Tuesday, 28 February 2017

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एक अँधा भीख मांगता हुआ राजा के द्वार पर पंहुचा।राजा को उस पर दया आ गयी,राजा ने प्रधानमंत्री से कहा-"यह भिक्षुक जन्मान्ध नहीं है,यह ठीक हो सकता है,इसे राजवैद्य के पास ले चलो।"

(दोनों उसे पकड़कर ले जाते हैं)रास्ते में राजा का मंत्री कहता है "महाराज आपसे एकांत में कुछ कहना चाहता हूं।"दोनों भिक्षुक को वहीँ बैठाकर दूसरी ओर जाते हैं।

मंत्री कहता है "महाराज यह भिक्षुक शरीर से हृष्ट-पुष्ट है,यदि इसकी रौशनी लौट आयी तो इसे आपका सारा भ्र्ष्टाचार दिखेगा,आपकी शानोशौकत और फिजूलखर्ची इसे दिखेगी।आपके राजमहल की विलासिता और आपके रनिवास का अथाह खर्च इसे दिखेगा,इसे यह भी दिखेगा कि जनता भूख और प्यास से तड़प रही है,सूखे से अनाज का उत्पादन हुआ ही नहीं और आपके सैनिक पहले से चौगुना लगन वसूल रहे हैं।

शाही खर्चे में बढ़ोत्तरी के कारण राजकोष रिक्त हो रहा है ,जिसकी भरपाई हम सेना में कटौती करके कर रहे हैं ,इससे हजारों सैनिक और कर्मचारी बेरोजगार हो गए हैं।
ठीक होने पर यह भिक्षुक औरों की तरह ही रोजगार की मांग करेगा और आपका ही विरोधी बन जायेगा।

मेरी मानिये तो यह आपसे मात्र दो वक्त का भोजन ही तो मांगता है,इसे आप राजमहल में बैठाकर  मुफ्त में सुबह-शाम भोजन कराइये और दिन भर इसे  घूमने के लिए छोड़ दीजिये।यह आपका पूरे राज्य में गुणगान करता फिरेगा,कि राजा बहुत न्यायी हैं,बहुत ही दयावान और परोपकारी हैं।इस तरह मुफ्त में खिलाने से आपका संकट कम होगा और आप लंबे समय तक शासन कर सकेंगे।"

राजा को यह बात समझ में आ गयी,वह वापस अंधे के पास गया और दोनों उसे उठाकर राजमहल ले आये।अब अँधा राजा का पूरे राज्य में गुणगान करता फिरता है,उसे यह नहीं पता कि राजा ने उसके साथ धूर्तता की है,छल किया है,वह ठीक होकर स्वयं कमा कर अपनी आँखों से संसार  का आनंद ले सकता था।

यही हाल वर्तमान में सरकारें करती हैं,हमे मुफ्त का लालच देती हैं किंतु आँखों की रोशनी ( अच्छी शिक्षा व रोजगार ) नहीं देतीं जिससे कि हम उनका भ्रष्टाचार  देख पाएं,उनकी फिजूलखर्जी और गुंडागर्दी देख पाएं,उनका शोषण और अन्याय देख पाएं।

और हम अंधे की तरह उनका गुणगान करते हैं कि राजा मुफ्त में सबको सामान देते हैं।हम यह नहीं सोचते कि यदि हमें अच्छी शिक्षा और रोजगार सरकारें दें तो हमें उनकी खैरात की जरूरत न होगी,हम स्वतः ही सब खरीद सकते हैं।
अत: हमें मुफ्तखोरी की नहीं। मेहनत की चाहिए।

