Wednesday, 26 April 2017

Reason of India and Pakistan u dividation

अक्सर जब हम इतिहास की बात करते हैं तो हमसे उसके साक्ष्य मांगे जाते हैं। जो अपनी बात को सिद्ध करने के लिए जरूरी है। पर मैं जानना चाहता हूं कि जो लेख हमारे पास है वे कहां तक सत्य है? हम वर्तमान की घटनाओं पर गौर करें तो पाते हैं कि घटना का हमें जो कारण बताया जाता है वास्तव में उससे भिन्न होता है। जैसे ब्राह्मणों ने पूरे भारत की सत्ता पर, छल कपट धोखाधड़ी, भेदभाव, धार्मिक जातीय भावनाओं आदि के सहारे, काबिज रहे और है। पर मान्य इतिहास में कहीं भी इसका वर्णन नहीं मिलता। तो हम यह कैसे मान ले कि हमारे सामने हमारे इतिहास को परिलक्षित करने वाले जो लेख, साहित्य, मौजूद है वह पूर्णतया सही व गलत है? फिर इतिहास की अनेकों घटनाएं ऐसी है जिनका वास्तविक कारण कुछ और है बताया कुछ और जाता है। जैसा कि अनेक मामलों में आज भी होता है। जैसे बहू ने आत्महत्या किसी भी कारण से की हो पर आरोप दहेज प्रताड़ना का ही लगता है। जब ऐसी छोटी छोटी बातों की असलियत बदल जाती है तो उस समय जब अधिकांश जनता अनपढ़ थी तो वास्तविक तथ्य क्यों नहीं छिपाए गये होंगे?

