Saturday, 22 November 2025

किसी भी व्यवस्था की मजबूती लोग की प्रतिभागिता पर निर्भर है।

*किसी भी व्यवस्था, संस्था की मजबूती का तभी होती है जब लोग स्वेच्छा से उसमें प्रतिभाग करे।* 
    करीब दो दशकों से बीएलओ ड्यूटी ने बेसिक शिक्षा की नींव हिला कर रख दी। यह विभाग करीब करीब समाप्ति की ओर अग्रसर है। जिसका जिम्मेदार शिक्षक को बनाया जा रहा है। जबकि शिक्षक बेचारा चुनाव आयोग के आगे नतमस्तक है।हालांकि कुछ प्रतिशत शिक्षकों ई शिक्षण कार्य के प्रति उदासीनता को भी कहना बुरा नहीं होगा। ऐसा भी नहीं है कि प्रतिवर्ष वोटर लिस्ट संशोधन के नाम पर शिक्षकों को बीएलओ ड्यूटी लगाकर वोटर लिस्ट में संशोधन कराने से लोकतंत्र मजबूत हो रहा है। अगर इस प्रक्रिया से लोकतंत्र मजबूत होता तो लोग भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते। जबकि ऐसा दिखाई नहीं देता। लोकतंत्र की मजबूती तभी है जब लोग अपनी 18 वर्ष की उम्र होते ही अपने वोट की प्रक्रिया का फार्म आनलाइन या आफलाइन आवेदन स्वयं दाखिल कर दे। ठीक उसी तरह जैसे किसी नौकरी के लिए आवेदन दाखिल करते हैं। वहां विभाग मात्र विज्ञप्ति जारी करता है। 
    वोटर लिस्ट संशोधन प्रक्रिया में पूरे वर्ष शिक्षकों को लगाने या उन्हें घर घर भेजने से लोगों में इसके प्रति उदासीनता बढ़ रही है। बीएलओ कई -कई बार दरवाजे पर जाता है। उसके बावजूद सम्बन्धित वोटर अपने आवश्यक दस्तावेज नहीं देते हैं। लोगों में लोकतंत्र के प्रति संवेदनशीलता समाप्त हो रही है और उदासीनता बढ़ रही है। इसके कई कारक हो सकते हैं, जिस पर विचार करने की सूक्ष्म आवश्यकता है।  लोगों की सक्रियता कम होने से लोकतंत्र के लिए खतरा नजर आ रहा है। निर्वाचन आयोग बीएलओ के माध्यम से जितना प्रयास करता नजर आ रहा है उतना ही लोकतंत्र की आधारशिला वोटिंग के प्रति नकारात्मक प्रभाव वोटर पर पड़ रहा है। लोग राजनीति को लेकर जिस तरह से दबी जुबान टिप्पणी करते हुए दिखते हैं। वह भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए शुभ संकेत नहीं है। लोकतंत्र की नींव सरकारी नौकरियों की समाप्ति, बीएलओ के नाम पर विद्यालयों को शिक्षक विहीन करना, लोगों की कड़ी मेहनत के दम पर खड़ी की गई विभिन्न सरकारी संस्थाओं को निजी हाथों में सौंप कर अधिकाधिक मुनाफे का प्रयास करना, टैक्स और महंगाई की मार, जनप्रतिनिधियों, प्रशासनिक अधिकारियों और कर्मचारियों में नैतिक मूल्यों में गिरावट इत्यादि कारणों से जनता में लोकतंत्र के प्रति लगाव लगातार गिरता जा रहा है। जिसे बीएलओ ड्यूटी लगाकर वोटर लिस्ट संशोधन कराने की प्रक्रिया मात्र से लोकतंत्र मजबूत नहीं होगा बल्कि कमजोर होगा।

