Thursday, 12 October 2023

निपुणता को एक कसौटी मे नहीं बांधा जा सकता है।

किसी भी व्यक्ति की निपुणता का एक मात्र पैमाना माना लेना उसके स्वतंत्र अध्ययन और चिंतन को रोकना मात्र है।
अगर हमने यह मान लिया होता कि जेम्स वाट इसलिए वैज्ञानिक बना कि उसने केतली में उड़ती भाप की शक्ति को समझकर भाप का इंजन बना दिया।इसलिए वही व्यक्ति निपुण  हैं तो शायद आज मिसाइलमैन ए पी जे अब्दुलकलाम वैज्ञानिक नहीं माने जाते। 
  यदि हम यह मान ले  कि प्रभू ईसा मसीह जिस राह पर चल कर अध्यात्मिक निपुणता हासिल की वहीं आध्यत्मिक निपुणता है, तो शायद आधुनिक आध्यात्मिक गुरू ओशो आध्यात्मिकता में निपुण नहीं माने जाते।
     यदि हम तुलसीदास के कवित्व को ही निपुणता का मानक मान कर ठहर जाते तो शायद आज महादेवी वर्मा, जयशंकर प्रसाद, मुंशी प्रेम चंद्र, और  अटल बिहारी बाजपेयी जैसे निपुण कवियो को कोई मान्यता ही न होती। 
अध्ययन, अध्यापन और चिंतन को किसी निश्चित ढांचे में ढालने का मतलब बौद्धिक विकास को रोकना मात्र है।

      ।। स्वामी संबोधि आनंद।।

Thursday, 6 July 2023

भारतीय संस्कृति बनाम विदेशी संस्कृति

Red day, pink day, mother day, friend day, etc हमारी भारतीय संस्कृति को नष्ट करने की साज़िश के तहत बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा मनमोहक प्रस्तुति के साथ भारतीयों पर थोपा जा रहा है। आज नवयुवक-नवयुवती विदेशियों की इस साजिश को समझने में असमर्थ हैं। 
हमारी संस्कृति में महिला दिवस नहीं मनाया जाता बल्कि महिलाओं को देवी मानकर पूजा जाता है। 
    हमारी संस्कृति में मित्रता दिवस नहीं मनाया जाता बल्कि कृष्ण और सुदामा की तरह मित्रता निभाई जाती है। 
      हमारी संस्कृति में  टीचर डे नहीं मनाया जाता बल्कि गुरु को भगवान से बढ़कर सम्मान दिया जाता है।
     हमारी संस्कृति में मदर डे या फादर डे नहीं मनाया जाता बल्कि सुबह उठकर सबसे पहले मात पिता अभिनन्दन के साथ दिनचर्या का शुभारंभ किया जाता है। 
     हमारी संस्कृति में  वैलेंटाइन डे नहीं मनाया जाता बल्कि अपनी जीवन साथी के साथ पूरा जीवन गुजार दिया जाता है। 
    हमारी संस्कृति में प्रेम का प्रर्दशन नहीं किया जाता है, प्रेम के सब-कुछ न्योछावर कर दिया जाता है। 
   हमारी संस्कृति में क्या कमी है जो हम विदेशी फिरंगियों की संस्कृति को ढोने में गर्व महसूस करते हैं, और अपनी श्रेष्ठ संस्कृति से बचने की कोशिश करते हैं। हम संस्कृति का आयोजन नहीं करते हम संस्कृति को जीते हैं। हम रिश्तों का प्रदर्शन नहीं करते। हम रिश्तों के लिए जीते मरते हैं। 

गर्व है हमें अपनी पवित्र संस्कृति में। 
    साभार:- स्वामी संबोधि आनंद।
01-8-2021

