों को मजबूत करता है और आपसे कहता है कि सवर्ण बहुत बुरे होते हैं, इनसे दूरी बना कर रखो। यह व्यक्ति दान दहेज में किये  गये खर्च को  बचा कर आपको रोजगार की व्यवस्था कर सकता था पर उसने ऐसा नहीं किया। जैसे ही उसकी लड़की आपके घर आती तो सबसे पहले आपको आपके परिवार से अलग करने का षणयंत्र करती है और बेबस अपने जन्मदाताओं को तिरस्कृत करने को मजबूर होते हैं।
अगर किसी को कष्ट हुआ हो तो क्षमा करें
शैलेन्द्र कुमार बौद्ध ।कानपुर नगर

Thursday, 2 November 2017

बहुजन आंदोलन की असफलता का कारण

*🌸🌸बहुजन समाज और उसकी असफलता का कारण🌹🌹*
*बहुजन समाज के लोग अक्सर अपने आन्दोलन को विरोधात्मक स्थिति में रखते है। इस विरोधी स्वरों के कारण वह व्यक्ति या समूह सदैव सतर्क रहता है जिसके विरोध में हम आन्दोलन कर रहे होते। जिसका नतीजा यह होता है कि बहुजनों के विरोधी सदैव एक मत और एक जुट ही नहीं रहते बल्कि वह इस फिराक में रहते हैं कि बहुजनों की कमजोर कड़ी कौन है जिससे मधुर संबंध बनाकर उसे बहुजन विरोध में लगाया जा सके और वो ऐसा करने में सफल रहते हैं। मैं अपनी बात को नीचे उदाहरण से और बेहतर तरीके से समझाने की कोशिश कर रहा हूं*

🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌹
मान लो कोई नदी किसी निश्चित दिशा में बह रही है। हम उसके बहाव की दिशा को जब रोकने की कोशिश करते हैं तो हमारा सारा प्रयास नदी की धारा को बांधने में रहता। जैसे ही हम नदी की धारा को बांधने में सफल हो जाते हैं तो हमें अत्यंत खुशी होती है। जबकि हम भूल जाते हैं कि हमने नदी का बहाव रोका है न कि दिशा बदली है। साथ ही नदी के बहाव में ठहराव हो जाता है जो कि बिल्कुल ही अल्पकालिक होता है। जैसे जैसे पानी का बहाव हमारे द्वारा बांधे गए बांध की ओर बढ़ता है वैसे वैसे बांध की सीमा को पार कर नदी का बहाव थोड़ा अपनी निर्धारित दिशा में प्रारम्भ हो जाता है। और देखते फिर से पानी उसी दिशा में बहने लगता है जिस दिशा में पूर्व में बह रहा होता है। क्योंकि नदी का स्वभाव बहना है। यदि हम उसे  बांधने का प्रयास करेंगे तो कुछ समय तक बहाव भले ही रूक जाये परन्तु वह या तो हमारे बांध को तोड़ कर अपनी दिशा में बहने लगेगा या बांध के आस पास से नयी धारा बना कर बहने लगेगा और कुछ दूर बहने के बाद पुनः उसी धारा में शामिल हो जायेगा। इसका दोष नदी का नहीं बांध बनाने वाले को देना चाहिए, क्योंकि जब उसे पता था कि नदी का स्वभाव बहना है तो वह किसी न किसी दिशा में अवश्य बहेगी। तो उसे रोकने से पहले दूसरी धारा उस दिशा में बना लेना चाहिए था जिस दिशा में नदी को ले जाना चाहते हैं। जबकि हमने ऐसा न कर केवल बांध बना दिया और समझ लिया कि हमने नदी की दिशा मोड़ दिया। जोकि हमारा भ्रम है। हमें बांध बनाने से पहले जमीन खोदकर नदी बनाना चाहिए जिसमें पानी आये या न आये। और जब हम निर्धारित दिशा में नदी बना लें तब बांध बनाने का प्रयास करना चाहिए जिससे पानी में कुछ ठहराव के बाद पानी उस धारा की ओर मुड़ जाये जिस दिशा में हमने नदी खोदी है। 

ठीक नदी की तरह इस समाज का बहाव होता है जो निरन्तर अग्रसर रहता है। जबकि हम उसे भूतकाल की ओर खींचने या रोकने का प्रयास करते हैं। समाज को रोकने का सीधा मतलब ठहराव है। और कोई भी ठहराव अनंत काल तक नहीं रखा जा सकता। इसी ठहराव का नतीजा है कि समाज कुछ समय तक तो नयी व्यवस्था का इंतजार करता है जब उसे बहने की समुचित दिशा नहीं दिखाई देती तो वह पुनः अपनी दिशा में बहने लगता है। जबकि हमें सबसे पहले अनन्त सीमा में बहने वाली व्यवस्था ( राह) बनाये। या हम नदी ( समाज) की दिशा को रोकने का नहीं मोड़ने का प्रयास करें। सवर्ण कभी भी समाज के बहाव को रोकने में वक्त व संसाधन, श्रम,जाया नहीं करता बल्कि आगे से आगे व्यवस्था ( बहाव की दिशा) बनाता है जिसमें समाज को बहाना होता है। 

हो सकता है मेरे उक्त लेख से बहुजन समाज के नेतृत्वकर्ता सहमत न हों, या उनके समझ में न आया हो तो इसको स्पष्ट करने लिए मैं सदैव तैयार हूं। 

शैलेन्द्र कुमार बौद्ध कानपुर नगर
 9455615564/ 8896561604

Wednesday, 4 October 2017

जातिवाद क्यों न हो

यह यूनीवर्सल फैक्ट हैकि किसी भी काल -अवधी में इंसान का "स्वार्थी" होना स्वभावतह अनिवार्य ऐट्रिब्यूट्स [गुण] होता है और यही स्वार्थी स्वभावगत अनिवार्यता इंसान के पक्षपाती होने की तरफ यानी उसे भ्रष्ट आचरण की तरफ आकर्षित करता है जिसे किसी धर्म सिद्धांत या नैतिक सिद्धांत के शिक्षा से कम / ज्यादा किया जा सकता है. जब इंसान का ये "स्वार्थी / पक्षपाती" अनिवार्य स्वभाव या गुण अपने निजी हितों जिसमे में उसके माँ-बाप- भाई-बहन- बीबी-बच्चे व रिश्तेदारों के प्रति स्वार्थ / पक्षपात का स्वभाव उतपन्न होता है तो समाज में एक सीमित स्तर व बर्दास्त के सीमा तक के पक्षपात यानी भ्रष्ट आचरण का प्रभाव -असर रहता है जिसे संविधान या कानून के माध्यमों से नियंत्रण किया जा सकता है लेकिन जब यही पक्षपात जन्मगत आधार पर जातिगत स्वाभिमान -अभिमान के कारण जातिगत पक्षपात [जातिवाद] के तरफ इसकी व्यापकता का विस्तार हो जाता है तो समस्या बेहद गंभीर हो जाती है.
चूँकि, भारत वर्ण एवं जातिगत व्यवस्था की विशेषता वाला समाज है जिसके कारण जातिगत पक्षपात यानि जातिवाद सभी नैतिक / धार्मिक सीमाओं को लांघते हुए समाज में भयंकर व प्रचंड तबाही मचाता  है. लेकिन विडंबना हैकि इस देश में वर्ण एवं जाति की व्यवस्था को "हिंदुत्व" के छद्म धर्म के सिद्धांत के रूप में स्थापित किया जा चुका है ऐसे में इंडिया में हिंदुत्व के सिद्धांत को बगैर इंकार किये या समाप्त किये जाति व वर्ण के पक्षपात यानी जातिवाद को समाप्त नहीं किया जा सकता है.
फिर इस देश में वो कौन लोग हैं जो "जातिवाद व वर्णवाद" की जननी / माता, "हिंदुत्व" का बचाव करते हैं?
"हिंदुत्व" के गर्भ से "जातिवाद व वर्णवाद" के पक्षपात यानि भ्रष्टाचार का जन्म होता है जो इस देश के सभी सामजिक-आर्थिक-राजनैतिक- शैक्षणिक- सांस्कृतिक क्षेत्रों को प्रभावित करता है?
सोचने वाली गंभीर बात है की- [१] जब दलित [जाटव] के नाम पर जब देश / प्रदेश में बसपा जैसे किसी राजनीतिकदल की सत्ता -शासन हो तो हिंदुत्व का सर्वश्रेष्ठ लंबरदार ब्राह्मण जाटव के साथ सत्ता की मलाई का रसास्वादन करता है और गैर जाटव दलित -बैकवर्ड या अन्य, समाज के सभी क्षेत्रों में हाशिये पर रहता है?
[२] जब बैकवर्ड [अहीर] के नाम पर जब देश / प्रदेश में सपा जैसे किसी राजनीतिकदल की सत्ता -शासन हो तो हिंदुत्व का सर्वश्रेष्ठ लंबरदार ब्राह्मण अहीर के साथ सत्ता की मलाई का रसास्वादन करता है और गैर अहीर बैकवर्ड -दलित या अन्य, समाज के सभी क्षेत्रों में हाशिये पर रहता है?
[३] जब सेक्युलरिज्म के नाम पर जब देश / प्रदेश में कांग्रेस जैसे अन्य किसी राजनीतिकदल की सत्ता -शासन हो तो हिंदुत्व का सर्वश्रेष्ठ लंबरदार ब्राह्मण सत्ता की मलाई का रसास्वादन करता है और बाकी लोग कम्युनल के नाम पर, समाज के सभी क्षेत्रों में हाशिये पर रहता है?
[४]  जब कम्युनल के नाम पर जब देश / प्रदेश में भाजपा जैसे अन्य किसी राजनीतिकदल की सत्ता -शासन हो तो हिंदुत्व का सर्वश्रेष्ठ लंबरदार ब्राह्मण सत्ता की मलाई का रसास्वादन करता है और बाकी लोग सेक्युलर के नाम पर, समाज के सभी क्षेत्रों में हाशिये पर रहता है?
यानी, हिंदुत्व का ये जाति पक्ष ही इस देश की सभी सार्वजनिक व निजी बुराईयों का जड़ मूल है फिर प्रश्न निर्माण होता है की "जाति व्यवस्था" समाप्त करने की जो असम्भव है क्यूंकि हिंदुत्व ही वो सिद्धांत है जो ये दावा ठोंकता है की भगवान ने स्वर्ग में बैठकर "जाति एवं वर्ण" की व्यवस्था का निर्माण किया है फिर ऐसे में "स्वर्ग में भगवान की बनाई इस वर्ण एवं जाति व्यवस्था" को किस्मे हिम्मत है जो समाप्त कर सके?

Tuesday, 13 June 2017

बहुजन समाज की नकारात्मक विचारधारा

मैं एक दशक से बहुजन आंदोलन व बहुजन संघर्ष को देख रहा हूं। जिसमें संघर्ष का मुख्य बिंदु विरोध, आलोचना, और व्यक्तिगत​ छींटाकशी के सिवा कुछ नजर नहीं आता। बसपा सरकार इन्हीं बिन्दुओं की परिणति मात्र थी। जो समय काल के गर्त में डूबते दिख रही है। बहुजन समाज की नकारात्मक चिंतन एवं प्रतिक्रियावादी आन्दोलन/ मिशन, ब्राह्मणवादी​ व्यवस्था को मजबूती प्रदान करने के लिए पर्याप्त है।
     मैं हमेशा इस बात को लेकर चिंतनशील रहता हूं कि आखिर बहुजन समाज सांख्यिकीय​, कामगार, संघर्षशील, सहनशील होने के बावजूद सवर्ण व्यवस्था के विरुद्ध अपनी व्यवस्था क्यों नहीं खड़ी कर पा रहा है? जहां तक उसके निम्नलिखित कारण हो सकते हैं
१- स्वअनुशासन का आभाव।( Personal mastery)
२- व्यवस्था परक चिंतन का आभाव।( System thinking)
३- परम्परागत​ सोच व विचार रखना ।( Creative thought)
४- परिवर्तनशील परिस्थितियों में समायोजन का आभाव। ( Changing nature)
५-  नीतिगत व दूरदर्शी चिंतनशीलता का आभाव।
६- लोकतंत्रात्मक​ स्वभाव  होने के बावजूद लोकतंत्रात्मक व्यवस्था का निर्माण करने में अक्षम।
७- पारस्परिक अन्तर्सम्बन्धों की समझ न होना।
८- मूर्तवादी/ प्रत्यक्षवादी होना।
९- लचीलापन न होना
१०- स्वनिर्मित व्यवस्था न होना।
११- निरन्तर संघर्ष न करना।
१२- आपसी विचारों में विरोधाभास
१३- राजनीति, सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक, न्यायिक, धार्मिक, दार्शनिक चिंतक दल का न होना।
१४- समदर्शी होना
१५- शीघ्र विश्वासी या कट्टर विश्वासी होना।

