Wednesday, 14 September 2022

RTE ACT की धारा 25 के प्राविधानों से बच्चों की शिक्षा का मौलिक अधिकार का हनन किया गया।

शिक्षा शुरू में जो एक संवैधानिक अधिकार था, अब एक मौलिक अधिकार है। संविधान के 86वें संशोधन अधिनियम 2002 द्वारा अनुच्छेद 21(A) जोड़ा गया था। जिसके अनुसार राज्य 6 से 14 वर्ष तक आयु के सभी बच्चों को नि:शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान करेगा।

भारत में शिक्षा का अधिकार’ संविधान के अनुच्छेद 21A के अंतर्गत मूल अधिकार के रूप में उल्लिखित है। 
2 दिसंबर, 2002 को संविधान में 86वाँ संशोधन किया गया था और इसके अनुच्छेद 21A के तहत शिक्षा को मौलिक अधिकार बना दिया गया।
इस मूल अधिकार के क्रियान्वयन हेतु वर्ष 2009 में नि:शुल्क एवं अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम (Right of Children to Free and Compulsory Education-RTE Act) बनाया गया। जो 1 अप्रैल 2010 से लागू हुआ था।
इस अधिनियम में की धारा-25 में विद्यालय स्तर पर छात्र और शिक्षक अनुपात का प्रावधान किया गया है। यही पर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21A के तहत प्राप्त शिक्षा के मौलिक अधिकार का हनन कर दिया गया है। 
     इस धारा के अनुपालन में सरकारों द्वारा छात्र -शिक्षक अनुपात 30:1 रखा गया। यदि किसी विद्यालय में 30-60 तक छात्र है तो वहां पर न्यूनतम दो शिक्षक नियुक्त किए जाएंगे। 
      यदि किसी विद्यालय में 50 छात्र है । जो एक से पांच कक्षा में नामांकित है। मान लो कक्षा1- में 10, कक्षा-2 में 12 कक्षा-3 में 9,कक्षा-4 में 11, कक्षा 5 में 8 छात्र है । शिक्षक दो है। मुख्य सवाल यह है कि दो शिक्षक एक साथ भिन्न भिन्न विषय पांचों कक्षा में एक समय में कैसे पढ़ा सकते हैं? यदि दो शिक्षक हैं और पांच कक्षाएं है तो क्या तीन कक्षाएं सदैव शिक्षक विहीन नहीं रहेगी? या तीन शिक्षक हैं तो दो कक्षाएं सदैव शिक्षक विहीन नहीं रहेगी? 
जबकि शिक्षक छात्र का अनुपात कक्षा की संख्या के अनुसार होना चाहिए न कि विद्यालय की छात्र संख्या आधार पर । यही पर बच्चे के मौलिक अधिकार का हनन RTE ACT की धारा 25 कर रही है। 
     RTE ACTधारा- 27 के अनुसार शिक्षकों को आपदा, जनसंख्या और निर्वाचन से सम्बन्धित कार्यों के अलावा अन्य किसी गैर शैक्षणिक कार्य में नहीं लगाया जाएगा। लेकिन मैं दस- पन्द्रह वर्षों से लगातार देख रहा हूं कि अगस्त से लेकर जनवरी तक लगातार शिक्षकों को बीएलओ ड्यूटी में लगाकर बच्चों के शिक्षा के मौलिक अधिकार का हनन किया जाता है। की बार इसके विरुद्ध शिक्षक संगठनों ने आवाज उठाई लेकिन निर्वाचन आयोग द्वारा प्रतिवर्ष शिक्षकों को भारी संख्या में वोटर लिस्ट के कार्य में लगा कर बच्चों को शिक्षा से वंचित किया जाता है। कई बार इस कार्य का विरोध भी किया गया लेकिन RTE act की धारा 27 का हवाला देकर शिक्षकों को शिक्षण कार्य से विरत कर दिया जाता है। मैंने इसी वर्ष यह मांग की कि यदि निर्वाचन आयोग बीएलो कार्य को निर्वाचन कार्य का हिस्सा मानकर शिक्षकों को बीएलओ कार्य में लगाया जा रहा है तो जिस तरह निर्वाचन कार्य के दौरान के चुनाव कार्मिकों को बीमा और टीए डीए दिया जाता है तो उसी तरह बीएलओ ड्यूटी के दौरान यह सुविधा प्रदान की जाए। इस पर सभी अधिकारी चुप हो जाते हैं। 

