अपना कार्य, अपने बुद्धि, विवेक व परिस्थितियों के अनुसार करना ही बुद्ध का संदेश है।
इस आधार पर जो व्यक्ति बुद्धिमान हैं, वह बौद्धिष्ट है।
बोधिसत्व बुद्ध कहते हैं कि दुख है तो दुख का कारण, कारण है तो निवारण है।
समस्या यह नहीं है कि विरोधी चालाक व धूर्त है। समस्या यह है कि यह हम जानते हुए भी उसके बहकावे में आ जाते हैं।
मान लो आप किसी रोग से पीड़ित हैं जिसका इलाज के लिए दवा आप स्वयं न कर किसी दूसरे से अपेक्षा करते हैं कि वह दवा खा ले, जो कि संभव नहीं। अगर मान लो कि दूसरे ने दवा खा भी ली तो उससे आपका इलाज कैसे होगा। अगर अपना इलाज करना है तो दवा आप ही को लेनी पड़ेगी।
एक अन्य तथ्य
जब बाबा साहब अंबेडकर का समय था तब लोगों को टी बी, प्लेग, भुखमरी, छुआछूत,जैसी समस्याएं थीं, तब उन्होंने समाज में व्याप्त उन बीमारियों का इलाज किया आज बीमारियां बदल चुकी है, एड्स, कैंसर, कूटनीति चालाकी, बेरोजगारी, शिक्षा का बाजारीकरण, निजीकरण वैश्वीकरण, मशीनीकरण उदारीकरण, डिजिटलीकरण जैसी समस्याएं खड़ी हो कर दी गयी है, तो मैं जानता चाहता हूं कि इनके इलाज के लिए बाबा साहब की टी बी, छुआछूत, भुखमरी की कौन सी दवा काम करेगी?
तीसरा तथ्य जब कांसीराम ने अपना मिशन चलाया उस समय बाबा साहब अंबेडकर को व उनके कार्यों को कोई नहीं जानता था, इस लिए यह आवश्यक था कि जगह जगह अम्बेदकर जयन्ती मनाने का कार्यक्रम चलाया गया। लेकिन आज की समस्या यह नहीं है कि भारत का हर नागरिक बाबा साहब अंबेडकर को व उनके योगदान को न जानते हों?
हमें अपना संघर्ष व कार्य उन क्षेत्रों में करना होगा जो आज के लिए जरूरी है। यहीं पर हमें बुद्ध के उस उपदेश की जरूरत पड़ती है जिसमें वे कहते हैं कि दुख है तो दुख का कारण है कारण खोजें बिना यदि हम कार्य करते हैं तो हमें सफलता नहीं मिलेगी। दुख के कारण को समझ लिया तो निवारण निश्चित हो जायेगा। जिसे बहुजन समझना नहीं चाहता और जिसने समझ लिया उसका दुख दूर हो गया।
इस आधार पर जो व्यक्ति बुद्धिमान हैं, वह बौद्धिष्ट है।
बोधिसत्व बुद्ध कहते हैं कि दुख है तो दुख का कारण, कारण है तो निवारण है।
समस्या यह नहीं है कि विरोधी चालाक व धूर्त है। समस्या यह है कि यह हम जानते हुए भी उसके बहकावे में आ जाते हैं।
मान लो आप किसी रोग से पीड़ित हैं जिसका इलाज के लिए दवा आप स्वयं न कर किसी दूसरे से अपेक्षा करते हैं कि वह दवा खा ले, जो कि संभव नहीं। अगर मान लो कि दूसरे ने दवा खा भी ली तो उससे आपका इलाज कैसे होगा। अगर अपना इलाज करना है तो दवा आप ही को लेनी पड़ेगी।
एक अन्य तथ्य
जब बाबा साहब अंबेडकर का समय था तब लोगों को टी बी, प्लेग, भुखमरी, छुआछूत,जैसी समस्याएं थीं, तब उन्होंने समाज में व्याप्त उन बीमारियों का इलाज किया आज बीमारियां बदल चुकी है, एड्स, कैंसर, कूटनीति चालाकी, बेरोजगारी, शिक्षा का बाजारीकरण, निजीकरण वैश्वीकरण, मशीनीकरण उदारीकरण, डिजिटलीकरण जैसी समस्याएं खड़ी हो कर दी गयी है, तो मैं जानता चाहता हूं कि इनके इलाज के लिए बाबा साहब की टी बी, छुआछूत, भुखमरी की कौन सी दवा काम करेगी?
तीसरा तथ्य जब कांसीराम ने अपना मिशन चलाया उस समय बाबा साहब अंबेडकर को व उनके कार्यों को कोई नहीं जानता था, इस लिए यह आवश्यक था कि जगह जगह अम्बेदकर जयन्ती मनाने का कार्यक्रम चलाया गया। लेकिन आज की समस्या यह नहीं है कि भारत का हर नागरिक बाबा साहब अंबेडकर को व उनके योगदान को न जानते हों?
हमें अपना संघर्ष व कार्य उन क्षेत्रों में करना होगा जो आज के लिए जरूरी है। यहीं पर हमें बुद्ध के उस उपदेश की जरूरत पड़ती है जिसमें वे कहते हैं कि दुख है तो दुख का कारण है कारण खोजें बिना यदि हम कार्य करते हैं तो हमें सफलता नहीं मिलेगी। दुख के कारण को समझ लिया तो निवारण निश्चित हो जायेगा। जिसे बहुजन समझना नहीं चाहता और जिसने समझ लिया उसका दुख दूर हो गया।
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