Monday, 5 June 2017

American President is against globalization​ policy

वैश्वीकरण और अमेरिका​

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पेरिस समझौते के तहत अपनाई गई वैश्वीकरण नीति से अमेरिका को अलग करके, ट्रंप ने बाबा साहब अम्बेदकर की मानवतावादी और सामाजिक व राष्ट्रीय सम्प्रभुता के सिद्धांत पर मुहर लगाई है। अगर वर्तमान परिस्थितियों के अनुसार ट्रंप के इस निर्णय को देखा जाए तो कहीं न कहीं अमेरिका पूंजीवादी नीति से हटकर समाजवादी नीति की ओर चलना भी कहा जा सकता है। जिस प्रकार अमेरिका ने अपने देशवासियों के हितों को ध्यान में रखते हुए पेरिस समझौते से खुद को अलग किया है। वह नयी विश्व व्यवस्था के जाल से मुक्ति का मार्ग भी है, भारत इसी जाल को विकास का नाम देने में जुटा है। मैं अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सराहना करता हूं कि उन्होंने अपने देश हित में वैश्वीकरण की नीति से खुद को हटाने का कार्य किया। इससे वैश्वीकरण ( अप्रत्यक्ष साम्राज्यवाद) को धक्का लगा है, जिसके कारण वैश्वीकरण के समर्थक देश ट्रंप की आलोचना करने में लगे हैं। जबकि वैश्वीकरण की नीति किसी भी देश की संप्रभुता के विरुद्ध होती है।
       कोई देश अपनी जनता के हितों को ध्यान में रख कर, विदेशियों को रोजगार देने में प्रतिबंध लगाता है, तो कौन सा गलत कार्य करता है? भारत को भी अमेरिका की तरह विदेशी कंपनियों व इंजीनियरों को भारत में रोजगार के अवसर देने को प्रतिबंधित करना चाहिए और विदेशों में जाकर अपनी  सेवाएं दे रहे लोगों को वापस बुलाना चाहिए। अगर वे वापस भारत आते हैं और भारत माता के लिए कार्य करते हैं तो निश्चित ही भारत माता का सिर गर्व से ऊंचा होगा। भारत की  संप्रभुता मजबूत होगी। विदेशी तकनीकी​ के भरोसे किये जा रहे भारत विकास को भले ही कुछ दिनों के लिए धक्का लगे परन्तु स्वनिर्मित तकनीकी से भारत के समग्र, संतुलित व स्थाई विकास को बल मिलेगा। भारत में बढ़ रही बेरोजगारी को नियंत्रित किया जा सकेगा। आपने देखा होगा कि भारत ने जब से उदारीकरण निजीकरण,वैश्वीकरण, मशीनीकरण, की नीति अपनाई सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम लगातार नष्ट हो रहे हैं, इस क्षेत्र में मिलने वाले रोजगार समाप्त हो रहे हैं। इतना पढ़ने लिखने के बाद भी  नवयुवकों को रोजगार नहीं मिल रहे, इन सबकी वजह भारत सरकार की निजीकरण वैश्वीकरण मशीनीकरण की नीति है। निजी क्षेत्र में बड़े बड़े पूंजीपति अपने कार्य को सम्पादित कराने के लिए छोटे स्तर से बड़े स्तर तक बड़ी मात्रा में मशीनों की उपयोगिता लगातार बढ़ा रहे है। जिससे नवयुवक नवयुवतियों को रोजगार नहीं मिल पा रहा है। नवयुवकों को रोजगार न मिल पाने के कारण अपराध व आत्महत्याओं का ग्राफ बढ़ रहा है। निजी क्षेत्र की ही देन है कि भारत में लगातार भ्रष्टाचार बढ़ रहा है। निजी क्षेत्र के लिए कार्य करने वाले पूंजीपतियों व कर्मचारियों का मुख्य उद्देश्य किसी भी प्रकार से लाभ लेना होता है उनका देश व समाज हित से कोई सरोकार नहीं होता। यदि भारत ने अमेरिका की तरह उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण, मशीनीकरण की नीति नहीं त्यागी तो वह दिन दूर नहीं कि भारत में, विदेशी निवेशक के माध्यम से, विदेशी सत्ता स्थापित होगी। जिसका सम्पूर्ण उत्तरदायित्व भारत सरकार का होगा। शैलेंद्र कुमार गौतम कानपुर नगर 9455615564

Sunday, 14 May 2017

नोट बंदी प्रवाहित हुई विदेश को पूंजी

नोटबंदी के बाद नोट छपाई में व्यय ११ हजार करोड़, ATM Trey १५९६ करोड़, किसान कर्ज माफी ३६३५९ करोड़ रुपये के साथ बड़े कर्जदार पूंजीपतियों के ३०००००(तीन लाख ) करोड़ रुपए की कर्ज माफ किया गया। जिसकी भरपाई के लिए आम जनता से करने के लिए सरकार व बैंक निम्न तरीके से करने की योजना बनाई-
१- न्यूनतम बैलेंस शुल्क।
२- ट्रांजिट शुल्क।
३- एप के माध्यम से मनी ट्रांसफर करने पर शुल्क।
४- सेवा कर
आदि तरीकों से वसूली प्रारंभ कर दी है। आम जनता सोचती है सरकार देश हित में कार्य कर रही है पर वास्तविकता​ कुछ इस प्रकार है।
१- नोट छपाई हेतु कागज का आयात विदेशियों से किया जाता है। जिसमें भारतीय धन का प्रवाह विदेशो को हुआ।
२- ATM Trey  का आयात विदेश से । भारत की पूंजी विदेश को प्रवाहित हुई।
३- बड़े कर्जदार पूंजीपति भारत से कर्ज लेकर विदेश फरार। भारत की पूंजी का विदेश को प्रवाहित हुई।

इसी प्रकार सरकारें​ विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को आमंत्रित कर भारतीय संसाधनों का अंधाधुंध दोहन की अनुमति देकर भारतीय संसाधनों को विदेश प्रवाहित करने में लगी है।

उपरोक्त तथ्यों के आधार पर आप खुद आकलन करें कि भारत में क्या हो रहा है? आम जनता की जानकारी से दूर ये तथ्य देश हित के है या अहित के आपको सोचना है।

Wednesday, 26 April 2017

Reason of India and Pakistan u dividation

अक्सर जब हम इतिहास की बात करते हैं तो हमसे उसके साक्ष्य मांगे जाते हैं। जो अपनी बात को सिद्ध करने के लिए जरूरी है। पर मैं जानना चाहता हूं कि जो लेख हमारे पास है वे कहां तक सत्य है? हम वर्तमान की घटनाओं पर गौर करें तो पाते हैं कि घटना का हमें जो कारण बताया जाता है वास्तव में उससे भिन्न होता है। जैसे ब्राह्मणों ने पूरे भारत की सत्ता पर, छल कपट धोखाधड़ी, भेदभाव, धार्मिक जातीय भावनाओं आदि के सहारे, काबिज रहे और है। पर मान्य इतिहास में कहीं भी इसका वर्णन नहीं मिलता। तो हम यह कैसे मान ले कि हमारे सामने हमारे इतिहास को परिलक्षित करने वाले जो लेख, साहित्य, मौजूद है वह पूर्णतया सही व गलत है? फिर इतिहास की अनेकों घटनाएं ऐसी है जिनका वास्तविक कारण कुछ और है बताया कुछ और जाता है। जैसा कि अनेक मामलों में आज भी होता है। जैसे बहू ने आत्महत्या किसी भी कारण से की हो पर आरोप दहेज प्रताड़ना का ही लगता है। जब ऐसी छोटी छोटी बातों की असलियत बदल जाती है तो उस समय जब अधिकांश जनता अनपढ़ थी तो वास्तविक तथ्य क्यों नहीं छिपाए गये होंगे?

आइये थोड़ा भारत पाक बंटवारा की ओर इशारा करते हैं- अक्सर यह कहा जाता है कि भारत पाक विभाजन जिन्ना गांधी की जिद व धार्मिक कारणों से हुआ। पर मैं इस से इन्कार नहीं करता हूं कि जो हमें बताया गया है वह पूर्णतया गलत है। पर मेरा मानना इस बंटवारे के पीछे कुछ और ही वजह है जिसे चालाक राजनीतिक लोग छिपाए बैठे हैं। आइये इस बंटवारे के पीछे कुछ सांस्कृतिक रिवाज, प्रेरणा स्थलों व लोगों की ऐतिहासिक चेतना के सन्दर्भ में देखते हैं। आज अगर हम भारत की परम्पराओं को गौर करें तो हमारी बहुत सी परम्पराएं  सैंधव सभ्यता से मिले प्रतीकों से मिलती जुलती है जिन्हें लोग विभिन्न अनुष्ठानों​, रीति-रिवाज परम्पराओं के रूप में रक्षित किये है पर उनका इतिहास में कहीं वर्णन नहीं है। हम सब यह अच्छी तरह से जानते हैं कि सैंधव सभ्यता के अधिकांश अवशेष वर्तमान पाकिस्तान में है। जहां अधिकांश मुस्लिम लोग हैं। वहीं इस सभ्यता से प्रेरणा लेने वाले लोगों भारत में है, जहां पर ये एतिहासिक प्रेरणा स्थल नहीं है। कहते हैं कि 1842 में मैसन ने सिंधु घाटी की सभ्यता की ओर इशारा किया। अर्थात सबसे प्राचीन इतिहास वैदिक इतिहास है के मिथक तो तोड़ा। लोगों का दिमाग अपनी ऐतिहासिक स्थलों​ की ओर न जाये इसलिए अंग्रेजों के विरुद्ध विभिन्न छोटे छोटे संघर्ष शुरू कराये गये जिनका अधिकांश नेतृत्व आदिवासियों ने किया। और इन भोले-भाले आदिवासियों ने मैसन को न सुना न जान पाये न ही इन्हें सिंधु घाटी की सभ्यता से कोई लेना-देना रहा।
जब 1922-23 में इस सैन्धव सभ्यता को खोजकर अंग्रेजों ने भारत के पटल रख दिया और वैदिक इतिहास की प्राचीनता को चुनौती देते हुए1928 में सिन्धु घाटी की सभ्यता को सर्वाधिक प्राचीन घोषित कराया। तो उसी समय ब्राम्हणों ने अपनी नस्ल की श्रेष्ठता को बनाए रखने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की गई जिसने भारतीय लोगों के बीच में हिन्दू धर्म नाम का नया धर्म लाकर खड़ा कर दिया ताकि लोगों का ध्यान सिंधु घाटी की गरिमामयी सभ्यता की ओर लोगों का ध्यान न जाते। उन लोगों ने बड़ी चालाकी से लोगों की मनोदशा हिंदू शब्द से जोड़ने के लिए सिंधु को हिन्दु कहकर सिंधु को गाली बना डाला गया। जिसका परिणाम यह हुआ कि आज भारतीय अपनी मूल सभ्यता सिंधु घाटी की सभ्यता को भूल गए और अपनी प्रेरणा का स्रोत देवी देवताओं को मानने लगे। आज अधिकांश भारतीयों के प्रेरणा स्रोत सिंधु घाटी से प्राप्त अवशेष होने चाहिए परंतु जानकारी के आभाव में हिन्दू मंदिर व देवी देवता बने हैं जो मूलतः यूनानी धर्म के है। सैन्धव सभ्यता की जानकारी हमेशा के लिए भारतीयों के मन मस्तिष्क में न आने पाए  इसलिए भारत पाक विभाजन कर अधिकांश सैन्धव सभ्यता के स्थल पाकिस्तान को दें दिये गये । और वर्तमान में भारत में पाकिस्तान विरोधी माहौल बना कर खड़ा कर दिया गया ताकि यहां के लोग अपने मूल उदगम क्षेत्र सैन्धव सभ्यता के स्थलो का भ्रमण करने की हिम्मत न कर सके और हमेशा हमेशा के लिए उस सैन्धव संस्कृति को लोग भूल जाये जिसे उनके पूर्वजों ने बनाकर तैयार किया था। उनके दिमाग से इस बात को​ हमेशा के लिए हटा दिया जाए कि हमारे पूर्वज ही इस सभ्यता के जनक थे। भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान को भारत से अलग करने का षणयंत्र इसलिए रचा गया, ताकि भारत के लोग कालांतर सिंधु सभ्यता को भारत की सभ्यता  न मानकर पाकिस्तान और अफगानिस्तान की मानते हुए अपने ही पूर्वजों की सांस्कृतिक विरासत से  घृणा करने लगे और पुुः इस बात को स्थापित किया जा सके कि वैदिक इतिहास ही सबसे पुराना इतिहास है। भारत के बंटवारे की तत्कालीन परिस्थितियां पैदा करना भारोपीयों की बहुत बड़ी मिलीभगत थी। जिसका परिणाम हमेशा हमेशा के लिए भारत की सभ्यता कहीं जाने वाली पाकिस्तानी विदेश अफगानिस्तान की बनकर रह
जायेगी।
मेरा लेख पूर्णतया वैचारिक व स्वसंस्कृति के महत्व को ध्यान में रखकर लिखा गया है। मेरी किसी को चुनौती देना या हर्ट करना नहीं है।
शैलेंद्र कुमार गौतम कानपुर नगर उ० प्र०
Mob 9455615564

