Tuesday, 4 September 2018

सर्वपर्ल्लीराधाकृष्णनन व शिक्षक दिवस

*सर्वपल्ली राधाकृष्णन के नाम पर शिक्षक दिवस मनाने का औचित्य क्या है?*

प्रति वर्ष सर्वपल्ली राधाकृष्णन के नाम पर *5 सितंबर को शिक्षक दिवस मनाया जाता है।* उन्हें महान शिक्षाविद् और दार्शनिक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। *‘भारतीय दर्शन’ नामक, जिस किताब पर उनकी महानता टिकी है, उसे साहित्यिक चोरी माना जाता है।* इससे जुड़े तथ्यों का विश्लेषण कर रहे हैं, गौतम राणे सागर :

BY GAUTAM RANE SAGAR गौतम राणे सागरON SEPTEMBER 4, 2018

राधाकृष्णन का *जन्म 5 सितंबर* 1818 में तेलुगू भाषी *नियोगी ब्राह्मण परिवार* में हुआ, सर्वपल्ली की उपाधि उन्हें उनके पूर्वजों से मिली। उनके पूर्वज आंध्र प्रदेश के नेल्लोर जिले से 15 मील दूर *सर्वपल्ली गांव में* रहते थे। सर्वपल्ली राधाकृष्णन को दर्शन के क्षेत्र में *प्रसिद्धि 1923 में प्रकाशित उनकी पुस्तक ‘भारतीय दर्शन’ से मिली।* इसी किताब पर साहित्यिक चोरी का इल्जाम भी लगा। *उस वक्त राधाकृष्णन कलकत्ता विश्वविद्यालय में प्रोफेसर थे।* शोध-छात्र जदुनाथ सिन्हा ने उनके ऊपर साहित्यिक चोरी का *आरोप लगाया।* मामला यह था कि *जदुनाथ सिन्हा ने पीएचडी डिग्री के लिए ‘भारतीय दर्शन’ नामक अपने शोध को 1921 में तीन परीक्षकों क्रमशः डाॅ. राधाकृष्णन, डॉ. ब्रजेंद्रनाथ सील व डाॅ. बी. एन. सील के समक्ष प्रस्तुत किया।* वे अपनी पीएचडी डिग्री की *प्रतीक्षा करने* लगे। जदुनाथ सिन्हा ने बारी-बारी से *तीनों परीक्षकों से संपर्क कर डिग्री रिवार्ड किए जाने पर विलंब होने की वजह जाननी चाही।*

डॉ. ब्रजेंद्रनाथ सील व डाॅ. बी. एन. सील ने कहा कि *धैर्य रखो* राधाकृष्णन  उसके परीक्षण में व्यस्त हैं। तुम्हारा शोध वृहद् है। दो भागों में तकरीबन 2000 पृष्ठों का होने की वजह से समय लग रहा है। इसी बीच *डॉ. राधाकृष्णन ने आनन-फानन में लंदन से इस पीएचडी को पुस्तक के रूप में अपने नाम से प्रकाशित करा लिया* और पुस्तक छपते ही जदुनाथ सिन्हा को पीएचडी की डिग्री भी उपलब्ध करा दी। *पुस्तक जैसे ही बाजार में आई, जदुनाथ सिन्हा को सांप सूंघ गया* और वह अपने को ठगा महसूस करने लगे। *राधाकृष्णन की किताब उनकी पीएचडी की हूबहू कॉपी थी।

जदुनाथ सिन्हा भी हार मानने वालों में नहीं थे। *न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाकर राधाकृष्णन कृष्ण पर 20000 रूपए का दावा ठोक दिया।* इसके बदले में  राधाकृष्णन ने भी जदुनाथ पर *एक लाख का मानहानि का दावा कर दिया।* डाॅ. ब्रजेन्द्रनाथ सील राधाकृष्णन की *ताकत और प्रभाव से परिचित थे।* वे उनके खिलाफ खड़े होने का साहस नहीं जुटा पाए। परंतु *जैसे ही जदुनाथ सिन्हा ने डाॅ. बी. एन. सील के यहां 1921 में प्रस्तुत की गई अपने शोध की प्राप्ति रसीद न्यायालय में प्रस्तुत किया, सच्चाई सामने आ जायेगी यह सोच कर राधाकृष्णन घबड़ा गए।* विश्वविद्यालय के कुलपति *डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने दोनों लोगों के बीच मध्यस्थता किया और न्यायालय से बाहर समझौता कराया।* राधाकृष्णन ने जदुनाथ सिन्हा को 10000 रूपए देकर समझौता किया ।