Monday, 18 August 2025

राजतंत्र बनाम लोकतंत्र

जब दुनिया में राजतंत्र था तब लोगों को इस बात की कोई चिंता नहीं होती थी कि कौन राजा बनेगा, कौन नहीं । राजाओं को एक दूसरे राजाओं से लड़नेऔर लूटने से आय हुआ करती थी। थोड़ी बहुत आय कृषि से हो जाती थी। जिससे वे अपना और अपनी सेवकों और सेनाओं का पोषण करते थे। लोग भी यह जानते थे कि अधिक धन एकत्र करना उनके लिए खतरा ही था। पता नहीं कब कौन लूटेरा आए और लूट ले जाए। लोग अधिकांश खानाबदोश जीवन जीते थे। वे एक जगह बंधकर नहीं रहते थे। जहां उन्हें भोजन पानी की व्यवस्था मिलती वही अपना डेरा डाल देते। वे पूर्ण रूप से स्वतंत्र और स्वच्छंद जीवन जीते थे। न उन्हें कुछ पाने की लालसा थी न कुछ खोने की। केवल जीवन जीने की जद्दोजहद थी।‌ कौन राजा मारा गया और कौन राजा बना कोई मतलब नहीं था। न ही इन सबका उनके जीवन में कुछ खास प्रभाव था।‌
        शासकों ने लोगों की इस स्वतंत्रता को देखा और सोचा समझा, और लोगों के जीवन में राजनीति का प्रभाव कैसे पड़े इसके लिए कुछ ऐसे कार्य किए जिससे लोगों पहचान सुनिश्चित हो।
1- नामकरण।
2- आवासीय व्यवस्था।
3- पता निर्धारण ।
4- भूमि बंदोबस्त।
5- शैक्षिक व्यवस्था 
6- संवैधानिक व्यवस्था।
7- लोकतंत्र 
8- सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक व्यवस्था।
9- मुद्रा 
10- बैंकिंग व्यवस्था 
इत्यादि व्यवस्था शासकों ने खड़ी की। जिसके माध्यम से लोग धीरे-धीरे कब बंधते चले गये यह उन्हें पता ही नहीं चला। वर्तमान में विकास एक ऐसा शिगूफा है जिसके माध्यम से लोगों में लालसा भरी जाती है और लोगों को धीरे-धीरे शासकों के अधीन रहने को प्रेरित किया जाता है। नगरीकरण इसी प्रेरणा का एक जीता जागता उदाहरण है। जहां हर व्यक्ति पूर्णतः शासन व्यवस्था पर आश्रित है। चाहे वह व्यापार करता हो, सेवा करता हो, नौकरी करता हो, या राजनीति करता हो।सबके सब पूर्ण रूप से बंधे हुए हैं। कहीं भी स्वंतत्रता नजर नहीं आती। कल जो शासक एक दूसरे शासकों को लूटकर अपने राज्य का खर्चा चलाते थे आज उन्हें लूटने की कोई जरूरत नहीं रही। उन्होंने ऐसी व्यवस्था खड़ी कर दी कि लोग विकास केनाम पर रातों दिन मेहनत कर रहे हैं और अपनी कमाई का अधिकांश‌ हिसूकर के रूप में शासकों को स्वेच्छा से दे रहे हैं। जो नहीं देता उसे कर चोरी के नाम पर जेल में कैद कर दिया जाता है। जहां राजतंत्रीय व्यवस्था में लोगों के जीवन में राजाओं के कृत्यों का कुछ खास प्रभाव नहीं पड़ता था। आज वही लोकतांत्रिक व्यवस्था में हर व्यक्ति राजनीति से प्रभावित हो रहा है। कटु सत्य है लेकिन समझ से परे। विकास का मतलब है लोगों की शासकों पर उत्तरोत्तर बढ़ती निर्भरता विकसित का तात्पर्य लोगों की शासकों पर पूर्ण निर्भरता। लोकतंत्र में आप महसूस कर रहे होंगे कि लोगो की निर्भरता शासकों पर बढ़ती ही जा रही है। उनकी निर्भरता का फायदा शासक वर्ग भरपूर फायदा उठा रहा है। लोगों की कमाई से प्राप्त कर से अपनी व्यवस्था को मजबूत करते जा रहे हैं तथा लोगों को रातों-दिन विकास के नाम पर भगा रहे हैं।

Saturday, 16 August 2025

कृष्ण जन्माष्टमी पर विशेष

कृष्ण जन्माष्टमी के उपलक्ष्य में विशेष - क्षण में जीना कोई कृष्ण से सीखें। 

 जेसपर्स की परिभाषा के अनुसार - 

"Man is the promising animal."