Thursday, 22 June 2023

क्या शिक्षक कार्मिक है? या अध्यात्मिक

राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ (प्रा०संवर्ग) के प्रदेश व्यापी एक दिवसीय सांकेतिक धरने में कानपुर नगर में आयोजित धरने में श्री शैलेन्द्र  द्विवेदी ( माध्यमिक शिक्षा) ने बड़ी ही ध्यानाकर्षित करने वाली   बात कही कि " शासन प्रशासन हम शिक्षकों नौकर बनाकर काम कराना चाहता है या शिक्षा संवर्धक बनाकर देश व राष्ट्र हित    में शिक्षा संवर्धन का दायित्व निर्वहन करने देना चाहता है। शासन प्रशासन पहले यह तय करें। दूसरी महत्वपूर्ण बात आंकड़ा आधारित शैक्षणिक गुणवत्ता चाहता है या प्रदर्शन आधारित शिक्षा। श्री शैलेन्द्र द्विवेदी के ये उद्गार पूरे आंदोलन का सूत्र बन कर शासन प्रशासन की मंशा को जनता के सामने लाने और शिक्षकों को बदनाम करने के वैश्विक षणयंत्र को भी उजागर करके रख देगा।‌
             शिक्षा और शिक्षक के संदर्भ में मैंने कई बार लिखा है कि शिक्षा मात्र शासन-प्रशासन और व्यापार हित की ही न हो, वह राष्ट्र और समाज हित की भी होनी चाहिए। शिक्षा लोगों के मानसिक नियंत्रण का हथियार ही न हो स्वतंत्र बोध व अभिव्यक्ति का भाव भरने वाली भी हो। मैं यह नहीं कहता कि शिक्षा शासन प्रशासन की प्रणाली को संचालित करने में सहायक न हो और यह भी नहीं कहता कि अभिव्यक्ति और बोध की स्वछंदता वाली ही हो। शिक्षा राष्ट्र, समाज, सरकार और परिस्थितियों में अनुकूलता और समायोजन की क्षमता विकसित करने वाली हो। 
        "शिक्षक का पद अध्यात्मिक पद हैं न कि कार्मिक ।" अक्सर मै यह कहता रहता हूं। अगर मेरे इस वक्तव्य को स्वीकार करते हैं तो एक बात और स्पष्ट होती है कि  शिक्षा कोई कर्म नहीं है, जिसे जितनी जल्द हो समाप्त कर इतिश्री प्राप्त कर ली जाए। शिक्षा से लक्ष्य अधीरता और बेचैनी पैदा करके कदापि हासिल नहीं किए जा सकते हैं। यह तो शांत चित्त, धैर्य, साहस और नित नये अनुभवों की प्रक्रिया है जिससे निरंतर  परिणाम आते रहते हैं और प्रक्रिया चलती रहती है। पता नहीं क्यों शासन-प्रशासन ने ऐसा मान लिया कि शिक्षा को एक क्रिया की तरह  झंझट समझकर इस क्रिया से जितनी जल्द हो मुक्ति प्राप्त कर ली जाए। 
     "किसी भी देश-राष्ट्र समाज, सरकार व सभी व्यक्तियों के लिए एक जैसी शिक्षा दे दी जाए यह भी शिक्षा के असली उद्देश्यों  की प्राप्ति नहीं है।"न ही शिक्षा उपलब्धि को आंकड़ों के माध्यम से मापा जा सकता है। जैसा कि वर्तमान में निपुण छात्र बनाने के लिए निर्धारित एप में बच्चा कुछ वाक्य, कहानी या अनुच्छेद पढ़ लें तो वह निपुण हो गया। हालांकि शासन प्रशासन के निपुण की अवधारणा और वास्तविक निपुण की अवधारणा दोनों में जमीन आसमान का अंतर है। निपुणता के क्षेत्र होते हैं। कोई बच्चा खेल में निपुण होता है, तो कोई कृषि कार्य में। कोई व्यवहार में निपुण होता है तो कोई नियम कानून में। कोई पढ़ने में निपुण होता है तो कोई संगीत में। मात्र सहज फाउंडेशन या एक अधिकारी द्वारा निर्मित एप के चंद अनुच्छेद पढ़ लें और बच्चा निपुण मान मान लिया जाए तो यह बात इतनी बचकानी लगती है कि यह तय करने वालों के बौद्धिक स्तर पर हंसी आने के अलावा और कुछ नहीं है। 
       अब बात करते हैं शिक्षा में शिक्षक की भूमिका की। शिक्षक वह नहीं है जिसने मात्र एप के या किसी किताब के चंद अक्षर बच्चे को सिखा दिए तो वह शिक्षक हो गया है।  शिक्षक एक तपस्वी की भांति होता है जो पहले स्वयं को सम- विषम परिस्थितियों से शिक्षा ग्रहण करता है और प्राप्त अनुभवों को शब्दों में पिरोकर अपने शिष्य को भी बोध कराता है। जिससे उसे अपने जीवन को जीने में सहजता और सरलता होती है।‌ क्या एक कार्मिक बनकर चंद किताबों के वाक्य रटा देने वाला व्यक्ति शिक्षक है। अगर ऐसा है तो फिर आधुनिक युग में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और वीडियो, एनीमेशन का निर्माण करके बच्चों को किताबों को रटाया और पढ़ाया जा सकता है। तो फिर सरकार को ऐसे शिक्षकों की क्या जरूरत जो बच्चों को रोबोट की तरह प्राप्त निर्देशों को छात्र के समक्ष उगल दें। यह काम तो मोबाइल टीवी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सोसल मीडिया के माध्यम से भी बिना धन खर्च के किया जा सकता है। क्या जरूरत है शिक्षकों को लाखों रुपए की पगार देने की। 

