Wednesday, 4 October 2017

जातिवाद क्यों न हो

यह यूनीवर्सल फैक्ट हैकि किसी भी काल -अवधी में इंसान का "स्वार्थी" होना स्वभावतह अनिवार्य ऐट्रिब्यूट्स [गुण] होता है और यही स्वार्थी स्वभावगत अनिवार्यता इंसान के पक्षपाती होने की तरफ यानी उसे भ्रष्ट आचरण की तरफ आकर्षित करता है जिसे किसी धर्म सिद्धांत या नैतिक सिद्धांत के शिक्षा से कम / ज्यादा किया जा सकता है. जब इंसान का ये "स्वार्थी / पक्षपाती" अनिवार्य स्वभाव या गुण अपने निजी हितों जिसमे में उसके माँ-बाप- भाई-बहन- बीबी-बच्चे व रिश्तेदारों के प्रति स्वार्थ / पक्षपात का स्वभाव उतपन्न होता है तो समाज में एक सीमित स्तर व बर्दास्त के सीमा तक के पक्षपात यानी भ्रष्ट आचरण का प्रभाव -असर रहता है जिसे संविधान या कानून के माध्यमों से नियंत्रण किया जा सकता है लेकिन जब यही पक्षपात जन्मगत आधार पर जातिगत स्वाभिमान -अभिमान के कारण जातिगत पक्षपात [जातिवाद] के तरफ इसकी व्यापकता का विस्तार हो जाता है तो समस्या बेहद गंभीर हो जाती है.
चूँकि, भारत वर्ण एवं जातिगत व्यवस्था की विशेषता वाला समाज है जिसके कारण जातिगत पक्षपात यानि जातिवाद सभी नैतिक / धार्मिक सीमाओं को लांघते हुए समाज में भयंकर व प्रचंड तबाही मचाता  है. लेकिन विडंबना हैकि इस देश में वर्ण एवं जाति की व्यवस्था को "हिंदुत्व" के छद्म धर्म के सिद्धांत के रूप में स्थापित किया जा चुका है ऐसे में इंडिया में हिंदुत्व के सिद्धांत को बगैर इंकार किये या समाप्त किये जाति व वर्ण के पक्षपात यानी जातिवाद को समाप्त नहीं किया जा सकता है.
फिर इस देश में वो कौन लोग हैं जो "जातिवाद व वर्णवाद" की जननी / माता, "हिंदुत्व" का बचाव करते हैं?
"हिंदुत्व" के गर्भ से "जातिवाद व वर्णवाद" के पक्षपात यानि भ्रष्टाचार का जन्म होता है जो इस देश के सभी सामजिक-आर्थिक-राजनैतिक- शैक्षणिक- सांस्कृतिक क्षेत्रों को प्रभावित करता है?
सोचने वाली गंभीर बात है की- [१] जब दलित [जाटव] के नाम पर जब देश / प्रदेश में बसपा जैसे किसी राजनीतिकदल की सत्ता -शासन हो तो हिंदुत्व का सर्वश्रेष्ठ लंबरदार ब्राह्मण जाटव के साथ सत्ता की मलाई का रसास्वादन करता है और गैर जाटव दलित -बैकवर्ड या अन्य, समाज के सभी क्षेत्रों में हाशिये पर रहता है?
[२] जब बैकवर्ड [अहीर] के नाम पर जब देश / प्रदेश में सपा जैसे किसी राजनीतिकदल की सत्ता -शासन हो तो हिंदुत्व का सर्वश्रेष्ठ लंबरदार ब्राह्मण अहीर के साथ सत्ता की मलाई का रसास्वादन करता है और गैर अहीर बैकवर्ड -दलित या अन्य, समाज के सभी क्षेत्रों में हाशिये पर रहता है?
[३] जब सेक्युलरिज्म के नाम पर जब देश / प्रदेश में कांग्रेस जैसे अन्य किसी राजनीतिकदल की सत्ता -शासन हो तो हिंदुत्व का सर्वश्रेष्ठ लंबरदार ब्राह्मण सत्ता की मलाई का रसास्वादन करता है और बाकी लोग कम्युनल के नाम पर, समाज के सभी क्षेत्रों में हाशिये पर रहता है?
[४]  जब कम्युनल के नाम पर जब देश / प्रदेश में भाजपा जैसे अन्य किसी राजनीतिकदल की सत्ता -शासन हो तो हिंदुत्व का सर्वश्रेष्ठ लंबरदार ब्राह्मण सत्ता की मलाई का रसास्वादन करता है और बाकी लोग सेक्युलर के नाम पर, समाज के सभी क्षेत्रों में हाशिये पर रहता है?
यानी, हिंदुत्व का ये जाति पक्ष ही इस देश की सभी सार्वजनिक व निजी बुराईयों का जड़ मूल है फिर प्रश्न निर्माण होता है की "जाति व्यवस्था" समाप्त करने की जो असम्भव है क्यूंकि हिंदुत्व ही वो सिद्धांत है जो ये दावा ठोंकता है की भगवान ने स्वर्ग में बैठकर "जाति एवं वर्ण" की व्यवस्था का निर्माण किया है फिर ऐसे में "स्वर्ग में भगवान की बनाई इस वर्ण एवं जाति व्यवस्था" को किस्मे हिम्मत है जो समाप्त कर सके?

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