Saturday, 25 December 2021

डा विनोद कुमार दोहरे से स्वामी बोधि आंनद तक का जीवन संघर्ष रूपी आत्मकथा

*डॉ विनोद कुमार से डॉ बोधी आनंद तक का यात्रा संस्मरण - शंका युक्त सवाल।*
🌹🌹9*4*5☸️☸️☸️☸️🇮🇳
शिक्षा प्राप्ति के बाद जब पहली बार मैंने नौकरी वर्ष 2000 में पाई तो दुनियां बहुत हरी भरी स्वप्नलोक सी नजर आई। क्योंकि उस उम्र तक इसी की कामना ही की थी मैंने। बाद में केंद्र सरकार की नौकरी में सेवा का मौका वर्ष 2001 में मिला। असम मणिपुर म्यांमार का दौरा भी बड़ा लुभावना लगा। मगर उसी समय शादी का चक्कर शुरू हुआ जो आज तक जारी है। इसी दौरान जीवन में कुछ घटना क्रम के सिलसिले में टीवी पर मायावती जी और राजा भैया का मामला दिखा। तब पहली बार जाति और जातीय पूर्वाग्रह ग्रसित झंडू धर्म की हकीकत और लोगों पर अत्याचार का नमूना दिल दिमाग में समाया। अर्थात वर्ष 2002 अर्थात 27 साल की उम्र गुजर जाने के बावजूद घर परिवार समाज से यह ज्ञान नहीं दिया गया कि जातीय दुराग्रह और तिरस्कार भी कोई चीज होती है।
यह हमारे समुदाय की बहुत बड़ी समस्या है जिस कारण बच्चे वयस्क होकर भी मूर्ख ही बने रहते हैं।

खैर इसी राजाभैया और मायावती जी वाले घटनाक्रम ने मुझे यह सोचने पर मजबूर किया कि आखिर यह सब मामला क्या है और इसका उपाय क्या है। इसी का नतीजा था कि मणिपुर प्रवास के दौरान तमाम सवर्ण दोस्तों से सामाजिक मुद्दों पर मेरी कहा सुनी होने लगी। जिसमे से एक दोस्त ने सुझाया कि यदि आप को समुदाय की इतनी ही चिंता है तो स्वयं को सामाजिक कार्यों में लिप्त कीजिए।
बात में दम था इसलिए
नतीजे में कोई प्रभावी साहित्य खोजने लगा। 

ताकि इस मामले को अच्छे से समझ सकूं। तभी कुछ पुस्तकें हाथ लगीं जिनमे से पहली थी के नाथ रचित जातिभेद। जो कि लेखक के अपने संस्मरण थे। जो मुल्तया किसी जाति विशेष के खिलाफ थे। मगर उस पुस्तक के बाद पता चला कि डॉ अंबेडकर नाम का कोई व्यक्ति भी रहा है जिसने समाज की इसी पीड़ा पर काफी काम किया है। नजीते में मुझे 14 अप्रैल के मेले में जाने का अवसर मिला जहां इस तरह का तमाम साहित्य मौजूद था। यकीन मानो मेरे लिए तो जैसे लाटरी ही लग गई। डा अंबेडकर को पढ़ते पढ़ते झामसेफ तक पहुंचा। उसके कार्यक्रमों में बढ़चढ़ कर हिस्सेदारी निभाने लगा। जयपुर कटक लखनऊ इटावा कन्नौज कानपुर आदि के राष्ट्रीय व जनपद स्तरीय अधिवेशन में शिरकत की। अपने विधिवत व्याख्यान दिए। नतीजे में एक बड़े समुदाय के लोगों से जुड़ाव बढ़ा। देश में ख्याति मिली। लेकिन इस दौरान भी थमा नहीं। अध्ययन लगातार जारी रहा। इस कारण मैं बामसेफियों की रटी रटाई बातों से ज्यादा प्रखर हो गया। कभी भी उनके झांसे में नहीं आया। कि राष्ट्रीय अध्यक्ष ने यह बोला है तो हमे करना ही है। इस कारण झामसेफियों को अपनी तरफ से सुझाव देने लगा। जबकि वे सब ठहरे लकीर के फकीर बेचारे।
उनके हाथ निर्णय की क्षमता ही न थी। इस कारण खिन्नता बढ़ती गई।

