Monday, 11 November 2024

शरीर साध्य नहीं; साधन है।

अक्सर हम किसी भी व्यक्ति के कार्य को देखकर उसकी प्रसंशा, या आलोचना करते हैं। लेकिन क्या इस बात पर कभी विचार किया है कि जिस शरीर को देखकर हम प्रशंसा या आलोचना कर रहे हैं। वह कर्ता नहीं साधन है।कर्ता तो कोई और है, जो हमें कहीं नजर नहीं आता है। कौन है जो हमारे शरीर को कार्य करने का निर्देश देता है? सामान्यत: यही बता दिया जाता है कि मस्तिष्क है जो शरीर को निर्देशित करता है।‌लेकिन मामला मस्तिष्क तक ही नहीं सीमित है। कुछ और भी है जो इसमें अपनी भूमिका निभाता है। 

                    

Saturday, 2 November 2024

शुभकामनाएं और उनकी बाइब्रेशन

          भारत त्योहारों का देश है। इन त्योहारों के माध्यम से हम अपने आसपास रहने वाले पड़ोसियों, मित्रों,‌ नाते रिश्तेदारों, पशु-पक्षियों,  पेड़-पौधों  प्रकृति के सारे अस्तित्व के प्रति आभार व्यक्त करते हैं। त्योहारों में बनाए गये छोटे छोटे अनुष्ठान यह हमारी अनुभूतियों को व्यक्त करने का प्रयास है। मानवीय स्वभाव के अनुसार हम अपनी अनुभूतियों को बताने के लिए विभिन्न तरीके अपनाते हैं। हालांकि अपनी अनुभूतियों का हस्तांतरण नहीं किया जा सकता फिर भी उन अनुभूतियों को व्यक्त करने के लिए कुछ न कुछ उपाय करते हैं। इसी प्रयास में हम अपनी अनुभूतियों की बाइड्रेशन भेजते हैं। जहां तक मैं महसूस कर सका हूं का पशु पक्षी, पेड़ पौधे भी अपनी अनुभूतियों की बाइब्रेशन भेजते हैं। उनका अपना तरीका है हम मानव का अपना। 
         इस बाइब्रेशन का प्रभाव इतने शक्तिशाली होते हैं कि यह हमारा शुभ और अशुभ दोनों कर सकते हैं। अक्सर हम त्योहारों में, किसी के जन्म दिन पर, किसी की सफलता पर शुभकामनाएं व बधाई संदेश भेजते रहते हैं। इन संदेशों के साथ हम अपनी बाइब्रेशन भी भेजते हैं। अगर यह बाइब्रेशन किसी को फोकस करके भेजी जाती है तो इसके चमत्कारिक लाभ होते है; अगर आपने बिना फोकस किए इस बाइब्रेशन को भेज दिया तो समझ लो कि आप स्वयं इसके घातक परिणामों के शिकार हो गये। इस बाइब्रेशन को ब्रम्हास्त्र समझो, अगर इसे अपना लक्ष्य भेदने को नहीं मिला तो यह भेजने वाले के लिए ही नुकसानदायक होगा। पश्चिमी सभ्यता और आधुनिक उपकरणों और सोसल मीडिया के प्रभाव में आकर हम भारतीय भी शुभकामना और बधाई संदेश भेजने की औपचारिकता करते हैं। लेकिन हम कभी यह नहीं सोचते हैं कि आखिर शुभकामनाओं और बधाई संदेशों के माध्यम से जो भी बाइब्रेशन भेजते हैं उसे ग्रहण कौन कर रहा है? अगर भेजी गई बाइब्रेशन को किसी ने नहीं स्वीकार किया तो वह वापस आकर भेजने वाले के लिए कितनी घातक सिद्ध होगी इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है। आज सोसल मीडिया के जमाने में लोगों का दायरा बढ़ना चाहिए, लोगों के सामाजिक सम्बन्ध मजबूत होने चाहिए। लेकिन परिणाम तो विपरीत आ रहे हैं। उसका अध्यात्मिक कारण सिर्फ इतना है कि हम ग्रुपों में जो भी बधाई व शुभकामनाएं संदेश भेजते हैं उन संदेशों के साथ भेजी गई बाइब्रेशन की दिशा लक्षित नहीं होती। बिना लक्ष्य दिये भेजी गई बाइब्रेशन भेजने वाले के लिए ही घातक होती है। 