आइये थोड़ा भारत पाक बंटवारा की ओर इशारा करते हैं- अक्सर यह कहा जाता है कि भारत पाक विभाजन जिन्ना गांधी की जिद व धार्मिक कारणों से हुआ। पर मैं इस से इन्कार नहीं करता हूं कि जो हमें बताया गया है वह पूर्णतया गलत है। पर मेरा मानना इस बंटवारे के पीछे कुछ और ही वजह है जिसे चालाक राजनीतिक लोग छिपाए बैठे हैं। आइये इस बंटवारे के पीछे कुछ सांस्कृतिक रिवाज, प्रेरणा स्थलों व लोगों की ऐतिहासिक चेतना के सन्दर्भ में देखते हैं। आज अगर हम भारत की परम्पराओं को गौर करें तो हमारी बहुत सी परम्पराएं  सैंधव सभ्यता से मिले प्रतीकों से मिलती जुलती है जिन्हें लोग विभिन्न अनुष्ठानों​, रीति-रिवाज परम्पराओं के रूप में रक्षित किये है पर उनका इतिहास में कहीं वर्णन नहीं है। हम सब यह अच्छी तरह से जानते हैं कि सैंधव सभ्यता के अधिकांश अवशेष वर्तमान पाकिस्तान में है। जहां अधिकांश मुस्लिम लोग हैं। वहीं इस सभ्यता से प्रेरणा लेने वाले लोगों भारत में है, जहां पर ये एतिहासिक प्रेरणा स्थल नहीं है। कहते हैं कि 1842 में मैसन ने सिंधु घाटी की सभ्यता की ओर इशारा किया। अर्थात सबसे प्राचीन इतिहास वैदिक इतिहास है के मिथक तो तोड़ा। लोगों का दिमाग अपनी ऐतिहासिक स्थलों​ की ओर न जाये इसलिए अंग्रेजों के विरुद्ध विभिन्न छोटे छोटे संघर्ष शुरू कराये गये जिनका अधिकांश नेतृत्व आदिवासियों ने किया। और इन भोले-भाले आदिवासियों ने मैसन को न सुना न जान पाये न ही इन्हें सिंधु घाटी की सभ्यता से कोई लेना-देना रहा।
जब 1922-23 में इस सैन्धव सभ्यता को खोजकर अंग्रेजों ने भारत के पटल रख दिया और वैदिक इतिहास की प्राचीनता को चुनौती देते हुए1928 में सिन्धु घाटी की सभ्यता को सर्वाधिक प्राचीन घोषित कराया। तो उसी समय ब्राम्हणों ने अपनी नस्ल की श्रेष्ठता को बनाए रखने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की गई जिसने भारतीय लोगों के बीच में हिन्दू धर्म नाम का नया धर्म लाकर खड़ा कर दिया ताकि लोगों का ध्यान सिंधु घाटी की गरिमामयी सभ्यता की ओर लोगों का ध्यान न जाते। उन लोगों ने बड़ी चालाकी से लोगों की मनोदशा हिंदू शब्द से जोड़ने के लिए सिंधु को हिन्दु कहकर सिंधु को गाली बना डाला गया। जिसका परिणाम यह हुआ कि आज भारतीय अपनी मूल सभ्यता सिंधु घाटी की सभ्यता को भूल गए और अपनी प्रेरणा का स्रोत देवी देवताओं को मानने लगे। आज अधिकांश भारतीयों के प्रेरणा स्रोत सिंधु घाटी से प्राप्त अवशेष होने चाहिए परंतु जानकारी के आभाव में हिन्दू मंदिर व देवी देवता बने हैं जो मूलतः यूनानी धर्म के है। सैन्धव सभ्यता की जानकारी हमेशा के लिए भारतीयों के मन मस्तिष्क में न आने पाए  इसलिए भारत पाक विभाजन कर अधिकांश सैन्धव सभ्यता के स्थल पाकिस्तान को दें दिये गये । और वर्तमान में भारत में पाकिस्तान विरोधी माहौल बना कर खड़ा कर दिया गया ताकि यहां के लोग अपने मूल उदगम क्षेत्र सैन्धव सभ्यता के स्थलो का भ्रमण करने की हिम्मत न कर सके और हमेशा हमेशा के लिए उस सैन्धव संस्कृति को लोग भूल जाये जिसे उनके पूर्वजों ने बनाकर तैयार किया था। उनके दिमाग से इस बात को​ हमेशा के लिए हटा दिया जाए कि हमारे पूर्वज ही इस सभ्यता के जनक थे। भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान को भारत से अलग करने का षणयंत्र इसलिए रचा गया, ताकि भारत के लोग कालांतर सिंधु सभ्यता को भारत की सभ्यता  न मानकर पाकिस्तान और अफगानिस्तान की मानते हुए अपने ही पूर्वजों की सांस्कृतिक विरासत से  घृणा करने लगे और पुुः इस बात को स्थापित किया जा सके कि वैदिक इतिहास ही सबसे पुराना इतिहास है। भारत के बंटवारे की तत्कालीन परिस्थितियां पैदा करना भारोपीयों की बहुत बड़ी मिलीभगत थी। जिसका परिणाम हमेशा हमेशा के लिए भारत की सभ्यता कहीं जाने वाली पाकिस्तानी विदेश अफगानिस्तान की बनकर रह
जायेगी।
मेरा लेख पूर्णतया वैचारिक व स्वसंस्कृति के महत्व को ध्यान में रखकर लिखा गया है। मेरी किसी को चुनौती देना या हर्ट करना नहीं है।
शैलेंद्र कुमार गौतम कानपुर नगर उ० प्र०
Mob 9455615564

Tuesday, 25 April 2017

वैज्ञानिक विकास ही विनाश का करना

वैज्ञानिक व डाक्टरों ने जिस तरह विकास के नाम पर खाद्य श्रृंखला को दूषित कर दिया है। उससे जीव- जन्तुओं का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है। आज यदि बीमारियों को गौर किया जाए तो मधुमेह, हार्टअटैक, ब्रेनअटैक, जैसी बीमारियों का बड़ी तेजी से इफाजा हो रहा है। इन सबके पीछे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न संक्रामक बीमारियों के नियंत्रण के नाम पर चल रहे स्वास्थ्य सेवाओं की आढ़ में मनुष्य को नष्ट करने की साजिश रच दी गई है। जिसे समझना व इससे झुटकारा पाना असंभव सा हो गया है।