राधाकृष्णन ने 1921 में जब मैसूर से आकर कलकत्ता विश्वविद्यालय में कार्यभार संभाला तभी से उनके *ज्ञान व प्रतिभा पर उंगलियां उठने लगी थी।* उनकी *प्रतिगामी सोच* छात्रों को पसंद नहीं आती थी। अंग्रेजी और बांग्ला भाषाओं पर इनकी ढीली पकड़ के चलते उन्हें छात्र – छात्राओं के बीच शर्मिंदा होना पड़ता था। *जिस व्यक्ति की सबसे प्रसिद्ध किताब पर ही साहित्यिक चोरी का आरोप लगा हो और यह आरोप साबित भी हुआ हो,* उस व्यक्ति के नाम पर शिक्षक दिवस मनाने का *औचित्य क्या है?* जहां तक उनकी दार्शनिकता का प्रश्न है, *डॉ. आंबेडकर ने अपनी किताब जाति के विनाश में राधाकृष्णन के दार्शनिक तर्कों के औचित्य पर गंभीर प्रश्न उठाया है।*

Saturday, 1 September 2018

हिन्दी भाषा और सरकारी नीतियां

गर्व है मुझे अटलबिहारी बाजपेयी पर जिन्होनें UNO में हिंदी का सम्मान बढ़ाया, देश के शासन और न्यायपालिका को किस रूप में देखूं? जो अपने कार्य विदेशी अंग्रेजी भाषा में सम्पादित करते है।

Monday, 20 August 2018

भारत का भविष्य किसके हाथ

भविष्य में भारत पर नियंत्रण सरकार का होगा या बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के हाथों।
भारत के कुछ लोग राजनीतिक सत्ता को सभी तालों की चावी समझते है, वे अपनी मूर्खता और अज्ञानता पुनर्मूल्यांकन करें। विचार करें भारत की हर प्रकार की सत्ता शनै: शनै: किनके हाथों में हस्तानान्तरित हो रही है। जिस सत्ता ( सरकार में प्रतिनिधित्व) के लिये अपनी ऊर्जा रातोंदिन व्यय कर रहे है वह सरकार एक मात्र बिजूका की तरह होगी।
अभी भी वक्त है इस ओर भारत के लोग विचार करें। मै कुछ उदाहरण पेश कर रहा हूं।
1- जो भोजन कल किसान पैदा करते थे, उनके अपने बैल, बीज, मजदूर आदि होते थे। आज कृषि का बीज पूर्णतया विदेश कंपनियों माहिको, मोसेंटो जैसी कम्पनियों के नियंत्रण में आ गया।
2- स्वास्थ्य - कल भारत का हर व्यक्ति शुद्ध भोजन, शुद्ध हवा, शुद्ध पानी का प्रयोग करते थे। आज उसका फिल्टरेशन विदेशी कंम्पनियों के हाथों पहुंच गया।
3- सुरक्षा-  कल भारत की बस्तियों का निर्माण कुछ इस प्रकार था कि उनकी गलियों से एक समय पर एक ही व्यक्ति गुजर सकता था मोटरगाड़ी का जाना तो असम्भव ही था। परन्तु वर्तमान में बड़े बड़े क्रूज जैसे लड़ाकू विमानों का निर्माण निजी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हाथों किया जा रहा है। उनकी डील प्राइवेट सेक्टर के माध्यम से किया जा रहा है। लड़ाकू विमान उतारने के लिये निजी कंपनियों द्वारा चौड़ी चौड़ी सड़के बनायी जा रही है, हां वही सड़के जिनमें आपकी मोटर गाड़ियां सरपट दौड़ रही है और आप बिना धक्का के अपनी गाड़ी को दौड़ता देख खुश होते है। उन्हीं सड़कों पर आपको नियंत्रित करने के एक लिये एक समय निजी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लड़ाकू विमान भी उतरते दिखेगे।

अब आपको तय करना है कि इसका उपाय क्या है। अपनी विलासी जिन्दगी या फिर विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार।

भवतु मंगलम्
स्वामी स्वबोधि आनंद।

Sunday, 19 August 2018

विश्व में फैले धर्म वास्तव में धर्म नही व्यवस्था है

आइये कुछ फालतू की बात की जाये।
1- पूरे विश्व का विभाजन ईसाई, इस्लाम,यहूदी,पारसी में बंटा है। सभी का जन्म एक क्षेत्र विशेष है।
2- भारत  का विभाजन हिंदू( मूलतः यहूदी), इस्लाम, ईसाई, बौद्ध में विभाजित है।
3- हिंदू ब्राम्हण, क्षत्रिय, वैश्य, शुद्ध (शूद्र) मे विभाजित है।

विश्व का विभाजन धार्मिक रूप से।
धर्म विभाजन वर्ण रूप में
वर्ण विभाजन वर्ग रूप में
वर्ग विभाजन जाति रूप में
जाति विभाजन उपजाति रूप में।

जरा सोचो ! जिन्हें हम धर्म मानते है, क्या वे वास्तव में धर्म है।

या

प्रकृति और प्राणी के मध्य स्थित अन्तर्सम्बम्ध को धर्म कहेगे। ???????