      हालांकि मैं भी इन सबको को न जानता था न कभी मानता था लेकिन अपनी ध्यान साधना के दौरान इस बाइब्रेशन की अनुभूति की। तब से मैंने भी जाना और माना कि बाइब्रेशन इतनी शक्तिशाली और ताकतवर होती है कि यह कुछ भी परिणाम ला सकती है। इसी बाइब्रेशन के कारण हम एक- दूसरे की ओर आकर्षित होते। समूहों में भेजे गये अनेकों शुभकामना व बधाई संदेशों को लेकर अक्सर मैं कमेंट करता रहता हूं। बहुत से लोग इसे कटाक्ष समझ लेते हैं। लेकिन शायद ही यह बात लोगों को पता चलती हो कि मेरा कटाक्ष करते ही भेजने वाले का ध्यान मेरी ओर आ जाता है और उसके द्वारा भेजी गई बाइब्रेशन का लक्ष्य मैं बन जाता हूं। भेजने वाला भले नकारात्मक समझ रहा हों लेकिन उसके द्वारा भेजी गई बाइब्रेशन के परिणाम मुझे मिल जाते हैं। सामान्यतया मैं अवलोकन किया है कि समूह में भेजे गये शुभकामना संदेशों पर लोग ध्यान नहीं देते। जिससे भेजने वाले को ही इस बाइब्रेशन के दुष्परिणामों को झेलना पड़ता है। मैं इस हाइड्रेशन की शक्ति और परिणामों की अनुभूति कर चुका हूं इसलिए भेजने वाले पर कटाक्ष कर देता हूं ताकि उसके द्वारा भेजी गई बाइब्रेशन के घातक परिणामों का वह स्वयं शिकार न हो जाये।‌क्योकि बाइब्रेशन भेजने वाले के लिए विपरीत सिद्ध होती है। 
      एक लकड़हारा एक वृक्ष को काटने से पहले कितनी ही पूजा पाठ क्यों न कर ले, लेकिन वृक्ष उसकी बाइब्रेशन को महसूस कर लेते हैं। वहीं एक माली किसी भी वृक्ष को कितना ही काटे - छांटें  वृक्ष उसकी भी बाइब्रेशन को महसूस कर लेते हैं। आप एक लकड़हारा को गौर से देखें वह कितना ही धनवान क्यों न लेकिन चेहरे में रौनक, चमक और ताजगी जरा सी भी नजर नहीं आती। वहीं एक माली कितना ही गरीब क्यों न हो उसके चेहरे में रौनक, ताजगी और चमक स्पष्ट नजर आएंगी।‌ ठीक यही परिणाम आप एक डाक्टर और कसाई में देख सकते हैं। यह सारा खेल बाइव्रेशन का है। एक संत कितना ही कटु क्यों न बोलता हो लेकिन उसकी बाइब्रेशन लाभकारी ही होती है। जबकि एक शैतान कितना ही मधुर क्यों न बोल रहा हो, लेकिन उसकी कुटिलता कालान्तर में महसूस हो ही जाती है। यह सब उनकी बाइब्रेशन है। यही बात भोजन बनाते समय एक मां जिस बाइब्रेशन से बनाती उसके परिणाम और एक होटल में बने भोजन के बाइब्रेशन में भी आप अंतर देख सकते हैं। जैसा हम भाव रखते हैं वैसी ही बाइव्रेशन प्रवाहित होती है। जिसे छिपाने के लिए हम कितने ही प्रयास कर लें पर वह छिपती नहीं है न ही रुकती है।
  सबका का कल्याण हो।
स्वामी संबोधि आनंद। 

Thursday, 24 October 2024

सकारात्मक और नकारात्मक ऊर्जा मिलकर हमें संचालित करती है।

Not to be positive, not to be negative but be sensitive.