हमारा मन की बात से नहीं कुछ भी भला नहीं होने वाला। हमें तन का काम चाहिए।

Monday, 27 February 2017

अपनी सफलता और असफलता के लिए आप ही उत्तरदायी है

हम अक्सर अपनी असफलताओं का दोष दूसरे को देते रहते हैं। जबकि अगर किसी दौड़ में कोई तेज दौड़ कर या आपको टंगड़ी मार कर गिरा जाये तो यह गलती उसकी नहीं बल्कि आपकी है। आप ने खुद में इतनी क्षमता पैदा नहीं की कि तेज दौड़ सके, या आप यह भूल गये कि जो तेज दौड़ नहीं पाते मगर धूर्त व चालाक होते हैं वे आपको टंगड़ी लगा कर जरूर गिरायेगे। आपकी इसी भूल का फायदा उठाकर उसने अपने स्वभाव के अनुसार टंगड़ी मार कर आपको गिराकर आगे बढ़ गया क्योंकि आप उससे सतर्क नहीं रहे बल्कि उस धूर्त स्वभाव वाले व्यक्ति को अपने पास आने दिया या आप खुद उसके पास गये।

     एक बात और जब आपके पास कोई आता है तो, आपके पास आने का,उसका क्या उद्देश्य है इसकी जानकारी आपको नहीं होती जबकि वह कोई भी व्यक्ति आपके पास निरुद्देश्य नहीं आता।
       जबकि आप किसी के पास जाते हैं तो किसी न किसी उद्देश्य से ही जाते हैं। जिसकी जानकारी उस व्यक्ति को नहीं होती। फिर भी वह आपसे सतर्क रहता है पर आप हजार धोखे खाने के बावजूद सतर्क नहीं रहते। जिसका नतीजा आपका पतन ही होता है।

Saturday, 25 February 2017

ब्राम्हणवाद

आइये ब्राम्हणवाद को जाने।क्या है ब्राम्हणवाद ? आखिर ऐसा क्या है ब्राम्हणवाद में कि हम हजारों साल से इससे मुक्त नहीं हो पा रहे हैं? कोई कहता है कि तुम्हारे अन्दर ब्राम्हणवाद कूट कूट कर भरा है। कोई कहता है कि ब्राम्हणवाद बहुत खराब है। आज तक हम ब्राम्हणवाद को समझ नहीं पाये। उसका सिर्फ एक कारण है कि हम स्वयं को नहीं समझ पाते कि हम कहां है? क्या कर रहे हैं? क्या है? आइये ब्राम्हणवाद को कुछ इस प्रकार समझते हैं।

पानी= समाज, नदी= सामाजिक व्यवस्था, नदी के कगार= ब्राम्हण, नदी की दिशा बनाने वाले= अग्रगामी ब्राम्हण, नदी का उफान या फैलाव=समाज का सामूहिक विरोध व ब्राम्हणवाद के दायरे का परिवर्तन, नदी की तली= ब्राम्हणवाद का गुप्त गठबंधन


भाइयों और बहनों आपने नदी को देखा होगा।कि उसमें दो कगार होते हैं। जिसके बीच पानी काम बहाव होता है। पानी सोचता है कि वह बिना किसी दबाव के आगे की ओर बह रहा है जबकि ऐसा नहीं है, पानी दो कगारों व आगे निर्मित ढाल के अनुरूप बहता है। हमें दो कगार अलग-अलग दिखाई देते हैं जबकि दोनों कगार पानी के नीचे छिपी तली के सहारे एक दूसरे को मजबूती से पकड़े हुए है।