 तभी बोरकर झल्ली मेहना आदि का मामला सामने आया। जिस पर मैंने खुद को ठगा सा महसूस किया। 
पहली बार लगा कि जो लोग समाज को एकजुट करने की बात करते हैं यही सब समुदाय के विखंडन के दोषी हैं क्योंकि यही लोग तो अलग अलग बामसेफ रूपी दुकानें चला रहे है जबकि सबके सब खुद को डा अंबेडकर का वारिश बताते हैं। सभी की बामसेफो का पंजीकरण नंबर भी एक ही है। सभी का मूल मकसद समाज को गुमराह कर धन बटोरना है।

इस पर संगठन में अनबन बढ़ने लगी। नतीजे में एक दिन बामसेफी प्रचारक जो कई सालों से मेरे वेतन की कमाई पर जीवन यापन कर रहा था, को चंदा मांगने पर घर से भगा दिया। इस प्रकार बामसेफ से मुक्ति वर्ष 2008 -09में मिल गई।

अब जोश आया कि तमाम बामसेफो को क्यो न एकजुट किया जाए। मुंबई में मीटिंग रखी गई। जिसमे बोरकर झल्ली वामन मेश्राम आदि को न्योता दिया गया। नियत तारीख पर पता चला कि ये चिरकुट चाह रहे कि फलां फलां हमारे बामसेफ में विलय कर लें । मगर हम नही एकजुट होने वाले। बड़ी निराशा हुई।

मगर जीवन कहां रुकने वाला।
अब संपर्क हुआ कम्युनिस्ट दुष्टों से। उनका भी सर्वहारा साहित्य पढ़ा मीटिंग अटेंड की। सर्वहारा बुर्जुआ की गुंडागर्दी का अध्ययन किया। लेनिन स्टालिन मार्क्स आदि को समझा और पाया कि ये कम्युनिस्ट महा निकम्मे है। ये केवल समाज को उकसा कर पुलिस के हवाले अपने कार्यकर्ताओं को करते हैं ताकि यह समाज अंदर से कमजोर ही बना रहे। नतीजे में कम्युनिस्ट दुष्टों को सलाह - सीख देने का काम चालू हुआ। मगर वही बात कार्यकर्ता के पास निर्णय लेने का न तो अधिकार होता है और न ही विवेक।
ऐसे में कम्युनिस्ट दुष्टता भी छूट गई।

तब तक में 3 री नौकरी पा परिवार के साथ सेटल हो चुका था। कानपुर प्रवास के दौरान फिर उम्मीद जगी कि शायद मायावती ही कुछ भला कर सकती है इस समुदाय का। 
नतीजे में 2011 से मायावती और डॉ अंबेडकर का भजन कीर्तन फिर से चालू हुआ। आप मै से ज्यादातर लोग भी उसी दौरान मित्रवत हुए। 2012 में मायावती अपनी हरकतें जिन्हे मैं दरकिनार कर भजन कीर्तन कर रहा था के कारण औंधे मुंह सत्ता से बाहर हुई। अखिलेश की गुंडागर्दी भी देखने को मिली।
नतीजतन जिंदगी फिर से इसी सवाल रूपी दिवाल से घिरी नजर आई।

तभी मन में एक सवाल कौंधा कि आखिर ऐसी कौन सी वजह रही है जिसके कारण इतनी बड़ी संख्या होने के बावजूद 85 % समुदाय को मुट्ठी भर लोग बंदर की तरह सदियों से नचा रहे हैं।
उत्तर खोजना चालू हुआ तो अब वो सब कुछ हमारे review का विषय था जो हमने तक पढ़ा समझा और सही माना हुआ था।

 नतीजे में डॉ अंबेडकर और उनका साहित्य पहली बार सवालों के घेरे में आ गया। अब मैंने अंबेडकर को समझना चालू हुआ। उनकी भक्ति खत्म हो गई। गांधी अंबेडकर जिन्ना के अतिरिक्त पहली बार अंबेडकर के तथागत बुद्ध और अंग्रेज साहू फूले पेरियार आदि सब कटघरे में खड़े थे।

अब जैसे जैसे इन सबका बहूमुखी अध्ययन चिंतन मनन किया। जेसीबी नग्न होने लगी। अंग्रेज भारत भाग्यविधाता से सबसे बडे दुष्ट दिखने लगे।
नतीजे में अब जेसीबी अंग्रेज जिन्ना गांधी सावरकर मेश्राम बोरकर आदि सब फिर से छूट गए।

