Saturday, 25 February 2017

ब्राम्हणवाद

आइये ब्राम्हणवाद को जाने।क्या है ब्राम्हणवाद ? आखिर ऐसा क्या है ब्राम्हणवाद में कि हम हजारों साल से इससे मुक्त नहीं हो पा रहे हैं? कोई कहता है कि तुम्हारे अन्दर ब्राम्हणवाद कूट कूट कर भरा है। कोई कहता है कि ब्राम्हणवाद बहुत खराब है। आज तक हम ब्राम्हणवाद को समझ नहीं पाये। उसका सिर्फ एक कारण है कि हम स्वयं को नहीं समझ पाते कि हम कहां है? क्या कर रहे हैं? क्या है? आइये ब्राम्हणवाद को कुछ इस प्रकार समझते हैं।

पानी= समाज, नदी= सामाजिक व्यवस्था, नदी के कगार= ब्राम्हण, नदी की दिशा बनाने वाले= अग्रगामी ब्राम्हण, नदी का उफान या फैलाव=समाज का सामूहिक विरोध व ब्राम्हणवाद के दायरे का परिवर्तन, नदी की तली= ब्राम्हणवाद का गुप्त गठबंधन


भाइयों और बहनों आपने नदी को देखा होगा।कि उसमें दो कगार होते हैं। जिसके बीच पानी काम बहाव होता है। पानी सोचता है कि वह बिना किसी दबाव के आगे की ओर बह रहा है जबकि ऐसा नहीं है, पानी दो कगारों व आगे निर्मित ढाल के अनुरूप बहता है। हमें दो कगार अलग-अलग दिखाई देते हैं जबकि दोनों कगार पानी के नीचे छिपी तली के सहारे एक दूसरे को मजबूती से पकड़े हुए है।

ब्राम्हणवाद भी कुछ इस नदी की तरह होता है। जिस प्रकार नदी के दो कगार होते हैं ठीक उसी प्रकार दो विचार वाले ( पक्ष व विपक्ष) ब्राम्हण होते हैं, जो समाज में दिखाई तो अलग-अलग देते हैं परन्तु नदी की तली की तरह मजबूती से एक दूसरे को पकड़े रहते हैं ताकि पानी यानि समाज नदी के दो कगारों यानि दो विचारधाराओं के बीच बहता रहे। जब कभी पानी का दबाव अधिक हो जाता है तो आपने देखा होगा कि कगार स्वत: फैल जाता है, कहने का तात्पर्य जब कभी समाज को यह महसूस होता कि हम ब्राम्हणवाद के गुलाम हैं हमें ब्राम्हणवाद के दायरे से बाहर निकलना है तो वे एक साथ एकत्र होकर ब्राम्हणवाद से निकलने का प्रयास करते हैं पर ब्राम्हणवाद इतना होशियार व चालाक होता कि वह बड़ी चालाकी से अपना, (नदी की तरह) अपना दायरा बढ़ा लेता है, ताकि नदी के उफान के कारण बाहर हुए पानी को भी नदी का ही पानी समझा जाए,अर्थात समाज जब ब्राम्हणवाद की सीमाएं तोड़ कर नयी धारा बनाने का प्रयास करता है तो ब्राम्हण अपने दायरे बढ़ा देता है अर्थात अपनी स्थिति में परिवर्तन कर लेता है और अग्रगामी ब्राम्हण बड़ी तेज़ी के साथ अपने हितों को ध्यान में रखते हुए आगे से आगे नयी व्यवस्था बदलने में लग जाता है, ताकि समाज के विरोध को शान्त किया जा सके। जबकि अन्य वर्ग उसी उफान को और ब्राम्हण के बदलाव को देखकर खुश होते रहते हैं। कुछ वर्ग तो इस बात से खुश होते हैं कि हमें ब्राम्हणवाद बहुत महत्व दें रहा है।जबकि सच्चाई यह होती कि ब्राम्हणवाद उस ताकत का अपने हितों की पूर्ति के बाद पीछे छोड़ कर आगे बढ़ जाता है। समाज को तब समझ में आता है जब उसे यह महसूस होता है कि वह जिसके साथ है उसे पीछे छोड़ गया। ब्राम्हणवाद की खासियत होती है कि वह इस उफान को देखकर तत्काल नदी की तरह अपना दायरा बदल और हमारे लोगों का प्रयोग कर दूध की मक्खी की तरह बाहर फेंक देता है। हमे भी तीन प्रकार से कार्य करना चाहिए पक्ष व विपक्ष और नई दिशा, अर्थात समाज की नई व्यवस्था बनाने का कार्य करना चाहिए। यदि हम ब्राम्हणवाद के समानांतर व्यवस्था बनाने में सक्षम नहीं हो पा रहे हैं तो हमें भी विरोध नीति के साथ कब्जा नीति अपनानी चाहिए। जैसा कि समय समय पर गौतम बुद्ध, भीमराव अंबेडकर जैसे लोगों ने व्यवस्था परिवर्तन का कार्य किया पर ब्राह्मणों ने बड़ी चालाकी से उनके साथ मिलकर उनकी व्यवस्था में कब्जा कर लिए और उनकी बनायी व्यवस्था को अपने हितों के अनुरूप मोड़ते चले गए और हम समझते रहे कि ब्राम्हण हमारी व्यवस्था में जी रहे है।
अगर हम कहें कि हम अपनी ताकत को अपनी व्यवस्था को बनाए रखने व उसमें छेड़छाड़ करने वाले व बदलाव करने वाले का तत्काल विरोध करे व अपनी व्यवस्था से उसे बाहर निकाल फेंके,भले ही उस बदलाव को हमारा हित बताया जाये। तो हम अपनी व्यवस्था में ही अपना हित कर सकते हैं। व्यवस्था की दिशा में परिवर्तन हमारे अनुसार हो न कि ब्राम्हणवाद के अनुसार। तब जाकर भले ही हमें ब्राम्हणवाद से मुक्ति मिल सके। अन्यथा केवल अपने व्यक्तिगत हितों को देखने से हमारा सामूहिक अहित ही होगा। हमें समय समय पर अपनी रणनीति बदलते रहना चाहिए न कि नीति ।

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