ब्राम्हणवाद भी कुछ इस नदी की तरह होता है। जिस प्रकार नदी के दो कगार होते हैं ठीक उसी प्रकार दो विचार वाले ( पक्ष व विपक्ष) ब्राम्हण होते हैं, जो समाज में दिखाई तो अलग-अलग देते हैं परन्तु नदी की तली की तरह मजबूती से एक दूसरे को पकड़े रहते हैं ताकि पानी यानि समाज नदी के दो कगारों यानि दो विचारधाराओं के बीच बहता रहे। जब कभी पानी का दबाव अधिक हो जाता है तो आपने देखा होगा कि कगार स्वत: फैल जाता है, कहने का तात्पर्य जब कभी समाज को यह महसूस होता कि हम ब्राम्हणवाद के गुलाम हैं हमें ब्राम्हणवाद के दायरे से बाहर निकलना है तो वे एक साथ एकत्र होकर ब्राम्हणवाद से निकलने का प्रयास करते हैं पर ब्राम्हणवाद इतना होशियार व चालाक होता कि वह बड़ी चालाकी से अपना, (नदी की तरह) अपना दायरा बढ़ा लेता है, ताकि नदी के उफान के कारण बाहर हुए पानी को भी नदी का ही पानी समझा जाए,अर्थात समाज जब ब्राम्हणवाद की सीमाएं तोड़ कर नयी धारा बनाने का प्रयास करता है तो ब्राम्हण अपने दायरे बढ़ा देता है अर्थात अपनी स्थिति में परिवर्तन कर लेता है और अग्रगामी ब्राम्हण बड़ी तेज़ी के साथ अपने हितों को ध्यान में रखते हुए आगे से आगे नयी व्यवस्था बदलने में लग जाता है, ताकि समाज के विरोध को शान्त किया जा सके। जबकि अन्य वर्ग उसी उफान को और ब्राम्हण के बदलाव को देखकर खुश होते रहते हैं। कुछ वर्ग तो इस बात से खुश होते हैं कि हमें ब्राम्हणवाद बहुत महत्व दें रहा है।जबकि सच्चाई यह होती कि ब्राम्हणवाद उस ताकत का अपने हितों की पूर्ति के बाद पीछे छोड़ कर आगे बढ़ जाता है। समाज को तब समझ में आता है जब उसे यह महसूस होता है कि वह जिसके साथ है उसे पीछे छोड़ गया। ब्राम्हणवाद की खासियत होती है कि वह इस उफान को देखकर तत्काल नदी की तरह अपना दायरा बदल और हमारे लोगों का प्रयोग कर दूध की मक्खी की तरह बाहर फेंक देता है। हमे भी तीन प्रकार से कार्य करना चाहिए पक्ष व विपक्ष और नई दिशा, अर्थात समाज की नई व्यवस्था बनाने का कार्य करना चाहिए। यदि हम ब्राम्हणवाद के समानांतर व्यवस्था बनाने में सक्षम नहीं हो पा रहे हैं तो हमें भी विरोध नीति के साथ कब्जा नीति अपनानी चाहिए। जैसा कि समय समय पर गौतम बुद्ध, भीमराव अंबेडकर जैसे लोगों ने व्यवस्था परिवर्तन का कार्य किया पर ब्राह्मणों ने बड़ी चालाकी से उनके साथ मिलकर उनकी व्यवस्था में कब्जा कर लिए और उनकी बनायी व्यवस्था को अपने हितों के अनुरूप मोड़ते चले गए और हम समझते रहे कि ब्राम्हण हमारी व्यवस्था में जी रहे है।
अगर हम कहें कि हम अपनी ताकत को अपनी व्यवस्था को बनाए रखने व उसमें छेड़छाड़ करने वाले व बदलाव करने वाले का तत्काल विरोध करे व अपनी व्यवस्था से उसे बाहर निकाल फेंके,भले ही उस बदलाव को हमारा हित बताया जाये। तो हम अपनी व्यवस्था में ही अपना हित कर सकते हैं। व्यवस्था की दिशा में परिवर्तन हमारे अनुसार हो न कि ब्राम्हणवाद के अनुसार। तब जाकर भले ही हमें ब्राम्हणवाद से मुक्ति मिल सके। अन्यथा केवल अपने व्यक्तिगत हितों को देखने से हमारा सामूहिक अहित ही होगा। हमें समय समय पर अपनी रणनीति बदलते रहना चाहिए न कि नीति ।