इसी दौरान 2015- 16 में फिर सवाल रूपी दिवाल ने घेर लिया कि अंग्रेज अगर इतने बदमाश थे तो कोई न कोई तो उनकी मजबूती होगी ही।
उत्तर खोजना चालू हुआ।
तो सुन यात सेन, मार्टिन लूथर किंग, आन सान सु की, माओत्से आदरणीय हिटलर आदि से संविधान और लोकतंत्र व तमाम वाद का पहली बार ककहरा सीखने समझने का अवसर 2015 -१६ में मिला।
पहली बार जीवन के 4० साल बाद संविधान कानून लोकतंत्र का सही ज्ञान आना शुरू हुआ। सारा कैडर बेकार गया। सारी पढ़ाई व्यर्थ साबित हुई। इसी दौरान अंग्रेज बेनकाब हो रहे थे। तभी पता चला कि अंग्रेजो की मजबूत चीज अगर कोई है तो वह है अध्यात्म। अब मैं सवार था अध्यात्म पर। बहुत बारीकी से समझना शुरू हुआ तो फ्रीमेसनरी तक आ पहुंचा। इसे भी समझा तो पाया कि हमारी जेसीबी तो इसी freemasonry का प्यादा मात्र रही है।
खैर अब मैं freemason हो गया। सोचा कि ग्लोबल संस्था है तो कोई न कोई संस्था कानपुर में भी होगी। खोज शुरू हुई तो पाया कि दर्शनों लॉज कानपुर लखनऊ मेरठ दिल्ली मुंबई चेन्नई आदि में चल रहे हैं। ग्रैंड लॉज ऑफ इंडिया ने मुझे मास्टर मेसन बना दिया। देश के धन्नासेठों के बीच उठने बैठने का मौका मिला। मगर फिर भी कुछ भी सार्थक नहीं दिखाए देने पर freemasonry से भी इस्तीफा दे दिया। चूंकि यह पता चल चुका है कि अध्यात्म ही दुनिया को चलाने वाला मुख्य स्रोत है। जिसमे जनक तथागत बुद्ध हैं इसलिए कभी विनोद कुमार कहां जाने वाला व्यक्ति आज डा विनोद कुमार से डॉ बोधी आनंद में तब्दील हो कर आनंद से जीवन यापन कर रहा हूं।
यह जो जीवन संस्मरण हैं यह एक तरह से जैसे तितली कोकून बना नया अवतार लेती है। सांप केचुल छोड़ नया जीवन हासिल करता है। दीमक चींटी आदि भी पंख उगा खुद को फना कर नया अवतार धारण करती हैं। कुछ यही प्रकार का metamorphosis ही है।
इस दौरान न केवल तमाम ism छूटी बल्कि उन ism से जुड़े हुए भक्त लोग भी छूटते गए। नए आते गए।
यह संस्मरण उनके लिए बड़े काम का है जो इस तरह के संगठनों के चंगुल में आज भी फसे हैं या जो सवाल रूपी दीवालों से घिरे हैं।
चूंकि मैं शंका रूपी सवाल से घिरा था इसलिए समांधान की ओर सतत अग्रसर रहा। यदि मैं दंभ पर खड़े होकर सवालों से घिरा होता तो शायद खुद को कब का खो चुका होता।
उम्मीद है कभी न रुकने और सतत चलायमान बने रहने वाले मेरे व्यक्तित्व व मेरे जीवन की यह metamorphosis आप सभी के लिए उपयोगी साबित होगी।
आपका डॉ बोधी आनंद
भवतु सब्ब मंगलम🌹☸️