         इस मेरा सुझाव है कि RTE ACT की 25 में यह प्राविधान किया जाए कि प्रत्येक कक्षा में कम से कम एक शिक्षक अनिवार्य हो। यदि कक्षा में 30 से ऊपर छात्र संख्या हो तो दूसरे शिक्षक की व्यवस्था की जाए। 

     दूसरा सुझाव शिक्षकों को बीएलओ ड्यूटी से मुक्त रखा जाए। जिससे बच्चों के शिक्षा के मौलिक अधिकार का फायदा दिलाया जा सके।
स्वामी संबोधि आनंद
14 सितंबर 2022

Wednesday, 20 April 2022

पानी का व्यापार और बहुराष्ट्रीय कंपनियां का खेल। सरकार की मिलीभगत।

आजकल स्वच्छ भारत मिशन के अंतर्गत गांव गांव में जाकर लोगों के दिमाग में यह भरा जा रहा है कि तुम सब गंदे संदेश रहते हो। तुम्हें सफाई के महत्व का पता नहीं। साफ पानी नहीं मिल रहा है। हम धरती का जो पानी टेस्ट कर रहे हैं वह पानी दूषित हो चुका है। इसे पीकर बीमारियां फैल रही है आदि आदि। 
       
        मेरे ऐसे लोगों से चंद सवाल है। 
१- भूजल अगर दूषित है तो इसे किया किसने? 
२- यदि प्राकृतिक प्रक्रिया द्वारा शुद्ध किया गया जल दूषित है तो कृत्रिम प्रक्रिया द्वारा शुद्ध किया गये  जल को कैसे शुद्ध ज्ञान लिया जाए। 
३-  लाखों सालों से मानव पशु सभी प्राकृतिक तरीके से छने पानी को पी रहे हैं। आज जब बहुराष्ट्रीय कंपनियां पानी बेच रही है तो पानी अशुद्ध हो गया।
४-  जो शहर के लोग गांवों में जाकर अपनी होशियारी दिखाते हैं जरा अपने गिरेबान में झांक कर देख लें कि उन्होंने अपनी धरती मां अधिक दूषित और खोखला किया है या गांव के लोगों ने।
५- बोतलबंद पानी पीने वाले कोरोना में ज्यादा मरे या कुंए का पानी पीने वाले? या यूं कहें कि शहरी ज्यादा बीमार होते हैं या गांव वाले।
६- शहरी प्रदूषण में रहते हैं या गांव वाले? 
७- हजारों लाखों सालों से मानव खुले में शौच को जा रहा है। पेड़ पौधों और फसलों को उससे पोषक तत्व मिलते हैं। लेकिन जब से स्वच्छता अभियान चलाया गया तब से शहरों की गंदगी अपने पास पड़ोस की गंदगी न साफ करने वाले देहात उन लोगों को सफाई का पाठ पढ़ा रहे हैं जो खुद स्वच्छ व हराभरे वातावरण में रहते हैं। ये शहरी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के एजेंट शहरी गंदगी शहर से लै जाकर देहात में गंदगी फैला रहे हैं। ताकि लोगों के दिमाग में यह भरा जा सके कि जमीन से निकला पानी अशुद्ध और फिल्टर किया बोतलबंद पानी पीने योग्य है। जिसके बारे में यह भी पता नहीं कि कब भरा गया, और कैसे भला गया होगा?
लोग बहुराष्ट्रीय कंपनियों के इस षणयंत्र को समझें और इन्हें देश के संसाधनों का दुरुपयोग करने और उनसे भारी मुनाफा कमाने से रोके। 
जय मजदूर, जय किसान। बहुराष्ट्रीय कंपनियों से रहो होशियार।
६-

Saturday, 2 April 2022

राजनीति ही भ्रष्टाचार की जनक है, तो फिर वह भ्रष्टाचार क्यों समाप्त करना चाहेगी??