Monday, 20 February 2017

प्राचीन भारतीय संस्कृति में एक महत्वपूर्ण व्यवस्था थी कि कोई लड़की अपने हेतु सुयोग्य वर की तलाश स्वयं करती थी। ऐसे उदाहरण एक भी नही नजर आते कि लड़का वधू की तलाश करता हो। कहने का मतलब यह है कि बालिकाओं को अपना जीवन साथी चुनने उसके साथ जीवन यापन करने की स्वतंत्रता थी। पर जब से भारत की संस्कृति में विदेशी आर्यों ने दखल देना शुरू किया तब से महिलाओ, शूद्रो, की स्थिति दयनीय होती चली गयी। आर्यो के ऐसे अनेको उदाहरण भरे पड़े है कि किस तरह महिलाओं का उत्पीड़न कर उनके सारे अधिकार अपने हाथों में ले लिये। हम बहुत ही सूक्ष्म दृष्टि से भारत की वैवाहिक प्रथा पर अध्ययन करे तो कुछ अपवादो को छोड़कर आज भी लड़की पक्ष ही वर की तलाश करता है।जब वर पसन्द होता है उसके बाद ही वधू को देखने की अनुमति होती है। बीच में विदेशी आक्रमणकारी व आर्य संस्कृति के चलते महिलाओं का शोषण हुआ। पर बाबा साहब के संविधान लागू होने के बाद महिलाओं की स्थिति में कुछ सुधार नजर आ रहा है। महिलाओं ने भी अपनी गरिमा को समझना प्रारम्भ किया है। जिसका नतीजा पारिवारिक जीवन में आशातीत परिवर्तन आये है, जिन्हें पुरुषवादी आर्य संस्कृति के समर्थक हजम नही कर पा रहे है।और दिन प्रतिदिन महिलाओं व शूद्रो के अधिकारो में प्रहार कर रहे है। मेरा मानना है कि अगर महिलाओं व शूद्रों को अपने अधिकार सुरक्षित रखने है तो भारत सरकार पर संविधान के अनुरूप राजव्यवस्था चलाये व हिन्दू कोड बिल लागू करने का दबाव बनाना होगा। शैलेन्द्र कुमार, सरसौल, कानपुर नगर।8896561604

Friday, 17 February 2017

demonetizatin

भारत सरकार demonetizationकी कार्यवाही, smart India, start-up India, digital India पूर्ववर्ती सरकारों की निजीकरण, वैश्वीकरण, उदारीकरण की नीतियां वास्तव में भारत के विकास के लिए अपनाई गई नीतियां नहीं है। बल्कि transfer of power by economy है। आज जो भी विकास हो रहा है वह वास्तव में उधार का विकास हो रहा है। भारतीय जनता की गाढ़ी कमाई तो विदेशी कर्ज व ब्याज में जा रही है। शेष कमाई विदेशी कम्पनियां लाभ के रूप में अपने देश लिए जा रही है। भारतीय युवा जिस तेजी से पढ़ लिख कर भारतीय सेवा के लिए तैयार हो रहा उसी तेजी से सार्वजनिक क्षेत्र से रोजगार समाप्त किया जा रहा। स्वरोजगार करने के लिए युवाओं के पास धन नहीं है। बैंक लोन देने से इंकार कर रही है। ऐसे में युवक प्राइवेट सेक्टर में चन्द रुपयों के बदले अपनी सेवाएं  देने को मजबूर हैं। पूंजी का केन्द्रीकरण किया जा रहा है उससे पूंजीपति मजबूत हो रहे हैं मजदूर किसान गरीब व नवयुवक बेरोजगारी से जूझ रहे हैं। यह सब सरकार की विदेशी कम्पनियां के हितों को ध्यान में रखकर नीतियां बनाने के कारण हो रहा है।

