वैश्विक समाज का चिंतन और कार्य प्रत्यक्ष प्रभावित करने वाले तथ्यों तक सीमित है। जो उनकी असफलता का सबसे बड़ा कारण है। जबकि जिनसे उनका टकराव है वे बहुत बड़े रणनीतिकार है। उनके चक्रव्यूह को समझना और उसे तोड़कर निकलने का उपाय समाज के चिंतकों व नेतृत्वकर्ताओं के पास नजर ही नहीं आता। जो कुछ थोड़ा बहुत चिंतन है वह उन्हीं रणनीतिकार की व्यवस्था के इर्द-गिर्द घूमता है। आज समाज के रणनीतिकारों को सबसे बड़ा खतरा उसी शिक्षा से है जिसे पाने के लिए वे लाखों खर्च कर रहे हैं।
हालांकि मेरी इस बात से बहुत से लोग सहमत नहीं होंगे। हो सकता है कि कुछ लोग मुझे यह भी समझ लें कि मैं समाज को शिक्षित करने का विरोध कर रहा हूं। उनका यह सोचना स्वाभाविक भी है। जबकि ऐसा नहीं है। समस्या यह है कि बहुत से लोग विद्यालय में पढ़ाई जाने वाली विषयवस्तु को 'शिक्षा' समझते हैं। जबकि शिक्षा विषयवस्तु का अध्ययन करना नहीं है , बल्कि शिक्षा चेतना को जागृत करने का माध्यम है। शिक्षा किताबों से प्राप्त जानकारी नहीं बल्कि उस जानकारी का समुचित उपयोग की क्षमता का विकास होना शिक्षा है। जो अत्याधुनिक शिक्षा पद्धति में कहीं भी नजर नहीं आता। जो विद्यालयी शिक्षा के पाठ्यक्रम से बड़ी चालाकी से निकाल दिया गया है। आज की शिक्षा व्यक्ति को जागृत करने का माध्यम नहीं बल्कि व्यक्ति के मस्तिष्क नियंत्रण का माध्यम है। मेरे कहने का मतलब यह कदापि नहीं है कि ऐसी दशा में हमें शिक्षा ग्रहण करने से कोई फायदा नहीं है या शिक्षा ग्रहण नहीं करना चाहिए। मेरा कहने का मतलब है कि शिक्षा ऐसी हो कि जो हमें प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष तथ्यों व समस्याओं को समझने व उनके निराकरण के योग्य बनाने में सहयोग करें। शिक्षा ऐसी हो जो व्यक्ति के अंतर्निहित बौद्धिक क्षमता को जागृत करने व वाह्य प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष परिस्थितियों को समझने की क्षमता का विकास करें।
आज हम अपने बच्चों को सुविधा सम्पन्न विद्यालयों में अध्ययन हेतु भेजते हैं तो क्या हम इस बात का अध्ययन करते हैं कि हमें अपने बच्चे में कौन सा गुण विकसित करना है? वहां भेजकर बच्चे में कौन गुण विकसित होगा? वह किस विचारधारा से पोषित होकर आयेगा। हम जिस विद्यालय में हम पढ़ाते हैं उस विद्यालय में पढ़ाये जाने वाले विषयवस्तु का स्वयं अध्ययन करते हुए उस विद्यालय के शिक्षकों का उस विषयवस्तु पर क्या दृष्टिकोण है उसकी जानकारी हासिल करते हैं। शायद नहीं करते! हम सिर्फ दूसरे के बच्चे को देखते हैं, जो अपने माता-पिता व अपने संज्ञानात्मक चिंतन मनन के कारण सफल हुआ। और हम उसकी सफलता को देखकर यह मान लेते हैं कि अमुक विद्यालय बहुत अच्छा है, वहां सब सुख सुविधा है, हमें चाहे दस हजार रुपए महीने फीस क्यों न देनी पड़े पढ़ायेंगे हम उसी विद्यालय में जहां पढ़कर पड़ोसी का बच्चा सफल हुआ है। जबकि मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि आज हमें जो शिक्षा दी जा रही है वह मनुष्य को उपकरण बनाने व संसाधन बनाने वाली थी जा रही है। व्यक्ति को आत्मनिर्भर व स्वाभिमानी बनाने वाली कदापि नहीं है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि शिक्षा के माध्यम से ही शिक्षा के प्रति आपका दृष्टिकोण बदल दिया गया।
स्वामी संबोधि आनंद