Sunday, 17 June 2018

ब्राम्हणवाद क्या है?

🌺🌺 *ब्राम्हणवाद क्या है?*🌺🌺🌺

इस प्रश्न को जब भी लोगों से पूंछता हूं तो अक्सर यही जवाब मिलता है कि जो केवल अपनी जाति का हित सोचे वहीं ब्राम्हणवाद है। यही पर फिर नया सवाल खड़ा हो जाता है कि यदि जातिवाद, भेदभाव  छुआछूत ब्राम्हणवाद है तो फिर क्या हम सभी ब्राम्हणवादी नहीं है,क्योंकि आज सभी अपना और अपनी जाति का हित सोचते है। समस्या यही है कि हम रोग को पहचान नहीं पा रहे हैं और उपचार किए जा रहे हैं। जब रोग का निदान नहीं होता है तो सारा दोष ब्राम्हणवाद को देने लगते हैं। जब आप जान ही गए हैं कि ब्राम्हणवाद भारत की सबसे बड़ी समस्या है तो क्या ब्राम्हणवाद गाली देने से नष्ट हो जायेगा?

चिकित्सा विज्ञान में रोग से शरीर को बचाकर रखने के दो तरीके हैं।
१- अपने शरीर में इतनी प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर लो कि रोगाणुओं का आक्रमण असर न करें।
२- दूसरा उपाय है कि रोगाणुओं को नष्ट करने की दवा खाई जाए।
    यदि उपर्युक्त उद्धरण को देखा जाए तो शरीर को रोग से बचाने के लिए खुद को ही मजबूत करना होगा। ऐसी व्यवस्था का विकास करना होगा जिसमें रोगाणुओं का विकास न हो सके।

   ब्राम्हणवाद भारत के हर नागरिक के जीवन का अभिन्न अंग बन चुका है। परन्तु लोग अपने अन्दर बैठे ब्राम्हणवाद को पहचानने में कामयाब नहीं हो पा रहे हैं। हालांकि ब्राम्हणवाद सम्पूर्ण विश्व में पूरी तरह से फैल चुका है। जो खुद को मजबूत बनाये रखने के लिए नये रंग-रोगन के साथ क्षण - प्रतिक्षण परिलक्षित होता रहता है।

वास्तव में "ब्राम्हणवाद अन्तर्सम्बन्धों की एक अवधारणा है।" ये अन्तर्सम्बन्ध शिक्षा, सुरक्षा, सम्पत्ति के मध्य स्थापित हो सकते हैं। ये अन्तर्सम्बन्ध सत्ता, सम्पत्ति, धर्म के मध्य स्थापित हो सकते हैं । ये अन्तर्सम्बन्ध समाज, राज्य, अर्थ के मध्य हो सकते हैं। ये अन्तर्सम्बन्ध देश, विदेश व जनसामान्य के मध्य हो सकते हैं।
कभी ब्राम्हणवाद जाति, धर्म, पाखण्ड, छुआछूत, ऊंच-नीच के माध्यम से पनप रहा था। आज ब्राम्हणवाद अपने नये कलेवर में स्थापित हो रहा है। जिसे उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण, मशीनीकरण, डिजिटलीकरण, के माध्यम से मजबूत किया जा रहा है। वर्तमान में स्थापित होने वाला ब्राम्हणवाद, उस ब्राम्हणवाद से अधिक खतरनाक होगा, जिसे आप भ्रमवश जातिवाद, धर्म, भेदभाव, आदि रूप में जानते हैं। जबकि ये सब ब्राम्हणवाद को लोगों की नशों में प्रवाहित करने के माध्यम है न कि ब्राम्हणवाद है।

