Wednesday, 20 April 2022

पानी का व्यापार और बहुराष्ट्रीय कंपनियां का खेल। सरकार की मिलीभगत।

आजकल स्वच्छ भारत मिशन के अंतर्गत गांव गांव में जाकर लोगों के दिमाग में यह भरा जा रहा है कि तुम सब गंदे संदेश रहते हो। तुम्हें सफाई के महत्व का पता नहीं। साफ पानी नहीं मिल रहा है। हम धरती का जो पानी टेस्ट कर रहे हैं वह पानी दूषित हो चुका है। इसे पीकर बीमारियां फैल रही है आदि आदि। 
       
        मेरे ऐसे लोगों से चंद सवाल है। 
१- भूजल अगर दूषित है तो इसे किया किसने? 
२- यदि प्राकृतिक प्रक्रिया द्वारा शुद्ध किया गया जल दूषित है तो कृत्रिम प्रक्रिया द्वारा शुद्ध किया गये  जल को कैसे शुद्ध ज्ञान लिया जाए। 
३-  लाखों सालों से मानव पशु सभी प्राकृतिक तरीके से छने पानी को पी रहे हैं। आज जब बहुराष्ट्रीय कंपनियां पानी बेच रही है तो पानी अशुद्ध हो गया।
४-  जो शहर के लोग गांवों में जाकर अपनी होशियारी दिखाते हैं जरा अपने गिरेबान में झांक कर देख लें कि उन्होंने अपनी धरती मां अधिक दूषित और खोखला किया है या गांव के लोगों ने।
५- बोतलबंद पानी पीने वाले कोरोना में ज्यादा मरे या कुंए का पानी पीने वाले? या यूं कहें कि शहरी ज्यादा बीमार होते हैं या गांव वाले।
६- शहरी प्रदूषण में रहते हैं या गांव वाले? 
७- हजारों लाखों सालों से मानव खुले में शौच को जा रहा है। पेड़ पौधों और फसलों को उससे पोषक तत्व मिलते हैं। लेकिन जब से स्वच्छता अभियान चलाया गया तब से शहरों की गंदगी अपने पास पड़ोस की गंदगी न साफ करने वाले देहात उन लोगों को सफाई का पाठ पढ़ा रहे हैं जो खुद स्वच्छ व हराभरे वातावरण में रहते हैं। ये शहरी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के एजेंट शहरी गंदगी शहर से लै जाकर देहात में गंदगी फैला रहे हैं। ताकि लोगों के दिमाग में यह भरा जा सके कि जमीन से निकला पानी अशुद्ध और फिल्टर किया बोतलबंद पानी पीने योग्य है। जिसके बारे में यह भी पता नहीं कि कब भरा गया, और कैसे भला गया होगा?
लोग बहुराष्ट्रीय कंपनियों के इस षणयंत्र को समझें और इन्हें देश के संसाधनों का दुरुपयोग करने और उनसे भारी मुनाफा कमाने से रोके। 
जय मजदूर, जय किसान। बहुराष्ट्रीय कंपनियों से रहो होशियार।
६-

Saturday, 2 April 2022

राजनीति ही भ्रष्टाचार की जनक है, तो फिर वह भ्रष्टाचार क्यों समाप्त करना चाहेगी??

राजनीति कभी भी नहीं चाहती कि भ्रष्टाचार खत्म हो। वह हमेशा भ्रष्टाचार की नई नई युक्तियां इजाद करती रहती है। भ्रष्टाचार की युक्ति के प्रचलन की जानकारी जैसे ही लोगों को हो जाती है, वैसे ही राजनीति उसे समाप्त करने का भरपूर नाटक करने लगती है। इसी भ्रष्टाचार समाप्ति के नाटक में नवीन तरह के भ्रष्टाचार की नींव रख देती है। जबकि साधारण व्यक्ति इतना भोला होता है प्रारम्भिक दौर पर उन्हें यह नींव नजर नहीं आती, नजर जब आती है जब वह महल बनकर सबके सामने होती है।  
       राजनीति कभी नहीं चाहती कि लोग चरित्रवान, सदाचारी और ईमानदार हो। क्योंकि इनके प्रभाव के चलते राजनीति व्यक्ति पर  शिकंजा कसने से घबराती है। राजनीति को व्यक्ति पर  शिकंजा कसने का अवसर तभी मिलता है जब वह चरित्रहीन, दुराचारी और बैईमान हो। इसलिए राजनीति से यह उम्मीद करना कि यह लोगों के बीच से भ्रष्टाचार, चरित्रहीनता, दुराचार, और बेईमानी समाप्त करेंगे । यह सोचना हमारी सबसे बड़ी मूर्खता है। 
     तो अब सवाल उठता है कि लोगों के मध्य से भ्रष्टाचार, चरित्रहीनता, दुराचार और बेईमानी कौन समाप्त कर सकता है? जहां तक मेरा व्यक्तिगत विचार है कि यह कार्य सिर्फ संत और महात्मा कर सकते हैं।  आपका अपना मत जो भी हो। मुझे उसमें कोई आपत्ति नहीं है। 

                     !!स्वामी संबोधि आनंद!!