"आदमी वचन देने वाला प्राणी है।" 

मानव को क्षण में जीने  वाला प्राणी होना चाहिए। वह वचन देने वाला प्राणी बनकर रह गया है। हालांकि वह मूलतः क्षण में जीता है, लेकिन सांसारिक व्यवस्था से बंधा होने के कारण इसकी अनुभूति नहीं कर पाता। उसके समक्ष जो क्षण आएगा, वैसा ही जिएगा। क्षण में अगर युद्ध आया, तो युद्ध में उतर जाएगा। क्षण में  प्रेम आया तो प्रेमी बन गया। क्षण अगर करुणा आयी तो करुणा से भर जाएगा। क्षण में  अगर क्रोध आया तो क्रोध से कांपेगा। क्षण में अगर अहंकार आया तो चुनौतियां देता नजर आएगा। केवल क्षण-क्षण जीने वाला आदमी ही मुक्त जी सकता है। क्योंकि जो वचन देता है। वह अतीत से बंध जाता है। जो पीछे से बंध जाता है, जो पीछे से बंधकर जीने लगता है, उसका वर्तमान और भविष्य दोनों दुख देने वाले साबित होते हैं। उसकी स्वतंत्रता रोज संकीर्ण होती चली जाती है और अतीत भविष्य पर बोझिल होने लगता है। ऐसा व्यक्ति कभी मुक्त नहीं हो सकता।

कृष्ण ऐसे आदमी नहीं हैं, जो वचन से बंधे दिखाई देते हो। क्षण में जो घटित होता है, वह उसके साथ समायोजित हो जाते हैं। हां, गांधी उनमें नजर आएंगे तो अम्बेडकर की झलक भी उनमे दिखेंगी, विवेकानंद भी दिखेंगे तो बुद्ध, महावीर और कबीर भी उनमें नजर आएंगे।  वचन देने वाले प्राणी भी नजर आएंगे। लेकिन कृष्ण वचन में बंधे रहने वाले प्राणी नजर नहीं आएंगे । वह उस क्षण में जीते हैं जो अभी अभी आया हुआ है । इसीलिए यह बचन देकर कि युद्ध में शस्त्र नहीं उठाएंगे लेकिन फिर भी चक्र उठाकर युद्ध भूमि में उतर पड़ते है। चोर नहीं है फिर भी साथियों की खुशी के लिए माखन चोरी का आनन्द लेते हैं। राधा से  प्रेम करने के बावजूद विवाह रुक्मणी से करते हैं। सामाजिक व्यवस्था को गंभीरता से मानने के बावजूद सुभद्रा को अर्जुन के साथ गंधर्व विवाह करने में सहयोगी बनते हैं। योद्धा हैं फिर युद्ध न करके सारथी बनते हुए। युद्ध नहीं चाहते हैं फिर भी अर्जुन को युद्ध करने के लिए प्रेरित करते हैं।ये कुछ क्षण में  जीने के उदाहरण मात्र है। समग्रता से परिपूर्ण कृष्ण क्षण में जीवन जीने के उदाहरण मात्र नहीं है। वे जीवन ही है।  जीवन में घुले रस है। जीवन का स्वाद लेते हैं। जीवन की कठिनाइयों से भागते नहीं है, उनके होकर उनका सामना करते हैं।‌
    ।।जय श्रीकृष्णा।।