      भारत की शिक्षा व्यवस्था में यूनिसेफ पर्याप्त दखल रखती है। भविष्य में तो ऐसा लगता है कि सारी की सारी बागडोर भारतीयों से निकलकर यूनिसेफ के हाथों चली जानी है। यूनिसेफ की नीति है कि लोग शरीर से तो वह अपने देश के हो लेकिन उनकी आत्मा यूनिसेफ द्वारा निर्धारित व्यवस्था के अनुरूप हो। यूनिसेफ  परिसंकल्पनाओं के माध्यम से पूरे विश्व को मानसिक विकलांग बनाने का निर्णय अपने गठन से लेकर आज तक लगातार कर रहा है। उसमें एक एक परिसंकल्पना मीना मंच की है। जिसमें एक प्रतीक तोता है जो इस बात का समर्थक है कि लोगों को साथ, चील, कौआ या शेर नहीं तोता बनाना है। उन्हें जितना रटाया जाए उतना ही रटने की क्षमता हो कुछ अपने अनुभवो और परिस्थितियों से सीखने की क्षमता न हो। यूनिसेफ की देन है कि शिक्षा आज एक बहुत बड़ा व्यापार बनकर रह गई है। हो सकता है कि मेरी इस बात से लोगों को  सहमति न हो कि पूरी दुनिया में यूनिसेफ ने महिलाओं और बच्चों को व्यापार की वस्तु बनाकर रख दिया है। वहीं पुरुषों को WHO, WTO, WEF, IMF ने बंदर बनाकर रख दिया है। शिक्षक भाइयों आपको भारतीय चेतना और संस्कृति की रक्षा के एक बहुत लम्बी और बड़ी लड़ाई लड़ने की जरूरत है। इस लड़ाई को आपके सिवा और नहीं लड़ सकता है और न ही विदेशी संस्थाओं के षणयंत्रों को समझ सकता है। आओ हम भारत की नई आजादी का बिगुल बजाए। सब मिलकर शिक्षा की अलख जलाए। जय भारत जय शिक्षक। 
          शैलेन्द्र कुमार
         (संगठन मंत्री) 
राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ (प्रा० संवर्ग) 
कानपुर नगर