वर्तमान में ब्राम्हणवाद PPP ( tripal P) के रूप में सामने आ रहा है। जिसे आप पहचान ही नहीं पा रहे, हलांकि ब्राम्हणवाद हमेशा ही तीन धाराओं में ही विकसित किया गया है। जिसे आप जाने अनजाने मौन धारण करके स्वीकार करते आ रहे है, अर्थात ब्राम्हणवाद  बड़ी चालाकी से आपके अन्दर, नये विषाणुओं की तरह, भिन्न-भिन्न माध्यमों से प्रवेश कराया जाता रहा है और आप बिना किसी विरोध के सहर्ष स्वीकार करते रहे हैं। आधुनिक Tripal p का फार्मूला  पुराना ब्राम्हण, क्षत्रिय, वैश्य का गठबंधन की तरह है। आपको बताता चलूं कि ब्राम्हणवाद के निशाने पर हमेशा  सुरक्षा, स्वास्थ्य, आजीविका, शिक्षा, सत्ता, और संसाधन रहते है जिसके माध्यम से एक विशेष वर्ग प्रभुत्व व नियंत्रण निश्चित हो जाता है।  किसी भी समाज के विकास के लिए शिक्षा, सत्ता, सम्पदा, स्वास्थ्य, सुरक्षा आजीविका पर कब्जा होना अति आवश्यक है। ब्राम्हणवाद हजारों सालों से इन्हीं पर कब्जा बनाए हुए हैं और भारत के मूलनिवासी आदिवासी ब्राम्हणवाद को समझे बिना ही ब्राम्हणवाद के विरुद्ध संघर्ष भले ही कर रहे हो, पर ब्राम्हणवाद का कुछ नुकसान नहीं कर पा रहे है। क्योंकि ब्राम्हणवाद का जाल इस तरह बना है कि आप उसका विरोध करे या समर्थन फायदा ब्राम्हणवाद का ही.होगा। आपको लगता है कि हमें ब्राम्हणवाद से मुक्ति चाहिए तो सर्वप्रथम खुद को इनके ब्रम्हजाल से अलग होकर अपनी नई व्यवस्था बनानी होगी। आपको बता दूं कि ब्राम्हणवाद विश्व में सभी देशों, धर्मों, समाज में भिन्न भिन्न रूपों में स्थापित है। केवल भारत में ही हो, ऐसा नहीं है। ब्राम्हणवाद की रचना स्थानीय स्तर से लेकर वैश्विक स्तर तक इस प्रकार किया गया है कि इससे मुक्ति का मार्ग, कम से कम, आज किसी के पास नहीं है। ब्राम्हणवाद की संरचना इस प्रकार की गई हैं कि आप इसके आदि और अंत को नहीं जान पायेंगे। ब्राम्हणवाद की संरचना की बड़ी खासियत है कि छोटे से छोटे और बड़े से बड़े स्तर पर एक समान रूप से कार्य करता है। इसकी दूसरी खासियत आप इसका विरोध करे या समर्थन फायदा ब्राम्हणवाद का ही होगा। यही वह कारण है कि हजारों साल से यह यूं ही कामयाब है। हलांकि ब्राम्हणवाद सिंधुघाटी की सामाजिक व्यवस्था का विकृत रूप है। जिसकी संरचना सिंधु नदी घाटी सभ्यता से प्राप्त मुहरों में देख सकते है। सिंधु सभ्यता की इस मानवीय व्यवस्था को थोड़ा सा विकृत गौतम बुद्ध, महावीर जैसे समाजसुधारकों ने किया जिसका फायदा कालांतर में ब्राम्हणों ने उठाया।
स्वामी संबोधि आनंद, कानपुर नगर।

Friday, 1 June 2018

निजीकरण और लुटते संसाधन, नष्ट की कगार पर खड़ा सम्पूर्ण प्राणी जगत

जब देश की शासन- प्रशासन की बागडोर सवर्णों के हाथों में थी तो देश में राष्ट्रीयकरण देशप्रेम था। जैसे ही देश के शासन प्रशासन की बागडोर बहुजनों के हाथों मे आने लगी वैसे ही देश के साधन संसाधन निजी हाथों को बेचना देशप्रेम हो गया। प्राकृतिक संसाधनों को निजी हाथों में बेचने से रोकना देशद्रोह व नक्सलवाद हो गया।

आज हमारे देश की सरकार को देश की कंपनियों पर भरोसा नहीं रहा इसीलिए पूरे भारत में विकास के नाम पर जो संसाधनों का दोहन हो रहा है वह सारा का सारा विदेशी कंपनियों के माध्यम से किया जा रहा है। विदेशी कंपनियां जिस तरह भारी भरकम मशीनों द्वारा देश के संसाधनों का दोहन कर देश की अमूल्य धरोहर व लाभांश विदेश लिये जा रहे है ,उससे यही लगता है कि वह दिन दूर नहीं कि भारत एक रेगिस्तान का रूप धारण कर लेगा। इंसान, पशु-पक्षी एक एक बूंद पानी व सांस लेने को तरसते नजर आयेंगे।
जरा सोचो कि जिस प्रकार देश में लम्बी चौड़ी सड़कें, ऊंचे ऊंचे भवन बनाने के लिए प्रतिवर्ष 30000 हेक्टेयर उपजाऊ भूमि विकास के नाम पर की जा रही बर्बाद, लगातार बढ़ती हुई जनसंख्या, टूटते हुये परिवार, सुविधा भोगी होता इंसान, घट रही कार्य क्षमता सम्पूर्ण प्राणी जगत के लिए कितना खतरनाक होगा, इसकी कल्पना मात्र से रोंगटे खड़े हो जाते है।