*नकारात्मक ऊर्जा;  सकारात्मक ऊर्जा एक दूसरे के विरोधी नहीं बल्कि पूरक  हैं। इन दोनों के प्रभाव के कारण ही इस संसार में संवेदनशीलता और संतुलन कायम है।* संवेदनशीलता और संतुलन की स्थिति में संचलन सम्भव है। 


      हमारे जीवन में अक्सर अनेकों बार ऐसे पहलू आते हैं कि हम कोई भी सकारात्मक कार्य;  नकारात्मक सोच के कारण ही कर पाते है।  सकारात्मक और नकारात्मक दोनो तरह के विचार हमारे संतुलित जीवन के लिए आवश्यक है। जहां सकारात्मक विचार हमें किसी कार्य को करने के लिए प्रेरित करते हैं, वहीं नकारात्मक विचार अतिवाद के लिए अवरोधक की तरह काम करते हैं। नकारात्मक विचार या सोच हमारे लिए बाधक नहीं है, बल्कि हमे सुरक्षित और संतुलित रहने में सहयोगी है। हमारा यह सोचना कि सकारात्मक विचार या सोच  से हम संतुलित जीवन जी सकते हैं तो यह हमारी महाभूल है। दोनों की अपनी उपयोगिता है। भय, क्रोध,घृणा, हिंसा व लालच निसंदेह नकारत्मक एनर्जी से ओतप्रोत है।लेकिन इन्हें के प्रभाव के कारण ही हम शांत, अहिंसक, वात्सल्य, प्रेम, दया, करुणा, निडर, रूपी सकारात्मक ऊर्जा के प्रभाव में आते हैं। स्थूल रूप से देखें तो सकारात्मक और नकारत्मक ऊर्जा एक दूसरे के विपरीत खड़ी दिखाई देती है। लेकिन सूक्ष्म रूप में दोनों ही ऊर्जाएं एक दूसरे की पूरकता के रूप में कार्य करती है।
        विश्व का कोई भी व्यक्ति अपनी सुरक्षा के इंतजाम नकारत्मक ऊर्जा के प्रभाव के कारण ही करता है। कोई भी व्यक्ति अपराध करने से इसलिए नहीं बचता कि उसे सकारात्मक ऊर्जा प्रेरित करती है कि आपको अपराध नहीं करना बल्कि सूक्ष्म में देख तो पाएगे कि हम नकारात्मकता के परिणामों को सोच कर सुरक्षा के इंतजाम करते हैं। अपराध से बचते हैं। हम किसी भी गाड़ी को चलाते समय अपनी गति को इसलिए नियंत्रित करने की व्यवस्था नहीं करते कि हम गति में अवरोध चाहते हैं बल्कि इसलिए गति अवरोधक यंत्र ( नकारात्मकता ) लगाते हैं कि गति ( सकारात्मकता) के कारण दुर्घटना से बच सके। नकारात्मकता और सकारात्मकता में मुझे चोली -दामन का साथ नजर आता है। पता नहीं क्यों लोग ऊर्जा के किसी एक पहलू को देखकर  दूसरे पहलू को नजरंदाज करते हैं। Be positive का नारा लगाकर दुर्घटना के शिकार होते रहते हैं।  Not be positive, not be negative  but be sensitive के भाव को रखना  संतुलित जीवन का आधार है।