Digital India and start-up India, smart India आदि भारतीय अर्थव्यवस्था को किस प्रकार खोखला करेगी तथा किस प्रकार इसका नियंत्रण विदेशी हाथों में होगा इसका अंदाजा लगाना हर व्यक्ति के बस में नहीं हैं। हां आप अंदाजा भले न लगा पाये पर आपकी आने वाली पीढ़ियां इसका खामियाजा जरूर भुगतेगी। आपकी संतान विदेशियों के हाथों कठपुतली बन कर रह जाएगी।  यह बात मैं दावे के साथ कह सकता हूं।

Sunday, 12 February 2017

जातीय भेदभाव व शमशान

शमशान घाट और जातीय भेदभाव

दोस्तों मैं कानपुर का निवासी हूं आज मैं जिस व्यवस्था पर लिखने की कोशिश कर रहा हूं वह जीवन काल का मामला नहीं मृत्यु के बाद अन्तिम संस्कार का मामला है।

मेरे कानपुर में गंगा नदी के किनारे स्थित भैरोघाट है जहां पर लोग शवदाह हेतु मृत शरीर को लेकर जाते हैं। पर इस घाट में अन्तिम संस्कार हेतु जो स्थान व लकड़ियों की दुकानें जाति के अनुसार निर्धारित है। हर वर्ग के लिए मंत्रोच्चार व ब्राम्हण भी अलग है ।

मैं वहां खडे़ यह सोचता रहा कि आखिर इस दुखद स्थिति में  जब लोगों के साथ यह भेदभाव होता है तो भारत में सामान्य दशा में कितना भेदभाव होता होगा?

   हम इस भेदभाव को जानते हुए भी वहां अंतिम संस्कार हेतु जाते हैं क्यों?
क्या हमारे पास इतना भी ज्ञान का आभाव है कि हम अपने लिए एक अलग से शमशान घाट की भूमि तैयार नहीं कर सकते?
हालांकि मैंने वहां पर बैठे पण्डों से पूछा कि यहां पर अलग-अलग जातियों के लिए अलग-अलग शमशान घाट क्यूं है, तो उन्हें यह कहने में जरा सा भी संकोच नहीं हुआ कि भगवान जाति के अनुसार स्वर्ग नर्क का निर्धारण होता है। फिर यह कहां से कम है कि हम यहां चमार पासी धानुक धोबी, काछी कुर्मी अहीर गड़रिया का हम अंतिम संस्कार कराते है?

पण्डें की यह बात सुनकर कर सोचता हूं कि हमारे साथ हो रहे भेदभाव के दोषी जितने वे नहीं है उससे अधिक दोषी हम बहुजन है। अगर हम बदल जाये तो जाहिर है कि सामने वाला व्यक्ति तुरन्त बदल जायेगा।
शमशान घाट और जातीय भेदभाव

दोस्तों मैं कानपुर का निवासी हूं आज मैं जिस व्यवस्था पर लिखने की कोशिश कर रहा हूं वह जीवन काल का मामला नहीं मृत्यु के बाद अन्तिम संस्कार का मामला है।

मेरे कानपुर में गंगा नदी के किनारे स्थित भैरोघाट है जहां पर लोग शवदाह हेतु मृत शरीर को लेकर जाते हैं। पर इस घाट में अन्तिम संस्कार हेतु जो स्थान व लकड़ियों की दुकानें जाति के अनुसार निर्धारित है। हर वर्ग के लिए मंत्रोच्चार व ब्राम्हण भी अलग है ।

मैं वहां खडे़ यह सोचता रहा कि आखिर इस दुखद स्थिति में  जब लोगों के साथ यह भेदभाव होता है तो भारत में सामान्य दशा में कितना भेदभाव होता होगा?

