Saturday, 25 December 2021

डा विनोद कुमार दोहरे से स्वामी बोधि आंनद तक का जीवन संघर्ष रूपी आत्मकथा

*डॉ विनोद कुमार से डॉ बोधी आनंद तक का यात्रा संस्मरण - शंका युक्त सवाल।*
🌹🌹9*4*5☸️☸️☸️☸️🇮🇳
शिक्षा प्राप्ति के बाद जब पहली बार मैंने नौकरी वर्ष 2000 में पाई तो दुनियां बहुत हरी भरी स्वप्नलोक सी नजर आई। क्योंकि उस उम्र तक इसी की कामना ही की थी मैंने। बाद में केंद्र सरकार की नौकरी में सेवा का मौका वर्ष 2001 में मिला। असम मणिपुर म्यांमार का दौरा भी बड़ा लुभावना लगा। मगर उसी समय शादी का चक्कर शुरू हुआ जो आज तक जारी है। इसी दौरान जीवन में कुछ घटना क्रम के सिलसिले में टीवी पर मायावती जी और राजा भैया का मामला दिखा। तब पहली बार जाति और जातीय पूर्वाग्रह ग्रसित झंडू धर्म की हकीकत और लोगों पर अत्याचार का नमूना दिल दिमाग में समाया। अर्थात वर्ष 2002 अर्थात 27 साल की उम्र गुजर जाने के बावजूद घर परिवार समाज से यह ज्ञान नहीं दिया गया कि जातीय दुराग्रह और तिरस्कार भी कोई चीज होती है।
यह हमारे समुदाय की बहुत बड़ी समस्या है जिस कारण बच्चे वयस्क होकर भी मूर्ख ही बने रहते हैं।

खैर इसी राजाभैया और मायावती जी वाले घटनाक्रम ने मुझे यह सोचने पर मजबूर किया कि आखिर यह सब मामला क्या है और इसका उपाय क्या है। इसी का नतीजा था कि मणिपुर प्रवास के दौरान तमाम सवर्ण दोस्तों से सामाजिक मुद्दों पर मेरी कहा सुनी होने लगी। जिसमे से एक दोस्त ने सुझाया कि यदि आप को समुदाय की इतनी ही चिंता है तो स्वयं को सामाजिक कार्यों में लिप्त कीजिए।
बात में दम था इसलिए
नतीजे में कोई प्रभावी साहित्य खोजने लगा। 

ताकि इस मामले को अच्छे से समझ सकूं। तभी कुछ पुस्तकें हाथ लगीं जिनमे से पहली थी के नाथ रचित जातिभेद। जो कि लेखक के अपने संस्मरण थे। जो मुल्तया किसी जाति विशेष के खिलाफ थे। मगर उस पुस्तक के बाद पता चला कि डॉ अंबेडकर नाम का कोई व्यक्ति भी रहा है जिसने समाज की इसी पीड़ा पर काफी काम किया है। नजीते में मुझे 14 अप्रैल के मेले में जाने का अवसर मिला जहां इस तरह का तमाम साहित्य मौजूद था। यकीन मानो मेरे लिए तो जैसे लाटरी ही लग गई। डा अंबेडकर को पढ़ते पढ़ते झामसेफ तक पहुंचा। उसके कार्यक्रमों में बढ़चढ़ कर हिस्सेदारी निभाने लगा। जयपुर कटक लखनऊ इटावा कन्नौज कानपुर आदि के राष्ट्रीय व जनपद स्तरीय अधिवेशन में शिरकत की। अपने विधिवत व्याख्यान दिए। नतीजे में एक बड़े समुदाय के लोगों से जुड़ाव बढ़ा। देश में ख्याति मिली। लेकिन इस दौरान भी थमा नहीं। अध्ययन लगातार जारी रहा। इस कारण मैं बामसेफियों की रटी रटाई बातों से ज्यादा प्रखर हो गया। कभी भी उनके झांसे में नहीं आया। कि राष्ट्रीय अध्यक्ष ने यह बोला है तो हमे करना ही है। इस कारण झामसेफियों को अपनी तरफ से सुझाव देने लगा। जबकि वे सब ठहरे लकीर के फकीर बेचारे।
उनके हाथ निर्णय की क्षमता ही न थी। इस कारण खिन्नता बढ़ती गई।