Friday, 2 June 2023

सेंगोल और नई संसद वैश्विक सरकार के गठन में अहम भूमिका निभाएंगी

सेंगोल one world,one government का कोड हैं। सेंगोल में कमल के ऊपर विराजमान सांड़ से स्पष्ट है कि अब भविष्य में भारत में निरंकुश सरकार होगी जो वैश्विक सरकार की प्रतिनिधि मात्र होगी। 888 सांसदों की संख्या Angel no. हैं जो ईसाइयत के देवदूत के रूप में काम करने वाले लोगों को डिकोड करती है। भविष्य में हिंदुत्व का शनै - शनै रूपांतरण ईसाइयत में किया जाएगा।। इसी ईसाइयत को हिन्दुत्व के नाम पर आने वाली पीढ़ी पर थोपा जाएगा। जिसकी झलक आप नई शिक्षा नीति में देख सकते हैं। नई शिक्षा नीति में वैश्वीकरण और डिजिटलीकरण को खास महत्व दिया गया है। सेंगोल निरंकुशता का प्रतीक है। जो आपको आने वाले 2047 के बाद देखने को मिलेगा। सारी दुनिया चंद लोगों की मुट्ठी में होगी। 

Monday, 15 May 2023

अध्यात्मिक विचार विमर्श स्त्री और पुरुष।

अध्यात्मिक विचार विमर्श का निष्कर्ष। 

 पुरुष ने देखा वह स्त्री से कमतर था तो पुरुष श्रेष्ठ होने को आतुर हुआ
उसने अध्यात्म चुना, अध्यात्म के लिए उसने सबसे पहले स्त्री को ही छोड़ दिया। पुरुष उसी दिन स्त्री से हार गया था।
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वहीं स्त्री जब-जब आध्यात्मिक हुई उसने घर नही छोड़ा। वह रात में सोते बच्चे छोड़ निकल नही भागी। उसने कष्टों को स्वीकार किया। स्वीकार करना ही आध्यात्मिकता थी। पुरुष यही बात नही जानता था कि अध्यात्म की शुरुआत, जैसा है वैसा स्वीकार करने से होती है। स्त्री ने इसे आत्मसात किया और जीतती रही।
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अध्यात्म सहजता और स्वीकार्यता की यात्रा है। स्त्री की यह यात्रा स्वाभाविक है। पुरुष कृत्रिमता से जीतने के प्रयास मेंअक्सर हारता रहा है। इसी हार से विक्षिप्त होकर आक्रमणकारी बन गया। 
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पुरुष बाहर से बटोरता है। सामान भीतर भरता है। स्त्री अपना भीतर सँजोती है,करुणा बाहर उड़ेलती है।
*करुणा के आगे आक्रमण एक पल नहीं टिकता।* 
आक्रमण का दंश झेलने के बावजूद स्त्री हर युग में जीतती रही और पुरुष हारता रहा, आगे भी हारता ही रहेगा 
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अध्यात्म स्त्री है। धर्म पुरुष है
अध्यात्म भीतर जाने की यात्रा है
धर्म बाहर से मज़बूत होने के द्वंद्व हैं
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पुरुष ने आध्यात्मिक होने के लिये
ज्ञान गढ़ा। ज्ञान के दम्भ में पुरुष जटिल होता गया। स्त्री ने करुणा रची
वह सहज हो गयी। 
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स्त्री उम्रदराज होती है तो 
संवेदना की तीव्रता से भर जाती है। 
पुरुष उम्रदराज होता है, स्वयं केंद्रित हो जाता है।
🌹🙏
।। स्वामी संबोधि आनंद।।