Saturday, 22 April 2017

दुख का कारण खोजें

अपना कार्य, अपने बुद्धि, विवेक व  परिस्थितियों के अनुसार करना ही बुद्ध का संदेश है।


इस आधार पर जो व्यक्ति बुद्धिमान हैं, वह​ बौद्धिष्ट है।


बोधिसत्व बुद्ध कहते हैं कि दुख है तो दुख का कारण, कारण है तो निवारण है।

समस्या यह नहीं है कि विरोधी चालाक व धूर्त है। समस्या यह है कि यह हम जानते हुए भी उसके बहकावे में आ जाते हैं।

मान लो आप किसी रोग से पीड़ित हैं जिसका इलाज के लिए दवा आप स्वयं न कर किसी दूसरे से अपेक्षा करते हैं कि वह दवा खा ले, जो कि संभव नहीं। अगर मान लो कि दूसरे ने दवा खा भी ली तो उससे आपका इलाज कैसे होगा। अगर अपना इलाज करना है तो दवा आप ही को लेनी पड़ेगी।


एक अन्य तथ्य
 जब बाबा साहब अंबेडकर का समय था तब लोगों को टी बी, प्लेग, भुखमरी, छुआछूत,जैसी समस्याएं थीं, तब उन्होंने समाज में व्याप्त उन बीमारियों का इलाज किया आज बीमारियां बदल चुकी है, एड्स, कैंसर, कूटनीति चालाकी, बेरोजगारी, शिक्षा का बाजारीकरण, निजीकरण वैश्वीकरण, मशीनीकरण उदारीकरण, डिजिटलीकरण​ जैसी समस्याएं खड़ी हो कर​ दी गयी है, तो मैं जानता चाहता हूं कि  इनके इलाज के लिए बाबा साहब की टी बी, छुआछूत, भुखमरी की कौन सी दवा काम करेगी?
तीसरा तथ्य जब कांसीराम ने अपना मिशन चलाया उस समय बाबा साहब अंबेडकर को व उनके कार्यों को कोई नहीं जानता था, इस लिए यह आवश्यक था कि जगह जगह अम्बेदकर जयन्ती मनाने का कार्यक्रम चलाया गया। लेकिन आज की समस्या यह नहीं है कि भारत का हर नागरिक बाबा साहब अंबेडकर को व उनके योगदान को न जानते हों?
हमें​ अपना संघर्ष व कार्य  उन क्षेत्रों में करना होगा जो आज के लिए जरूरी है। यहीं पर हमें बुद्ध के उस उपदेश की जरूरत पड़ती है जिसमें वे कहते हैं कि दुख है तो दुख का कारण है कारण खोजें बिना यदि हम कार्य करते हैं तो हमें सफलता नहीं मिलेगी। दुख के कारण को समझ लिया तो निवारण निश्चित हो जायेगा। जिसे बहुजन समझना नहीं चाहता और जिसने समझ लिया उसका दुख दूर हो गया।

Monday, 17 April 2017

नौनिहाल क्यों हो जाते है, अपनो के विरुद्ध

मैं यह नहीं कहता कि हम अपने इतिहास को भूले। पर मैं यह भी नहीं कहता कि इतिहास को ही सब कुछ माने।
हम आज की परिस्थितियों को समझें और भविष्य का प्लान बनाये।
बहुत से लोग मेरी इस बात से इत्तेफाक नहीं रखेंगे। फिर भी मैं कहना चाहूंगा कि। हम जो शिक्षा अपने बच्चों को दें रहे हैं। क्या वह शिक्षा बच्चे को बुद्धजीवी बनाने वाली है, या फिर शासकों​ द्वारा मस्तिष्क नियंत्रण करने वाले शिक्षा दिला रहे हैं।