भाइयों मेरी एक अपील है कि अभी भी समय है कुछ नीचे लिखी अपीलों को गौर करते हुए आने.वाली पीढ़ी को बचा सकते है।
1- सीमित सुविधाओं का प्रयोग करे।
2- अनावश्यक जल बर्बाद न करें।
3- वृक्षारोपण में तेजी लाये।
4- धरातल को पत्थरो में.न बदले।
5- संयुक्त परिवारों को स्थापित करें।
6- संविधान द्वारा निर्धारित मौलिक अधिकारों की अपेक्षा कर्तव्यों पर ध्यान दे।
7- नदियों को प्रदूषित होने से बचायें।
8- कम से मशीनों का उपयोग करे।
9- आवश्यकता से अधिक वस्तुओं का संग्रह न करे।
10-भोजन में फल फूल का अधिक सेवन करें। कंपनी निर्मित भोज्य पदार्थों का त्याग करें।

स्वामी संबोधि आनंद।

Wednesday, 16 May 2018

प्रकृति से खिलवाड़, परिणाम भुगतता संसार

वाह रे! मानव तू कहाँ पहुंच गया ? जिन हाथों से सैन्धव सभ्यता से लेकर किले व ताज जैसे महल खड़े कर दिये। आज उन्हीं हाथों से भरोसा कैसे उठ गया? जो मशीनों का सहारा लेने पर भी ऐसे पुल बना जो अल्पावधि तक भी न टिक सके। कभी क्यों नहीं सोचता कि तेरे इस विकास में अपने ही दब रहे हैं। क्यों तेरा हृदय द्रवित नहीं होता है?  जब तेरे विकास के नीचे अपने चिल्लाते है। क्या करूं ? तेरे इस विकास का जहाँ अपने ही दफन हो रहे हो। क्या करूँ तेरी इस ऊंचाई का जहाँ से अपने ही गिर रहे हो। तुझे तो रहने के लिए ईश्वर ने धरती दी थी, सांसो व भोजन के लिए वृक्ष दिये है। फिर क्यों ऊंचाई के लिए तड़प रहा है? दो पग दिये थे चलने के लिए फिर क्यों तेज  भाग रहा है? पानी मिला है मुफ्त में फिर क्यो उसे बांध व बंद कर अपने ही जीवन में जहर घोल रहा है? कभी क्यों नहीं सोचता कि बिन हवा पानी के एक पल जी नहीं सकता, अपनी किस ऊंचाई के लिए नदी,वृक्ष,व धरती को ही नष्ट कर रहा हैं?

स्वामी संबोधि आनंद

Thursday, 10 May 2018

21 goals of illuminati

The creation of a One World Government with one single church and one single currency under their control.


The total destruction of every national identity and all national pride, because only then will people accept a super-national world government.


The destruction of every religion, especially Christian denominations. The only exception: a “religion” of their creation.


The establishment of thought-control techniques with the goal of creating human robots who respond to external impulses and direction.


The end of industrialization with the exception of the computer and service sectors. A “post-industrial zero growth society” is the goal. The other industry branches will be transferred to more cost-effective third world countries.


To encourage or even to legalize drug usage and to make “art” out of pornography, which will first be generally accepted and finally be seen as totally normal.


To undertake the depopulation of larger cities following the example of Pol Pot’s bloodbaths in Cambodia.


The suppression of all scientific development except that which serves the purposes of the Illuminati.


To bring about the premature death of 3 billion people by the year 2050—either through “regional warfare” in developed countries, or through starvation and sickness in under-developed nations. The Committee of 300 (under the direction of the Illuminati) commissioned Cyrus Vance (US Secretary of State under Carter) to write a paper on how such a population reduction could be managed. The paper was called Global2000Report and was accepted and approved of by President Carter and Edwin Muskie, the then-Secretary of State, for and in the name of the US government. One of the conditions of the Global2000Report states that the US population must be reduced by 100 million people by the year 2050.


To weaken the people’s morale and to further demoralize the working class through large-scale unemployment and, therefore, to push them into drug or alcohol addiction. The youth should be encouraged to rebel against the status quo, which also leads to the weakening/dissolution of the family, through drugs and aggressive music.


To stop people from determining their own fate by forcing them to weather one crisis after another and to learn to leave such crises to be dealt with by the government. The people will soon feel so overwhelmed by their “own fates” and many difficult decisions that they will become apathetic. There is already an authority for crisis management; it’s called FEMA, or the Federal Emergency Management Agency.


To introduce new cults and support existing ones.