Saturday, 23 October 2021

सोसल मीडिया लोगों के आंदोलन को कुचलने का साफ्ट तरीका

*🌸🌸‌🌸क्या सो सल मीडिया बहुजन आंदोलन को कुचल रहा है?*🌸🌸🌸

मुझे‌ कभी कभी लगता है कि सोसल मीडिया ने बहुजन आंदोलन को कुचलने का कार्य किया है। 

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कोई भी आन्दोलन लोगों से मिजरश्रल‌‌ने, वार्ता करने, बैठक करने, विचारों के आदान-प्रदान, भा‌‌‌‌वनाओं को समझने, से संचालित होता है। जब हम किसी से बात करते हैं तो हमारे शब्द व ध्वनि प्रवाहित होती है। जब हम सोसल मीडिया पर ‌कुछ लिखते हैं तो केवल शब्द स्थानांतरित होते हैं, भावनाएं नहीं। वही लेखक अपने विचारों को प्रवाहित करने में दिल दिमाग दोनों का प्रयोग तो करता है, पर वह भावनाओं को प्रवाहित करने में असफल रहता है। किसी भी व्यक्ति से सम्बन्ध  मिलने जुलने से बनते हैं न कि चिठ्ठी पत्री, या सोसल मीडिया में विचार प्रवाह करने से। सोसल मीडिया में विचार प्रवाह करने से आप एक लेखक की तौर पर स्थापित होते हैं आन्दोलनकारी के रूप में नहीं। सोसल मीडिया से वैचारिक जागरूकता अभियान तो तेज हुआ पर आन्दोलन कमजोर हुआ है। किसी भी व्यक्ति में यह प्रवृत्ति पाई जाती है कि वह जो सोचता है लोग वैसा ही सोचें, इस सोच के साथ वह सोसल मीडिया में लिखता है, और जैसे ही वह सोसल मीडिया में लिखता है वैसे ही उसके अन्दर उठा तूफान शांत जाता है। सोसल मीडिया में विचार प्रवाह करते ही व्यक्ति को आनुभूतिक शांति मिल जाती है। 
अगर व्यक्ति को अपने विचार व्यक्त करने का अवसर न मिले तो वह अपने विचारों को प्रकट करने के लिए लोगों की तलाश शुरू करेगा, ऐसे प्लेटफार्म की तलाश करेगा, जहां उसे अपने विचार व्यक्त करने का अवसर मिल सके। जिसके लिए उसे घर छोड़कर लोगों के बीच आना पड़ेगा, आन्दोलन का हिस्सा बनना पड़ेगा। 
व्यक्ति के इस प्रयास को सोसल मीडिया ने एक झटके में नष्ट कर रख दिया है। सोसल मीडिया ने व्यक्ति के अंदर उठ रहे इस तूफान को शांत करने में महती भूमिका निभाई है। और लोगों से मिलने जुलने में रोक लगाई है जिससे आंदोलन कमजोर हुये है। स्वामी संबोधि आनन्द।

Wednesday, 23 June 2021

हर रोज बदलता रहता हूं

मैं हर रोज बदलता रहता हूं, हर पल बदलता रहता हूं।
हर रोज मैं जीता-मरता हूं। जीना मरना ही जीवन है। जीवन के इस पग में हर रोज मैं चलता रहता हूं। 
मैं हर रोज बदलता रहता हूं, हर पल बदलता रहता हूं।

मेरा बदलना ही अच्छाई है।मेरा बदलना ही बुराई है।
 कुछ लोग अच्छा  कहते हैं,कुछ लोग बुरा इसे कहते हैं। 
पर मेरा ये बदलाव ही जीवन की सच्चाई है। जीवन की इस सच्चाई में बस एक ही बात मै कहता हूं। 
मैं हर रोज बदलता रहता हूं, हर पल बदलता रहता हूं।

 अनित्य है संसार में सब कुछ। 
फिर मैं कैसे ठहर जाऊं। हर कोई ठहरे रहना चाहता है। मैं तो नित रोज बदलता रहता  हूं। 
मैं हर रोज बदलता रहता हूं, हर पल बदलता रहता हूं।

 कल जो था वह आज नहीं हूं।
जो आज हूं वह कल नहीं रह पाऊंगा। फिर कैसे कह दूं कि जो आज लिखा है वहीं कल लिख पाऊंगा। जीवन के हर पल में मैं रमता रहता हूं। 
मैं हर रोज बदलता रहता हूं, हर पल बदलता रहता हूं।

कल का लिखा आज विपरीत नजर आता है।  फिर कैसे कह दूं कि जो आज लिखा है वह विपरीत नजर नही आयेगा। इस भूत भविष्य को छोड़कर आज आगे बढ़ता रहता हूं।
मैं हर रोज बदलता रहता हूं, हर पल बदलता रहता हूं।

