Thursday, 2 November 2017

बहुजन आंदोलन की असफलता का कारण

*🌸🌸बहुजन समाज और उसकी असफलता का कारण🌹🌹*
*बहुजन समाज के लोग अक्सर अपने आन्दोलन को विरोधात्मक स्थिति में रखते है। इस विरोधी स्वरों के कारण वह व्यक्ति या समूह सदैव सतर्क रहता है जिसके विरोध में हम आन्दोलन कर रहे होते। जिसका नतीजा यह होता है कि बहुजनों के विरोधी सदैव एक मत और एक जुट ही नहीं रहते बल्कि वह इस फिराक में रहते हैं कि बहुजनों की कमजोर कड़ी कौन है जिससे मधुर संबंध बनाकर उसे बहुजन विरोध में लगाया जा सके और वो ऐसा करने में सफल रहते हैं। मैं अपनी बात को नीचे उदाहरण से और बेहतर तरीके से समझाने की कोशिश कर रहा हूं*

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मान लो कोई नदी किसी निश्चित दिशा में बह रही है। हम उसके बहाव की दिशा को जब रोकने की कोशिश करते हैं तो हमारा सारा प्रयास नदी की धारा को बांधने में रहता। जैसे ही हम नदी की धारा को बांधने में सफल हो जाते हैं तो हमें अत्यंत खुशी होती है। जबकि हम भूल जाते हैं कि हमने नदी का बहाव रोका है न कि दिशा बदली है। साथ ही नदी के बहाव में ठहराव हो जाता है जो कि बिल्कुल ही अल्पकालिक होता है। जैसे जैसे पानी का बहाव हमारे द्वारा बांधे गए बांध की ओर बढ़ता है वैसे वैसे बांध की सीमा को पार कर नदी का बहाव थोड़ा अपनी निर्धारित दिशा में प्रारम्भ हो जाता है। और देखते फिर से पानी उसी दिशा में बहने लगता है जिस दिशा में पूर्व में बह रहा होता है। क्योंकि नदी का स्वभाव बहना है। यदि हम उसे  बांधने का प्रयास करेंगे तो कुछ समय तक बहाव भले ही रूक जाये परन्तु वह या तो हमारे बांध को तोड़ कर अपनी दिशा में बहने लगेगा या बांध के आस पास से नयी धारा बना कर बहने लगेगा और कुछ दूर बहने के बाद पुनः उसी धारा में शामिल हो जायेगा। इसका दोष नदी का नहीं बांध बनाने वाले को देना चाहिए, क्योंकि जब उसे पता था कि नदी का स्वभाव बहना है तो वह किसी न किसी दिशा में अवश्य बहेगी। तो उसे रोकने से पहले दूसरी धारा उस दिशा में बना लेना चाहिए था जिस दिशा में नदी को ले जाना चाहते हैं। जबकि हमने ऐसा न कर केवल बांध बना दिया और समझ लिया कि हमने नदी की दिशा मोड़ दिया। जोकि हमारा भ्रम है। हमें बांध बनाने से पहले जमीन खोदकर नदी बनाना चाहिए जिसमें पानी आये या न आये। और जब हम निर्धारित दिशा में नदी बना लें तब बांध बनाने का प्रयास करना चाहिए जिससे पानी में कुछ ठहराव के बाद पानी उस धारा की ओर मुड़ जाये जिस दिशा में हमने नदी खोदी है। 

ठीक नदी की तरह इस समाज का बहाव होता है जो निरन्तर अग्रसर रहता है। जबकि हम उसे भूतकाल की ओर खींचने या रोकने का प्रयास करते हैं। समाज को रोकने का सीधा मतलब ठहराव है। और कोई भी ठहराव अनंत काल तक नहीं रखा जा सकता। इसी ठहराव का नतीजा है कि समाज कुछ समय तक तो नयी व्यवस्था का इंतजार करता है जब उसे बहने की समुचित दिशा नहीं दिखाई देती तो वह पुनः अपनी दिशा में बहने लगता है। जबकि हमें सबसे पहले अनन्त सीमा में बहने वाली व्यवस्था ( राह) बनाये। या हम नदी ( समाज) की दिशा को रोकने का नहीं मोड़ने का प्रयास करें। सवर्ण कभी भी समाज के बहाव को रोकने में वक्त व संसाधन, श्रम,जाया नहीं करता बल्कि आगे से आगे व्यवस्था ( बहाव की दिशा) बनाता है जिसमें समाज को बहाना होता है। 

हो सकता है मेरे उक्त लेख से बहुजन समाज के नेतृत्वकर्ता सहमत न हों, या उनके समझ में न आया हो तो इसको स्पष्ट करने लिए मैं सदैव तैयार हूं। 

शैलेन्द्र कुमार बौद्ध कानपुर नगर
 9455615564/ 8896561604

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