To support Christian fundamentalism, which will then, through identification with “God’s Chosen People”, support the goals of the Zionist Israeli state with, among other things, great sums of money.


To push for the spread of religious sects like the Muslim Brotherhood or the Sikhs and to carry out thought-control experiments similar to the ones Jim Jones carried out in his camp in Jonestown (Guayana) before the c. 900 followers of his People’s Temple were killed or committed suicide on command (November 1978).


To circulate ideas with respect to religious freedom around the world in order to undermine all existing religions, especially Christianity. This process has already begun with the so-called “Theology of Liberation”.


To provoke a collapse of the world economy and thus create total political chaos.


To take over control of all domestic and international policies of the USA.


To ensure that supra-national institutions (e.g. the UNO (United Nations Organization), the IMF (International Monetary Fund), the BIS (Bank for International Settlements), the ICJ (International Court of Justice), etc.) receive the greatest support, while, at the same time, local and national institutions become decreasingly able to act by systematically destroying them or by bringing them under the controlling umbrella of the UNO.


To infiltrate and take over all governments in order to insidiously dissipate and destroy the sovereignty of each nation from the inside.


To create an international terrorism and to negotiate with terrorists whenever terrorist activities have occurred.


To take control of the education system in the USA with the goal of completely destroying it.


Tuesday, 8 May 2018

वर्तमान शिक्षा, बिगड़ता बचपन

आज कल हम जिसे शिक्षा समझ कर अपने बच्चों को दिला रहे हैं वास्तव में वह creative education न होकर straight forward education है जहां बच्चे को पढ़ाने लिखाने के नाम पर सब कुछ पका पकाया परोस कर रखा जा रहा है। बच्चे का बौद्धिक​ स्तर खोजी न होकर आश्रित बनाया जा रहा है।
हो सकता है मेरी यह बात हर किसी के समझ में नहीं आये पर मैं एक शिक्षक होने के नाते यह कहना चाहता हूं कि यदि हम सुविधा भोगी व विलासी पद्धति वाले विद्यालयों से मुंह नहीं मोड़ा तो आने वाले कुछ वर्षों में ही आप का बच्चा पूर्ण भावना रहित उदण्ड प्रवृत्ति के होने से कोई नहीं रोक सकता।

जरा खुद सोचो कि आपको क्या तीन चार वय की उम्र में बतायी गयी कोई बात याद है? जहां तक मेरा निजी अनुभव है कि मुझे तो उक्त उम्र का कुछ भी याद नहीं है। हम यह भूलते जा रहे कि बच्चे की शिक्षा से अधिक महत्वपूर्ण बच्चे की शारीरिक क्षमता का विकास भी है। जोकि अधिक से अधिक आउटडोर गेम्स खेलने से विकसित होती है। जिसे हमने स्वयं बच्चों को घरों में कैद कर समाप्त करने में लगे हैं। यह विषय बहुत ही जटिल और सोचनीय है कि हम बच्चों को क्या सौंप रहे हैं। जरा आप खुद सोचो जब आप बृद्ध या बीमार हो और इस स्थिति में न हो कि एक गिलास पानी उठाकर ले सके तब आपकी सोच यही होगी आपका कोई बेटा बेटी आपके साथ हो और आपकी देखरेख करें पर आपके अपने बेटे आपको सक्षम होते हुए भी एक गिलास पानी देने के लिए आपके पास नहीं होंगे, जानते हैं क्यों? क्यों कि यह सब आपने आधुनिकता व शिक्षा के नाम पर अपने बच्चों को तीन वर्ष की अवस्था में ही जो दिया था वहीं वह आपको वापस कर रहा होता है। जिस तीन वर्ष की उम्र में आपके बच्चे को प्यार दुलार के साथ उछल कूद की आवश्यकता थी उस उम्र में आप अपने बच्चे को शिक्षा के नाम पर उसे विद्यालय भेजकर अपने लाड़-प्यार से दूर रखा और आपने अपने बच्चों के साथ कोई भी हमदर्दी नहीं रखी तो फिर वही बेटा आपके साथ क्यों हमदर्दी रखें। जिस प्रकार आपने अपने बच्चों को सर का बोझ समझकर व्यवसाय में लिप्त आकर्षित करते विद्यालयों​ को सौंप दिया था जहां वह अबोध बच्चा आपके प्यार व मां की ममता को तरसता रहता होगा ठीक उसी प्रकार जब आप एक गिलास पानी लेने को तरस रहे होते हैं तब वहीं बच्चा जिससे आप एक गिलास पानी की उम्मीद कर रहे होते हैं आपसे बड़े प्यार से कहता है कि पापा नौकर आ गया है जो आवश्यकता हो ले लेना। सोचो उस समय आपके दिल में क्या गुजरती होगी जिस औलाद को आपने इस उम्मीद से पाला था कि मेरे बुढ़ापे का सहारा बनेगा पर वह भी आपकी तरह भावना रहित होकर भौतिक संसाधनों के पीछे दौड़ रहा होता है।

