Monday, 15 May 2023

अध्यात्मिक विचार विमर्श स्त्री और पुरुष।

अध्यात्मिक विचार विमर्श का निष्कर्ष। 

 पुरुष ने देखा वह स्त्री से कमतर था तो पुरुष श्रेष्ठ होने को आतुर हुआ
उसने अध्यात्म चुना, अध्यात्म के लिए उसने सबसे पहले स्त्री को ही छोड़ दिया। पुरुष उसी दिन स्त्री से हार गया था।
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वहीं स्त्री जब-जब आध्यात्मिक हुई उसने घर नही छोड़ा। वह रात में सोते बच्चे छोड़ निकल नही भागी। उसने कष्टों को स्वीकार किया। स्वीकार करना ही आध्यात्मिकता थी। पुरुष यही बात नही जानता था कि अध्यात्म की शुरुआत, जैसा है वैसा स्वीकार करने से होती है। स्त्री ने इसे आत्मसात किया और जीतती रही।
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अध्यात्म सहजता और स्वीकार्यता की यात्रा है। स्त्री की यह यात्रा स्वाभाविक है। पुरुष कृत्रिमता से जीतने के प्रयास मेंअक्सर हारता रहा है। इसी हार से विक्षिप्त होकर आक्रमणकारी बन गया। 
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पुरुष बाहर से बटोरता है। सामान भीतर भरता है। स्त्री अपना भीतर सँजोती है,करुणा बाहर उड़ेलती है।
*करुणा के आगे आक्रमण एक पल नहीं टिकता।* 
आक्रमण का दंश झेलने के बावजूद स्त्री हर युग में जीतती रही और पुरुष हारता रहा, आगे भी हारता ही रहेगा 
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अध्यात्म स्त्री है। धर्म पुरुष है
अध्यात्म भीतर जाने की यात्रा है
धर्म बाहर से मज़बूत होने के द्वंद्व हैं
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पुरुष ने आध्यात्मिक होने के लिये
ज्ञान गढ़ा। ज्ञान के दम्भ में पुरुष जटिल होता गया। स्त्री ने करुणा रची
वह सहज हो गयी। 
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स्त्री उम्रदराज होती है तो 
संवेदना की तीव्रता से भर जाती है। 
पुरुष उम्रदराज होता है, स्वयं केंद्रित हो जाता है।
🌹🙏
।। स्वामी संबोधि आनंद।।