मैं यह बात यूं ही नहीं कह रहा हूं। आपने देखा होगा कि आपका अपना बच्चा जिसे तीन साल की उम्र में ही पी जी से पढ़ने के लिए मंहगे से मंहगे विद्यालय में भेजते हैं फिर हमारा अपना बच्चा एक निश्चित उम्र में आकर आपकी बात की कद्र नहीं करता है। जानते हैं आपका अपना बच्चा, जिसे आपने पढ़ाने लिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी, वह आपके विरुद्ध खड़ा हो जाता है। उसका सबसे बड़ा कारण आपके द्वारा तीन वर्ष की आयु में विद्यालय भेजना है। जो उम्र में बच्चे की शारीरिक व भावात्मक विकास की होती है उस उम्र में शासकों द्वारा निर्धारित पाठ्यक्रम में फंस जाने के कारण उसका संवेगी विकास प्रभावित होता है। जिस प्रकार आप बच्चे के संवेग को समझें बगैर जबरन तीन साल की उम्र में अपने वात्सल्य से दूर कर उसे संवेदना हीन बनाते हैं, ठीक उसी तरह एक निश्चित उम्र में आकर वह स्वयं आपसे दूर हो जाता है। आज की शिक्षा पूर्णतया सुनियोजित शिक्षा है जो कि विश्व नियंताओं द्वारा निर्धारित की गई है।जिसके माध्यम से वे भावना रहित मानव का निर्माण कर रहे हैं।

आज कल हम जिसे शिक्षा समझ कर अपने बच्चों को दिला रहे हैं वास्तव में वह creative education न होकर tool of controlling education है जहां बच्चे को पढ़ाने लिखाने के नाम पर ऐसी शिक्षा दी जाती है जिससे बच्चे का बौद्धिक स्तर  खोजी न होकर आश्रित हो जाए। 
         हो सकता है मेरी यह बात हर किसी के समझ में न आये या मेरी बात से आप सहमत न हों।  परन्तु मैं एक शिक्षक होने के नाते  बच्चो, नौजवानों और समाज, परिवार का आकलन करने के उपरांत इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि हम अपने बच्चों को शैशवास्था में (2 से 5 वर्ष) ही विद्यालय में भेज देने का परिणाम यह होता है कि बच्चे का शारीरिक और मानसिक विकास बाधित हो जाता है। बच्चे को कम उम्र में ही जानकारियों का भण्डार हो जाता है परन्तु उस जानकारियों का जीवन में उपयोगिता सुनिश्चित करने की क्षमता नष्ट हो जाती है। 