हिंदू महासभा और मुस्लिम लीग की योजना का हिस्सा था भारत पाकिस्तान बंटवारा

हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग दोनों मिलकर  तो असली खेल सैकड़ो साल से खेलते आये है। किसको.किसका.समर्थक बनाना है यह.हिंदू मुस्लिम धर्माचार्य व नीतिकार मिल बैठकर तय करते हैं। जो आम हिंदू मुस्लिम है, जो.मूलतः भारत का मूलनिवासी है, वह इन.नीतिकारों व धर्माचार्यों  की रणनीतियों को नहीं समझ पाता। देश आजाद होते समय सबसे बड़ी कूटनीति यही रही होगी कि यदि देश आजाद हो गया तो भारतीय मूलनिवासियों को धर्म, देश आदि के नाम पर कैसे उलझाया जायेगा। इसलिए हिंदूमहासभा व मुस्लिम लीग दोनों  ने मिल बैठ कर अखण्ड भारत को खण्ड खण्ड करने की रणनीति बनाई होगी। वास्तविकता को अगर बहुत ही सूक्ष्म और नीतिगत तरीक़े से समझा जाये तो भारत पाकिस्तान का बंटवारा, उनसे आपसी तनाव सब योजनागत् लगते है। अगर हिन्दू, मुस्लिम को वास्तव में एक दूसरे से नफरत होती तो विश्व के सभी मुस्लिम देशों से रिश्ते खराब होते। अगर हिंदुओं को इसाईयों से वास्तव में नफरत होती तो केवल भारत में रहने वाले इसाईयों से ही क्यों ? विश्व के अन्य देशों के इसाईयों से क्यों नहीं? वास्तव में भारत, अफगानिस्तान, बांग्लादेश, और भारत के अधिकांश.हिन्दू, मुसलमान सिंधु सभ्यता के मूल निवासियों के वंशज ही है, जिन्हें पश्चिमी विदेशी योजनाकार बड़ी चालाकी से बांटकर आपस में लड़ाते रहे हैं। धर्म और संस्कृति को इस बंटवारे का आधार बनाया। अधिकांश लोग इस बंटवारे को धर्म मानकर उसकी रक्षा के लिये आपस में लड़ते रहे और चालक विदेशी इस देश की प्राकृतिक संपदा को लूटते रहे है।

इन सब नीतियों को देखते हुए मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि।
1- भारत एक प्रचुर प्राकृतिक संसाधनों का देश हैं। यहां की जनता को जाति धर्म मे उलझाए रखो और प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करते रहो।
2-  भारत का बंटवारा एक बड़ी सोची समझी रणनीति के तहत किया गया और इससे विवाद बनाने इसलिए रखा जाता हैं ताकि भारत की उद्गमस्थल सिंधु सभ्यता, जोकि भारतीय मूलनिवासियों की प्रेरणा स्रोत हैं, को भारतीयों से दूर रखा जाये ताकि भारत के मूलनिवासी उस सभ्यता के अवशेष देखकर गौरवान्वित न होने पाये। षणयंत्रकारियो को उसी समय यह डर सताने लगा था, जब भारत की आजादी की लड़ाई भारत के शहीद लड़ रहे थे, कि अगर आजादी के बाद इस देश के लोगों को सिंधु सभ्यता के गौरवमयी इतिहास की जानकारी हो गई तो हमें उखाड़ फेंकने मे देर नही करेगें। इसलिए इसका एक ही उपाय सूझा भारत-अफगानिस्तान बाद में भारत- पाकिस्तान बंटवारा किया जाये और इन देशो में आपसी  विवाद बनाये रखने की नीति का पालन भारत पाक दोनो देशों ने किया और कर रहे है। लेकिन दोनों देशों की जनता अपने लाडलों को देश की रक्षा के नाम पर कुर्बान करती रहती है। मै यह नहीं कहता कि लोगो को अपनी देश की सरहदों की सुरक्षा नहीं करनी चाहिये, सुरक्षा अवश्य करनी चाहिये लेकिन जब एक ही देश का बंटवारा एक सुनियोजित तरीके से किया गया हो तो उन्हे आपस में लड़ना नही एक होने की पहल करनी चाहिये।यही दशा समाज में लागू है।