   हम इस भेदभाव को जानते हुए भी वहां अंतिम संस्कार हेतु जाते हैं क्यों?
क्या हमारे पास इतना भी ज्ञान का आभाव है कि हम अपने लिए एक अलग से शमशान घाट की भूमि तैयार नहीं कर सकते?
हालांकि मैंने वहां पर बैठे पण्डों से पूछा कि यहां पर अलग-अलग जातियों के लिए अलग-अलग शमशान घाट क्यूं है, तो उन्हें यह कहने में जरा सा भी संकोच नहीं हुआ कि भगवान जाति के अनुसार स्वर्ग नर्क का निर्धारण होता है। फिर यह कहां से कम है कि हम यहां चमार पासी धानुक धोबी, काछी कुर्मी अहीर गड़रिया का हम अंतिम संस्कार कराते है?

पण्डें की यह बात सुनकर कर सोचता हूं कि हमारे साथ हो रहे भेदभाव के दोषी जितने वे नहीं है उससे अधिक दोषी हम बहुजन है। अगर हम बदल जाये तो जाहिर है कि सामने वाला व्यक्ति तुरन्त बदल जायेगा।

Thursday, 9 February 2017

Question with government of India

माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने एक जन सभा में कहा कि यदि यू पी में भाजपा की सरकार बनी तो प्राधिकरणों केभ्रष्टाचार की जांच होगी।


क्या मोदी जी अभी भारत सरकार के प्रधानमंत्री नहीं है ?
क्या केंद्र सरकार राज्य सरकार के घोटालों की जांच कराने की शक्ति नहीं रखती?
क्या मोदी जी का यह जांच कराने की घोषणा जनता को बेवकूफ बनाने वाली नहीं है?
क्या मोदी जी को चुनाव के समय जनता की समस्याएं नजर आती है?
मोदी ने नवयुवकों को रोजगार देने की बात कही थी अपने कार्यकाल में केंद्र सरकार की कितनी पोस्टों पर भर्ती की?
मोदी जी ने हमारे कुछ दलित नेताओं से लोकसभा चुनावों में वादा किया था कि हमारी सरकार बनाये हम पदोन्नति में आरक्षण बिल पास कराएंगे, क्या मोदी जी ने अपना वादा पूरा किया या वे नेता जो अपने आंदोलनों को छोड़कर सांसद बनने के लिए भाजपा में सम्मिलित हुए पदोन्नति में आरक्षण बिल पास करा पाये ?
क्या मोदी जी देश हित में भारत की आर्थिक, शैक्षिक संस्थानों का राष्ट्रीयकरण करने की क्षमता रखते हैं?
 मोदी जी भारतीय व्यवस्था का वैश्वीकरण कर रहे हैं या यूरोपीय व्यवस्था का वैश्वीकरण कर रहे हैं?
मोदी जी या उनसे पहले की सरकारें  विश्व व्यवस्था के दबाव में भारतीय संवैधानिक व्यवस्था के विरुद्ध जाकर सामाजवादी लोकतंत्र को नष्ट कर पूंजीवादी व्यवस्था की हिमायत नहीं कर रही है?
क्या मोदी से पूर्व व मोदी जी की सरकारों ने उदारीकरण, निजीकरण व वैश्वीकरण  डिजिटलाइजेशन व १००℅ प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की नीति अपनाने के लिए भारतीय जनता को विश्वास में लिया तथा भारतीय जनता को प्रचार प्रसार
कर इस नीति के लाभ हानि को बताया?
मोदी जी व पूर्व की सरकारों ने भारतीय संविधान की प्रमाणित प्रतिलिपि छपवा कर भारतीय संविधान का जनता के बीच प्रचार प्रसार किया?