 स्वामी संबोधि आनंद।
23/6/2021

Sunday, 21 March 2021

विश्व व्यवस्था और हमारी आवश्यकता

मैं कई सालों से लोगों से एक ही बात कह रहा हूं कि किसी भी व्यक्ति की प्रथम वरीयता उसकी सुरक्षा होती है। द्वितीय वरीयता उसका स्वास्थ्य होता है। तृतीय वरीयता उसकी आजीविका होती है। इसका अंदाजा वर्तमान में फैली कोरोना महामारी से लगा सकते हैं। इन तीनों आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये हर व्यक्ति, अनेकों प्रयत्न, उपलब्ध संसाधनों के आधार पर करता है। जो व्यक्ति इन तीनों आवश्यकताओं की आपूर्ति करने में सक्षम होता है वहीं सफल माना जाता है। इन तीनों आवश्यकताओं की आपूर्ति के लिये उसे तंत्र (व्यवस्था), मंत्र (योजना) यंत्र (प्रयास/ तकनीकि) करने होते है। जब तक हम इस तरह के कदम नहीं उठायेंगे न तब तक हमारी उपरोक्त आवश्यकताओं की आपूर्ति होना असम्भव है। जब हम इस तरह के कदम उठाने में खुद व्यवस्था नहीं बनाते, खुद योजना बनाकर सार्थक प्रयास नहीं करते तब तक हम अपनी सुरक्षा, स्वास्थ्य और आजीविका प्राप्त नहीं कर सकते। 
       जब कोई व्यक्ति इन लक्ष्यों को हासिल कर लेता है, तो वह स्वत: सामाजिक लक्ष्य शिक्षा, संपत्ति और सत्ता के लिये प्रयास करता है। शिक्षा, संपत्ति, और सत्ता सामाजिक मान्यता का विषय है। जबकि अधिकांश लोग शिक्षा जानकारी व ज्ञान को ही समझकर किताबों में रातों दिन जुटे रहते हैं। जबकि शिक्षा, ज्ञान और जानकारी का पर्याय नहीं है। इसी लिये कबीर ने कहा है " पोथी पढ़-पढ़ जग मुहा, पंडित भया न कोय। ढाई आखर प्यार का, पढ़ें हो पंडित होय। जहां तक शिक्षा के प्रति मेरा मत है कि "अपनी जानकारी और ज्ञान का समुचित प्रयोग करने की क्षमता का विकास ही शिक्षा है।" न कि विद्यालय में जाकर डिग्रियां हासिल करना शिक्षा है। विद्यालयों से जानकारी और ज्ञान हासिल कर डिग्रियां हासिल करना योग्यता है, शिक्षा नही। जबकि योग्यता का पैमाना दूसरा तय करता है। इसलिये हमें शिक्षा के लिये प्रयास करना चाहिते न कि योग्यता के लिये। जानकारी व ज्ञान तब महत्त्वपूर्ण है, जब आप उसे शिक्षा के रूप में रूपांतरित करने में समर्थ हो।
इसी तरह संपत्ति भी एक सामाजिक मान्यता है। समाज जिस वस्तु को सम्पत्ति के रूप में मान्यता दे देता है, वहीं वस्तु सम्पत्ति के रूप में स्थापित हो जाती है। जो हमें हमारी ऊर्जा व्यय और  प्रयास के परिणाम स्वरूप प्राप्त होती है। इसलिये सम्पत्ति हमारे द्वारा मान्यता प्रदान की गयी वस्तु को कहा जाता है। अब आप जिस वस्तु को चाहे उसे सम्पत्ति के रूप में मान्यता दे कर उसे सम्पति के रूप में स्थापित कर सकते हैं। यह आपसी भाव का विषय है।
उपर्युक्त सभी के बाद सत्ता का भाव आता है जो एक प्रकार से अन्य लोगों और खुद को नियंत्रित करें की संगठनात्मक शक्ति है। यदि हम लोगों में स्वनियंत्रण की शक्ति का भाव विकसित कर दे तो उन पर कोई दूसरा नियंत्रण नहीं कर सकता। इसी स्वनियंत्रण को पैदा करने के लिये गौतमबुद्ध ने पंचशील का ज्ञान दिया। कबीर ने इसी स्वनियंत्रण के भाव को विकसित करने के लिये कहा कि "बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय, जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय। जहां तक मेरा मत है कि आत्मनियंत्रण से बड़ी कोई सत्ता नहीं है। जैसे ही हम आत्मनियंत्रण खोते हैं वैसे ही दूसरे के नियंत्रण के प्रभाव में आ जाते हैं। इसीलिये कहा जाता है कि या तो आप स्वनियंत्रित हो जाओ, या नियंत्रण में आ जाओ। नियंत्रण के दो तरीके हैं एक लालच, दूसरा भय।
    अब हमें व्यक्तिगत पहलू और सामाजिक पहलू दोनों को ध्यान में रखकर अपने आचरणों में सुधार कर लेना ही समस्या का समाधान है। अन्यथा समस्या ही समस्या है। 
स्वामी संबोधि आनंद।