Tuesday, 25 April 2017

वैज्ञानिक विकास ही विनाश का करना

वैज्ञानिक व डाक्टरों ने जिस तरह विकास के नाम पर खाद्य श्रृंखला को दूषित कर दिया है। उससे जीव- जन्तुओं का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है। आज यदि बीमारियों को गौर किया जाए तो मधुमेह, हार्टअटैक, ब्रेनअटैक, जैसी बीमारियों का बड़ी तेजी से इफाजा हो रहा है। इन सबके पीछे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न संक्रामक बीमारियों के नियंत्रण के नाम पर चल रहे स्वास्थ्य सेवाओं की आढ़ में मनुष्य को नष्ट करने की साजिश रच दी गई है। जिसे समझना व इससे झुटकारा पाना असंभव सा हो गया है।

Saturday, 22 April 2017

दुख का कारण खोजें

अपना कार्य, अपने बुद्धि, विवेक व  परिस्थितियों के अनुसार करना ही बुद्ध का संदेश है।


इस आधार पर जो व्यक्ति बुद्धिमान हैं, वह​ बौद्धिष्ट है।


बोधिसत्व बुद्ध कहते हैं कि दुख है तो दुख का कारण, कारण है तो निवारण है।

समस्या यह नहीं है कि विरोधी चालाक व धूर्त है। समस्या यह है कि यह हम जानते हुए भी उसके बहकावे में आ जाते हैं।

मान लो आप किसी रोग से पीड़ित हैं जिसका इलाज के लिए दवा आप स्वयं न कर किसी दूसरे से अपेक्षा करते हैं कि वह दवा खा ले, जो कि संभव नहीं। अगर मान लो कि दूसरे ने दवा खा भी ली तो उससे आपका इलाज कैसे होगा। अगर अपना इलाज करना है तो दवा आप ही को लेनी पड़ेगी।


एक अन्य तथ्य
 जब बाबा साहब अंबेडकर का समय था तब लोगों को टी बी, प्लेग, भुखमरी, छुआछूत,जैसी समस्याएं थीं, तब उन्होंने समाज में व्याप्त उन बीमारियों का इलाज किया आज बीमारियां बदल चुकी है, एड्स, कैंसर, कूटनीति चालाकी, बेरोजगारी, शिक्षा का बाजारीकरण, निजीकरण वैश्वीकरण, मशीनीकरण उदारीकरण, डिजिटलीकरण​ जैसी समस्याएं खड़ी हो कर​ दी गयी है, तो मैं जानता चाहता हूं कि  इनके इलाज के लिए बाबा साहब की टी बी, छुआछूत, भुखमरी की कौन सी दवा काम करेगी?
तीसरा तथ्य जब कांसीराम ने अपना मिशन चलाया उस समय बाबा साहब अंबेडकर को व उनके कार्यों को कोई नहीं जानता था, इस लिए यह आवश्यक था कि जगह जगह अम्बेदकर जयन्ती मनाने का कार्यक्रम चलाया गया। लेकिन आज की समस्या यह नहीं है कि भारत का हर नागरिक बाबा साहब अंबेडकर को व उनके योगदान को न जानते हों?
हमें​ अपना संघर्ष व कार्य  उन क्षेत्रों में करना होगा जो आज के लिए जरूरी है। यहीं पर हमें बुद्ध के उस उपदेश की जरूरत पड़ती है जिसमें वे कहते हैं कि दुख है तो दुख का कारण है कारण खोजें बिना यदि हम कार्य करते हैं तो हमें सफलता नहीं मिलेगी। दुख के कारण को समझ लिया तो निवारण निश्चित हो जायेगा। जिसे बहुजन समझना नहीं चाहता और जिसने समझ लिया उसका दुख दूर हो गया।

Monday, 17 April 2017

नौनिहाल क्यों हो जाते है, अपनो के विरुद्ध

मैं यह नहीं कहता कि हम अपने इतिहास को भूले। पर मैं यह भी नहीं कहता कि इतिहास को ही सब कुछ माने।
हम आज की परिस्थितियों को समझें और भविष्य का प्लान बनाये।
बहुत से लोग मेरी इस बात से इत्तेफाक नहीं रखेंगे। फिर भी मैं कहना चाहूंगा कि। हम जो शिक्षा अपने बच्चों को दें रहे हैं। क्या वह शिक्षा बच्चे को बुद्धजीवी बनाने वाली है, या फिर शासकों​ द्वारा मस्तिष्क नियंत्रण करने वाले शिक्षा दिला रहे हैं।

मैं यह बात यूं ही नहीं कह रहा हूं। आपने देखा होगा कि आपका अपना बच्चा जिसे तीन साल की उम्र में ही पी जी से पढ़ने के लिए मंहगे से मंहगे विद्यालय में भेजते हैं फिर हमारा अपना बच्चा एक निश्चित उम्र में आकर आपकी बात की कद्र नहीं करता है। जानते हैं आपका अपना बच्चा, जिसे आपने पढ़ाने लिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी, वह आपके विरुद्ध खड़ा हो जाता है। उसका सबसे बड़ा कारण आपके द्वारा तीन वर्ष की आयु में विद्यालय भेजना है। जो उम्र में बच्चे की शारीरिक व भावात्मक विकास की होती है उस उम्र में शासकों द्वारा निर्धारित पाठ्यक्रम में फंस जाने के कारण उसका संवेगी विकास प्रभावित होता है। जिस प्रकार आप बच्चे के संवेग को समझें बगैर जबरन तीन साल की उम्र में अपने वात्सल्य से दूर कर उसे संवेदना हीन बनाते हैं, ठीक उसी तरह एक निश्चित उम्र में आकर वह स्वयं आपसे दूर हो जाता है। आज की शिक्षा पूर्णतया सुनियोजित शिक्षा है जो कि विश्व नियंताओं द्वारा निर्धारित की गई है।जिसके माध्यम से वे भावना रहित मानव का निर्माण कर रहे हैं।

आज कल हम जिसे शिक्षा समझ कर अपने बच्चों को दिला रहे हैं वास्तव में वह creative education न होकर tool of controlling education है जहां बच्चे को पढ़ाने लिखाने के नाम पर ऐसी शिक्षा दी जाती है जिससे बच्चे का बौद्धिक स्तर  खोजी न होकर आश्रित हो जाए। 
         हो सकता है मेरी यह बात हर किसी के समझ में न आये या मेरी बात से आप सहमत न हों।  परन्तु मैं एक शिक्षक होने के नाते  बच्चो, नौजवानों और समाज, परिवार का आकलन करने के उपरांत इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि हम अपने बच्चों को शैशवास्था में (2 से 5 वर्ष) ही विद्यालय में भेज देने का परिणाम यह होता है कि बच्चे का शारीरिक और मानसिक विकास बाधित हो जाता है। बच्चे को कम उम्र में ही जानकारियों का भण्डार हो जाता है परन्तु उस जानकारियों का जीवन में उपयोगिता सुनिश्चित करने की क्षमता नष्ट हो जाती है। 

      जरा खुद सोचो कि आपको क्या तीन चार वय की उम्र में बतायी गयी कोई बात या साधारण घटना याद है? जहां तक मेरा निजी अनुभव है कि मुझे तो उक्त उम्र का कुछ भी याद नहीं है। हम यह भूलते जा रहे कि बच्चे की परवरिश, शैक्षिक व बौद्धिक विकास के असली मायने क्या है! जिस उम्र में हम अपने बच्चों को स्कूली शिक्षा के लिए कठोर अनुशासन में विद्यालय को सौंप देते हैं वह उम्र स्कूली शिक्षा से अधिक महत्वपूर्ण बच्चे की सामाजिक, सांस्कृतिक और शारीरिक क्षमता के विकास की उम्र होती है। उपरोक्त विकास अधिक से अधिक आउटडोर गेम्स खेलने, नाते रिश्तेदारों व आप पास के पड़ोसियों, मित्रों से सम्पर्क से होता है। जिसे हमने स्वयं बच्चों को घरों में कैद कर या कक्षा, किताब  तक सीमित क समाप्त करने में लगे हैं। यह विषय बहुत ही जटिल और सोचनीय है कि हम बच्चों को क्या सौंप रहे हैं। आप वर्तमान पीढ़ी का अध्ययन करें असहनशीलता, अपराधी प्रवृत्तियां, डिप्रेशन, समस्याओं का सामना करने की क्षमताओं का पतन तेजी से हो रहा है। यह  सब हमारी सोच और अन्धानुकरण का नतीजा है। जिस उम्र में बच्चे को लाड़-प्यार, दुलार, अपनों का साथ चाहिए उस उम्र में हम उसे व्यवसायिक शिक्षालयों में सौंप देते हैं।  जरा आप खुद सोचो जब आप बृद्ध या बीमार हो और इस स्थिति में न हो कि एक गिलास पानी उठाकर ले सके तब आपकी सोच यही होगी आपका कोई बेटा बेटी आपके साथ हो और आपकी देखरेख करें पर आपके अपने बेटे आपको सक्षम होते हुए भी एक गिलास पानी देने के लिए आपके पास नहीं होंगे, जानते हैं क्यों? क्यों कि यह सब आपने आधुनिकता व शिक्षा के नाम पर अपने बच्चों को दो-तीन वर्ष की अवस्था में ही जो दिया था वहीं वह आपको वापस कर रहा होता है। जिस तीन वर्ष की उम्र में आपके बच्चे को प्यार दुलार के साथ उछल कूद की आवश्यकता थी उस उम्र में आप अपने बच्चे को शिक्षा के नाम पर उसे विद्यालय भेजकर अपने लाड़-प्यार से दूर रखा और आपने अपने बच्चों के साथ कोई भी हमदर्दी नहीं रखी तो फिर वही बेटा आपके साथ क्यों हमदर्दी रखें। जिस प्रकार आपने अपने बच्चों को सर का बोझ समझकर व्यवसाय में लिप्त आकर्षित करते विद्यालयों को सौंप दिया था जहां वह अबोध बच्चा आपके प्यार व मां की ममता को तरसता रहता होगा ठीक उसी प्रकार जब आप एक गिलास पानी लेने को तरस रहे होते हैं तब वहीं बच्चा जिससे आप एक गिलास पानी की उम्मीद कर रहे होते हैं आपसे बड़े प्यार से कहता है कि पापा नौकर आ गया है जो आवश्यकता हो ले लेना। सोचो उस समय आपके दिल में क्या गुजरती होगी जिस औलाद को आपने इस उम्मीद से पाला था कि मेरे बुढ़ापे का सहारा बनेगा पर वह भी आपकी तरह भावना रहित होकर भौतिक संसाधनों के पीछे दौड़ रहा होता है। यह सब हमारी ही सोच और कर्मों का नतीजा है। हमें सोचना होगा कि हमें हमारे बच्चे कैसे हों? हमारा समाज कैसा हो? देश कैसा हो, देश के नागरिक कैसे हो? जैसा हम चाहते हैं पहले हमें खुद वैसा ही बनना पड़ेगा। 
 जय भारत भूमि
सर्वे मंगलं भवतु।।
स्वामी संबोधि आनंद।

Sunday, 16 April 2017

Responsibility of teacher

अगर सभी महापुरुषों की जयन्तियों में विद्यालय खोले जाते, उनके जीवन के बारे में अपनी आने वाली पीढ़ी को ज्ञान हस्तांतरित किया जाये तो इसमें बुरा ही क्या है? रही बात १२० दिन विद्यालय खुलने की , तो बता दूं कि १२० दिन भी ही विद्यालय खोलकर पढ़ाई नहीं होती है।  विद्यालय खुलने का समय 8:30am है। कुछ विद्यालयों​ को छोड़कर शिक्षक के विद्यालय पहुंचने का समय 9 am से 10  am के बीच रहता है। शिक्षण कार्य बंद होने का समय 3 pm है। विद्यालय 2:30 से 3 pm के मध्य हरहाल में बंद हो जाते हैं। मध्यावकाश का समय 30 मिनट होता है पर समाप्त एक घंटे में होता है। इस प्रकार शिक्षक  4से 5 व 3 से 4घंटे कार्य करता है। RTE के मुताबिक प्रतिदिन शिक्षक को साढ़े सात घंटे रुकना है। रुकता 3 से ५ घंटे है। अब आप पूरे वर्ष काम आंकड़ा खुद निकालो शिक्षक कितने दिन कार्य करता है। अरे भाई जरूरी नहीं कि जो व्यवस्था हमारे लिए समस्या लग रही हो वह देश के लिए हितकारी न हो। शिक्षक ही तो है जो समाज के सामने आदर्श प्रस्तुत करता है। अगर गहराई से चिंतन करें तो विदेशी आक्रांता व कंम्पनियां शिक्षक से ही तो घबराती है। आज शिक्षक ने अपनी जिम्मेदारी वहन करना बंद कर दिया है। जिसका नतीजा देश फिर से गुलामी की ओर बढ़ रहा है। शासक का तो काम है लोगों को गुलाम बनाये रखना। वह चाहे देशी हो या विदेशी। पर शिक्षक का कार्य है शासक पर लगाम लगाये रखना। वह घर का हो या बाहरी। इसी लिए अमेरिका जैसे देश भारतीय शिक्षक से घबराता है। परन्तु क्या कहा जाए शिक्षक को, क्योंकि मैं भी शिक्षक हूं, चाटुकारिता की हद ही पार कर दी है। निजी शिक्षक जनता को जी भर के चूस रहे हैं सरकारी शिक्षक अपनी जिम्मेदारियों से भाग जिसका रहे हैं। नतीजा है कि एक अदना सा तहसील का चपरासी, लिपिक हमें एक मात्र फोन से अपने कार्य को कराने के लिए बुला लेता है और न जाने पर कार्यवाही की धमकी देता है। एक  नेता  हम पर उंगलियां उठा रहा है। हम वह शिक्षक रहे हैं जो एक निरंकुश राजा को भी नियंत्रित करते थे ये तो लोकतंत्र वाले शासक इन्हें नियंत्रण में रखना  कौन बड़ी बात है। बस हम अपने दायित्वों का निर्वाहन करने लगे।
 हमने पूर्व भी लिखा था कि