Wednesday, 6 August 2025

प्राइवेट बनाम सरकारी विद्यालयों की शिक्षा

अक्सर सरकारी विद्यालयों में पढ़ाने वाले शिक्षकों को कामचोर और दायित्वविहीन कहा जाता है। कहा जाता है कि प्राइवेट स्कूलों में अच्छी पढ़ाई होती है और सरकारी विद्यालयों में खराब पढ़ाई होती है। पहले तो अच्छी और बुरी पढ़ाई का क्या मानक है?  सूचनाओं का संग्रह कर अंक हासिल कर लेना या दायित्वबोध और उत्तम चरित्र, संवेदनशील व्यक्तित्व का निर्माण करना। 
    मैं दावे के साथ कहता हूं कि प्राइवेट स्कूलों में भले लिए बच्चों को सूचनाओं से भर दिया जाता हो लेकिन शिक्षा अच्छी नहीं थी जाती।अगर प्राइवेट विद्यालयों की शिक्षा बेहतर है तो आज हर व्यक्ति अपने दायित्वों से भाग क्यों रहा है? क्यों संवेदनशून्य हो रहा है? क्यों व्यक्तिवादी , स्वार्थी हो रहा है। इस चरित्र के जो भी लोग हैं, उनकी पृष्ठभूमि का अवलोकन भी तो कर लो, कि वे किन विद्यालयों की फसल है? सरकारी अधिकारी, कार्मिक और शिक्षक अधिकांशतः प्राइवेट विद्यालयों से निकलकर सरकारी सेवा दे रहे हैं। जैसी सेवा दे रहे हैं वह किसी से छिपा नहीं है। अगर प्राइवेट विद्यालयों ने सही शिक्षा दी होती तो आज वे कामचोरी करते नजर नहीं आ रहे होते। लोग सरकारी सेवकों को कोसते नजर नहीं आ रहे होते। अब बच्चे को बचपन से जैसा सिखाया पढ़ाया गया है।  वही तो वह प्रदर्शित करेगा। प्राइवेट विद्यालय कोई समाज सेवा नहीं कर रहे हैं। वे शिक्षा का व्यवसाय कर रहे हैं। क्या कोई  व्यक्ति सूचनाओं का संग्रह कर अंक हासिल कर लेने मात्र से शिक्षित हो जाता है? सरकारी विद्यालयों या कार्यालयों में कर रहे कामचोरी की बात छोड़िए प्राइवेट विद्यालयों में पढ़ें लिखे लोग अपने माता पिता व पारिवारिक दायित्वों से बचते नजर आ रहे हैं। वे उन माता पिता को ठोकर मारते नजर आते हैं जिन्होने अपनी सारी उम्र अपने  बच्चे को यह सोचकर कर प्राइवेट में पढ़ाते हैं कि बड़ा होकर उनका सहारा बनेगा। जब वह इस काबिल हो जाता है कि वह अपना और अपने परिवार का भरण पोषण कर सकता है तो वह अपने बूढ़े माता पिता को दर दर की ठोकरें खाने को छोड़कर भाग खड़ा होता है। यही हाल बेटियों और बहुओं का है। अध्ययन करके देख लो। उन्हें सिर्फ अपना स्वार्थ और धन नजर आता है। जब प्राइवेट विद्यालय अच्छी शिक्षा दे रहे तो यहां से पढ़े लिखे लोग का  एक अच्छा चरित्रवान व्यक्तित्व का निर्माण क्यों नहीं हो पा रहा है ? वे पढ़े तो प्राइवेट विद्यालयों में है लेकिन नौकरी सरकारी स्कूलों में कर रहे हैं। प्राइवेट स्कूलों में पढ़ें शिक्षको का मैंने बहुत नजदीक से अध्ययन किया है कि वे बच्चे से कोई लगाव नहीं रखते, केवल उन्हें अपने वेतन से लगाव रहता है। इसलिए सरकारी विद्यालयों में शिक्षा का स्तर गिरा है। सरकारी विद्यालयों में पढ़ाई न होने का मुख्य कारण प्राइवेट विद्यालयों से पढ़कर निकले शिक्षकों का सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चों से आत्मीय लगाव न होना। अगर किसी सरकारी विद्यालय से पढ़ा कोई शिक्षक अपने कर्तव्य का निर्वहन करता है तो उसे प्राइवेट विद्यालयों से पढ़कर निकले शिक्षक और अधिकारी इतना परेशान कर लेंगे कि वह मजबूर होकर उसी राह पर चलने लगता है। अगर सरकारी सेवाएं समाप्त हो जाती है तो मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि प्राइवेट विद्यालयों से पढ़ें लिखे कामचोर और दायित्वविहीन लोग अपना जीवन यापन गुलामों की तरह न करते नजर आए, तब यह बात कहना कि कौन जीवन कौशल से जोड़कर शिक्षा दे रहा है और कौन दायित्व विहीन बनाने की शिक्षा दे रहा है। प्राइवेट में पढ़ें अधिकांश लोग भावनाओं और संवेदनाओं से शून्य होते हैं। वे हर व्यक्ति को अपना शिकार समझते हैं। अवसर देख सबसे बड़े हितैषी लगेंगे लेकिन जैसे ही काम खत्म वैसे ही पहचान खतम। यही हाल प्राइवेट में पढ़ें शिक्षको ने सरकारी विद्यालयों के कर दिए हैं। जैसा उन्होंने प्राइवेट विद्यालयों से सीखा है वैसा ही वे सरकारी विद्यालयों में सिखाते हैं। समाज को स्वार्थी और संवेदन शून्य बनाते हैं। 
   शैलेन्द्र कुमार
वरिष्ठ जिला उपाध्यक्ष 
राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ 
कानपुर नगर 