      जरा खुद सोचो कि आपको क्या तीन चार वय की उम्र में बतायी गयी कोई बात या साधारण घटना याद है? जहां तक मेरा निजी अनुभव है कि मुझे तो उक्त उम्र का कुछ भी याद नहीं है। हम यह भूलते जा रहे कि बच्चे की परवरिश, शैक्षिक व बौद्धिक विकास के असली मायने क्या है! जिस उम्र में हम अपने बच्चों को स्कूली शिक्षा के लिए कठोर अनुशासन में विद्यालय को सौंप देते हैं वह उम्र स्कूली शिक्षा से अधिक महत्वपूर्ण बच्चे की सामाजिक, सांस्कृतिक और शारीरिक क्षमता के विकास की उम्र होती है। उपरोक्त विकास अधिक से अधिक आउटडोर गेम्स खेलने, नाते रिश्तेदारों व आप पास के पड़ोसियों, मित्रों से सम्पर्क से होता है। जिसे हमने स्वयं बच्चों को घरों में कैद कर या कक्षा, किताब  तक सीमित क समाप्त करने में लगे हैं। यह विषय बहुत ही जटिल और सोचनीय है कि हम बच्चों को क्या सौंप रहे हैं। आप वर्तमान पीढ़ी का अध्ययन करें असहनशीलता, अपराधी प्रवृत्तियां, डिप्रेशन, समस्याओं का सामना करने की क्षमताओं का पतन तेजी से हो रहा है। यह  सब हमारी सोच और अन्धानुकरण का नतीजा है। जिस उम्र में बच्चे को लाड़-प्यार, दुलार, अपनों का साथ चाहिए उस उम्र में हम उसे व्यवसायिक शिक्षालयों में सौंप देते हैं।  जरा आप खुद सोचो जब आप बृद्ध या बीमार हो और इस स्थिति में न हो कि एक गिलास पानी उठाकर ले सके तब आपकी सोच यही होगी आपका कोई बेटा बेटी आपके साथ हो और आपकी देखरेख करें पर आपके अपने बेटे आपको सक्षम होते हुए भी एक गिलास पानी देने के लिए आपके पास नहीं होंगे, जानते हैं क्यों? क्यों कि यह सब आपने आधुनिकता व शिक्षा के नाम पर अपने बच्चों को दो-तीन वर्ष की अवस्था में ही जो दिया था वहीं वह आपको वापस कर रहा होता है। जिस तीन वर्ष की उम्र में आपके बच्चे को प्यार दुलार के साथ उछल कूद की आवश्यकता थी उस उम्र में आप अपने बच्चे को शिक्षा के नाम पर उसे विद्यालय भेजकर अपने लाड़-प्यार से दूर रखा और आपने अपने बच्चों के साथ कोई भी हमदर्दी नहीं रखी तो फिर वही बेटा आपके साथ क्यों हमदर्दी रखें। जिस प्रकार आपने अपने बच्चों को सर का बोझ समझकर व्यवसाय में लिप्त आकर्षित करते विद्यालयों को सौंप दिया था जहां वह अबोध बच्चा आपके प्यार व मां की ममता को तरसता रहता होगा ठीक उसी प्रकार जब आप एक गिलास पानी लेने को तरस रहे होते हैं तब वहीं बच्चा जिससे आप एक गिलास पानी की उम्मीद कर रहे होते हैं आपसे बड़े प्यार से कहता है कि पापा नौकर आ गया है जो आवश्यकता हो ले लेना। सोचो उस समय आपके दिल में क्या गुजरती होगी जिस औलाद को आपने इस उम्मीद से पाला था कि मेरे बुढ़ापे का सहारा बनेगा पर वह भी आपकी तरह भावना रहित होकर भौतिक संसाधनों के पीछे दौड़ रहा होता है। यह सब हमारी ही सोच और कर्मों का नतीजा है। हमें सोचना होगा कि हमें हमारे बच्चे कैसे हों? हमारा समाज कैसा हो? देश कैसा हो, देश के नागरिक कैसे हो? जैसा हम चाहते हैं पहले हमें खुद वैसा ही बनना पड़ेगा। 
 जय भारत भूमि
सर्वे मंगलं भवतु।।
स्वामी संबोधि आनंद।