जब शिक्षक चाटुकार हो जाये तो समाज भ्रष्ट हो जाता है। और जब राजा व्यापारी हो जाये तो देश नष्ट हो जाता है।

आज जो हम शिक्षकों​ पर उंगलियां उठा रहे​ है ये हमारे तलवे चाटते नजर आयेंगे। केवल हम अपनी जिम्मेदारियों का सही से निर्वाहन करने लगे। शिक्षक का कार्य केवल पढ़ाना ही नहीं बल्कि सही और गलत को समाज के सामने रखना भी है, समाज को सही मार्ग दिखाना भी है।

भाइयों व बहनों जिनको मेरी बातों से उनके आत्म सम्मान को ठेस लगी हो माफ करना।

Saturday, 15 April 2017

सिंधुत्व

सिन्धुत्व के बारे में कहा जाता है कि यूनानी सिंधु नदी को इण्डस कहते थे जिसके कारण  जम्बूद्वीप  को इण्डिया कहा जाने लगा। बाद में आर्यों ने, जो भारोपीय  व हिब्रू भाषियन समूह के आक्रांता थे, सिंधु को हिंदु कहकर पुकारते थे। क्योंकि वे ''स' का उच्चारण 'ह' करते थे । जिसके कारण सिन्धु को वे हिंदु कहकर पुकारते थे। ऐसा ब्राह्मण विद्वानों​ का मानना है।

जहां तक मेरा चिंतन मनन है ब्राह्मणों का यह तर्क बड़ा ही षणयंत्रकारी और साजिश से भरा लगता है। अगर ब्राह्मणों ( आर्यों) को ' स' का उच्चारण नहीं आता था तो वेदों पुराणों में जगह जगह 'स' का प्रयोग कैसे कर लिया? हालांकि इस प्रश्न से भी बचने के लिए उन्होंने उपाय खोज लिया कि हिंदु शब्द मध्यकालीन आक्रांताओं​ का दिया हुआ है। तो फिर आपने सिंधु को हिंदु क्यों मान लिया।
उनके इन सभी तर्कों के समक्ष यह. बात स्वयं सिद्ध होती है कि हिंदु एक विदेशी शब्द है। जिसे स्वीकृत करना देशद्रोह से कम नहीं​है।
अब आते हैं कि सिंधत्व पर हिंदुत्व का आवरण कैसे हैं?

अगर आप वर्तमान में हिंदुओं द्वारा अपनाई जा रही अनेकों विद्याएं जो मूलतः सैन्धव सभ्यता की है और वहां से प्राप्त अवशेषों में भी मिली है। जिन पर ब्राह्मणवाद​ का लेपन कर, सनातन धर्म, सनातन संस्कृति आदि के नाम से समाज को परोसा गया। और आप सूक्ष्म दृष्टि से अवलोकन करें तो आज भी बहुजनों के कार्यों का ब्राह्मणीकरण कर पेश किया जाता है। आप ने पढ़ा होगा कि बुद्ध, कबीर, रविदास,आदि अनेकों बहुजन महापुरुषों का ब्राह्मणीकरण कर डाला। सिंधु घाटी सभ्यता से प्राप्त योगी की प्रतिमा को शिव से, स्वास्तिक, व सतिया का चिन्ह,जो कि ऊर्जा का प्रतीक,व सूर्य व पृथ्वी के घूर्णन का प्रतीक होता था, उसे शुभ लाभ का प्रतीक बना दिया। और उस पर पाखण्ड का लेपन कर सैन्धव विज्ञान को नष्ट करने में सफल रहे।

यह. बहुत बड़ा विषय है जिस पर चर्चा परिचर्चा करने के लिए आमने सामने होना आवश्यक है।
डिजिटल इण्डिया, निजीकरण, वैश्वीकरण, उदारीकरण, मशीनीकरण आदि की नीति अपनाने के पीछे मुख्य कारण भारत में अमीर व गरीब ( शोषक,व शोषित) वर्ग बनाना। मध्यम वर्ग को नष्ट करना। क्योंकि​ किसी भी सत्ता को सबसे बड़ा खतरा मध्यम वर्ग से रहता है।

Thursday, 13 April 2017

क्या हम जानते​है अम्बेदकर मिशन क्या है?

इस अम्बेदकर जयन्ती की बधाईयों को लेकर मैं क्या करूं।
उस समय ये बधाइयां और चुभती है जब दुश्मन बाबा साहब अंबेडकर की बनाई व्यवस्था को नष्ट कर रहा हो और हमारे समाज के कर्णधार व्यवस्था के नष्ट होने पर चुप्पी साधे हो। और बाबा साहब अंबेडकर की तस्वीर गले में टांग गाने,बजाने व मौज मनाने में लिप्त हो। क्या नाचना,गाना, मौज मनाना ही अम्बेदकर का मिशन है।

आज बड़े जोर जोर से बहुजन माइक लगाकर चिल्ला रहे हैं "बाबा तेरा मिशन अधूरा, हम सब मिलकर करेंगे पूरा"।

बड़ा ही आश्चर्य होता है कि हम खुद यह मानते व कहते हैं कि बाबा साहब अंबेडकर का मिशन अधूरा है।  हमारा दुश्मन कहता है तो क्या बुरा करता है।


अगर बाबा साहब का मिशन अधूरा होता तो पूरा भारत उनकी बनायी व्यवस्था में रहकर अपना विकास न कर रहा होता। बाबा साहब के मिशन को पूरा करने की नहीं बढ़ाने की जरूरत है।  जोकि नाचने, गाने, खाने पीने मौज मनाने से नहीं चलने वाला। इसके लिए हमें वर्तमान परिस्थितियों, व्यवस्था को समझते हुए अवसर तलाशने से पूरा होगा।

क्या हम जानते​है अम्बेदकर मिशन क्या है?

इस अम्बेदकर जयन्ती की बधाईयों को लेकर मैं क्या करूं।









उस समय ये बधाइयां और चुभती है जब दुश्मन बाबा साहब अंबेडकर की बनाई व्यवस्था को नष्ट कर रहा हो और हमारे समाज के कर्णधार व्यवस्था के नष्ट होने पर चुप्पी साधे हो। और बाबा साहब अंबेडकर की तस्वीर गले में टांग गाने,बजाने व मौज मनाने में लिप्त हो। क्या नाचना,गाना, मौज मनाना ही अम्बेदकर का मिशन है।

आज बड़े जोर जोर से बहुजन माइक लगाकर चिल्ला रहे हैं "बाबा तेरा मिशन अधूरा, हम सब मिलकर करेंगे पूरा"।

बड़ा ही आश्चर्य होता है कि हम खुद यह मानते व कहते हैं कि बाबा साहब अंबेडकर का मिशन अधूरा है।  हमारा दुश्मन कहता है तो क्या बुरा करता है।


अगर बाबा साहब का मिशन अधूरा होता तो पूरा भारत उनकी बनायी व्यवस्था में रहकर अपना विकास न कर रहा होता। बाबा साहब के मिशन को पूरा करने की नहीं बढ़ाने की जरूरत है।  जोकि नाचने, गाने, खाने पीने मौज मनाने से नहीं चलने वाला। इसके लिए हमें वर्तमान परिस्थितियों, व्यवस्था को समझते हुए अवसर तलाशने से पूरा होगा।

Sunday, 9 April 2017

बुद्धत्व क्या है

सिन्धुत्व पर विदेशियत व पाखण्ड का आवरण( overlapping) करना छ हिंदुत्व है। इस पाखण्ड व आवरण को हटाना बुद्धत्व है।
शैलेंद्र कुमार गौतम कानपुर नगर।

Hindu dharm ki jatiyata

मैंने दुनिया के अनेकों धर्मों के बारे में पढ़ा और सुना है, सभी धर्मों की​ कोई न कोई गाइड लाइन ( शिक्षाएं) अवश्य निर्धारित है। परन्तु मुझे आज तक किसी ने सनातन धर्म या हिंदू जीवनशैली की कोई सामान्य शिक्षाएं नहीं बतायी गयी, जो सभी पर समान रूप से लागू हो।
    कई बार लोगों से चर्चा परिचर्चा व अध्ययन के दौरान जानकारी मिली कि हिंदू धर्म नहीं जीवनशैली है। सनातन धर्म क्या है इसकी शिक्षाएं क्या है? इसका प्रवर्तक कौन है? कोई भी बताने की स्थिति में नहीं मिलता। जो कुछ विद्वानों ने बताया उनमें से अधिकांश शिक्षाएं सैंन्धव से जैन धर्म व बौद्ध धर्म से चुराई लगती है। अगर ऐसा है तो स्वयं को हिंदू कहने वाले लोगों का वास्तव में कोई धर्म नहीं है। हां जातियों का उर्ध्वाधर विभाजन जरूर मिलता है। जिसमें कुछ जातियां सम्पूर्ण समाज की ठेकेदार होती है। जो अधिकांशतः​ अपने वर्ग का हित साधती है। शेष जातियां वर्ग संघर्ष में लगी रहती है।

Friday, 31 March 2017

हिंदुत्व क्या है?


आज तक किसी न इतनी सटीक परिभाषा किसी ने नहीं दी होगी।




यहूदियों द्वारा भारतीय मूलनिवासियों को दास व बुद्धि​हीन बनाये रखने की सर्वोत्तम व्यवस्था है।


यह भावी डिजिटल मुद्रा की तरह है जिसका अस्तित्व तो कहीं नहीं है पर जो इसका उपयोग करेगा वह अपनी कमाई का कुछ न कुछ हिस्सा अवश्य देना पड़ता है। जिसका फायदा निजी क्षेत्र को होता है। जिस प्रकार निजीकरण में मूलनिवासी नौकर चाकर तो बन सकते है पर वे मालिक नहीं बन सकेंगे। ठीक उसी तरह  हिंदू धर्म को मानने वाले भक्त तो बन सकते है पर धर्माधिकारी नहीं बन सकते।

जिस प्रकार निजी क्षेत्र के लोग भारतीय संसाधनों का भारतीय नामों के माध्यम से बड़ी चालाकी से अंधाधुंध उपयोग अपने हितों के लिए कर रहे हैं। ठीक उसी तरह यहूदियों ने भारतीय​ बौद्ध धर्म, दर्शन, संस्कृति को भारतीय नामों के माध्यम से भिन्न भिन्न तरीकों से थोड़ा बहुत परिवर्तन कर अपने हितों में प्रयोग किया।
इसे संविधान की उद्देशिका से भी समझा जा सकता है।
संविधान की उद्देशिका में समाजवादी लोकतंत्र शब्द का प्रयोग किया गया है। पर जवाहरलाल नेहरू ने समाजवाद को छोड़कर पूंजीवाद व औद्योगिकीकरण​ की नीति अपनाई जिससे भारतीय मूलनिवासी नौकर चाकर बनकर रह गया है।
हमें देशी बनाम विदेशी की लड़ाई लड़नी चाहिए।
हमें सार्वजनिक बनाम निजीकरण की लड़ाई लड़नी चाहिए।
हमें कृषिकरण बनाम औद्योगिकीकरण​ की लड़ाई लड़नी चाहिए।
हमें युवा व रोजगार की लड़ाई लड़नी चाहिए।
हमें मशीन बनाम मानव विकास की लड़ाई लड़नी चाहिए।
हमें समाजवाद​ बनाम पूंजीवाद की लड़ाई लड़नी चाहिए।
हमें पर्यावरण बनाम प्रदूषण की लड़ाई लड़नी चाहिए।
हमें लोगों के स्वास्थ्य के लिए लड़ना चाहिए।
पृथ्वी के बढ़ रहे ताप के विरूद्ध आन्दोलन करना चाहिए।
हमें विदेशी व देशी कंपनियों द्वारा  भारतीय संसाधनों के अन्धाधुन्ध दुरूपयोग के विरूद्ध संघर्ष करना चाहिए।
हमें पार्टियों के निजी एजेण्डाओं के विरूद्ध व संवैधानिक एजेण्डा के पक्ष में लड़ना चाहिए।
हमें धर्म व जाति के विरूद्ध धर्मनिरपेक्षता की लड़ाई लड़नी चाहिए।

