🌺🌺 *ब्राम्हणवाद क्या है?*🌺🌺🌺
इस प्रश्न को जब भी लोगों से पूंछता हूं तो अक्सर यही जवाब मिलता है कि जो केवल अपनी जाति का हित सोचे वहीं ब्राम्हणवाद है। यही पर फिर नया सवाल खड़ा हो जाता है कि यदि जातिवाद, भेदभाव छुआछूत ब्राम्हणवाद है तो फिर क्या हम सभी ब्राम्हणवादी नहीं है,क्योंकि आज सभी अपना और अपनी जाति का हित सोचते है। समस्या यही है कि हम रोग को पहचान नहीं पा रहे हैं और उपचार किए जा रहे हैं। जब रोग का निदान नहीं होता है तो सारा दोष ब्राम्हणवाद को देने लगते हैं। जब आप जान ही गए हैं कि ब्राम्हणवाद भारत की सबसे बड़ी समस्या है तो क्या ब्राम्हणवाद गाली देने से नष्ट हो जायेगा?
चिकित्सा विज्ञान में रोग से शरीर को बचाकर रखने के दो तरीके हैं।
१- अपने शरीर में इतनी प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर लो कि रोगाणुओं का आक्रमण असर न करें।
२- दूसरा उपाय है कि रोगाणुओं को नष्ट करने की दवा खाई जाए।
यदि उपर्युक्त उद्धरण को देखा जाए तो शरीर को रोग से बचाने के लिए खुद को ही मजबूत करना होगा। ऐसी व्यवस्था का विकास करना होगा जिसमें रोगाणुओं का विकास न हो सके।
ब्राम्हणवाद भारत के हर नागरिक के जीवन का अभिन्न अंग बन चुका है। परन्तु लोग अपने अन्दर बैठे ब्राम्हणवाद को पहचानने में कामयाब नहीं हो पा रहे हैं। हालांकि ब्राम्हणवाद सम्पूर्ण विश्व में पूरी तरह से फैल चुका है। जो खुद को मजबूत बनाये रखने के लिए नये रंग-रोगन के साथ क्षण - प्रतिक्षण परिलक्षित होता रहता है।
वास्तव में "ब्राम्हणवाद अन्तर्सम्बन्धों की एक अवधारणा है।" ये अन्तर्सम्बन्ध शिक्षा, सुरक्षा, सम्पत्ति के मध्य स्थापित हो सकते हैं। ये अन्तर्सम्बन्ध सत्ता, सम्पत्ति, धर्म के मध्य स्थापित हो सकते हैं । ये अन्तर्सम्बन्ध समाज, राज्य, अर्थ के मध्य हो सकते हैं। ये अन्तर्सम्बन्ध देश, विदेश व जनसामान्य के मध्य हो सकते हैं।
कभी ब्राम्हणवाद जाति, धर्म, पाखण्ड, छुआछूत, ऊंच-नीच के माध्यम से पनप रहा था। आज ब्राम्हणवाद अपने नये कलेवर में स्थापित हो रहा है। जिसे उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण, मशीनीकरण, डिजिटलीकरण, के माध्यम से मजबूत किया जा रहा है। वर्तमान में स्थापित होने वाला ब्राम्हणवाद, उस ब्राम्हणवाद से अधिक खतरनाक होगा, जिसे आप भ्रमवश जातिवाद, धर्म, भेदभाव, आदि रूप में जानते हैं। जबकि ये सब ब्राम्हणवाद को लोगों की नशों में प्रवाहित करने के माध्यम है न कि ब्राम्हणवाद है।
वर्तमान में ब्राम्हणवाद PPP ( tripal P) के रूप में सामने आ रहा है। जिसे आप पहचान ही नहीं पा रहे, हलांकि ब्राम्हणवाद हमेशा ही तीन धाराओं में ही विकसित किया गया है। जिसे आप जाने अनजाने मौन धारण करके स्वीकार करते आ रहे है, अर्थात ब्राम्हणवाद बड़ी चालाकी से आपके अन्दर, नये विषाणुओं की तरह, भिन्न-भिन्न माध्यमों से प्रवेश कराया जाता रहा है और आप बिना किसी विरोध के सहर्ष स्वीकार करते रहे हैं। आधुनिक Tripal p का फार्मूला पुराना ब्राम्हण, क्षत्रिय, वैश्य का गठबंधन की तरह है। आपको बताता चलूं कि ब्राम्हणवाद के निशाने पर हमेशा सुरक्षा, स्वास्थ्य, आजीविका, शिक्षा, सत्ता, और संसाधन रहते है जिसके माध्यम से एक विशेष वर्ग प्रभुत्व व नियंत्रण निश्चित हो जाता है। किसी भी समाज के विकास के लिए शिक्षा, सत्ता, सम्पदा, स्वास्थ्य, सुरक्षा आजीविका पर कब्जा होना अति आवश्यक है। ब्राम्हणवाद हजारों सालों से इन्हीं पर कब्जा बनाए हुए हैं और भारत के मूलनिवासी आदिवासी ब्राम्हणवाद को समझे बिना ही ब्राम्हणवाद के विरुद्ध संघर्ष भले ही कर रहे हो, पर ब्राम्हणवाद का कुछ नुकसान नहीं कर पा रहे है। क्योंकि ब्राम्हणवाद का जाल इस तरह बना है कि आप उसका विरोध करे या समर्थन फायदा ब्राम्हणवाद का ही.होगा। आपको लगता है कि हमें ब्राम्हणवाद से मुक्ति चाहिए तो सर्वप्रथम खुद को इनके ब्रम्हजाल से अलग होकर अपनी नई व्यवस्था बनानी होगी। आपको बता दूं कि ब्राम्हणवाद विश्व में सभी देशों, धर्मों, समाज में भिन्न भिन्न रूपों में स्थापित है। केवल भारत में ही हो, ऐसा नहीं है। ब्राम्हणवाद की रचना स्थानीय स्तर से लेकर वैश्विक स्तर तक इस प्रकार किया गया है कि इससे मुक्ति का मार्ग, कम से कम, आज किसी के पास नहीं है। ब्राम्हणवाद की संरचना इस प्रकार की गई हैं कि आप इसके आदि और अंत को नहीं जान पायेंगे। ब्राम्हणवाद की संरचना की बड़ी खासियत है कि छोटे से छोटे और बड़े से बड़े स्तर पर एक समान रूप से कार्य करता है। इसकी दूसरी खासियत आप इसका विरोध करे या समर्थन फायदा ब्राम्हणवाद का ही होगा। यही वह कारण है कि हजारों साल से यह यूं ही कामयाब है। हलांकि ब्राम्हणवाद सिंधुघाटी की सामाजिक व्यवस्था का विकृत रूप है। जिसकी संरचना सिंधु नदी घाटी सभ्यता से प्राप्त मुहरों में देख सकते है। सिंधु सभ्यता की इस मानवीय व्यवस्था को थोड़ा सा विकृत गौतम बुद्ध, महावीर जैसे समाजसुधारकों ने किया जिसका फायदा कालांतर में ब्राम्हणों ने उठाया।
स्वामी संबोधि आनंद, कानपुर नगर।