Sunday, 2 April 2023

कागजी मुद्रा अधवा e-rupee/ digital currency हम और हमारी मूर्खता का सच।

*सीबीडीसी -eRupee,हम और हमारी अज्ञानता* 
१ अप्रैल भारतीय अर्थव्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण दिन होता है। इस दिन से लागू अर्थनीति हमारे जीवन को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती है। 1 अप्रैल का एतिहासिक महत्व भी कम नहीं है यह इसलिए कि इसी दिन डा. बी आर अंबेडकर ने अपनी पुस्तक "रुपए की समस्या" लिखकर अंग्रेजों द्वारा थोपी गई कागजी करेंसी की पोल खोलकर रख दी। इसी को ध्यान में रखकर अंग्रेजों ने भारत में आरबीआई बना कर सोने चांदी की मुद्रा के स्थान पर "कागजी" नोट का लेनदेन सन 1935 में स्वीकृत किया गया था। यह कागजी फर्जीवाड़ा जिसे fiat करेंसी कहा जाता है बिना किसी ठोस आधार के ही कितनी भी कभी भी छापी जा सकती है। शुरुआत में इस छपाई की मात्रा का निर्धारण उपलब्ध सोने चांदी की मात्रा से किया जा जाता था, जिसे अब फर्जी डॉलर (कागजी घोषणा मात्र) बिल (fiat करेंसी) के आधार पर रिचर्ड निक्सन राष्ट्रपति काल से कर दिया गया । जिसे हम बड़ी शान- शौकत से इधर उधर खिसकाते रहते हैं। कभी रूपए की रूप में तो कभी डॉलर के रूप में।
 जिसे हाल ही में भारत सहित कई अन्य देशों ने रातोरात डीनोटिफाई कर, कागज को मुद्रा समझ, तिजोरी भरे देशवासियों को रातोरात करेंसी की औकात दिखा दी। मैं तो माननीय प्रधानमंत्री जी को धन्यवाद देना चाहूंगा कि उन्होंने अंग्रेजों द्वारा थोपी गई कागजी मुद्रा की असलियत को सबके सामने ला दिया। प्रधानमंत्री जी द्वारा हम सबके सामने करेंसी की औकात दिखा दी गई फिर भी हम नासमझ  बने रहे यह हमारी मूर्खता नहीं है तो क्या है? उन्होंने दिखा दिया कि देशवासी पूरी तरह मूर्खता में जीवनयापन कर रहे हैं। उनके सामने सच्चाई कितनी भी खोलकर रख दो लेकिन वे अंधे ही रहेंगें। देश की 140 करोड़ लोगों के अंधेपन के अखबार,टीवी है ( जो अंग्रेजों द्वारा बनाए गए Vernacular Press Act-1878  के अधीन स्थापित किए गए)  स्कूल कालेज है (जो लार्ड मैकाले की शैक्षिक सिफारिशों के आधार पर स्थापित किए गए) इत्यादि के द्वारा ब्रेनवाश है। जिसे हम मुद्रा, रूपया, माया, पूंजी समझे बैठे हैं वह १ अप्रैल 1935 को अंग्रेजों द्वारा भारतीय संसाधनों को मुफ्त में उपभोग करने की रणनीति का परिणाम मात्र है। इसी दिन सोने चांदी की मुद्राएं अंग्रेजों ने अपनी तिजारी में बंद कर भारत देश पर उसी तिजोरी के स्वर्ण भंडार के आधार पर कागजी धोखाधड़ी सारे भारतवासियों पर थोपी थी। सोने की चिड़िया कहलाने वाला देश देखते देखते कब कर्ज की गर्त में चला गया इसका अंदाजा हम भारतीयों को आज तक नहीं हो पाया। हलांकि दादाभाई नौरोजी ने अंग्रेजों की चालों को बहुत अच्छे से समझा और1868 ई. में सर्वप्रथम दादाभाई नौरोजी ने ही अंग्रेज़ों द्वारा भारत के धन की निकासी की ओर सभी भारतीयों का ध्यान आकृष्ट किया। फिर भी हम अपनी मूर्खता के चलते आज तक नौरोजी को समझने और करेंसी के माध्यम से प्राप्त सुविधा को तो ध्यान दिया लेकिन करेंसी रुपी सुविधा की चासनी में लिपटी घातक समस्या की ओर कभी भी दृष्टि नहीं घुमाई।  