शूद्रों ​ने इस्लाम क्यों अपनाया

जब ब्राह्मणों ने बौद्ध धर्म को नष्ट कर हिन्दू धर्म को स्थापित कर अपना पाखण्ड, अन्धविस्वास, जातिवाद को बढाकर इस देश के मूलनिवासी पर अत्याचार,:जुल्म इस कदर बढाता कि विश्व इतिहास में कही इस प्रकार का कोई उदाहरण नही मिलता। ब्राह्मणों के इस अत्याचार से बचने के लिए मूलनिवासियों को सशक्त सहारे की जरूरत थी, ऐसी परिस्थितियों मे उन्हें सबसे बेचा सहारा इस्लाम धर्म ने दिया। जो लोग इस्लाम धर्म अपना लिये उनकी रक्षा इस्लाम ने बखूबी किया और आज भी अपने अनुयायियों की रक्षा कर रहे। जबकि हिन्दू धर्म में आज भी ब्राह्मण अपने ही अनुयायियों पर अत्याचार, भेदभाव करते है। जिस तेज गति से मूलनिवासी इस्लाम धर्म को अपनाया उसका परिणाम इस देश में इस्लाम तेजी सर बढा और मजबूत हुआ। कहने का तात्पर्य यह है कि इस देश का मुस्लिम वो मूलनिवासी है जो ब्राह्मणों के अत्याचार से बचने के लिये इस्लाम को अपनाया इस बात के प्रमाण आज भी मौजूद हैं जैसे ब्राह्मण जिस प्रकार शूद्रो से भेदभाव, नफरत, छुआछूत, उसी प्रकार मुस्लिमो से करते है। जब ब्राह्मणों ने खुद को इस्लाम को नष्ट करने मे अक्षम पाया तो वे भी इस्लाम धर्म अपना कर घुसपैठी बन गये तथा इस्लाम मे मौलवी,मुल्ला बनकर इस्लाम मे अनेको विकृतियां पैदा कर दी। जिसका परिणाम इतने घातक साबित हुये कि हिन्दू धर्म के ब्राह्मण. और इस्लाम के मुल्ला  मौलवी दोनो ने मिलकर खूब कत्लेआम,  कराया, तथा इस देश मे इस्लाम और मूलनिवासियो के  मध्य नफरत की मजबूत दीवार खड़ी करने मे सफल रहे।

Sunday, 19 March 2017

*Some Nice Collections*

*Quote 1 .* जब लोग आपको *Copy* करने लगें तो समझ लेना जिंदगी में *Success* हो रहे हों.

*Quoted 2 .* कमाओ…कमाते रहो और तब तक कमाओ, जब तक महंगी चीज सस्ती न लगने लगे.

*Quote 3 .* जिस व्यक्ति की इच्छा  खत्म, उसकी तरक्की भी खत्म.

*Quote 4 .* यदि *“Plan A”* काम नही कर रहा, तो कोई बात नही *25* और *Letters* बचे हैं उन पर *Try* करों.

*Quote 5 .* जिस व्यक्ति ने कभी गलती नहीं कि उसने कभी कुछ नया करने की कोशिश नहीं की.

*Quote 6 .* भीड़ हौंसला तो देती हैं लेकिन पहचान छिन लेती हैं.

*Quote 7 .* अगर किसी चीज़ को दिल से चाहो तो पूरी कायनात उसे तुमसे मिलाने में लग जाती हैं.

*Quote 8 .* कोई भी महान व्यक्ति अवसरों की कमी के बारे में शिकायत नहीं करता.

*Quote 9 .* महानता कभी ना गिरने में नहीं है, बल्कि हर बार गिरकर उठ जाने में है.

*Quote 10 .* जिस चीज में आपका *Interest* हैं उसे करने का कोई टाईम फिक्स नही होता. चाहे रात के *1* ही क्यों न बजे हो.

*Quote 11 .* अगर आप चाहते हैं कि, कोई चीज अच्छे से हो तो उसे खुद कीजिये.

*Quote 12 .* सिर्फ खड़े होकर पानी देखने से आप नदी नहीं पार कर सकते.

*Quote 13 .* जीतने वाले अलग चीजें नहीं करते, वो चीजों को अलग तरह से करते हैं.

*Quote 14 .* जितना कठिन संघर्ष होगा जीत उतनी ही शानदार होगी.

*Quote 15 .* यदि लोग आपके लक्ष्य पर *हंस* नहीं रहे हैं तो समझो *आपका लक्ष्य बहुत छोटा हैं.*

*Quote 16 .* विफलता के बारे में चिंता मत करो, आपको बस एक बार ही सही होना हैं.

*Quote 17 .* सबकुछ कुछ नहीं से शुरू हुआ था.

*Quote 18 .* हुनर तो सब में होता हैं फर्क बस इतना होता हैं किसी का *छिप* जाता हैं तो किसी का *छप* जाता हैं.

*Quote 19 .* दूसरों को सुनाने के लिऐ अपनी आवाज ऊँची मत करिऐ, बल्कि अपना व्यक्तित्व इतना ऊँचा बनाऐं कि आपको सुनने की लोग मिन्नत करें.

*Quote 20 .* अच्छे काम करते रहिये चाहे लोग तारीफ करें या न करें आधी से ज्यादा दुनिया सोती रहती है ‘सूरज’ फिर भी उगता हैं.

*Quote 21 .* पहचान से मिला काम थोडे बहुत समय के लिए रहता हैं लेकिन काम से मिली पहचान उम्रभर रहती हैं.

*Quote 22 .* जिंदगी अगर अपने हिसाब से जीनी हैं तो कभी किसी के *फैन* मत बनो.

*Quote 23 .* जब गलती अपनी हो तो हमसे बडा कोई वकील नही जब गलती दूसरो की हो तो हमसे बडा कोई जज नही.

*Quote 24 .* आपका खुश रहना ही आपका बुरा चाहने वालो के लिए सबसे बडी सजा हैं.

*Quote 25 .* कोशिश करना न छोड़े, गुच्छे की आखिरी चाबी भी ताला खोल सकती हैं.

*Quote 26 .* इंतजार करना बंद करो, क्योकिं सही समय कभी नही आता.

*Quote 27 .* जिस दिन आपके *Sign #Autograph* में बदल जाएंगे, उस दिन आप *बड़े आदमी बन जाओगें.*

*Quote 28 .* काम इतनी शांति से करो कि सफलता शोर मचा दे.

*Quote 29 .* तब तक पैसे कमाओ जब तक तुम्हारा बैंक बैलेंस तुम्हारे फोन नंबर की तरह न दिखने लगें.

*Quote 30 .* *अगर एक हारा हुआ इंसान हारने के बाद भी मुस्करा दे तो जीतने वाला भी जीत की खुशी खो देता हैं. ये हैं मुस्कान की ताकत.*

Tuesday, 14 March 2017

लोकतंत्र को नष्ट करने की साजिश

आज जिस तरह से शासक वर्ग निजीकरण, वैश्वीकरण, और उदारीकरण के नाम पर sc,st,obc,और minorities को धीरे धीरे शासन-प्रशासन में प्रदत्त प्रतिनिधित्व से वंचित कर रहे है, सामाजिक सुधार हेतु प्रदत्त कुछ विशेषाधिकारों को असमानता के नाम पर समाप्त कर रहे है। जिस प्रकार लोकतंत्र के चारो स्तम्भों ( व्यवस्थापिका, कार्यपालिका,न्यायपालिका व मीडिया) से लोगों का विश्वास उठने लगा है, वह भारतीय गणराज्य के लिये भयानक खतरा है। इतिहास गवाह है कि जब जब आम नागरिकों के अधिकारो का दमन किया गया, तब तब सत्ता परिवर्तन हुआ। आज भारतीय गणराज्य में भी ऐसा ही कुछ नजर आता है। लोग असहिष्णुता के शिकार हो रहे है, इसके बावजूद कुछ राजनीतिक दल व सामाजिक दल अपनी आदत से बाज नही आ रहे है। सुनने में उनके बयान भले ही अच्छे लग रहे हो  पर , इस भारतीय गणराज्य में, अप्रत्यक्ष रूप से लोकतंत्र को विघटित व राजतंत्र को स्थापित करने वाले है। कभी कभी लगता है कि यह बयान वास्तव में लोकतंत्र को नष्ट करने के लिये जानबूझकर दिये जा रहे, यह बयानबाजी इतनी खतरनाक है कि भारतीय गणराज्य को कालान्तर में कई टुकड़ों में बॉटने का कार्य करेगे। शैलेन्द्र कुमार कानपुर नगर 8896561604

Monday, 13 March 2017

बहुजन समाज व बहुजन समाज पार्टी की दुर्दशा की बजह *यिन और यांग* ऊर्जा का बिगड़ा हुआ सामंजस्य- एक रोचक अध्ययन
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आपने अक्सर सुना होगा क़ि प्रत्येक व्यक्ति की सफलता मे एक महिला का योगदान जरूर होता है। बजह?????
क्योंकि महिलाओ मे यिन ऊर्जा होती है। जिसका प्रवाह बाहर से अंदर की ओर होता है। यह ऊर्जा वलयाकार होती है। जिसकी बजह से ही महिलाओ का शरीर लहरदार होता है।
यही बजह है क़ि महिलाएं extrovert ज्यादा होती हैं। इन्हें किसी की मदद करने या सेवा करने या पालन पोषण करने या किसी पर अपना सब कुछ निछावर करने की प्रवत्ति सर्वाधिक होती है। इसी बजह से माताए बहने imotional होती हैं।क्योंकि इन्हें ईश्वर ने design ही इस प्रकार किया हुआ है।
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जबकि पुरुषो मे यांग ऊर्जा होती है जो क़ि श्रजनात्मक प्रवत्ति की होती है। जो शरीर के अंदर से बाहर की तरह प्रवाहित होती है। यह ऊर्जा आयताकार या वर्गाकार होती है। इसीलिए पुरुषो के शरीर लहरदार न होकर आयात व वर्ग आकार के होते हैं।
इसी ऊर्जा के संतुलन मे कमी के कारण हमारे परिवारों मे झगड़े आपसी संबंध, स्वास्थ्य आदि खराब होते हैं।
इसकी बहुत अच्छी व प्रमाणिक गणित व भौतिक विज्ञान है आप परेशान न हो। इस ऊर्जा के वितरण व प्रकार का उदाहरण आपके हमारे कान हैं।
चूंकि महिलाओ को ईश्वर द्वारा मदद करने या पालन पोषण के लिए बनी है। इसी लिए महिलाओं मे वात्सल्य सबसे ज्यादा होता है जिसके सही उपयोग से व्यक्ति सफल होता है। तभी कहा जाता है क़ि प्रत्येक सफल व्यक्ति की सफलता के पीछे एक स्त्री जरूर होती है।
चूंकि *महिलाओं मे creativity की बजाय receptivity ज्यादा होती है। इसी ऊर्जा की बजह से वह अच्छी रणनीतिकार, भविष्यद्रष्टा व नेतृत्व कर्ता नहीं होती हैं।*
इन दोनो *ऊर्जा यिन और यांग के तालमेल मे गड़बड़ी से ही समाज मे हिजड़ा पैदा होते हैं। क्योंकि महिलाओं मे मिलने वाले xx और पुरुषो मे मिलने वाले xy गुणसूत्रों के वितरण को जो चीज नियंत्रित करती है वह कोई और नहीं बल्कि यिन और यांग ऊर्जा ही है।*
चूंकि यदि पुरुषार्थपूर्ण ऊर्जा समाज मे ज्यादा होगी तो लोग विद्रोह भी उतना ही ज्यादा व जल्दी करेगें क्योंकि वह ऊर्जा इन्शान को शांत बैठने ही नही देगी। कुछ न कुछ श्रजन करने को बाध्य जरूर करेगी।
यही *बजह है क़ि हिजड़े चाह कर भी ताली बजाने, नाचने गाने के अलावा कुछ नही कर सकते।*
इसीलिए की सत्तावर्ग की बनी बनाई व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह कोई न कर सके तभी संघियों की सुषमा स्वराज ने पोर्न वेबसाइट से प्रतिबंध हटा लिया है। ताकि लोगों मे यांग ऊर्जा न इकठ्ठी हो। बहुसंख्य लोग हिजड़ा बने रहें।
यही बजह है क़ि LGBT अर्थात हिजड़ो homosexual lezbiun gay आदि के मुद्दों को बढ़ावा दिया जा रहा है। ताकि समाज मे यिन ऊर्जा की भरमार पैदा करके व्यवस्था मे जमे लोग दीर्घकाल तक अपना कब्जा जमाये रह सकें।
*चूंकि स्त्रियों / महिलाओं मे ईश्वर ने दया करुणा मैत्री कूटकूट कर भरी है, तो हम अपनी माताओ बहनों से श्रजन व संघर्ष की उम्मीद कर ही कैसे सकते हैं?*
यही बजह है क़ि जो माता बहनें दया व करुणा की अद्वितीय मिशाल हैं। वही एक महिला अर्थात बहन मायावती जी पूरे समाज को गुलाम बनवा रही हैं।

*जब यिन ऊर्जा विद्रोह कर ही नही सकती, जब यिन ऊर्जा श्रजन कर ही नही सकती तो वही यिन ऊर्जा हमे कुशल नेतृत्व कैसे प्रदान कर सकती हैं?*