Sunday, 16 April 2017

Responsibility of teacher

अगर सभी महापुरुषों की जयन्तियों में विद्यालय खोले जाते, उनके जीवन के बारे में अपनी आने वाली पीढ़ी को ज्ञान हस्तांतरित किया जाये तो इसमें बुरा ही क्या है? रही बात १२० दिन विद्यालय खुलने की , तो बता दूं कि १२० दिन भी ही विद्यालय खोलकर पढ़ाई नहीं होती है।  विद्यालय खुलने का समय 8:30am है। कुछ विद्यालयों​ को छोड़कर शिक्षक के विद्यालय पहुंचने का समय 9 am से 10  am के बीच रहता है। शिक्षण कार्य बंद होने का समय 3 pm है। विद्यालय 2:30 से 3 pm के मध्य हरहाल में बंद हो जाते हैं। मध्यावकाश का समय 30 मिनट होता है पर समाप्त एक घंटे में होता है। इस प्रकार शिक्षक  4से 5 व 3 से 4घंटे कार्य करता है। RTE के मुताबिक प्रतिदिन शिक्षक को साढ़े सात घंटे रुकना है। रुकता 3 से ५ घंटे है। अब आप पूरे वर्ष काम आंकड़ा खुद निकालो शिक्षक कितने दिन कार्य करता है। अरे भाई जरूरी नहीं कि जो व्यवस्था हमारे लिए समस्या लग रही हो वह देश के लिए हितकारी न हो। शिक्षक ही तो है जो समाज के सामने आदर्श प्रस्तुत करता है। अगर गहराई से चिंतन करें तो विदेशी आक्रांता व कंम्पनियां शिक्षक से ही तो घबराती है। आज शिक्षक ने अपनी जिम्मेदारी वहन करना बंद कर दिया है। जिसका नतीजा देश फिर से गुलामी की ओर बढ़ रहा है। शासक का तो काम है लोगों को गुलाम बनाये रखना। वह चाहे देशी हो या विदेशी। पर शिक्षक का कार्य है शासक पर लगाम लगाये रखना। वह घर का हो या बाहरी। इसी लिए अमेरिका जैसे देश भारतीय शिक्षक से घबराता है। परन्तु क्या कहा जाए शिक्षक को, क्योंकि मैं भी शिक्षक हूं, चाटुकारिता की हद ही पार कर दी है। निजी शिक्षक जनता को जी भर के चूस रहे हैं सरकारी शिक्षक अपनी जिम्मेदारियों से भाग जिसका रहे हैं। नतीजा है कि एक अदना सा तहसील का चपरासी, लिपिक हमें एक मात्र फोन से अपने कार्य को कराने के लिए बुला लेता है और न जाने पर कार्यवाही की धमकी देता है। एक  नेता  हम पर उंगलियां उठा रहा है। हम वह शिक्षक रहे हैं जो एक निरंकुश राजा को भी नियंत्रित करते थे ये तो लोकतंत्र वाले शासक इन्हें नियंत्रण में रखना  कौन बड़ी बात है। बस हम अपने दायित्वों का निर्वाहन करने लगे।
 हमने पूर्व भी लिखा था कि

जब शिक्षक चाटुकार हो जाये तो समाज भ्रष्ट हो जाता है। और जब राजा व्यापारी हो जाये तो देश नष्ट हो जाता है।

आज जो हम शिक्षकों​ पर उंगलियां उठा रहे​ है ये हमारे तलवे चाटते नजर आयेंगे। केवल हम अपनी जिम्मेदारियों का सही से निर्वाहन करने लगे। शिक्षक का कार्य केवल पढ़ाना ही नहीं बल्कि सही और गलत को समाज के सामने रखना भी है, समाज को सही मार्ग दिखाना भी है।

भाइयों व बहनों जिनको मेरी बातों से उनके आत्म सम्मान को ठेस लगी हो माफ करना।

Saturday, 15 April 2017

सिंधुत्व

सिन्धुत्व के बारे में कहा जाता है कि यूनानी सिंधु नदी को इण्डस कहते थे जिसके कारण  जम्बूद्वीप  को इण्डिया कहा जाने लगा। बाद में आर्यों ने, जो भारोपीय  व हिब्रू भाषियन समूह के आक्रांता थे, सिंधु को हिंदु कहकर पुकारते थे। क्योंकि वे ''स' का उच्चारण 'ह' करते थे । जिसके कारण सिन्धु को वे हिंदु कहकर पुकारते थे। ऐसा ब्राह्मण विद्वानों​ का मानना है।