 तभी बोरकर झल्ली मेहना आदि का मामला सामने आया। जिस पर मैंने खुद को ठगा सा महसूस किया। 
पहली बार लगा कि जो लोग समाज को एकजुट करने की बात करते हैं यही सब समुदाय के विखंडन के दोषी हैं क्योंकि यही लोग तो अलग अलग बामसेफ रूपी दुकानें चला रहे है जबकि सबके सब खुद को डा अंबेडकर का वारिश बताते हैं। सभी की बामसेफो का पंजीकरण नंबर भी एक ही है। सभी का मूल मकसद समाज को गुमराह कर धन बटोरना है।

इस पर संगठन में अनबन बढ़ने लगी। नतीजे में एक दिन बामसेफी प्रचारक जो कई सालों से मेरे वेतन की कमाई पर जीवन यापन कर रहा था, को चंदा मांगने पर घर से भगा दिया। इस प्रकार बामसेफ से मुक्ति वर्ष 2008 -09में मिल गई।

अब जोश आया कि तमाम बामसेफो को क्यो न एकजुट किया जाए। मुंबई में मीटिंग रखी गई। जिसमे बोरकर झल्ली वामन मेश्राम आदि को न्योता दिया गया। नियत तारीख पर पता चला कि ये चिरकुट चाह रहे कि फलां फलां हमारे बामसेफ में विलय कर लें । मगर हम नही एकजुट होने वाले। बड़ी निराशा हुई।

मगर जीवन कहां रुकने वाला।
अब संपर्क हुआ कम्युनिस्ट दुष्टों से। उनका भी सर्वहारा साहित्य पढ़ा मीटिंग अटेंड की। सर्वहारा बुर्जुआ की गुंडागर्दी का अध्ययन किया। लेनिन स्टालिन मार्क्स आदि को समझा और पाया कि ये कम्युनिस्ट महा निकम्मे है। ये केवल समाज को उकसा कर पुलिस के हवाले अपने कार्यकर्ताओं को करते हैं ताकि यह समाज अंदर से कमजोर ही बना रहे। नतीजे में कम्युनिस्ट दुष्टों को सलाह - सीख देने का काम चालू हुआ। मगर वही बात कार्यकर्ता के पास निर्णय लेने का न तो अधिकार होता है और न ही विवेक।
ऐसे में कम्युनिस्ट दुष्टता भी छूट गई।

तब तक में 3 री नौकरी पा परिवार के साथ सेटल हो चुका था। कानपुर प्रवास के दौरान फिर उम्मीद जगी कि शायद मायावती ही कुछ भला कर सकती है इस समुदाय का। 
नतीजे में 2011 से मायावती और डॉ अंबेडकर का भजन कीर्तन फिर से चालू हुआ। आप मै से ज्यादातर लोग भी उसी दौरान मित्रवत हुए। 2012 में मायावती अपनी हरकतें जिन्हे मैं दरकिनार कर भजन कीर्तन कर रहा था के कारण औंधे मुंह सत्ता से बाहर हुई। अखिलेश की गुंडागर्दी भी देखने को मिली।
नतीजतन जिंदगी फिर से इसी सवाल रूपी दिवाल से घिरी नजर आई।

तभी मन में एक सवाल कौंधा कि आखिर ऐसी कौन सी वजह रही है जिसके कारण इतनी बड़ी संख्या होने के बावजूद 85 % समुदाय को मुट्ठी भर लोग बंदर की तरह सदियों से नचा रहे हैं।
उत्तर खोजना चालू हुआ तो अब वो सब कुछ हमारे review का विषय था जो हमने तक पढ़ा समझा और सही माना हुआ था।

 नतीजे में डॉ अंबेडकर और उनका साहित्य पहली बार सवालों के घेरे में आ गया। अब मैंने अंबेडकर को समझना चालू हुआ। उनकी भक्ति खत्म हो गई। गांधी अंबेडकर जिन्ना के अतिरिक्त पहली बार अंबेडकर के तथागत बुद्ध और अंग्रेज साहू फूले पेरियार आदि सब कटघरे में खड़े थे।