Sunday, 20 April 2025

योजनाकारों की बदलती योजनाएं और पीछे पीछे भागते लोग

🌹🌹🌹   *व्यवस्थागत परिवर्तनों को देखो और समझो, तब आगे बढ़ो।* 🌹🌹🌹 
योजनाकारों की बदलती योजनाएं और पीछे पीछे भागते लोग।

एक समय था जब लोगों वस्तु विनिमय के माध्यम से अपनी दैनिक आवश्यकताओं पूर्ति करते थे। तब लोगों के पास नाना प्रकार की वस्तुएं संजोकर रखते थे। तब भूमि और कृषि उत्पादों की बड़ी महत्ता थी। राजसत्ता में बैठे और उनके कारिंदे लोग हर संभव कृषि उत्पादों और जमीन पर आधिपत्य को लेकर प्रयासरत थे। उनको देखते हुए आम व्यक्ति भी कृषि और कृषिगत उत्पादों व कृषि योग्य जमीन को महत्व देते थे।‌
       समय बदला चालाक और होशियार लोगों ने औद्योगिक क्रांति के महत्व को समझा और कृषिगत उत्पादों और वस्तुओं के एकत्रीकरण को  करेंसी रूपी सुविधा में बदलने का खेल शुरू कर दिया। जमीनदारी प्रथा समाप्त कर मेहनत मजदूरी करने वाले लोगों को जमीनें आवंटित कर दी गयी। लोग बड़े खुश हो गये कि सरकार ने उनके लिए जमीनें मुहैया करा दी। नि:संदेह जमीन जीवन के लिए सबसे महत्वपूर्ण अवयव है लेकिन योजनाकारों ने जमीन को महत्वहीन बना मानव निर्मित करेंसी और औद्योगिक उत्पादों को महत्वपूर्ण स्थान देने लगे। क्योंकि इसी महत्व में उनका फायदा और लोगों का शोषण सम्भव था। यह देख लोगो ने औद्योगिक उत्पादों को महत्व और नौकरियों को महत्व देना प्रारम्भ कर दिया। जब तक आम व्यक्ति औद्योगिक उत्पादों और नौकरियों के महत्व को समझता -समझता और इसमें अपना उचित स्थान बनाने का प्रयास शुरू किया। इसके माध्यम से लोग थोड़ा मजबूत होना शुरू क्या हुए उनके सामने सुविधा रूपी एक ऐसा वैभव लाकर खड़ा कर दिया गया कि लोग उसके पीछे भागने लगे और अपनी जमा पूंजी पुन उन्हीं योजनाकारों की ओर प्रवाहित करें लगे। अब जब लोगों ने औद्योगिक उत्पादों और सरकारी नौकरियों के फायदों के चक्कर में फंसकर अपने मूल आत्मनिर्भर व्यवस्था को अपने ही हाथों नष्ट कर गौरवान्वित महसूस करने लगे। उनको यह गौरव महसूस करने के कुछ ही दिन हुए थे कि योजनाकारों ने उदारीकरण लाकर उनके गौरव को इतना छिछियाया कि आज हर तबके का व्यक्ति अंदर उनसे घृणा और द्वेष करने लगा। 
