Thursday, 30 November 2017

बेरोजगार से रोजगार मिलते ही

हमारे पढ़ें लिखे, शिक्षित व नौकरी पेशा लोग, जो खुद गरीबी के दलदल से निकल कर आये हुए होंगे, इनमें से कुछ भाग्यवान होंगे जिन्होंने खुद गरीबी एहसास नहीं की होगी।

अगर इन गरीब मजदूर समाज के लोग भी नौकरी पेशा पाकर उसी तरह वैभवपूर्ण, भरपूर दान दहेज मांगकर या अपने जैसी नौकरी पेशा से विवाह करने को लालायित रहते हैं। क्या कभी इन नौकरी पेशा वाले लोगों ने इस पर ध्यान दिया कि वे भी सवर्णों की तरह पूंजीवाद के समर्थक और धनलोलुपता के चक्कर में यह भी भूल जाते हैं कि जब वे बेरोजगार थे तब कोई नौकरी पेशे वाले व्यक्ति ने अपनी कन्या का प्रस्ताव लेकर कर गया? शायद उत्तर न ही हो! उस समय उनके जीवन साथी के रूप में कोई धनाढ्य व्यक्ति अपनी लड़की को आपके पहलू में देने को तैयार नहीं था, जबकि वह इस हैसियत में था कि वह आपको कोई न कोई रोजगार करा कर अपनी लड़की को आपके पहलू पर दे सकता था। परन्तु उसने बेरोजगार हुनरमंद नवजवान के घर एक गिलास पानी पीना भी गंवारा नहीं समझा। जैसे ही गरीब मजदूर के बेटे की नौकरी लगी वैसे ही धनाढ्य व्यक्ति अपनी लड़की का रिश्ता लेकर मंडराने लगते हैं। क्या हमारे नव रोजगार प्राप्त गरीब नवजवान अपने उस अपमान को भूल गये जो चन्द सिक्कों के लालच में आकर उस व्यक्ति की लड़की को अपना जीवन साथी बनाने को तैयार हो जाते हैं जो आपके दरवाजे पर दस्तक देना तो दूर पास से निकलना गुनाह समझता था।
क्या आप भूल जाते हैं कि जो व्यक्ति अपनी लड़की के विवाह में लाखों खर्च कर करता है और भारी भरकम दहेज के खरीदकर बनियों को मजबूत करता है और आपसे कहता है कि सवर्ण बहुत बुरे होते हैं, इनसे दूरी बना कर रखो। यह व्यक्ति दान दहेज में किये  गये खर्च को  बचा कर आपको रोजगार की व्यवस्था कर सकता था पर उसने ऐसा नहीं किया। जैसे ही उसकी लड़की आपके घर आती तो सबसे पहले आपको आपके परिवार से अलग करने का षणयंत्र करती है और बेबस अपने जन्मदाताओं को तिरस्कृत करने को मजबूर होते हैं।
अगर किसी को कष्ट हुआ हो तो क्षमा करें
शैलेन्द्र कुमार बौद्ध ।कानपुर नगर

Thursday, 2 November 2017

बहुजन आंदोलन की असफलता का कारण

*🌸🌸बहुजन समाज और उसकी असफलता का कारण🌹🌹*
*बहुजन समाज के लोग अक्सर अपने आन्दोलन को विरोधात्मक स्थिति में रखते है। इस विरोधी स्वरों के कारण वह व्यक्ति या समूह सदैव सतर्क रहता है जिसके विरोध में हम आन्दोलन कर रहे होते। जिसका नतीजा यह होता है कि बहुजनों के विरोधी सदैव एक मत और एक जुट ही नहीं रहते बल्कि वह इस फिराक में रहते हैं कि बहुजनों की कमजोर कड़ी कौन है जिससे मधुर संबंध बनाकर उसे बहुजन विरोध में लगाया जा सके और वो ऐसा करने में सफल रहते हैं। मैं अपनी बात को नीचे उदाहरण से और बेहतर तरीके से समझाने की कोशिश कर रहा हूं*

