Sunday, 12 February 2017

शमशान घाट और जातीय भेदभाव

दोस्तों मैं कानपुर का निवासी हूं आज मैं जिस व्यवस्था पर लिखने की कोशिश कर रहा हूं वह जीवन काल का मामला नहीं मृत्यु के बाद अन्तिम संस्कार का मामला है।

मेरे कानपुर में गंगा नदी के किनारे स्थित भैरोघाट है जहां पर लोग शवदाह हेतु मृत शरीर को लेकर जाते हैं। पर इस घाट में अन्तिम संस्कार हेतु जो स्थान व लकड़ियों की दुकानें जाति के अनुसार निर्धारित है। हर वर्ग के लिए मंत्रोच्चार व ब्राम्हण भी अलग है ।

मैं वहां खडे़ यह सोचता रहा कि आखिर इस दुखद स्थिति में  जब लोगों के साथ यह भेदभाव होता है तो भारत में सामान्य दशा में कितना भेदभाव होता होगा?

   हम इस भेदभाव को जानते हुए भी वहां अंतिम संस्कार हेतु जाते हैं क्यों?
क्या हमारे पास इतना भी ज्ञान का आभाव है कि हम अपने लिए एक अलग से शमशान घाट की भूमि तैयार नहीं कर सकते?
हालांकि मैंने वहां पर बैठे पण्डों से पूछा कि यहां पर अलग-अलग जातियों के लिए अलग-अलग शमशान घाट क्यूं है, तो उन्हें यह कहने में जरा सा भी संकोच नहीं हुआ कि भगवान जाति के अनुसार स्वर्ग नर्क का निर्धारण होता है। फिर यह कहां से कम है कि हम यहां चमार पासी धानुक धोबी, काछी कुर्मी अहीर गड़रिया का हम अंतिम संस्कार कराते है?

पण्डें की यह बात सुनकर कर सोचता हूं कि हमारे साथ हो रहे भेदभाव के दोषी जितने वे नहीं है उससे अधिक दोषी हम बहुजन है। अगर हम बदल जाये तो जाहिर है कि सामने वाला व्यक्ति तुरन्त बदल जायेगा।

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