आजकल स्वच्छ भारत मिशन के अंतर्गत गांव गांव में जाकर लोगों के दिमाग में यह भरा जा रहा है कि तुम सब गंदे संदेश रहते हो। तुम्हें सफाई के महत्व का पता नहीं। साफ पानी नहीं मिल रहा है। हम धरती का जो पानी टेस्ट कर रहे हैं वह पानी दूषित हो चुका है। इसे पीकर बीमारियां फैल रही है आदि आदि।
मेरे ऐसे लोगों से चंद सवाल है।
१- भूजल अगर दूषित है तो इसे किया किसने?
२- यदि प्राकृतिक प्रक्रिया द्वारा शुद्ध किया गया जल दूषित है तो कृत्रिम प्रक्रिया द्वारा शुद्ध किया गये जल को कैसे शुद्ध ज्ञान लिया जाए।
३- लाखों सालों से मानव पशु सभी प्राकृतिक तरीके से छने पानी को पी रहे हैं। आज जब बहुराष्ट्रीय कंपनियां पानी बेच रही है तो पानी अशुद्ध हो गया।
४- जो शहर के लोग गांवों में जाकर अपनी होशियारी दिखाते हैं जरा अपने गिरेबान में झांक कर देख लें कि उन्होंने अपनी धरती मां अधिक दूषित और खोखला किया है या गांव के लोगों ने।
५- बोतलबंद पानी पीने वाले कोरोना में ज्यादा मरे या कुंए का पानी पीने वाले? या यूं कहें कि शहरी ज्यादा बीमार होते हैं या गांव वाले।
६- शहरी प्रदूषण में रहते हैं या गांव वाले?
७- हजारों लाखों सालों से मानव खुले में शौच को जा रहा है। पेड़ पौधों और फसलों को उससे पोषक तत्व मिलते हैं। लेकिन जब से स्वच्छता अभियान चलाया गया तब से शहरों की गंदगी अपने पास पड़ोस की गंदगी न साफ करने वाले देहात उन लोगों को सफाई का पाठ पढ़ा रहे हैं जो खुद स्वच्छ व हराभरे वातावरण में रहते हैं। ये शहरी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के एजेंट शहरी गंदगी शहर से लै जाकर देहात में गंदगी फैला रहे हैं। ताकि लोगों के दिमाग में यह भरा जा सके कि जमीन से निकला पानी अशुद्ध और फिल्टर किया बोतलबंद पानी पीने योग्य है। जिसके बारे में यह भी पता नहीं कि कब भरा गया, और कैसे भला गया होगा?
लोग बहुराष्ट्रीय कंपनियों के इस षणयंत्र को समझें और इन्हें देश के संसाधनों का दुरुपयोग करने और उनसे भारी मुनाफा कमाने से रोके।
जय मजदूर, जय किसान। बहुराष्ट्रीय कंपनियों से रहो होशियार।
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