Wednesday, 10 February 2021

किसान बिल के पीछे का सच और new world order

*भारत मे सरकारी व्यवस्था द्वारा लागू किये जा रहे न्यू वर्ल्ड आर्डर के खतरनाक मंसूबे।*
अपने देश मे कहा जाता है कि अमुक बात पत्थर की लकीर है। कुछ ऐसा ही अमेरिका स्थित जॉर्जिया गाइडस्टोन में निम्न 10 लक्ष 20 फुट ऊंचे ग्रेनाइट पत्थरों पर 8 भाषाओं में लिखे हैं जिसमे से एक भाषा हिंदी भी है। जिसे 1980 में दुनिया मे शैतानी राज स्थापित करने के उद्देश्य से कार्यरत षड़यंत्रकारियों ने सरकारों की मदद से लगाए हैं।

1-Maintain humanity under 500,000,000 in perpetual balance with nature. अर्थात प्रकृति के साथ तालमेल बैठाते हुए विश्व की आबादी को मात्र 50 करोड़ तक सीमित करो।
(जबकि अभी सारे विश्व की आबादी 780 करोड़ व भारत की आबादी 138 करोड़ है। तो सवाल यह कि 780-50=730 करोड़ लोगों  अर्थात 93.5% लोगों को मारने की तैयारी क्यों व किसके इशारे पर की गई है??? वर्तमान तीनो कृषि कानूनों द्वारा भोजन सुरक्षा खत्म कर अकाल पैदा करने की रणनीति कही इसीलिए तो तैयार नही की गई है।
नाजी हिटलर भी यही कर रहा था। उसके वंशज संघी  भी फासिस्टों की ही जमात के साथ चल रहे हैं। संघियों की काली टोपी व हाफ पैंट व मक्खी मूँझ व ध्वज सलामी का तरीका हिटलर की ही नकल है। भारत मे सारा कृषि व शोध मंत्रालयों का अमला इसी लक्ष की प्राप्ति के लिए स्थापित किया गया है।)

2-Guide reproduction wisely — improving fitness and diversity.
अर्थात मानव प्रजनन को बुद्धिमत्ता के साथ गाइड करो जिससे फिटनेस व विविधता सुधारी जा सके।

(यह बिंदु नाजी हिटलर के eugenics कार्यक्रम व मेडिकल साइंस का हिस्सा है। जिसमे ज्यादातर इंसानो की चेतना को जानवरों के स्तर पर लाकर मारा जा सके। भारत में इस पर अमलीकरण स्वास्थ्य विभाग के द्वारा WHO के इशारे टीकाकरण, अंग्रेजी औषधियों आदि द्वारा लगातार किया जाता रहा है। आपको ज्ञात होना चाहिए कि सारे विश्व मे मानव फर्टीलिटी रेट गोता लगा रही है। आबादी भले ही थोड़ी बहुत बढ़ी है मगर आबादी बढ़ने की दर लगातार इसी मंत्रालयों के कुकर्मो की बदौलत घट रही है।)

3-Unite humanity with a living new language. अर्थात वैश्विक मानवीयता को जीवित नई भाषा से एकीकृत किया जाए।

 (इस लक्ष की प्राप्ति अंग्रेजी को वैश्विक भाषा के तौर पर स्थापित करके की जा रही है। लगातार भारत मे अंतरराष्ट्रीय दिवसों को मान्यता दी जाती रही है। इस लक्ष की प्राप्ति शिक्षा व्यवस्था द्वारा की जा रही है। यह भाषा आकर प्रकार व रंगों की नई भाषा है।)

4-Rule passion — faith — tradition — and all things with tempered reason.
अर्थात लोगों के जुनून, आस्था, परंपराओं जैसी चीजों को गलत मंसूबो के साथ उपयोग में लाना है।

 (इस लक्ष की प्राप्त द्विदलीय लोकतांत्रिक व्यवस्था द्वारा की जा रही है। जिसमे लोगों को पक्ष विपक्ष में बांटकर एक दूसरे के खिलाफ लड़ाकर बाद में दोनों पक्षो को न्यूट्रल करके ढक्कन बनाया जा सके। स्पोर्ट आयोजनों के पीछे भी यही मकसद रहा है।
यही संवैधानिक व्यवस्था का अभीष्ट है ताकि लोगों में प्रेम भाईचारा को शंका व बैमानस्यता में बदला जाए।)