Monday, 7 May 2018

विकास का खेल, विदेशियों से मेल

हजारों सालों से भारत की सत्ता में कायम वर्ग का असली मकसद भारत का विकास नहीं रहा, बल्कि. भारत भूमि के गर्भ में छिपे अमूल्य धरोहर को निकाल कर अपने नस्लीय भाइयों तक पहुंचाना रहा है। जोकि आज भी जारी है। इसी संपदा के दोहन को रोकने के लिए आदिवासियों ने आंदोलन चलाया तो उन्हें नक्सली करार देते हुये मारा जा रहा है।
        वैश्विकरण की नीति के सहारे विश्व संस्थाओं को मजबूत करने और भारतीय संस्थाओ को नष्ट करने का कार्य, षणयंत्र विकास के नाम पर, बहुत तेजी से किया जा रहा है। भारतीय संविधान द्वारा भारतीय जनता को प्रदान किए गए संरक्षण को माननीय सुप्रीम कोर्ट के माध्यम से नष्ट कराया जा रहा है। जो बहुत ही चिंता का विषय है। आज जब भारतीय व्यवस्था भारतीयों के हाथों में है तब कोई गरीब, मजदूर किसान व समाज के हासिये पर.खड़े व्यक्ति को कोई संरक्षण नहीं मिल रहा है। जरा सोचिए कि वैश्विकरण की स्थिति में क्या हाल होगा?

अगर आज वैश्विकरण को.नहीं रोका गया तो आने वाली पीढियों की दशा साम्राज्यवाद से भी भयावह होगी। इसका एक ही.मात्र उपाय है सीमित आवश्यकताओं मे जीवन जीना और पश्चिमी देशों की वस्तुओं का बहिष्कार।

Wednesday, 18 April 2018

जाति धर्म तो बहाना है असली खेल अपने षड्यंत्र छिपाना है ।

रेगिस्तानों को वार्षिक वर्षा के कम अनुपात के आधार पर परिभाषित किया जाता है। यह सामान्य रूप से प्रतिवर्ष 100 मिलीमीटर या इससे कम भी हो सकती है।

शोधकर्ताओं ने अफ्रीका में 1920 से 2013 तक के वर्षा के आंकड़ों का अध्ययन किया और पाया कि महाद्वीप के ज्यादातर उत्तरी भाग में मौजूद सहारा के क्षेत्रफल में इस दौरान 10 फीसदी वृद्धि हुई।

शोधकर्ताओं ने जब इस समय अंतराल में सहारा का विश्लेषण मौसमों के अनुसार किया तो उन्होंने मरुस्थल के क्षेत्रफल में सबसे ज्यादा वृद्धि गर्मियों में दर्ज की।

शोध परिणाम के अनुसार, मानव जनित जलवायु परिवर्तन के साथ-साथ प्राकृतिक परिवर्तनों के कारण मरुस्थल का क्षेत्रफल बढ़ा है। जिस प्रकार  वर्तमान विश्व में विकास का मानक माना गया है और फर्जी विकास की होड़ लगी है इससे साफ जाहिर है कि वह दिन दूर नही कि सम्पूर्ण भारत रेगिस्तान में बदल जायेगा। अगर हम थार मरुस्थल की वार्षिक वृद्धि के  आधार पर कहे तो प्रतिवर्ष आधा किलोमीटर से एक किलो मीटर की दर से  मरुस्थल बढ़ रहा है । इस हिसाब से आप खुद अनुमान लगा सकते है कि आपका क्षेत्र कितने समय बाद रेगिस्तान में बदल जायेगा।
   इसी भौतिक दोहन के के विरुद्ध जो आदिवासी , मूलनिवासी व जनजाति के लोग आंदोलन चला रहे है वह वास्तव में अच्छी तरह से जानते है कि धन व सुख  सुविधाओ के  पिपासु लोगो को यदि प्राकृतिक संसाधनो के अंधाधुंध दोहन को नही रोका गया तो सम्पूर्ण भारत रेगिस्तान मेरे बदलने में देर नही लगेगी । पूंजीवादी व्यवस्था के पोषक लोग भी जल जंगल जमीन पर कब्जा करने व धरती मां की गोद में छिपे संसाधनो के दोहन में कोई कसर नही छोड़ रहे है । इसी क्रम में भारत सरकार में काबिज लोगो ने कृषि सुधार के नाम पर मिजोरम में हजारों हेक्टेयर भूमि इजराइल को दी है। जो कृषि सुधार नही वहां छिपे बेशकीमती संसाधनो का दोहन कर खुद तो मालामाल होगा और भारत भूमि संसाधन विहीन रेगिस्तान में परिवर्तित होगी । अभी भारतीय जनता के पास समय है असली षड्यंत्र को व षड्यंत्रकारियों को समझे। अन्यथा आने वाली पीढियों का अस्तित्व खतरे में होगा ।
शैलेंद्र कुमार बौद्ध कानपुर नगर