विश्व के अधिकांश लोग प्रतिक्रिया व आलोचना, समर्थन और विरोध करके ही अपने को श्रेष्ठ और ज्ञानी समझते रहते है। जबकि इन्हें यह पता ही नही है कि क्रिया और प्रतिक्रिया , आस्तिक और नास्तिक, सकारात्मक और नकारात्मक, पक्ष और विपक्ष एक ही सिक्के के दो पहलू है। विश्व व्यवस्थापक आम लोगो को आस्तिक व नास्तिक, सकारात्मक व नकारात्मक, पक्ष व-विपक्ष मे उलझाकर वास्तविकता, स्वीकरात्मकता और निष्पक्षता से कोसो दूर कर उन पर क्रमश: अलग अलग कर अपना अपना शिकंजा कसते रहते है। लोग अपने गुण और स्वभाव और वातावरणीय विचारों के अनुसार इसी में उलक्षकर आपस में वाद-विवाद, समर्थन और विरोध करने में अपनी ऊर्जा व्यय करते रहते। जिसका परिणाम वे हमेशा दुखी और परेशान रहते है।
स्वामी संबोधि आनंद।