5-Protect people and nations with fair laws and just courts. अर्थात सही कानून व कोर्ट द्वारा लोगों व राष्ट्रों की संरक्षा करो। 

(इस लक्ष की प्राप्ति लोगों को शिक्षा व्यवस्था द्वारा सही गलत में बांटकर हाशिल की जा रही है। ताकि बकरी अपनी सुरक्षा का जिम्मा शेर को थमा दे। जबकि हमे पढ़ाये जा रहे जो भी अक्षर हैं वे मात्र प्रतीक हैं। जिसमे मनमाफिक मीनिंग भरी जा सकती है। उदाहरण के लिए आपका अपना नाम ही लें, जो भी कुछ नाम है वह सुविधा मात्र के लिए सही है जबकि आपके नाम जैसा कोई भी व्यक्ति आपके शरीर मे नही है। यह बदमाशी शुरू से ही अंजाम देने के लिए स्कूलो में छात्र संघो की व्यवस्था की गई ताकि बच्चों को पक्ष विपक्ष में बंटे रहने व एक दूसरे को विरोधी मानने की ट्रेनिंग शुरुआत से ही दी जा सके। इस व्यवस्था के माध्यम से ही न्याय व पुलिस व्यवस्था सर्वमान्य बनाई गई। जबकि भारत मे स्थापित यह न्याय व पुलिस व्यवस्था कैथोलिक जेजुइट आर्डर द्वारा संचालित है।)

6-Let all nations rule internally resolving external disputes in a world court. सारे देश आंतरिक तौर पर अपनी अपनी समस्याएं सुलझाएं जबकि बाहरी समस्यायों का निपटारा अंतरराष्ट्रीय न्यायालय द्वारा किया जाए। 

(अर्थात इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस की स्थापना इसी लक्ष की प्राप्ति के लिए की गई न कि लोगों को न्याय देने के लिए। इसी विन्दु के द्वारा अंतरराष्ट्रीय गैंगस्टर किसी भी देश की सीमा में घुसकर हमला कर नष्ट करते रहे हैं। अफ़ग़ानिस्तान लीबिया रवांडा इराक आदि इसी हरामीपन द्वारा तहसनहस किये जा सके। इस लक्ष द्वारा किसी भी देश को अस्थिर बना वहां की आबादी में मनमाफ़िक डेमोग्राफिक, पोलिटिकल व इकोनॉमिक बाध्यताएं स्वीकार कराई जाती रही हैं। उत्तरी कोरिया इनके काबू से बाहर है इसी लिए उसे खतरनाक बता बदनाम किया जाता रहा है। भारत मे आर बी आई की स्थापना इसी सडयंत्र का हिस्सा रही है। जिसे डॉ बाबासाहेब अम्बेडकर रचित problem in rupees किताब की प्रतियां हाथ मे लिये आये हिल्टन कमीशन द्वारा गवर्मेन्ट ऑफ इंडिया एक्ट 1935 में झोल करके हाशिल किया गया है। नोटबन्दी, कैशलेस व वर्तमान रुपे, अमेजोन पे, गूगल पे आदि एप्प बाजी इसी का परिणाम है। बैकों का विनष्टीकरण इसी लक्ष की प्राप्ति का हिस्सा है।)

7-Avoid petty laws and useless officials. अर्थात तुच्छ कानूनों व रोड़े बने अधिकारियों की दरकिनार करो। 

(ताकि सारी बाधाएं खत्म करते हुए उक्त सब लक्ष तेजी से हाशिल किये जा सके। भारत मे तेजी के साथ खत्म किये जा रहे संवैधानिक कानून इसी बदमाशी का हिस्सा हैं। मनमाफ़िक अधिकारियों को जगह जगह बिठाने की प्रक्रिया का हिस्सा UPSC परीक्षा बिना पास किये ही निजी धन्नासेठों के पिट्ठुओं को IAS बना संयुक्त सचिव जैसे सरकारी पद थमाया जाना इसीलिए शुरू किया गया है। ताकि अपने बैठाए गए टट्टुओं से मनमाफ़िक व त्वरित निर्णय लिए जा सके। इसीलिए ICAR के महानिदेशक पद को भी आईएएस को शौंप दिया गया।)

8-Balance personal rights with social duties. व्यक्तिगत अधिकारों को सामाजिक दायित्वों के साथ बैलेंस करो।