जहां तक मेरा चिंतन मनन है ब्राह्मणों का यह तर्क बड़ा ही षणयंत्रकारी और साजिश से भरा लगता है। अगर ब्राह्मणों ( आर्यों) को ' स' का उच्चारण नहीं आता था तो वेदों पुराणों में जगह जगह 'स' का प्रयोग कैसे कर लिया? हालांकि इस प्रश्न से भी बचने के लिए उन्होंने उपाय खोज लिया कि हिंदु शब्द मध्यकालीन आक्रांताओं​ का दिया हुआ है। तो फिर आपने सिंधु को हिंदु क्यों मान लिया।
उनके इन सभी तर्कों के समक्ष यह. बात स्वयं सिद्ध होती है कि हिंदु एक विदेशी शब्द है। जिसे स्वीकृत करना देशद्रोह से कम नहीं​है।
अब आते हैं कि सिंधत्व पर हिंदुत्व का आवरण कैसे हैं?

अगर आप वर्तमान में हिंदुओं द्वारा अपनाई जा रही अनेकों विद्याएं जो मूलतः सैन्धव सभ्यता की है और वहां से प्राप्त अवशेषों में भी मिली है। जिन पर ब्राह्मणवाद​ का लेपन कर, सनातन धर्म, सनातन संस्कृति आदि के नाम से समाज को परोसा गया। और आप सूक्ष्म दृष्टि से अवलोकन करें तो आज भी बहुजनों के कार्यों का ब्राह्मणीकरण कर पेश किया जाता है। आप ने पढ़ा होगा कि बुद्ध, कबीर, रविदास,आदि अनेकों बहुजन महापुरुषों का ब्राह्मणीकरण कर डाला। सिंधु घाटी सभ्यता से प्राप्त योगी की प्रतिमा को शिव से, स्वास्तिक, व सतिया का चिन्ह,जो कि ऊर्जा का प्रतीक,व सूर्य व पृथ्वी के घूर्णन का प्रतीक होता था, उसे शुभ लाभ का प्रतीक बना दिया। और उस पर पाखण्ड का लेपन कर सैन्धव विज्ञान को नष्ट करने में सफल रहे।

यह. बहुत बड़ा विषय है जिस पर चर्चा परिचर्चा करने के लिए आमने सामने होना आवश्यक है।
डिजिटल इण्डिया, निजीकरण, वैश्वीकरण, उदारीकरण, मशीनीकरण आदि की नीति अपनाने के पीछे मुख्य कारण भारत में अमीर व गरीब ( शोषक,व शोषित) वर्ग बनाना। मध्यम वर्ग को नष्ट करना। क्योंकि​ किसी भी सत्ता को सबसे बड़ा खतरा मध्यम वर्ग से रहता है।

Thursday, 13 April 2017

क्या हम जानते​है अम्बेदकर मिशन क्या है?

इस अम्बेदकर जयन्ती की बधाईयों को लेकर मैं क्या करूं।
उस समय ये बधाइयां और चुभती है जब दुश्मन बाबा साहब अंबेडकर की बनाई व्यवस्था को नष्ट कर रहा हो और हमारे समाज के कर्णधार व्यवस्था के नष्ट होने पर चुप्पी साधे हो। और बाबा साहब अंबेडकर की तस्वीर गले में टांग गाने,बजाने व मौज मनाने में लिप्त हो। क्या नाचना,गाना, मौज मनाना ही अम्बेदकर का मिशन है।

आज बड़े जोर जोर से बहुजन माइक लगाकर चिल्ला रहे हैं "बाबा तेरा मिशन अधूरा, हम सब मिलकर करेंगे पूरा"।

बड़ा ही आश्चर्य होता है कि हम खुद यह मानते व कहते हैं कि बाबा साहब अंबेडकर का मिशन अधूरा है।  हमारा दुश्मन कहता है तो क्या बुरा करता है।


अगर बाबा साहब का मिशन अधूरा होता तो पूरा भारत उनकी बनायी व्यवस्था में रहकर अपना विकास न कर रहा होता। बाबा साहब के मिशन को पूरा करने की नहीं बढ़ाने की जरूरत है।  जोकि नाचने, गाने, खाने पीने मौज मनाने से नहीं चलने वाला। इसके लिए हमें वर्तमान परिस्थितियों, व्यवस्था को समझते हुए अवसर तलाशने से पूरा होगा।

क्या हम जानते​है अम्बेदकर मिशन क्या है?