देवी का अर्थ

हम भारतीय अक्सर अपनी बेटियों के नाम के आगे देवी शब्द लगाते हैं। जब किसी लड़की की तारीफ करनी होगी है तो बड़े गर्व से कहते हैं कि " अरे वह लड़की तो साक्षात देवी है"

पर आपने कभी सोचा है कि जब हम लड़कियों के नाम के आगे देवी शब्द लगाते हैं या उन्हें देवी कहते तो उससे क्या प्रदर्शित होता है ? आइये इस पर प्रकाश डाला जाये।

'देवी' = ब्राम्हण की स्त्री की उपाधि ।
देव=  ब्राम्हण की उपाधि
होता है।
अब जरा सा सोचे कि जब हम अपनी बेटियों के नाम के आगे देवी शब्द लगाते हैं तो जाने अनजाने यह मान लेते हैं कि यह हमारी बेटी देव( अर्थात् ब्राम्हण) की पत्नी है।
हम इन छोटी छोटी बातों पर उनके अर्थो पर ध्यान नहीं देते हैं और हम खुद जाने अनजाने अपना अपमान कराते रहते हैं।
शैलेंद्र कुमार कानपुर नगर 9455615564/889656

Saturday, 4 February 2017

Nirvachan kary mein Janta ki udaseenta

इस समय भारत के कई राज्यों में चुनावों का माहौल चल रहा है। ऐसे में निर्वाचन आयोग द्वारा जगह- जगह मतदाता जागरूकता रैली व शपथ समारोह का आयोजन कराया जा रहा है। जोकि बेशक महत्वपूर्ण कार्य है। इस कार्यक्रम से नि:संदेह लोगों को बताया जा रहा है कि मताधिकार का प्रयोग करना, सरकार बनाने के लिए, कितना जरूरी है।
          परन्तु इस सब के बीच सवाल खड़ा होता है कि मताधिकारी ( मतदाता) जागरूकता रैली आयोजन की आवश्यकता क्यों पड़ी?
१- क्या भारतीय नागरिकों को वोट के अधिकार की जानकारी नहीं है?
२- क्या भारतीय नागरिकों के पास वोट करने के लिए समय नहीं है?
३- क्या भारतीय नागरिक सरकार चुनने की इच्छा नहीं रखते?
४- क्या भारतीय नागरिक वोटिंग के प्रति उदासीन हो रहे हैं?
५- क्या भारतीय नागरिक अपनी जिम्मेदारी से बच रहे हैं? 
६- क्या भारतीय नागरिक वोटिंग करने से डर रहे ? 
७-क्या मताधिकारी अशिक्षित हैं? 
उपरोक्त ऐसे अनेकों प्रश्न जहन में उठते हैं। जिनका समाधान व जवाब सायद किसी के पास हो? परन्तु जहां तक मैं अनुभव व विचार कर पा रहा हूं,  जिसके क्रम में लोगों को मतदान हेतु पूरी तरह से उदासीनता है जिसका सबसे बड़ा कारण योग्य, चरित्रवान, जिम्मेदार, देशप्रेमी, उत्तरदायी, ईमानदार, संविधान व देश, समाज व लोगों के प्रति निष्ठावान, नैतिक मूल्यों वाले जनप्रतिनिधियों का आभाव है। जो वोटर्स को उदासीन बनाता है। आज कोई ऐसा प्रत्याशी चुनाव मैदान में नहीं नजर आता जो देश के लिए चुनाव में उतरा हो। सभी के सभी प्रत्याशी अपने कल्याण के लिए लाखों करोड़ों रुपए खर्च करते हैं और फिर जनता को दोनों हाथों लूटते हैं। आज राजनीति को सेवा नहीं व्यापार बना दिया गया है। ऐसी स्थिति में वोटर को ही लूटा जाता है। आज के नेताओं व अंग्रेजों में कोई अन्तर समझ नहीं आता। तो जनता क्यों न उदासीन हो। जनता की 
यही उदासीनता लोकतंत्र के लिए घातक होगा। निर्वाचन आयोग द्वारा मतदाता जागरूकता रैली के आयोजन से साफ साफ नजर आता है कि लोकतंत्र अपनी अंतिम सांसें गिन रहा है। बड़ें ही धीमें कदमों से राजतंत्र आता नजर आ रहा है।
Shailendra Kumar 9455615564