🤔🤔 *रिहायशी एरिया से व्यवसायिक गतिविधियों का संचालन को विधि विरुद्ध बनाना, वास्तव में दलित, पिछड़ो और अल्पसंख्यक समुदाय को व्यापार और आजीविका की व्यवस्था से रोकना।*🤔🤔
भारत में व्यापार के अनेकों आयाम आये और गये। कभी घूम घूमकर फेरी के माध्यम से, तो कभी हाट बाजार और मेलों के माध्यम से व्यापार किये जाते रहे तो आधुनिक युग में दुकानों, शापिंग माल और आनलाइन के माध्यम से व्यापार करने का प्रचलन चल रहा है। छोड़े बड़ों शहरों में व्यवसायियों द्वारा एक स्थान पर वाणिज्यिक संस्थान स्थापित हो रहे है। जो बाजार या व्यवसायिक संस्थानों के रूप में विकसित कर संगठित तरीक़े से लोगों को मनमाने दामों में मिलावटी वस्तुएं बेच रहे है, जिसका समय समय पर खुलासा भी होता रहता है। लोगों के पास मौजूदा समय में कोई विकल्प न होने से मंहगे दामों में सामान खरीदने को मजबूर होना पड़ता है।
पिछले एक दशक से जिस प्रकार एक षणयंत्र के तहत सरकारी संस्थाओं का निजीकरण, सरकारी सेवाओं की समाप्ति की गई। इससे दलितों, पिछड़ो और अल्पसंख्यक समुदाय में एक बेचैनी के साथ असुरक्षा का भाव तेजी से पनप रहा है। वहीं कुछ प्रगतिशील और भावी व्यवस्था को ध्यान में रखकर अपनी छोटी मोटी पूंजी लगाकर अपने घरों में दुकानें स्थापित करना प्रारम्भ किया। जिससे इस समुदाय के लोगों को अपनी आजीविका की व्यवस्था होती है। इन समुदाय का अपने घरों में दुकान स्थापित कर अपनी आजीविका की व्यवस्था करना पूजीपतियों को अखर रहा है। लोग अपनी छोटी मोटी जरूरत का सामान इन्हीं छोटे दुकानदारों से ले लेते , समय पर इन्हे यहां से उधार भी मिल जाता है। पूंजीपतियों ने भविष्य में इस प्रकार की व्यवस्था से घबराये हुये है। उन्हें आशंका है कि अगर इस समाज के लोग अपने घरों से व्यवसाय करते गये, और सफल होते गये तो हमारा क्या होगा। इस आशंका को मद्देनजर रखते हुये रिहायशी इलाकों में व्यवसाय स्थापित करना, गैरकानूनी घोषित कराया। जिससे भविष्य में कोई दलित पिछड़े समाज का कोई व्यक्ति अपनी छोटी पूंजी लगाकर, अपनी आजीविका चलाने के लिये, अपने घर में दुकान न डाल सके और व्यापार पर एक खास वर्ग का कब्जा बरकरार रहे।
बहुजन समाज के लोगों को इस बात को समझना चाहिए, और इस नियम का जोरदार तरीके से विरोध करना चाहिए। अन्यथा उनका व्यवसाय के माध्यम से आजीविका का सपना कभी पूरा नहीं होने वाला।
अन्त में मेरा सबसे महत्वपूर्ण सवाल है। कि जब ये पूजीपतियों द्वारा अपने घर से व्यापार करना, अपने घरों को गोदाम बनाना, कारखाना स्थापित करना गैर कानूनी नहीं था तो आज जब बहुजन समाज के लोग अपने घरों से व्यवसाय करने की दिशा में कदम बढ़ा रहे है तो उनकी ये गतिविधियां गैर कानूनी क्यों?
पूंजीपतियों के घरों बने गोदाम, या व्यवसायिक संस्थाओं में सड़को तक कब्जा जमाना, लोगो को निकलने तक की जगह न मिलना, गैरकानूनी या अव्यवहारिक क्यों नहीं?
बहुजन समाज इस पर विचार करे। और इस प्रकार के अव्यवहारिक, और अमानवीय व्यवस्था का विरोध करे। अन्यथा आने वाली पीढियां रोजी रोटी को तरस जायेगी।
स्वामी संबोधि आनंद।