यही बजह है क़ि अच्छे नेतृत्व कर्ता अक्सर ब्रह्चर्य पूर्ण पुरुष ही होते हैं। फिर चाहे वो मान्यवर कांशीराम जी हो या डॉ बाबासाहेब अम्बेडकर या शिवाजी महाराज या फुले शाहेब य कबीर या नानक या भगवान बुद्ध आदि आदि आदि।
महिलाये अच्छी सहयोगी जरूर रही है। कुछ एक ने पराक्रम भी दिखाए हैं। लेकिन इन्शान मे नर ऊर्जा व मादा ऊर्जा के मौलिक योगदान व प्रभाव की बात ही दूसरी है।
*यह तो कमी यांग ऊर्जा वाले पुरुषो की है जो अपने पुरुषार्थ की बजह हिजड़ो वाली ऊर्जा यिन पर भरोषा किये हुए हैं।*
दोषी हमारी बहन जी नही बल्कि आज का उनका समर्थक पुरुष समाज है। जिसमे यिन ऊर्जा की विशालता देखी जा रही है।
ऐसे मे प्रत्येक माता बहन से निवेदन क़ि अपने बच्चों व पति पिता भाई आदि मे पुरुषार्थ जगाएं। उन्हें मजबूर करें सामाजिक कार्य के लिए।
 नही तो सब कुछ लूट जायेगा इस यिन ऊर्जा की बजह से।
उम्मीद है क़ि आपको कुछ बात समझ मे आई होगी।
यदि न आई हो तो आपका सशरीर स्वागत हैं।
Written by Dr Vinod Dohrey

Tuesday, 28 February 2017

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एक अँधा भीख मांगता हुआ राजा के द्वार पर पंहुचा।राजा को उस पर दया आ गयी,राजा ने प्रधानमंत्री से कहा-"यह भिक्षुक जन्मान्ध नहीं है,यह ठीक हो सकता है,इसे राजवैद्य के पास ले चलो।"

(दोनों उसे पकड़कर ले जाते हैं)रास्ते में राजा का मंत्री कहता है "महाराज आपसे एकांत में कुछ कहना चाहता हूं।"दोनों भिक्षुक को वहीँ बैठाकर दूसरी ओर जाते हैं।

मंत्री कहता है "महाराज यह भिक्षुक शरीर से हृष्ट-पुष्ट है,यदि इसकी रौशनी लौट आयी तो इसे आपका सारा भ्र्ष्टाचार दिखेगा,आपकी शानोशौकत और फिजूलखर्ची इसे दिखेगी।आपके राजमहल की विलासिता और आपके रनिवास का अथाह खर्च इसे दिखेगा,इसे यह भी दिखेगा कि जनता भूख और प्यास से तड़प रही है,सूखे से अनाज का उत्पादन हुआ ही नहीं और आपके सैनिक पहले से चौगुना लगन वसूल रहे हैं।

शाही खर्चे में बढ़ोत्तरी के कारण राजकोष रिक्त हो रहा है ,जिसकी भरपाई हम सेना में कटौती करके कर रहे हैं ,इससे हजारों सैनिक और कर्मचारी बेरोजगार हो गए हैं।
ठीक होने पर यह भिक्षुक औरों की तरह ही रोजगार की मांग करेगा और आपका ही विरोधी बन जायेगा।

मेरी मानिये तो यह आपसे मात्र दो वक्त का भोजन ही तो मांगता है,इसे आप राजमहल में बैठाकर  मुफ्त में सुबह-शाम भोजन कराइये और दिन भर इसे  घूमने के लिए छोड़ दीजिये।यह आपका पूरे राज्य में गुणगान करता फिरेगा,कि राजा बहुत न्यायी हैं,बहुत ही दयावान और परोपकारी हैं।इस तरह मुफ्त में खिलाने से आपका संकट कम होगा और आप लंबे समय तक शासन कर सकेंगे।"

राजा को यह बात समझ में आ गयी,वह वापस अंधे के पास गया और दोनों उसे उठाकर राजमहल ले आये।अब अँधा राजा का पूरे राज्य में गुणगान करता फिरता है,उसे यह नहीं पता कि राजा ने उसके साथ धूर्तता की है,छल किया है,वह ठीक होकर स्वयं कमा कर अपनी आँखों से संसार  का आनंद ले सकता था।

यही हाल वर्तमान में सरकारें करती हैं,हमे मुफ्त का लालच देती हैं किंतु आँखों की रोशनी ( अच्छी शिक्षा व रोजगार ) नहीं देतीं जिससे कि हम उनका भ्रष्टाचार  देख पाएं,उनकी फिजूलखर्जी और गुंडागर्दी देख पाएं,उनका शोषण और अन्याय देख पाएं।

और हम अंधे की तरह उनका गुणगान करते हैं कि राजा मुफ्त में सबको सामान देते हैं।हम यह नहीं सोचते कि यदि हमें अच्छी शिक्षा और रोजगार सरकारें दें तो हमें उनकी खैरात की जरूरत न होगी,हम स्वतः ही सब खरीद सकते हैं।
अत: हमें मुफ्तखोरी की नहीं। मेहनत की चाहिए।

हमारा मन की बात से नहीं कुछ भी भला नहीं होने वाला। हमें तन का काम चाहिए।

Monday, 27 February 2017

अपनी सफलता और असफलता के लिए आप ही उत्तरदायी है

हम अक्सर अपनी असफलताओं का दोष दूसरे को देते रहते हैं। जबकि अगर किसी दौड़ में कोई तेज दौड़ कर या आपको टंगड़ी मार कर गिरा जाये तो यह गलती उसकी नहीं बल्कि आपकी है। आप ने खुद में इतनी क्षमता पैदा नहीं की कि तेज दौड़ सके, या आप यह भूल गये कि जो तेज दौड़ नहीं पाते मगर धूर्त व चालाक होते हैं वे आपको टंगड़ी लगा कर जरूर गिरायेगे। आपकी इसी भूल का फायदा उठाकर उसने अपने स्वभाव के अनुसार टंगड़ी मार कर आपको गिराकर आगे बढ़ गया क्योंकि आप उससे सतर्क नहीं रहे बल्कि उस धूर्त स्वभाव वाले व्यक्ति को अपने पास आने दिया या आप खुद उसके पास गये।

     एक बात और जब आपके पास कोई आता है तो, आपके पास आने का,उसका क्या उद्देश्य है इसकी जानकारी आपको नहीं होती जबकि वह कोई भी व्यक्ति आपके पास निरुद्देश्य नहीं आता।
       जबकि आप किसी के पास जाते हैं तो किसी न किसी उद्देश्य से ही जाते हैं। जिसकी जानकारी उस व्यक्ति को नहीं होती। फिर भी वह आपसे सतर्क रहता है पर आप हजार धोखे खाने के बावजूद सतर्क नहीं रहते। जिसका नतीजा आपका पतन ही होता है।

Saturday, 25 February 2017

ब्राम्हणवाद

आइये ब्राम्हणवाद को जाने।क्या है ब्राम्हणवाद ? आखिर ऐसा क्या है ब्राम्हणवाद में कि हम हजारों साल से इससे मुक्त नहीं हो पा रहे हैं? कोई कहता है कि तुम्हारे अन्दर ब्राम्हणवाद कूट कूट कर भरा है। कोई कहता है कि ब्राम्हणवाद बहुत खराब है। आज तक हम ब्राम्हणवाद को समझ नहीं पाये। उसका सिर्फ एक कारण है कि हम स्वयं को नहीं समझ पाते कि हम कहां है? क्या कर रहे हैं? क्या है? आइये ब्राम्हणवाद को कुछ इस प्रकार समझते हैं।

पानी= समाज, नदी= सामाजिक व्यवस्था, नदी के कगार= ब्राम्हण, नदी की दिशा बनाने वाले= अग्रगामी ब्राम्हण, नदी का उफान या फैलाव=समाज का सामूहिक विरोध व ब्राम्हणवाद के दायरे का परिवर्तन, नदी की तली= ब्राम्हणवाद का गुप्त गठबंधन


भाइयों और बहनों आपने नदी को देखा होगा।कि उसमें दो कगार होते हैं। जिसके बीच पानी काम बहाव होता है। पानी सोचता है कि वह बिना किसी दबाव के आगे की ओर बह रहा है जबकि ऐसा नहीं है, पानी दो कगारों व आगे निर्मित ढाल के अनुरूप बहता है। हमें दो कगार अलग-अलग दिखाई देते हैं जबकि दोनों कगार पानी के नीचे छिपी तली के सहारे एक दूसरे को मजबूती से पकड़े हुए है।

ब्राम्हणवाद भी कुछ इस नदी की तरह होता है। जिस प्रकार नदी के दो कगार होते हैं ठीक उसी प्रकार दो विचार वाले ( पक्ष व विपक्ष) ब्राम्हण होते हैं, जो समाज में दिखाई तो अलग-अलग देते हैं परन्तु नदी की तली की तरह मजबूती से एक दूसरे को पकड़े रहते हैं ताकि पानी यानि समाज नदी के दो कगारों यानि दो विचारधाराओं के बीच बहता रहे। जब कभी पानी का दबाव अधिक हो जाता है तो आपने देखा होगा कि कगार स्वत: फैल जाता है, कहने का तात्पर्य जब कभी समाज को यह महसूस होता कि हम ब्राम्हणवाद के गुलाम हैं हमें ब्राम्हणवाद के दायरे से बाहर निकलना है तो वे एक साथ एकत्र होकर ब्राम्हणवाद से निकलने का प्रयास करते हैं पर ब्राम्हणवाद इतना होशियार व चालाक होता कि वह बड़ी चालाकी से अपना, (नदी की तरह) अपना दायरा बढ़ा लेता है, ताकि नदी के उफान के कारण बाहर हुए पानी को भी नदी का ही पानी समझा जाए,अर्थात समाज जब ब्राम्हणवाद की सीमाएं तोड़ कर नयी धारा बनाने का प्रयास करता है तो ब्राम्हण अपने दायरे बढ़ा देता है अर्थात अपनी स्थिति में परिवर्तन कर लेता है और अग्रगामी ब्राम्हण बड़ी तेज़ी के साथ अपने हितों को ध्यान में रखते हुए आगे से आगे नयी व्यवस्था बदलने में लग जाता है, ताकि समाज के विरोध को शान्त किया जा सके। जबकि अन्य वर्ग उसी उफान को और ब्राम्हण के बदलाव को देखकर खुश होते रहते हैं। कुछ वर्ग तो इस बात से खुश होते हैं कि हमें ब्राम्हणवाद बहुत महत्व दें रहा है।जबकि सच्चाई यह होती कि ब्राम्हणवाद उस ताकत का अपने हितों की पूर्ति के बाद पीछे छोड़ कर आगे बढ़ जाता है। समाज को तब समझ में आता है जब उसे यह महसूस होता है कि वह जिसके साथ है उसे पीछे छोड़ गया। ब्राम्हणवाद की खासियत होती है कि वह इस उफान को देखकर तत्काल नदी की तरह अपना दायरा बदल और हमारे लोगों का प्रयोग कर दूध की मक्खी की तरह बाहर फेंक देता है। हमे भी तीन प्रकार से कार्य करना चाहिए पक्ष व विपक्ष और नई दिशा, अर्थात समाज की नई व्यवस्था बनाने का कार्य करना चाहिए। यदि हम ब्राम्हणवाद के समानांतर व्यवस्था बनाने में सक्षम नहीं हो पा रहे हैं तो हमें भी विरोध नीति के साथ कब्जा नीति अपनानी चाहिए। जैसा कि समय समय पर गौतम बुद्ध, भीमराव अंबेडकर जैसे लोगों ने व्यवस्था परिवर्तन का कार्य किया पर ब्राह्मणों ने बड़ी चालाकी से उनके साथ मिलकर उनकी व्यवस्था में कब्जा कर लिए और उनकी बनायी व्यवस्था को अपने हितों के अनुरूप मोड़ते चले गए और हम समझते रहे कि ब्राम्हण हमारी व्यवस्था में जी रहे है।
अगर हम कहें कि हम अपनी ताकत को अपनी व्यवस्था को बनाए रखने व उसमें छेड़छाड़ करने वाले व बदलाव करने वाले का तत्काल विरोध करे व अपनी व्यवस्था से उसे बाहर निकाल फेंके,भले ही उस बदलाव को हमारा हित बताया जाये। तो हम अपनी व्यवस्था में ही अपना हित कर सकते हैं। व्यवस्था की दिशा में परिवर्तन हमारे अनुसार हो न कि ब्राम्हणवाद के अनुसार। तब जाकर भले ही हमें ब्राम्हणवाद से मुक्ति मिल सके। अन्यथा केवल अपने व्यक्तिगत हितों को देखने से हमारा सामूहिक अहित ही होगा। हमें समय समय पर अपनी रणनीति बदलते रहना चाहिए न कि नीति ।

