🌸🌸🌸 *प्रचलित शिक्षा और शिक्षा व्यवस्था ही हमें गुलाम बनाए रखने का चिरस्थाई साधन है* 🌺🌺
सा विद्या या विमुक्तये। ( विद्या वही जो लोगों को मुक्ति ( आजादी) दिलाए) लेकिन क्या आपने यह पढ़ा है कि अंग्रेजों ने जब भारत मे स्कूल कालेज खोलना शुरू किया तो उस समय उनकी नीति क्या थी?
उन्होंने शिक्षा क्या उद्देश्य निर्धारित किया गया था? आज तक जारी शिक्षा व्यवस्था का यह उद्देश्य था कि भारत मे शिक्षा के माध्यम से ऐसे लोगों की ऐसी फौज बनाई जाए जो Indian in BLOOD AND COLOR. अर्थात रंग व खून से तो भारतीय हो मगर
English in taste, opinion, morals and intellect. अर्थात स्वाद से पिज्जा बर्गर चाउमीन आदि के लिए लार बहाने वाली हो। राय मसविसे से बेबकूफ। मोरल और विकास के नाम पर फूहड़ मुंह ढका हो लेकिन अर्धनग्न और खुले बदन वाली फौज तैयार हो और बुद्धि से बुद्धिहीन खाने हगने वाली पशु टाइप की फौज बनाने की रणनीति बनी थी, जो आज भी 1835 से बदस्तूर आज तक जारी है।
चूंकि हमारी अश्थि मांस मज्जा खून बुद्धि आदि का निर्माण इसी सडयंत्र रूपी व्यवस्था से हुआ है इसलिए जब तक हम सच्चे अर्थों में "द्विज" नहीं बन जाते तब तक यह सब बाते समझ से परे हैं।
पहले मुझे भी सब हराभरा ही दिखता था।
मगर जब से बुद्धत्व की प्राप्ति हुई तब से दूध का दूध व पानी का पानी अलग अलग हो गया।
इस English in taste opinion morals and intellect का ही नतीजा है कि भारत के संविधान का अनुच्छेद 348 कहता है कि राजकाज व कोर्ट की भाषा अंग्रेजी ही होगी। मगर राज्य चाहें तो अनुवाद कर सकते हैं।
जिस देश मे हर 20 किलोमीटर पर भाषा बदलती हो वहां ऐसी शर्त लगाना अपने आप मे देशवासियों के खिलाफ जंग है।
इसीलिए वकीलों व पुलिसकर्मियों की मौज व जनता का शोषण बदस्तूर जारी है।
आज शासक वर्ग यू एन ओ, यूनीसेफ, डब्ल्यू टी ओ , आई एम एफ के निर्देश पर ठीक उसी तरह लोगों पर जबरन डिजटलीकरण आनलाइन लादने के लिए प्रयासरत है जिस तरह अंग्रेजों ने लोगों से सोना चांदी लूट कर कागज की मुद्रा थोपी थी। आनलाइन की स्वीकरोक्ति लोगों को तिल तिल मारेगी। यह सुविधा नहीं फंदा है जो बड़ा ही मनमोहक लग रहा है लेकिन मैकाले की शिक्षा नीति का परिणाम है कि हम इस फंदे को खुली आंखों से नहीं देख पा रहे हैं।