राजनीति कभी भी नहीं चाहती कि भ्रष्टाचार खत्म हो। वह हमेशा भ्रष्टाचार की नई नई युक्तियां इजाद करती रहती है। भ्रष्टाचार की युक्ति के प्रचलन की जानकारी जैसे ही लोगों को हो जाती है, वैसे ही राजनीति उसे समाप्त करने का भरपूर नाटक करने लगती है। इसी भ्रष्टाचार समाप्ति के नाटक में नवीन तरह के भ्रष्टाचार की नींव रख देती है। जबकि साधारण व्यक्ति इतना भोला होता है प्रारम्भिक दौर पर उन्हें यह नींव नजर नहीं आती, नजर जब आती है जब वह महल बनकर सबके सामने होती है।  
       राजनीति कभी नहीं चाहती कि लोग चरित्रवान, सदाचारी और ईमानदार हो। क्योंकि इनके प्रभाव के चलते राजनीति व्यक्ति पर  शिकंजा कसने से घबराती है। राजनीति को व्यक्ति पर  शिकंजा कसने का अवसर तभी मिलता है जब वह चरित्रहीन, दुराचारी और बैईमान हो। इसलिए राजनीति से यह उम्मीद करना कि यह लोगों के बीच से भ्रष्टाचार, चरित्रहीनता, दुराचार, और बेईमानी समाप्त करेंगे । यह सोचना हमारी सबसे बड़ी मूर्खता है। 
     तो अब सवाल उठता है कि लोगों के मध्य से भ्रष्टाचार, चरित्रहीनता, दुराचार और बेईमानी कौन समाप्त कर सकता है? जहां तक मेरा व्यक्तिगत विचार है कि यह कार्य सिर्फ संत और महात्मा कर सकते हैं।  आपका अपना मत जो भी हो। मुझे उसमें कोई आपत्ति नहीं है। 

                     !!स्वामी संबोधि आनंद!!