Monday, 20 February 2017

प्राचीन भारतीय संस्कृति में एक महत्वपूर्ण व्यवस्था थी कि कोई लड़की अपने हेतु सुयोग्य वर की तलाश स्वयं करती थी। ऐसे उदाहरण एक भी नही नजर आते कि लड़का वधू की तलाश करता हो। कहने का मतलब यह है कि बालिकाओं को अपना जीवन साथी चुनने उसके साथ जीवन यापन करने की स्वतंत्रता थी। पर जब से भारत की संस्कृति में विदेशी आर्यों ने दखल देना शुरू किया तब से महिलाओ, शूद्रो, की स्थिति दयनीय होती चली गयी। आर्यो के ऐसे अनेको उदाहरण भरे पड़े है कि किस तरह महिलाओं का उत्पीड़न कर उनके सारे अधिकार अपने हाथों में ले लिये। हम बहुत ही सूक्ष्म दृष्टि से भारत की वैवाहिक प्रथा पर अध्ययन करे तो कुछ अपवादो को छोड़कर आज भी लड़की पक्ष ही वर की तलाश करता है।जब वर पसन्द होता है उसके बाद ही वधू को देखने की अनुमति होती है। बीच में विदेशी आक्रमणकारी व आर्य संस्कृति के चलते महिलाओं का शोषण हुआ। पर बाबा साहब के संविधान लागू होने के बाद महिलाओं की स्थिति में कुछ सुधार नजर आ रहा है। महिलाओं ने भी अपनी गरिमा को समझना प्रारम्भ किया है। जिसका नतीजा पारिवारिक जीवन में आशातीत परिवर्तन आये है, जिन्हें पुरुषवादी आर्य संस्कृति के समर्थक हजम नही कर पा रहे है।और दिन प्रतिदिन महिलाओं व शूद्रो के अधिकारो में प्रहार कर रहे है। मेरा मानना है कि अगर महिलाओं व शूद्रों को अपने अधिकार सुरक्षित रखने है तो भारत सरकार पर संविधान के अनुरूप राजव्यवस्था चलाये व हिन्दू कोड बिल लागू करने का दबाव बनाना होगा। शैलेन्द्र कुमार, सरसौल, कानपुर नगर।8896561604

Friday, 17 February 2017

demonetizatin

भारत सरकार demonetizationकी कार्यवाही, smart India, start-up India, digital India पूर्ववर्ती सरकारों की निजीकरण, वैश्वीकरण, उदारीकरण की नीतियां वास्तव में भारत के विकास के लिए अपनाई गई नीतियां नहीं है। बल्कि transfer of power by economy है। आज जो भी विकास हो रहा है वह वास्तव में उधार का विकास हो रहा है। भारतीय जनता की गाढ़ी कमाई तो विदेशी कर्ज व ब्याज में जा रही है। शेष कमाई विदेशी कम्पनियां लाभ के रूप में अपने देश लिए जा रही है। भारतीय युवा जिस तेजी से पढ़ लिख कर भारतीय सेवा के लिए तैयार हो रहा उसी तेजी से सार्वजनिक क्षेत्र से रोजगार समाप्त किया जा रहा। स्वरोजगार करने के लिए युवाओं के पास धन नहीं है। बैंक लोन देने से इंकार कर रही है। ऐसे में युवक प्राइवेट सेक्टर में चन्द रुपयों के बदले अपनी सेवाएं  देने को मजबूर हैं। पूंजी का केन्द्रीकरण किया जा रहा है उससे पूंजीपति मजबूत हो रहे हैं मजदूर किसान गरीब व नवयुवक बेरोजगारी से जूझ रहे हैं। यह सब सरकार की विदेशी कम्पनियां के हितों को ध्यान में रखकर नीतियां बनाने के कारण हो रहा है।

Digital India and start-up India, smart India आदि भारतीय अर्थव्यवस्था को किस प्रकार खोखला करेगी तथा किस प्रकार इसका नियंत्रण विदेशी हाथों में होगा इसका अंदाजा लगाना हर व्यक्ति के बस में नहीं हैं। हां आप अंदाजा भले न लगा पाये पर आपकी आने वाली पीढ़ियां इसका खामियाजा जरूर भुगतेगी। आपकी संतान विदेशियों के हाथों कठपुतली बन कर रह जाएगी।  यह बात मैं दावे के साथ कह सकता हूं।

Sunday, 12 February 2017

जातीय भेदभाव व शमशान

शमशान घाट और जातीय भेदभाव

दोस्तों मैं कानपुर का निवासी हूं आज मैं जिस व्यवस्था पर लिखने की कोशिश कर रहा हूं वह जीवन काल का मामला नहीं मृत्यु के बाद अन्तिम संस्कार का मामला है।

मेरे कानपुर में गंगा नदी के किनारे स्थित भैरोघाट है जहां पर लोग शवदाह हेतु मृत शरीर को लेकर जाते हैं। पर इस घाट में अन्तिम संस्कार हेतु जो स्थान व लकड़ियों की दुकानें जाति के अनुसार निर्धारित है। हर वर्ग के लिए मंत्रोच्चार व ब्राम्हण भी अलग है ।

मैं वहां खडे़ यह सोचता रहा कि आखिर इस दुखद स्थिति में  जब लोगों के साथ यह भेदभाव होता है तो भारत में सामान्य दशा में कितना भेदभाव होता होगा?

   हम इस भेदभाव को जानते हुए भी वहां अंतिम संस्कार हेतु जाते हैं क्यों?
क्या हमारे पास इतना भी ज्ञान का आभाव है कि हम अपने लिए एक अलग से शमशान घाट की भूमि तैयार नहीं कर सकते?
हालांकि मैंने वहां पर बैठे पण्डों से पूछा कि यहां पर अलग-अलग जातियों के लिए अलग-अलग शमशान घाट क्यूं है, तो उन्हें यह कहने में जरा सा भी संकोच नहीं हुआ कि भगवान जाति के अनुसार स्वर्ग नर्क का निर्धारण होता है। फिर यह कहां से कम है कि हम यहां चमार पासी धानुक धोबी, काछी कुर्मी अहीर गड़रिया का हम अंतिम संस्कार कराते है?

पण्डें की यह बात सुनकर कर सोचता हूं कि हमारे साथ हो रहे भेदभाव के दोषी जितने वे नहीं है उससे अधिक दोषी हम बहुजन है। अगर हम बदल जाये तो जाहिर है कि सामने वाला व्यक्ति तुरन्त बदल जायेगा।
शमशान घाट और जातीय भेदभाव

दोस्तों मैं कानपुर का निवासी हूं आज मैं जिस व्यवस्था पर लिखने की कोशिश कर रहा हूं वह जीवन काल का मामला नहीं मृत्यु के बाद अन्तिम संस्कार का मामला है।

मेरे कानपुर में गंगा नदी के किनारे स्थित भैरोघाट है जहां पर लोग शवदाह हेतु मृत शरीर को लेकर जाते हैं। पर इस घाट में अन्तिम संस्कार हेतु जो स्थान व लकड़ियों की दुकानें जाति के अनुसार निर्धारित है। हर वर्ग के लिए मंत्रोच्चार व ब्राम्हण भी अलग है ।

मैं वहां खडे़ यह सोचता रहा कि आखिर इस दुखद स्थिति में  जब लोगों के साथ यह भेदभाव होता है तो भारत में सामान्य दशा में कितना भेदभाव होता होगा?

   हम इस भेदभाव को जानते हुए भी वहां अंतिम संस्कार हेतु जाते हैं क्यों?
क्या हमारे पास इतना भी ज्ञान का आभाव है कि हम अपने लिए एक अलग से शमशान घाट की भूमि तैयार नहीं कर सकते?
हालांकि मैंने वहां पर बैठे पण्डों से पूछा कि यहां पर अलग-अलग जातियों के लिए अलग-अलग शमशान घाट क्यूं है, तो उन्हें यह कहने में जरा सा भी संकोच नहीं हुआ कि भगवान जाति के अनुसार स्वर्ग नर्क का निर्धारण होता है। फिर यह कहां से कम है कि हम यहां चमार पासी धानुक धोबी, काछी कुर्मी अहीर गड़रिया का हम अंतिम संस्कार कराते है?

पण्डें की यह बात सुनकर कर सोचता हूं कि हमारे साथ हो रहे भेदभाव के दोषी जितने वे नहीं है उससे अधिक दोषी हम बहुजन है। अगर हम बदल जाये तो जाहिर है कि सामने वाला व्यक्ति तुरन्त बदल जायेगा।

Thursday, 9 February 2017

Question with government of India

माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने एक जन सभा में कहा कि यदि यू पी में भाजपा की सरकार बनी तो प्राधिकरणों केभ्रष्टाचार की जांच होगी।


क्या मोदी जी अभी भारत सरकार के प्रधानमंत्री नहीं है ?
क्या केंद्र सरकार राज्य सरकार के घोटालों की जांच कराने की शक्ति नहीं रखती?
क्या मोदी जी का यह जांच कराने की घोषणा जनता को बेवकूफ बनाने वाली नहीं है?
क्या मोदी जी को चुनाव के समय जनता की समस्याएं नजर आती है?
मोदी ने नवयुवकों को रोजगार देने की बात कही थी अपने कार्यकाल में केंद्र सरकार की कितनी पोस्टों पर भर्ती की?
मोदी जी ने हमारे कुछ दलित नेताओं से लोकसभा चुनावों में वादा किया था कि हमारी सरकार बनाये हम पदोन्नति में आरक्षण बिल पास कराएंगे, क्या मोदी जी ने अपना वादा पूरा किया या वे नेता जो अपने आंदोलनों को छोड़कर सांसद बनने के लिए भाजपा में सम्मिलित हुए पदोन्नति में आरक्षण बिल पास करा पाये ?
क्या मोदी जी देश हित में भारत की आर्थिक, शैक्षिक संस्थानों का राष्ट्रीयकरण करने की क्षमता रखते हैं?
 मोदी जी भारतीय व्यवस्था का वैश्वीकरण कर रहे हैं या यूरोपीय व्यवस्था का वैश्वीकरण कर रहे हैं?
मोदी जी या उनसे पहले की सरकारें  विश्व व्यवस्था के दबाव में भारतीय संवैधानिक व्यवस्था के विरुद्ध जाकर सामाजवादी लोकतंत्र को नष्ट कर पूंजीवादी व्यवस्था की हिमायत नहीं कर रही है?
क्या मोदी से पूर्व व मोदी जी की सरकारों ने उदारीकरण, निजीकरण व वैश्वीकरण  डिजिटलाइजेशन व १००℅ प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की नीति अपनाने के लिए भारतीय जनता को विश्वास में लिया तथा भारतीय जनता को प्रचार प्रसार
कर इस नीति के लाभ हानि को बताया?
मोदी जी व पूर्व की सरकारों ने भारतीय संविधान की प्रमाणित प्रतिलिपि छपवा कर भारतीय संविधान का जनता के बीच प्रचार प्रसार किया?

देवी का अर्थ

हम भारतीय अक्सर अपनी बेटियों के नाम के आगे देवी शब्द लगाते हैं। जब किसी लड़की की तारीफ करनी होगी है तो बड़े गर्व से कहते हैं कि " अरे वह लड़की तो साक्षात देवी है"

पर आपने कभी सोचा है कि जब हम लड़कियों के नाम के आगे देवी शब्द लगाते हैं या उन्हें देवी कहते तो उससे क्या प्रदर्शित होता है ? आइये इस पर प्रकाश डाला जाये।

'देवी' = ब्राम्हण की स्त्री की उपाधि ।
देव=  ब्राम्हण की उपाधि
होता है।
अब जरा सा सोचे कि जब हम अपनी बेटियों के नाम के आगे देवी शब्द लगाते हैं तो जाने अनजाने यह मान लेते हैं कि यह हमारी बेटी देव( अर्थात् ब्राम्हण) की पत्नी है।
हम इन छोटी छोटी बातों पर उनके अर्थो पर ध्यान नहीं देते हैं और हम खुद जाने अनजाने अपना अपमान कराते रहते हैं।
शैलेंद्र कुमार कानपुर नगर 9455615564/889656

Saturday, 4 February 2017

Nirvachan kary mein Janta ki udaseenta

इस समय भारत के कई राज्यों में चुनावों का माहौल चल रहा है। ऐसे में निर्वाचन आयोग द्वारा जगह- जगह मतदाता जागरूकता रैली व शपथ समारोह का आयोजन कराया जा रहा है। जोकि बेशक महत्वपूर्ण कार्य है। इस कार्यक्रम से नि:संदेह लोगों को बताया जा रहा है कि मताधिकार का प्रयोग करना, सरकार बनाने के लिए, कितना जरूरी है।
          परन्तु इस सब के बीच सवाल खड़ा होता है कि मताधिकारी ( मतदाता) जागरूकता रैली आयोजन की आवश्यकता क्यों पड़ी?
१- क्या भारतीय नागरिकों को वोट के अधिकार की जानकारी नहीं है?
२- क्या भारतीय नागरिकों के पास वोट करने के लिए समय नहीं है?
३- क्या भारतीय नागरिक सरकार चुनने की इच्छा नहीं रखते?
४- क्या भारतीय नागरिक वोटिंग के प्रति उदासीन हो रहे हैं?
५- क्या भारतीय नागरिक अपनी जिम्मेदारी से बच रहे हैं? 
६- क्या भारतीय नागरिक वोटिंग करने से डर रहे ? 
७-क्या मताधिकारी अशिक्षित हैं? 
उपरोक्त ऐसे अनेकों प्रश्न जहन में उठते हैं। जिनका समाधान व जवाब सायद किसी के पास हो? परन्तु जहां तक मैं अनुभव व विचार कर पा रहा हूं,  जिसके क्रम में लोगों को मतदान हेतु पूरी तरह से उदासीनता है जिसका सबसे बड़ा कारण योग्य, चरित्रवान, जिम्मेदार, देशप्रेमी, उत्तरदायी, ईमानदार, संविधान व देश, समाज व लोगों के प्रति निष्ठावान, नैतिक मूल्यों वाले जनप्रतिनिधियों का आभाव है। जो वोटर्स को उदासीन बनाता है। आज कोई ऐसा प्रत्याशी चुनाव मैदान में नहीं नजर आता जो देश के लिए चुनाव में उतरा हो। सभी के सभी प्रत्याशी अपने कल्याण के लिए लाखों करोड़ों रुपए खर्च करते हैं और फिर जनता को दोनों हाथों लूटते हैं। आज राजनीति को सेवा नहीं व्यापार बना दिया गया है। ऐसी स्थिति में वोटर को ही लूटा जाता है। आज के नेताओं व अंग्रेजों में कोई अन्तर समझ नहीं आता। तो जनता क्यों न उदासीन हो। जनता की 
यही उदासीनता लोकतंत्र के लिए घातक होगा। निर्वाचन आयोग द्वारा मतदाता जागरूकता रैली के आयोजन से साफ साफ नजर आता है कि लोकतंत्र अपनी अंतिम सांसें गिन रहा है। बड़ें ही धीमें कदमों से राजतंत्र आता नजर आ रहा है।
Shailendra Kumar 9455615564