Thursday, 8 August 2024

*।।वर्तमान शिक्षा व्यवस्था के घातक परिणाम।।*

*वर्तमान शिक्षा व्यवस्था के घातक परिणाम*

मानव निर्मित व्यवस्था का प्रतिफल सदैव आत्मीय और स्नेहिल नहीं होता। समय और परिस्थितियों के अनुसार जहां इसके आत्मीय और स्नेहिल रूप भी देखने को मिलते हैं,तो वहीं क्रूरतम और अमानवीय रूप भी देखने को मिलते हैं। जीवन में भी सदैव दो पहलुओं के मध्य, पेण्डुलम की तरह, इधर से उधर डिगंडांग करता रहता है। जीवन में कभी सापेक्ष परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है तो कभी आपेक्ष,तो कभी निरपेक्ष। हम शिक्षकों व अभिभावको का यह दायित्व है कि एक बच्चे को शिक्षा इस प्रकार दे कि वह अपने जीवन की सापेक्ष और आपेक्ष परिस्थितियों के साथ समायोजन कर उनके अनुसार जीवन जीने की कला सीख सकें। बच्चे के प्रति सदैव आत्मीय और स्नेहिल रहने से वे जीवन की वास्तविक परिस्थितियों का आकलन करने में अक्षम हो जाते हैं। अगर बच्चे के प्रति सदैव कठोर और रुग्ण रहा जाए तो बच्चे के  विद्रोही होने के अवसर बढ़ जाते है। वही जो बच्चा सदैव आत्मीय और स्नेहिल परिस्थितियों में पला-वसा हुआ हो, वह  90% अवसरों पर विपरीत परिस्थातियों से बचेगा। अगर वह विपरीत परिस्थितियों से नहीं बच सका तो वह उन परिस्थितियों में टूट जाएगा और निराश होकर स्वयं का नुक़सान करने के लिए प्रेरित हो जाता है। वह प्रतिक्षण संघर्ष और समस्याओं का सामना करने से बचेगा। आजकल विद्यालयों में कुछ इसी तरह की शिक्षा दी जा रही है कि बच्चा किताबी, तकनीकि, तार्किक, वैज्ञानिक शिक्षा में भले महारत हासिल कर रहे हो। लेकिन जीवन के दायित्वों, परिस्थितियों और समस्याओं का सामने करने में अक्षम दिखेंगे। अक्सर विपरीत परिस्थिति आते ही बच्चे आक्रामक हो जाते हैं। अगर वे अपनी आक्रामकता में सफल नहीं होते तो वे या तो तनावग्रस्त और अवसादग्रस्त होकर आत्महत्या के लिए प्रेरित हो जाते हैं। 
       हालांकि इसमें बच्चे का कोई दोष नहीं है। हम बच्चे को जैसा बनाना चाहते हैं। वह स्वयं को परिस्थितियोंवश उसी तरह डालने का प्रयास करता है। जबकि वह  मूलत: वैसा है नहीं।  बच्चा खुद को ढालते -ढालते इतना ऊब जाता है कि सक्षम स्थिति में आते ही उसका विद्रोह प्रकट होने लगता हैं। जो उसने अपने जीवन में पूर्व से दबा रखा है। वास्तव में न हम, न बच्चा यह समझ पा रहे हैं कि आखिर जीवन का उद्देश्य क्या है? क्या मात्र धनाढ्य या वैभवशाली हो जाना जीवन का उद्देश्य है? या और कुछ ?
          हम सदैव इस सोच के साथ बच्चे को दूसरे के हवाले कर दे कि उसके जीवन को संभालने की जिम्मेदारी, उसे शिक्षित करने की जिम्मेदारी, उसे रोटी रोजगार देने की जिम्मेदारी, उसे योग्य बनाने की जिम्मेदारी किसी और की है। हमारा कार्य तो रातों दिन धनार्जन कर बच्चे के लिए वैभव एकत्र करना, बच्चे की हर आवश्यकताओं की पूर्ति करना है। एक अभिभावक या माता-पिता के रूप में हम इतना ही सोच रहे हैं तो नि:संदेह हम अपने बच्चे से जरा सा भी प्रेम नहीं करते। हम यह चाहते ही नहीं है कि हमारा बच्चा जीवन की विभिन्न परिस्थितियों का सामना करने योग्य बन सके। इसलिए मेरा मानना है कि हमें अपने बच्चे की शिक्षा दीक्षा के बारे में पुन: मूल्यांकन करने की आवश्यकता है। हमें बच्चे को अच्छे-बुरे, सम-विषम परिस्थितियों में जीवन जीने की कला में पारंगत करना होगा।तभी एक बच्चा अपना संतुलित जीवन जी सकेगा।