मानव निर्मित व्यवस्था का प्रतिफल सदैव आत्मीय और स्नेहिल नहीं होता। समय और परिस्थितियों के अनुसार जहां इसके आत्मीय और स्नेहिल रूप भी देखने को मिलते हैं,तो वहीं क्रूरतम और अमानवीय रूप भी देखने को मिलते हैं। जीवन में भी सदैव दो पहलुओं के मध्य, पेण्डुलम की तरह, इधर से उधर डिगंडांग करता रहता है। जीवन में कभी सापेक्ष परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है तो कभी आपेक्ष,तो कभी निरपेक्ष। हम शिक्षकों व अभिभावको का यह दायित्व है कि एक बच्चे को शिक्षा इस प्रकार दे कि वह अपने जीवन की सापेक्ष और आपेक्ष परिस्थितियों के साथ समायोजन कर उनके अनुसार जीवन जीने की कला सीख सकें। बच्चे के प्रति सदैव आत्मीय और स्नेहिल रहने से वे जीवन की वास्तविक परिस्थितियों का आकलन करने में अक्षम हो जाते हैं। अगर बच्चे के प्रति सदैव कठोर और रुग्ण रहा जाए तो बच्चे के विद्रोही होने के अवसर बढ़ जाते है। वही जो बच्चा सदैव आत्मीय और स्नेहिल परिस्थितियों में पला-वसा हुआ हो, वह 90% अवसरों पर विपरीत परिस्थातियों से बचेगा। अगर वह विपरीत परिस्थितियों से नहीं बच सका तो वह उन परिस्थितियों में टूट जाएगा और निराश होकर स्वयं का नुक़सान करने के लिए प्रेरित हो जाता है। वह प्रतिक्षण संघर्ष और समस्याओं का सामना करने से बचेगा। आजकल विद्यालयों में कुछ इसी तरह की शिक्षा दी जा रही है कि बच्चा किताबी, तकनीकि, तार्किक, वैज्ञानिक शिक्षा में भले महारत हासिल कर रहे हो। लेकिन जीवन के दायित्वों, परिस्थितियों और समस्याओं का सामने करने में अक्षम दिखेंगे। अक्सर विपरीत परिस्थिति आते ही बच्चे आक्रामक हो जाते हैं। अगर वे अपनी आक्रामकता में सफल नहीं होते तो वे या तो तनावग्रस्त और अवसादग्रस्त होकर आत्महत्या के लिए प्रेरित हो जाते हैं।
हालांकि इसमें बच्चे का कोई दोष नहीं है। हम बच्चे को जैसा बनाना चाहते हैं। वह स्वयं को परिस्थितियोंवश उसी तरह डालने का प्रयास करता है। जबकि वह मूलत: वैसा है नहीं। बच्चा खुद को ढालते -ढालते इतना ऊब जाता है कि सक्षम स्थिति में आते ही उसका विद्रोह प्रकट होने लगता हैं। जो उसने अपने जीवन में पूर्व से दबा रखा है। वास्तव में न हम, न बच्चा यह समझ पा रहे हैं कि आखिर जीवन का उद्देश्य क्या है? क्या मात्र धनाढ्य या वैभवशाली हो जाना जीवन का उद्देश्य है? या और कुछ ?
हम सदैव इस सोच के साथ बच्चे को दूसरे के हवाले कर दे कि उसके जीवन को संभालने की जिम्मेदारी, उसे शिक्षित करने की जिम्मेदारी, उसे रोटी रोजगार देने की जिम्मेदारी, उसे योग्य बनाने की जिम्मेदारी किसी और की है। हमारा कार्य तो रातों दिन धनार्जन कर बच्चे के लिए वैभव एकत्र करना, बच्चे की हर आवश्यकताओं की पूर्ति करना है। एक अभिभावक या माता-पिता के रूप में हम इतना ही सोच रहे हैं तो नि:संदेह हम अपने बच्चे से जरा सा भी प्रेम नहीं करते। हम यह चाहते ही नहीं है कि हमारा बच्चा जीवन की विभिन्न परिस्थितियों का सामना करने योग्य बन सके। इसलिए मेरा मानना है कि हमें अपने बच्चे की शिक्षा दीक्षा के बारे में पुन: मूल्यांकन करने की आवश्यकता है। हमें बच्चे को अच्छे-बुरे, सम-विषम परिस्थितियों में जीवन जीने की कला में पारंगत करना होगा।तभी एक बच्चा अपना संतुलित जीवन जी सकेगा।