इस अम्बेदकर जयन्ती की बधाईयों को लेकर मैं क्या करूं।









उस समय ये बधाइयां और चुभती है जब दुश्मन बाबा साहब अंबेडकर की बनाई व्यवस्था को नष्ट कर रहा हो और हमारे समाज के कर्णधार व्यवस्था के नष्ट होने पर चुप्पी साधे हो। और बाबा साहब अंबेडकर की तस्वीर गले में टांग गाने,बजाने व मौज मनाने में लिप्त हो। क्या नाचना,गाना, मौज मनाना ही अम्बेदकर का मिशन है।

आज बड़े जोर जोर से बहुजन माइक लगाकर चिल्ला रहे हैं "बाबा तेरा मिशन अधूरा, हम सब मिलकर करेंगे पूरा"।

बड़ा ही आश्चर्य होता है कि हम खुद यह मानते व कहते हैं कि बाबा साहब अंबेडकर का मिशन अधूरा है।  हमारा दुश्मन कहता है तो क्या बुरा करता है।


अगर बाबा साहब का मिशन अधूरा होता तो पूरा भारत उनकी बनायी व्यवस्था में रहकर अपना विकास न कर रहा होता। बाबा साहब के मिशन को पूरा करने की नहीं बढ़ाने की जरूरत है।  जोकि नाचने, गाने, खाने पीने मौज मनाने से नहीं चलने वाला। इसके लिए हमें वर्तमान परिस्थितियों, व्यवस्था को समझते हुए अवसर तलाशने से पूरा होगा।

Sunday, 9 April 2017

बुद्धत्व क्या है

सिन्धुत्व पर विदेशियत व पाखण्ड का आवरण( overlapping) करना छ हिंदुत्व है। इस पाखण्ड व आवरण को हटाना बुद्धत्व है।
शैलेंद्र कुमार गौतम कानपुर नगर।

Hindu dharm ki jatiyata

मैंने दुनिया के अनेकों धर्मों के बारे में पढ़ा और सुना है, सभी धर्मों की​ कोई न कोई गाइड लाइन ( शिक्षाएं) अवश्य निर्धारित है। परन्तु मुझे आज तक किसी ने सनातन धर्म या हिंदू जीवनशैली की कोई सामान्य शिक्षाएं नहीं बतायी गयी, जो सभी पर समान रूप से लागू हो।
    कई बार लोगों से चर्चा परिचर्चा व अध्ययन के दौरान जानकारी मिली कि हिंदू धर्म नहीं जीवनशैली है। सनातन धर्म क्या है इसकी शिक्षाएं क्या है? इसका प्रवर्तक कौन है? कोई भी बताने की स्थिति में नहीं मिलता। जो कुछ विद्वानों ने बताया उनमें से अधिकांश शिक्षाएं सैंन्धव से जैन धर्म व बौद्ध धर्म से चुराई लगती है। अगर ऐसा है तो स्वयं को हिंदू कहने वाले लोगों का वास्तव में कोई धर्म नहीं है। हां जातियों का उर्ध्वाधर विभाजन जरूर मिलता है। जिसमें कुछ जातियां सम्पूर्ण समाज की ठेकेदार होती है। जो अधिकांशतः​ अपने वर्ग का हित साधती है। शेष जातियां वर्ग संघर्ष में लगी रहती है।