 (अर्थात सामाजिक दायित्वों का हवाला देते हुए व्यक्तिगत मौलिक अधिकारों को नष्ट करो। पिछले मार्च 2020 ताली थाली कांड से आवाजाही का अधिकार, पूजापाठ का अधिकार, इकट्ठा होने के अधिकार, शादी विवाह के कार्यक्रमो तक के अधिकार इसी लक्ष के अनुसार छीने जा चुके हैं। रोटी रोजगार सब चौपट इसी लक्ष के अनुसार किया गया है और तो और खुली हवा में सांस लेने का अधिकार जबरन मास्क लगाने के फ़रमान द्वारा इस प्रावधान के अनुसार ही छीन लिया गया है। इसी बिंदु के हिसाब से लोगों को जबरन नौकरी से निकाल देने व वेतन रोकने की धमकी देकर वैक्सीन लगवाने को बाध्य किया जा रहा है। जिसमे बहुतों ने जान गवाई है। जिसे दक्षिण अफ्रीका, तंजानिया, यूरोपीय यूनियन के तमाम देशों ने प्रतिबंधित कर देने के बावजूद भारत मे खुद डॉक्टरों आदि को जबरन वैक्सीन लगवाए जा रहे है। जो हिटलर के कंपल्सरी इन्सुरेंस कार्यक्रम जैसा है जिसे nuremberg code द्वारा उस समय प्रतिबंधित किया गया था। मगर भारत मे यह अंधेरनगरी धड़ल्ले से जारी है। लोग बेजुबान जानवर बने हुए हैं।)

9-Prize truth — beauty — love — seeking harmony with the infinite. सत्य सुंदरता व प्रेम को पुरस्कृत करते रहें जो अनंत के साथ समरसता में सहायक हो। 

(अर्थात उक्त लक्ष्यों की प्राप्ति में लगे चमचों को तब तक पुरस्कृत करते रहो जव तक उनकी उपयोगिता रहे। उपयोगिता खत्म होते ही ऐसे चमचो को नष्ट कर दो।)

10- Be not a cancer on the Earth — Leave room for nature — Leave room for nature. अर्थात धरती पर कैंसर न बनो। प्रकृति के लिए जगह खाली करो। प्रकृति के लिए जगह खाली करो। 

(मतलब धरती का बोझ न बनो। जल्दी मरो। इसी लक्ष की प्राप्ति के लिए sustainable gevelopment goals (SDGs) बनाये गए हैं। इसी लक्ष की प्राप्ति के लिए आठ आठ लाइन के हाईवे बनाये जा रहे हैं। इसी लक्ष की प्राप्ति के लिए लाइन सफारी बनाई जा रही हैं ताकि नरभक्षी जानवरों को ज़ू से बाहर खुले में छोड़ नरसंहार कराया जा सके। यही SDGs का मूल उद्देश्य है। शहरीकरण में लेयर ह्यूमन फार्मिंग को स्मार्ट सिटी प्रचारित किया जा रहा है।ताकि सारी धरती को इंसानो से फ्री किया जा सके। हिटलर घर परिवार रोटी कपड़े की जुगाड़ में लगे लोगों को numen कहता था और वर्तमान शासक जाति zionist यहूदी भी अपने से अलग लोगों को goyim कहते हैं। जिन्हें हम भारतवासी लोग इंसानी गोरु के नाम से जानते हैं। यह वह सब लोगो का समूह है जो 10 से 5 की नौकरी या काम धंधे कर अपना घर परिवार पालता रहा है। जो अम्बानी अडानी टाटा बिड़ला आदि परिवारों से अलग हैं। शायद इसीलिए कैंसर इंसानो को मारने वाली नम्बर वन बीमारी इसीलिए बनाई गई है। oncology सबसे टॉप ब्रांच आज बन चुकी है।)
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यह 20 बीस फीट ऊंचे लगे ग्रेनाइट पत्थरो पर लिखी वह इबादत है जिसकी स्थापना धरती से इंसानी प्रजाति के संहार के लिए की गई है। इस सडयंत्र में सरकार शामिल है। होश में आओ प्यारे देशवासियों। यही है न्यू वर्ल्ड आर्डर जिसका जिक्र प्रधानमंत्री मोदी ने 29 जनवरी 2021 को खुद किया।
जय भारत भूमि 🇮🇳
https://www.ndtv.com/india-news/pm-narendra-modi-new-world-order-emerging-after-pandemic-big-role-for-india-2360605