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मान लो कोई नदी किसी निश्चित दिशा में बह रही है। हम उसके बहाव की दिशा को जब रोकने की कोशिश करते हैं तो हमारा सारा प्रयास नदी की धारा को बांधने में रहता। जैसे ही हम नदी की धारा को बांधने में सफल हो जाते हैं तो हमें अत्यंत खुशी होती है। जबकि हम भूल जाते हैं कि हमने नदी का बहाव रोका है न कि दिशा बदली है। साथ ही नदी के बहाव में ठहराव हो जाता है जो कि बिल्कुल ही अल्पकालिक होता है। जैसे जैसे पानी का बहाव हमारे द्वारा बांधे गए बांध की ओर बढ़ता है वैसे वैसे बांध की सीमा को पार कर नदी का बहाव थोड़ा अपनी निर्धारित दिशा में प्रारम्भ हो जाता है। और देखते फिर से पानी उसी दिशा में बहने लगता है जिस दिशा में पूर्व में बह रहा होता है। क्योंकि नदी का स्वभाव बहना है। यदि हम उसे  बांधने का प्रयास करेंगे तो कुछ समय तक बहाव भले ही रूक जाये परन्तु वह या तो हमारे बांध को तोड़ कर अपनी दिशा में बहने लगेगा या बांध के आस पास से नयी धारा बना कर बहने लगेगा और कुछ दूर बहने के बाद पुनः उसी धारा में शामिल हो जायेगा। इसका दोष नदी का नहीं बांध बनाने वाले को देना चाहिए, क्योंकि जब उसे पता था कि नदी का स्वभाव बहना है तो वह किसी न किसी दिशा में अवश्य बहेगी। तो उसे रोकने से पहले दूसरी धारा उस दिशा में बना लेना चाहिए था जिस दिशा में नदी को ले जाना चाहते हैं। जबकि हमने ऐसा न कर केवल बांध बना दिया और समझ लिया कि हमने नदी की दिशा मोड़ दिया। जोकि हमारा भ्रम है। हमें बांध बनाने से पहले जमीन खोदकर नदी बनाना चाहिए जिसमें पानी आये या न आये। और जब हम निर्धारित दिशा में नदी बना लें तब बांध बनाने का प्रयास करना चाहिए जिससे पानी में कुछ ठहराव के बाद पानी उस धारा की ओर मुड़ जाये जिस दिशा में हमने नदी खोदी है। 

ठीक नदी की तरह इस समाज का बहाव होता है जो निरन्तर अग्रसर रहता है। जबकि हम उसे भूतकाल की ओर खींचने या रोकने का प्रयास करते हैं। समाज को रोकने का सीधा मतलब ठहराव है। और कोई भी ठहराव अनंत काल तक नहीं रखा जा सकता। इसी ठहराव का नतीजा है कि समाज कुछ समय तक तो नयी व्यवस्था का इंतजार करता है जब उसे बहने की समुचित दिशा नहीं दिखाई देती तो वह पुनः अपनी दिशा में बहने लगता है। जबकि हमें सबसे पहले अनन्त सीमा में बहने वाली व्यवस्था ( राह) बनाये। या हम नदी ( समाज) की दिशा को रोकने का नहीं मोड़ने का प्रयास करें। सवर्ण कभी भी समाज के बहाव को रोकने में वक्त व संसाधन, श्रम,जाया नहीं करता बल्कि आगे से आगे व्यवस्था ( बहाव की दिशा) बनाता है जिसमें समाज को बहाना होता है। 

हो सकता है मेरे उक्त लेख से बहुजन समाज के नेतृत्वकर्ता सहमत न हों, या उनके समझ में न आया हो तो इसको स्पष्ट करने लिए मैं सदैव तैयार हूं। 

शैलेन्द्र कुमार बौद्ध कानपुर नगर
 9455615564/ 8896561604