नौरोजी  ने मई, 1867 ई. को लंदन में आयोजित ईस्ट इंडिया एसोसिएशन की बैठक में अपने पत्र, जिसका शीर्षक England Debut To India को पढ़ते हुए पहली बार धन के बहिर्गमन के सिद्धान्त को प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा- भारत का धन ही भारत से बाहर जाता है, और फिर धन भारत को पुनः ऋण के रूप में दिया जाता है, जिसके लिए उसे और धन ब्याज के रूप से चुकाना पड़ता है। यह सब एक दुश्चक्र था, जिसे तोड़ना कठिन था। इसके अतिरिक्त उनकी अन्य पुस्तकें, जिसमें उन्होंने धन के निष्कासन सिद्धान्त की व्याख्या की है, द वान्ट्स एण्ड मीन्स ऑफ़ इण्डिया (1870 ई.), आन दि कामर्स ऑफ़ इण्डिया (1871 ई.) आदि उनकी पुस्तकों में अंग्रेजों की लूट को समझाया हैं। दादाभाई नौरोजी धन के बहिर्गमन के सिद्धान्त के सर्वप्रथम और सर्वाधिक प्रखर प्रतिपादक थे। 1905 ई. में उन्होंने कहा था कि धन का बहिर्गमन समस्त बुराइयों की जड़ है और भारतीय निर्धनता का मुख्य कारण। दादाभाई नौरोजी ने धन निष्कासन को अनिष्टों का अनिष्ट की संज्ञा दी है। धन निष्कासन के इसी रणनीति के कारण बहुराष्ट्रीय कंपनियों के रूप, वही फिरंगी आज 2023 में फिर से फन उठाए घूम रहे। आज इन्ही फिरंगियों ने नया षडयंत्र कर सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी का बबेला खड़ा किया है। जिसमें अग्रणी भूमिका निभा रहा इन्ही फिरंगियों के हाथ की कठपुतली रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया। इस सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी जिसे eRupee कहा जा रहा, *में इस बार सबसे बड़ी बदमाशी यह होगी कि यह अब कोई कागजी घोषणा भी नही होगी। अब केवल आपके हमारे फोन और कंप्यूटर में दर्ज एक संख्या मात्र होगी।* वह भी कोई ऐसी वैसी संख्या नहीं बल्कि डिजिटल माध्यम से reprogrammable होगी अर्थात इसमें आरबीआई जैसी पिट्टू संस्था द्वारा तय की गई सामग्री के अलावा कुछ भी अन्य नही खरीदा जा सकता। इस षणयंत्र में तमाम अमेरिकी fin -tech कंपनियां दशकों से जुटी हैं। अर्थात अगर आरबीआई मुखौटे ने तय कर दिया कि आप अमुक e Rupee से समोसा खरीद सकते हैं तो केवल समोसा ही खरीद पाएंगे। अगर उस e Rupee में आरबीआई ने तय कर दिया कि आप इस e Rupee से अमुक वस्तु ही खरीद सकते है तो केवल वही चीज खरीदी जा सकती है, वह भी निर्धारित मात्रा में। भले ही आपके पास बैंक कंप्यूटर में लाखों रुपए की संख्या दिख रही हो। इस बात की गंभीरता ऐसे समझिए जैसे कि आपके खाते में रुपए तो लाखों दिख रहे और आप बीमार हो गए। अब आपको इलाज के लिए लाखों की जरूरत है। लाखों रूपए आपके खाते में उपलब्ध भी हैं मगर programmed eRupee (CBDC) होने के कारण आप केवल उतने ही रुपए की दवा खरीद सकते हैं जितना आरबीआई ने पहले से तय कर रखा है। *इस प्रकार हमारे पास बैंक बैलेंस खूब होने पर भी। उक्त संख्या हमारी कड़ी मेहनत से अर्जित करने के बावजूद भी उस संख्या रूपी eRupee पर हुकूमत इन्ही फिरंगियों की संस्था आरबीआई की ही चलेगी।