मैं एक दशक से बहुजन आंदोलन व बहुजन संघर्ष को देख रहा हूं। जिसमें संघर्ष का मुख्य बिंदु विरोध, आलोचना, और व्यक्तिगत छींटाकशी के सिवा कुछ नजर नहीं आता। बसपा सरकार इन्हीं बिन्दुओं की परिणति मात्र थी। जो समय काल के गर्त में डूबते दिख रही है। बहुजन समाज की नकारात्मक चिंतन एवं प्रतिक्रियावादी आन्दोलन/ मिशन, ब्राह्मणवादी व्यवस्था को मजबूती प्रदान करने के लिए पर्याप्त है।
मैं हमेशा इस बात को लेकर चिंतनशील रहता हूं कि आखिर बहुजन समाज सांख्यिकीय, कामगार, संघर्षशील, सहनशील होने के बावजूद सवर्ण व्यवस्था के विरुद्ध अपनी व्यवस्था क्यों नहीं खड़ी कर पा रहा है? जहां तक उसके निम्नलिखित कारण हो सकते हैं
१- स्वअनुशासन का आभाव।( Personal mastery)
२- व्यवस्था परक चिंतन का आभाव।( System thinking)
३- परम्परागत सोच व विचार रखना ।( Creative thought)
४- परिवर्तनशील परिस्थितियों में समायोजन का आभाव। ( Changing nature)
५- नीतिगत व दूरदर्शी चिंतनशीलता का आभाव।
६- लोकतंत्रात्मक स्वभाव होने के बावजूद लोकतंत्रात्मक व्यवस्था का निर्माण करने में अक्षम।
७- पारस्परिक अन्तर्सम्बन्धों की समझ न होना।
८- मूर्तवादी/ प्रत्यक्षवादी होना।
९- लचीलापन न होना
१०- स्वनिर्मित व्यवस्था न होना।
११- निरन्तर संघर्ष न करना।
१२- आपसी विचारों में विरोधाभास
१३- राजनीति, सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक, न्यायिक, धार्मिक, दार्शनिक चिंतक दल का न होना।
१४- समदर्शी होना
१५- शीघ्र विश्वासी या कट्टर विश्वासी होना।
मैं हमेशा इस बात को लेकर चिंतनशील रहता हूं कि आखिर बहुजन समाज सांख्यिकीय, कामगार, संघर्षशील, सहनशील होने के बावजूद सवर्ण व्यवस्था के विरुद्ध अपनी व्यवस्था क्यों नहीं खड़ी कर पा रहा है? जहां तक उसके निम्नलिखित कारण हो सकते हैं
१- स्वअनुशासन का आभाव।( Personal mastery)
२- व्यवस्था परक चिंतन का आभाव।( System thinking)
३- परम्परागत सोच व विचार रखना ।( Creative thought)
४- परिवर्तनशील परिस्थितियों में समायोजन का आभाव। ( Changing nature)
५- नीतिगत व दूरदर्शी चिंतनशीलता का आभाव।
६- लोकतंत्रात्मक स्वभाव होने के बावजूद लोकतंत्रात्मक व्यवस्था का निर्माण करने में अक्षम।
७- पारस्परिक अन्तर्सम्बन्धों की समझ न होना।
८- मूर्तवादी/ प्रत्यक्षवादी होना।
९- लचीलापन न होना
१०- स्वनिर्मित व्यवस्था न होना।
११- निरन्तर संघर्ष न करना।
१२- आपसी विचारों में विरोधाभास
१३- राजनीति, सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक, न्यायिक, धार्मिक, दार्शनिक चिंतक दल का न होना।
१४- समदर्शी होना
१५- शीघ्र विश्वासी या कट्टर विश्वासी होना।
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