Friday, 27 January 2017

TLM का प्रयोग एक साजिश। It is a mind fixation program

      "कल्पना ही पूरे विश्व मेंं राज करती हैं।"
नेपोलियन बोनापार्ट का यह कथन को ध्यान में रखते हुए विश्व नियंताओं द्वारा शिक्षण में TLM के प्रयोग को बढ़ावा दिया, जिससे लोगों की कल्पना शक्ति नष्ट किया जा सके।
  शिक्षक लोग शिक्षण कार्य करते समय शिक्षण अधिगम सामग्री का प्रयोग करते हैं। पर कभी इस बात पर विचार नहीं करते कि TLM के प्रयोग से बच्चे पर क्या असर पड़ता है।

आइये TLM  के प्रयोग पर विचार करे। नि: संदेह TLM के प्रयोग से बच्चे को किसी भी बिंदु को सीखने, जानने, एवं समझने में बेहद आसानी होती है। शिक्षक को भी सिखाने में सुगमता रहती हैं। पर कभी आपने यह सोचा है कि यह TLM का प्रयोग एक बहुत बड़ी साजिश का हिस्सा है। बच्चे को  विचार शून्यता व कल्पनाहीनता की ओर ले जाने का सशक्त माध्यम है। जब हम बच्चे को परियों की कहानियों के माध्यम से शिक्षा देते थे या किसी वस्तु आदि के बारे में बताते थे तो क्या बच्चा अपने मस्तिष्क में भांति भांति की कल्पनाओं का अदृश्य चित्रण नहीं होता था? दोआज हम जब किसी वस्तु के बारे में बताते हैं और बच्चे के समक्ष तुरंत उस वस्तु का प्रतिरूप प्रस्तुत कर देते हैं तो क्या बच्चे के मस्तिष्क में भांति भांति की कल्पनाएं उस वस्तु के प्रति उभरती है वे प्रतिरुप देखते ही समाप्त नहीं हो जाती? हमने शिक्षण कार्य करते समय बच्चे को चिंतन, कल्पना,व मानसिक गतिविधियों से हटाकर उसकी सोचने, समझने, चिंतन व कल्पना को अवरूद्ध कर देते हैं । जोकि एक बहुत बड़ी साजिश का हिस्सा समझ में आता है। यह एक प्रकार का mind fixation का program है। जो कि बहुत ही सोच समझ कर विश्व शासकों द्वारा तैयार कराया गया लगता है। बच्चे की शिक्षा ठीक उसी तरह कर दी गयी जैसे किसी फसल में उर्वरक डाल डाल कर उपज तो बढ़ायी जाती है पर उपज की स्वपोषण की क्षमता नष्ट कर दी जाती है। TLM के प्रयोग से बच्चे के ज्ञान में वृद्धि कर दी गई पर नवीन ज्ञान संरचना की क्षमता नष्ट कर दी गयी। जिसका परिणाम यह होता है कि बच्चे की कल्पनाशक्ति व तर्कशक्ति नष्ट होती जा रही है।

Friday, 13 January 2017

भाजपा का माटी व किसान प्रेम दिखावा या सच्चाई

भाजपा किसानों को जाल में फंसाने की साजिश कर रही है।अभी हाल ही के निर्णय में भाजपा ने उत्तर प्रदेश के चुनावों को मद्देनजर रखते हुए निर्णय लिया है कि वह किसान व माटी  की समस्या को लेकर चुनाव में उतरेगी।
      भाजपा का मुद्दा बेहद लोकप्रिय व भावात्मक है। न लेकिन भाजपा के इस माटी व किसान समस्या को लेकर मुझे कुछ शंकाएं है।
१- बनिए व व्यापार की बात करने वाले भाजपाईयों को अचानक किसान व माटी की याद कैसे आ गई? अगर इन्हें वास्तव में किसान व माटी से प्रेम है तो अभी तक किसानों द्वारा की गई आत्महत्याओं को लेकर इन्होने क्या किया? जबकि ढाई साल से इनकी सरकार केंद्र में है?
२- अगर भाजपा को किसान व देश की माटी से प्रेम है तो उनकी केंद्र की सरकार ने जबरन भूमि अधिग्रहण बिल को लेकर इतना अधिक हो हल्ला क्यों मचाया, और जब बिल पास कराने में नाकाम रहे तो दोबारा अध्यादेश लाकर किसानों की जमीन को औने-पौने दाम में पूंजीपतियों व विदेशी कंपनियों को क्यों दिया? अगर दिया है तो क्या उस कम्पनी में किसान की हिस्सेदारी तय की?
३- जिस प्रकार पूंजीपतियों को अपने उत्पादों का मूल्य निर्धारण करने का अधिकार  है क्या किसानों को अपनी उपज का मूल्य निर्धारण करने व बेचने का कानून बनाने का दम भाजपा या कोई सरकार चाहे सकती है?
४- जहां कहीं भी सरकार किसान की जमीन अधिग्रहण कर उद्योग स्थापित करें , उस जमीन पर स्थापित उद्योग के लाभ में किसान की हिस्सेदारी सुनिश्चित क्यों नहीं कर रही है?

Sunday, 8 January 2017

निजीकरण व डिजिटलीकरण दोनों ही लोकतंत्र को नष्ट कर राजतंत्र स्थापित करने का सशक्त माध्यम है।

भारतीय अपने विभिन्न आंदोलनों को भूतकाल व जातिवाद पर केंद्रित करके रह गये है। अगर आजादी के बाद के भारत के इतिहास का सूक्ष्म अध्ययन करे तो साफ साफ झलकता है कि भारत की आजादी व लोकतंत्र की कोंपल भी नहीं फूटी कांग्रेस ने औद्योगिकीकरण की नीति अपना कर राजतंत्र की स्थापना के लिए नींव की ईंट रख दी थी।
    दूसरा भारत में मीसा लगाकर लोगों में भय पैदा किया गया और इसी भय की आड़ में भारतीय संविधान में मनमानी संबोधन किये गये।
        तीसरा सरकारी सेवाओं में भ्रष्टाचार बढ़ा कर तथा सरकारी सेवाओं में हीलाहवाली पैदा कर निजी क्षेत्र की स्थापना व निजी क्षेत्र में बेहतर सुविधाएं दे कर राजतंत्र स्थापित करने की ओर कदम बढ़ा दिया गया है।
चौथा कदम विकास के नाम पर उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण की नीति व अनेक विदेशी व्यापारिक समझौतों द्वारा लोकतंत्र की रीढ़ पर वार किये जा रहे है।
पांचवां भारत के लोगों का आधार नामांकन व डिजिटलीकरण कर लोगों की निजता पर डाका डालकर व उनकी निजी जिंदगी में हस्तक्षेप करने की नीति अपना कर भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त मूलाधिकारों पर लगातार हमले किए जा रहे हैं। जोकि लोकतंत्र को समाप्त कर राजतंत्र व नये रूप की तानाशाही स्थापित करने की ओर कदम है।
हमारे प्यारे भारतीय अभी भी मुफ्त की योजनाओं, सुविधाओं में फंसकर खुद के स्वाभिमान को नष्ट करा रहे है तथा अशिक्षित लोगों की बात छोड़ो शिक्षित लोग भी नहीं समझ पा रहे है।

     आइये एक उदाहरण से अपनी बात समझाता हूं।


हमारे सभी साथियों को यह तो ज्ञान होगा कि सन् 1990  से पहले अधिकांश लोग अपने बच्चों को किसी सरकारी विद्यालयों में प्रवेश दिलाने के लिए परेशान रहते थे, और वर्तमान में क्या स्थिति है किसी से छिपी नहीं है। क्या इस स्थिति के लिए आम जनता दोषी है? आज सरकारी विद्यालयों की यह स्थिति यूं ही नहीं हुई। सरकारी विद्यालयों की यह स्थिति बाकायदा योजनाबद्ध तरीके से की गई। आज सरकारी शिक्षक चाहे भी तो सरकारी नीतियों के चलते अपने मूल दायित्वों काम निर्वहन नहीं कर सकता। अब आप ही विचार करे कि यदि किसी सरकारी विद्यालय में पांच कक्षाएं है उसमें पचास बच्चें हैं। सरकारी नीति के अनुसार उस विद्यालय में दो ही शिक्षक नियुक्त किए जा सकते। अब आप ही सोचिए कि शिक्षक चाहकर भी सभी बच्चों को समुचित तरीके से अपनी सेवाएं नहीं दे सकता, क्योंकि तत्समय पर एक शिक्षक एक ही कक्षा में उपस्थित हो सकता है। शेष तीन कक्षाएं तो रिक्त ही रहेगी और उन कक्षाओं को भी डिस्टर्ब करती रहेगी जिनमें शिक्षक पढ़ा रहा होगा। यह तो मात्र नमूना है।  यह सब यूं ही नहीं है यह सरकार के hidden agenda के कारण है ताकि सरकारी विद्यालय नष्ट हो सके और निजी विद्यालय पल्लवित हो सके। जिससे सरकार में बैठे लोगों को राजतंत्र स्थापित करने में आसानी हो जाये।
शैलेंद्र कुमार 9455615564

Tooth paste dangerous my health

प्राय: काल हम अपनी दैनिक क्रियाकलाप खुद को fresh करने से शुरू करते है। आज प्रत्येक घर में मंजन के रूप में close up, Colgate, dantkranti, dabar tooth paste आदि न जाने कितने उत्पाद हमारे घरों में मिल जायेगें। पर क्या आपने कभी अपने सबसे प्रिय टूथपेस्ट को पढ़ा है। कि उसमें किन किन चीजों का मिश्रण है। मंजन में मिलाये जाने रासायनिक तत्व potassium nitrate & fluoride  कहीं आपके और आपके प्यासे परिवार के लिये परेशानी का कारण तो नही बन रहा। आपके पेट की समस्याओं का कारण तो नही। जैसे गैस बनना, पीठ दर्द , समल्सपेन, प्रसव समस्या, मंदबुद्धि चक्कर आना, कोमा में जाना, कैंसर आदि समस्या के लिये उपरोक्त रसायन potassium nitrate and fluoride तो कारण नही। पढ़े नीचे दिये गये लेख को।        
Potassium Nitrate Health Effects

Despite its substantial popularity in this method of food preparation, it is important to tread very carefully when incorporating potassium nitrate into your meal preparation because of the fact that recent studies by the National Center for Home Food Preservation have cited that a high potassium nitrate content in food products can have a poisonous effects on diners. Although the symptoms of poisoning do not show up too prominently when a person is exposed to the chemical in small quantities or over short periods of time, the effects can be significantly more damaging when the individual is chronically exposed to the substance. Some of the more prominent symptoms of potassium nitrate poisoning include irregular breathing, convulsions, a rapid heartbeat, dizziness or even a coma and death in the more severe cases. Children too should be kept away from potassium nitrate preservative food additives, as they have been shown to cause dizziness and headaches in children. Potassium nitrate is also commonly used as a diuretic medicine while also being added to medicines that are commonly used to treat conditions like excessive back pain and joint pain. One of the most useful applications of potassium nitrate is its benefits in the production of nitric acid with the addition of concentrated sulfuric acid to the aqueous solution of potassium nitrate. The chemical is also widely used as a fertilizer and rocket propellant as well as in the production of smoke bombs because of the resulting effect when mixed with sugar to generate a cloud of smoke that is roughly about 600 times the volume of the actual bomb.

Potassium nitrate, when ingested in small quantities, is not harmful. The FDA considers it to be non-toxic. Most people have no problem with it, and can easily handle the small quantities in food.

That being said, it is not a good idea to consume it in larger quantities. Research shows that nitrates and nitrites can causes cancers. It is possible that bacteria in the stomach may actually convert some of the potassium nitrate into the much more dangerous potassium nitrite. For this reason, many countries have banned the preservative, and other countries are mulling a ban.
शैलेन्द्र कुमार प्र० अ० कानपुर 9455615564