* हम आप इनके हर एक इशारे पर नाचने को मजबूर होंगे। इनकी हां में हां करी तो ठीक अन्यथा कभी भी आपका खाता फ्रीज कर, किसी भी प्रकार के लेनदेन पर एक झटके में रोक लगाई जा सकती है। ऐसा पिछले महीने कनाडा में सरकार के विरुद्ध वैक्सीन पासपीर्ट के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे देशवासियों पर बहुत बड़ी मात्रा में किया भी जा चुका है। जरा इसकी भयाभवता का अंदाजा तो लगाओ कि हमारे पास खूब रुपया है मगर हम उसे उपयोग तभी करेंगे जब कंप्यूटर बाबा इजाजत देगा अन्यथा नहीं। अभी हाल ही तमाम नेता कम्प्यूटर लैपटॉप फोन फ्री डाटा आदि इसी योजना को पूरा करने के ही बांटते नजर इसीलिए आए हैं। 
*भला सोचिए यह कागजी गुलामी जो 1 अप्रैल 1935 में आरबीआई बना कर शुरू की गई थी वह मूर्खता दिवस नहीं तो क्या है❓* इसी करेंसी के आधार पर प्रतिवर्ष आप थोपा जाने वाला बजट रूपी मंहगाई और कर , जिसे हम स्वीकार कर मान्यता दिए हुए हैं, यह हमारी मूर्खता नहीं है तो क्या है। हर वर्ष हमें 1 अप्रैल को मूर्ख बनाया जाता है और हम मूर्ख बन भी जाते हैं। यह मूर्खता दिवस इसलिए भी है क्योंकि आज हमारे हाथ में सारी दुनिया मुट्ठी में आने के बाद भी हम नेताओं अखबारों टीवी में बैठे फिरौतीबाजों के इशारे पर नाच रहे। यह हमारी मूर्खता नहीं है तो क्या है❓
ध्यान रहे यह सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी कोई खयाली पुलाव नहीं बल्कि सख्त हकीकत है जिसे पिछले केंद्रीय बजट 2022 में बाकायदा पास किया चुका है। जिसे हाल में भारत आए बिल गेट्स के हाथों उदघाटित भी कराया जा चुका है। इसी षडयंत्र को अमली जामा पहनाने के लिए दुनियां की बैंके तबाह की जा रही। इसी षडयंत्र को अमलीजामा पहनाने के लिए ही पेटीएम, गूगल पे, रुपे, एमेजॉन पे आदि बाजार में उतारे जा चुके हैं। जिसे हम आज भले ही सुगमता से इस्तेमाल के बहाने मेढक को पानी के डाल धीरे धीरे पानी गर्म किया जा रहा है जिसका हम को कोई अनुमान नहीं। यह सुगमता में भी फीस तामिल कर दी गई हैं।आपका फोन, आपका रिचार्ज,आपका खाता, आपका धन दूसरे के नियंत्रण में है या नहीं। जिसे पेटीएम वाले convenience fee कह कर वसूली शुरू की जा चुकी है। अर्थात हर एक लेनदेन पर सुगमता के नाम पर अलग से जेब कटाई चालू कर दी गई। अपनी जेब कटाई करवाना हमारी मूर्खता नहीं है तो क्या है? मगर हम चुप चाप बर्दास्त करते चले जा रहे। मगर जल्द ही इसी को सीबीडीसी रूपी eRupee में तब्दील कर नकेल और मजबूत कर दी जाएगी। इसी सीबीडीसी को बैंको के cibil score से जोड़ चीनी सोशल क्रेडिट सिस्टम भारत में लागू किया जा रहा। जिसके तहत 2030 तक भारतवासियों को मुद्रा और संपत्ति के अधिकार से विहीन की जाना है। यही नेता ताली बजा बजा कर संसद में यह सब कराएंगे। इसलिए होश में आइए नियंत्रण की जो अमानवीय व्यवस्था खड़ी की जा रही है उसको न समझना तथा  उसका विरोध न करना हमारी मूर्खता नहीं है तो क्या है? । अपने आप पडोस के लोगों से बात कीजिए। सच्चाई से रूबरू होइए। 
आप चाहें तो अब विश्व मूर्खता दिवस की अब बधाई ले- दे सकते हैं।
जय जय भारत भूमि ☸️🇮🇳