Wednesday, 23 February 2022

महिला सशक्तीकरण और चालाक शिकारी

      दोस्तों मैं आपको एक कहानी सुनाता हूं । एक जंगल में कुछ जंगली भैंसों का झुंड था। वे आपस में मिलकर एक साथ रहते थे । एक दूसरे के सुख-दुख में साथ देती थी । अगर कोई भैंस बीमार हो जाए तो सभी भैंसे मिलकर उसकी रक्षा करती थी। एक दिन जंगल का राजा शेर ने भैंसों के झुण्ड पर आक्रमण कर दिया। जैसे ही शेर ने भैंसों पर आक्रमण किया वैसे ही सभी भैंसे मिलकर शेर पर आक्रमण कर शेर को भगा दिया। शेर ने अनेकों प्रयास किया लेकिन भैंसों की एकता के कारण उनका बालबांका भी नहीं कर सका। एक दिन उसकी (शेर की) मुलाकात एक सियार से हो गई । उसने सियार को पकड़ लिया और कहा कि मैं तुम्हें खा जाऊंगा। सियार डर के मारे हाथ जोड़कर विनती करने लगा। सियार बड़ा ही चालाक था। उसने कहा कि अगर आप मुझे छोड़ दो तो मैं तुम्हें प्रतिदिन एक भैंस लाकर दूंगा। जिसे तुम खाकर अपना पेट भर सकते हो। शेर को उसकी बात समझ में आ गई उसने शेर को इस शर्त के साथ छोड़ दिया कि वह रोज उसे एक हैं भैंस लाकर देगा। 
         सियार भैंस के झुण्ड के पास गया और उसने एक झूठी कहानी गढ़ी कि शेर ने उसके बच्चों को पकड़ लिया है। वह उन्हें एक एक कर के मार डालेगा वह मुझे भी मारना चाहता है मैं किसी तरह उसके चंगुल से छूटकर आया हूं मुझे अपने झुण्ड में रख लो। भैंसों ने सियार की बात पर विश्वास कर लिया। सियार बड़े प्रेम से भैंसों के झुण्ड में रहने लगा। कुछ दिनो तक सियार भैंसों के झुण्ड में बना रहा और सभी भैंसों से हिल मिल गया। जब सियार को यह विश्वास हो गया कि भैंसों ने उस पर पूरा विश्वास कर लिया तो। उसने शेर को खबर की कि तुम अब भैंसों के झुण्ड पर हमला करो लेकिन ध्यान रहे कि भैंसों पर सिर्फ हमला कर किसी एक भैंस को घायल करना उसे मारना नहीं। तुम मेरी विनती पर उन्हें छोड़ देना। 
           शेर ने वैसा ही किया उसने भैंसों पर हमला किया तो सियार शेर के आगे हाथ जोड़कर खड़ा हो गया और सियार की विनती पर शेर ने भैंसों को छोड़ दिया। अब भैंसों को सियार पर पूरा भरोसा हो गया। सभी भैंसे उसकी बात मानने लगी। झुण्ड में कुछ भैंसे ऐसी भी थी जो सियार की चालाकी को समझ रही थी। उन्होंने भैंसों को चेतावनी दी कि वे सियार से सावधान रहें, हमें उसकी नियत पर भरोसा नहीं है। लेकिन अन्य भैंसों को उन भैंसों की बात पर भरोसा नहीं किया। मामला इतना बढ़ गया की भैंसें दो गुटों पर बंट गई। इधर सियार ने दो गुटों को आपस में समझौता कराने का नाटक किया। लेकिन समझौता भी नहीं होने दिया। भैंसों के दोनों गुट आपस में लड़ने -झगड़ने लगे। इस लड़ाई में दोनों गुटों से भैंसे घायल हो जाती तो सियार उन भैंसों को इलाज कराने के बहाने गुट से बाहर ले जाता और शेर के हवाले कर देता। सियार भैंसों के गुट में आकर घड़ियाली आंसू बहाता और शेर के हमले की रोज नई कहानी गढ़ता। 
       इधर भैंसों के दोनों गुटों की दुश्मनी लगातार बढ़ती गई। सियार ने भैंसों के सामने एक प्रस्ताव रखा कि हम तुम्हें सशक्त बनाने के लिए युद्ध की नई-नई विधियां सिखाएंगे ताकि तुम्हारा कोई सामना न कर सके। इस तरह वह भैंसों को प्रशिक्षित करने के नाम पर एक एक कर भैंसों को गुट से अलग कर देता और शेर को उन पर हमले करने के लिए आमंत्रित कर देता। शेर सियार की इस भैंस सशक्तीकरण की योजना से बहुत प्रभावित हुआ और उसने सियार को नाना प्रकार के पुरस्कारों से पुरस्कृत किया। 
     ऐसा ही कुछ हाल महिलाओं बच्चों और पुरुषों की सुरक्षा, संरक्षा, लालन-पालन के आधार परिवार को महिलाओं की उन्नति, शिक्षा, आजादी व विकास में सबसे बड़े बाधक, शोषक और प्रताणना का पर्याय बताकर महिलाओं और पुरुषों को एक दूसरे के विरुद्ध करने की साज़िश रची जा रही है। वे भेदभाद के नाम पर महिलाओं को अपने ही परिवार के विरुद्ध बगावत करने के लिए उकसा रहे हैं। परिवार रूपी संरक्षा व सुरक्षा के घेरों को महिलाओं के शोषणकारी संस्था के रूप में प्रस्तुत कर महिलाओं को परिवार से अलग करने की नाना प्रकार की साजिशों को लगातार अंजाम दिया जा रहा है।ताकि चालाक शिकारी की तरह शिकार को सुरक्षा घेरे से अलग करके उसे आसानी से शिकार बनाया जा सके। महिलाओं, बच्चो और पुरुषों की सुरक्षा का सबसे मजबूत आधार परिवार है।जिसे महिलाओं के शोषणकारी संस्था के रूप में प्रस्तुतीकरण कर महिलाओं को परिवार के विरुद्ध करने और परिवार तोड़ने की लगातार साजिश चल रही है। अगर यही हाल रहा तो एक दिन परिवार व समाज रूपी संस्थाएं इतिहास के पन्नों का हिस्सा बनकर रह जाएगी और महिलाओं का खुलेआम सुरक्षा और संरक्षा के नाम पर शोषण किया जाएगा। 
    स्वामी संबोधि आनंद।