     लोग धीरे धीरे अपने स्तर से औद्योगाक उत्पादों की ओर बढ़ने लगे। जैसे ही यह रुझान योजनाकारों ने समझा उन्होंने फिर से अपनी योजना बदल दी। जिन औद्योगिक उत्पादों के दम पर वे एक क्षत्र राज चला रहे थे उनका लोकल स्तर पर उत्पादन होने से उनके राज पर संकट मंडराने लगा तो उन्होंने फिर से अपनी योजनाओं को बदल कर उत्पादों को लोकल और मार्केटिंग को वैश्विक बनाने का आनलाइन खेल शुरू कर दिया। जिसका परिणाम लोकल स्तर के उत्पादों की बिक्री प्रभावित होने लगी। तो लोग फिर उसी राह पर चल डगरे जिस राह पर मार्केटिंग कंपनियां और योजनाकार उन्हे ले जाना चाहते हैं। 
     जब उन्हें कृषिगत मजदूरों की आवश्यकता थी तो जमींदारी लाकर बंधुआ मजदूर बनाए। 
   जब उन्हें औद्योगिक मजदूरों की जरूरत थी तो नानाप्रकार की शिक्षा दीक्षा के माध्यम से कुशल मजदूर तैयार कराए। 
    जब उन्हें सरकारी व्यवस्था को मजबूती देनी तो शिक्षा के माध्यम से सरकारी नौकर तैयार करायें। 
आज उन्हें ऐसे लोगों की आवश्यकता है जो उनकी मार्केटिंग के अनुसार उनके द्वारा निर्धारित दामों में उन्हें वस्तुएं निर्मित कर दे सके। इसके लिए कौशल विकास आदि की शिक्षा को बढ़ावा देना प्रारम्भ कर दिया है। वह दिन दूर नहीं जब शत प्रतिशत अंक प्राप्त अंकधारी अंक पत्र लिए फिरेंगे लेकिन उन्हें आजीविका नसीब नहीं होगी। अब सुरक्षा, सम्मान व आजीविका ऐसे कुशल लोगों को मिलेगी जो वैश्विक स्तर पर मार्केटिंग कर रही कंपनियों के लिए उत्पादन निर्मित कर सके। 

    हमें बदलाव के क्रम को समझना होगा। जो उत्पाद कभी वृहद पैमाने पर फैक्ट्रियों में कर लोकल स्तर के दुकानदारों के माध्यम से बेचा कर धनार्जन किया जाता था। आज व
अवस्था उलटकर कुछ ऐसी हो रही है। लोकल स्तर पर उत्पादन कर वैश्विक स्तर पर मार्केटिंग करना। 
   स्वामी संबोधि आनंद

Friday, 10 January 2025

विकासशील और विकसित की अवधारणा

अविकसित से तात्पर्य प्रकृति पर निर्भरता व प्रकृति द्वारा नियंत्रित व्यवस्था।
विकासशील से तात्पर्य प्रकृति का आश्रय छोड़ सरकार पर निर्भरता व सरकार द्वारा नियंत्रित व्यवस्था की ओर अग्रसारित।
विकसित से तात्पर्य सरकार पर पूर्ण निर्भरता व सरकार द्वारा पूर्ण नियंत्रित व्यवस्था। 
Undeveloped means dependence on nature and a system controlled by nature.
Developing means leaving the shelter of nature and moving towards dependence on the government and a system controlled by the government.
Developed means complete dependence on the government and a system completely controlled by the government.