अब जैसे जैसे इन सबका बहूमुखी अध्ययन चिंतन मनन किया। जेसीबी नग्न होने लगी। अंग्रेज भारत भाग्यविधाता से सबसे बडे दुष्ट दिखने लगे।
नतीजे में अब जेसीबी अंग्रेज जिन्ना गांधी सावरकर मेश्राम बोरकर आदि सब फिर से छूट गए।

इसी दौरान 2015- 16 में फिर सवाल रूपी दिवाल ने घेर लिया कि अंग्रेज अगर इतने बदमाश थे तो कोई न कोई तो उनकी मजबूती होगी ही।
उत्तर खोजना चालू हुआ।
तो सुन यात सेन, मार्टिन लूथर किंग, आन सान सु की, माओत्से आदरणीय हिटलर आदि से संविधान और लोकतंत्र व तमाम वाद का पहली बार ककहरा सीखने समझने का अवसर 2015 -१६ में मिला।
पहली बार जीवन के 4० साल बाद संविधान कानून लोकतंत्र का सही ज्ञान आना शुरू हुआ। सारा कैडर बेकार गया। सारी पढ़ाई व्यर्थ साबित हुई। इसी दौरान अंग्रेज बेनकाब हो रहे थे। तभी पता चला कि अंग्रेजो की मजबूत चीज अगर कोई है तो वह है अध्यात्म। अब मैं सवार था अध्यात्म पर। बहुत बारीकी से समझना शुरू हुआ तो फ्रीमेसनरी तक आ पहुंचा। इसे भी समझा तो पाया कि हमारी जेसीबी तो इसी freemasonry का प्यादा मात्र रही है।
खैर अब मैं freemason हो गया। सोचा कि ग्लोबल संस्था है तो कोई न कोई संस्था कानपुर में भी होगी। खोज शुरू हुई तो पाया कि दर्शनों लॉज कानपुर लखनऊ मेरठ दिल्ली मुंबई चेन्नई आदि में चल रहे हैं। ग्रैंड लॉज ऑफ इंडिया ने मुझे मास्टर मेसन बना दिया। देश के धन्नासेठों के बीच उठने बैठने का मौका मिला। मगर फिर भी कुछ भी सार्थक नहीं दिखाए देने पर freemasonry से भी इस्तीफा दे दिया। चूंकि यह पता चल चुका है कि अध्यात्म ही दुनिया को चलाने वाला मुख्य स्रोत है। जिसमे जनक तथागत बुद्ध हैं इसलिए कभी विनोद कुमार कहां जाने वाला व्यक्ति आज डा विनोद कुमार से डॉ बोधी आनंद में तब्दील हो कर आनंद से जीवन यापन कर रहा हूं।
यह जो जीवन संस्मरण हैं यह एक तरह से जैसे तितली कोकून बना नया अवतार लेती है। सांप केचुल छोड़ नया जीवन हासिल करता है। दीमक चींटी आदि भी पंख उगा खुद को फना कर नया अवतार धारण करती हैं। कुछ यही प्रकार का metamorphosis ही है।
इस दौरान न केवल तमाम ism छूटी बल्कि उन ism से जुड़े हुए भक्त लोग भी छूटते गए। नए आते गए।
यह संस्मरण उनके लिए बड़े काम का है जो इस तरह के संगठनों के चंगुल में आज भी फसे हैं या जो सवाल रूपी दीवालों से घिरे हैं।
चूंकि मैं शंका रूपी सवाल से घिरा था इसलिए समांधान की ओर सतत अग्रसर रहा। यदि मैं दंभ पर खड़े होकर सवालों से घिरा होता तो शायद खुद को कब का खो चुका होता।
उम्मीद है कभी न रुकने और सतत चलायमान बने रहने वाले मेरे व्यक्तित्व व मेरे जीवन की यह metamorphosis आप सभी के लिए उपयोगी साबित होगी।
आपका डॉ बोधी आनंद
भवतु सब्ब मंगलम🌹☸️