Tuesday, 3 November 2020

यात्रा संस्मरण बौद्ध तीर्थ स्थल।

यात्राएं सामाजिक, राजनीति‌ और भौगोलिक जानकारी के साथ-साथ ऐतिहासिक व धार्मिक जानकारी का एक प्रमुख माध्यम है। किसी स्थान की यात्रा के दौरान हमें प्रत्यक्ष रूप से उस स्थान के भौगोलिक, सामाजिक, आर्थिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, धार्मिक जीवन का अनुभव करने के साथ-साथ वहां की वास्तुकला, स्थापत्यकला और रहन-सहन का सूक्ष्म अध्ययन करने अवसर मिलता है। यात्राएं उस समय और महत्वपूर्ण व उपयोगी हो जाती है जब हमें किसी विद्वान और पारखी नजर रखने वाले व्यक्ति के साथ यात्रा करने का अवसर मिले। 
       ऐसा ही एक अवसर मुझे कानपुर के प्रकाण्ड विद्वान, वैज्ञानिक और आध्यात्मिक गुरू डा० विनोद कुमार ( डा० बोधी आनंद) के सानिध्य में मिला। डा० विनोद कुमार के साथ बौद्ध तीर्थस्थलों की यात्रा  करने पर विचार सालों से हो रहा था।  कई बार योजना बनी परन्तु कतिपय कारणों से यात्रा की तिथि निश्चित नहीं हो पाई। आखिर 23 अक्टूबर 2020 को महीने में कई बार अनुरोध करने के पश्चात मुझे डाक्टर विनोद जी और अरुण कानपुरी व उनके परिवार के साथ श्रावस्ती, कपिलवस्तु और कुशीनगर की यात्रा करने का शुभ अवसर मिला। 23 अक्टूबर 2020  सायं को हम सभी लोग श्रावस्ती की पावन भूमि पहुंच गये, वहां हमें श्रद्धेय अशोक भन्ते के आवास में ठहरने का अवसर मिला। 24 अक्टूबर 2020 को हम सभी लोगों को बुद्ध की कर्मस्थली श्रावस्वती के जेतवन में जाने का अवसर मिला। जेतवन की पावन धरती पर पैर रखते ही कुछ ऐसी अनुभूति हुई, जैसे शरीर में अजीब सी ऊर्जा का प्रवाह हुआ, शरीर में गजब का आध्यात्मिक भावों का उदय हो गया। मन में उठ रहे विकार भाव विलुप्त से हो गए। डाक्टर विनोद जी द्वारा बुद्ध के आध्यात्मिक जीवन और वहां की पावन धरती और ऐतिहासिक खण्डहरों पर जो प्रकाश डाला गया । उससे ऐसा लगा कि श्रावस्ती पर बने जेतवन को अनाथपिंडक ने 18 करोड़ स्वर्ण मुद्राएं देकर (514-513 ई. वर्ष पूर्व में) यूं ही नहीं खरीदकर बुद्ध को दान दिया होगा। डाक्टर साहब ने पहली बार बुद्ध के तेजस व आध्यात्मिक ज्ञान का जिस प्रकार प्रकाश डाला गया उससे पता चला कि बुद्ध के तेजस और ज्ञान के सामने अनाथपिंडक को 18 करोड़ की धनराशि मामूली लगी होगी। 
        डाक्टर साहब द्वारा जेतवन विहार के निर्माण और उसकी स्थापत्यकला का वर्णन और उसके वैज्ञानिक आधार का जो वर्णन किया गया उससे यह पता चला कि जेतवन विहार की स्थापत्य कला में वे सभी नीतियों और रणनीतियां प्रतीक रूप में जेतवन के खण्डहरों में निहित है।जिसे अंग्रेजों ने बखूबी समझा और अध्ययन कर पूरी कायनात को नियंत्रण में रखने की शक्ति प्राप्त की।
     
       श्रावस्ती में वर्गाकार रूप में बने बुद्ध स्तूपों, संघाराम, साधना स्थली के स्थापत्यकला उसमें छिपे गूढ़ संदेशों को स्वामी बोधी आनंद जी द्वारा डिकोड किया गया जोकि पूर्णतया गणितीय और वैज्ञानिक, दार्शनिक तथ्यों पर आधारित वास्तुकला है। नीचे दिए गए वृत्ताकार वास्तुकला के चित्र मात्र ईट पत्थरों से बनी इमारत नहीं है। यह प्रकृति की उस व्यवस्था की प्रतीक भी है जो पूरे संसार को एक निश्चित दिशा और दशा दिए हैं। इसी प्राकृतिक व्यवस्था में प्रत्येक प्राणी का अस्तीत्व बनता और बिगड़ता है। श्रावस्ती रूपी विश्व गुरुत्व स्थल पर बने ये प्रतीक विश्व केन्द्रीय शक्ति को प्रतिबिम्बित करते हैं। नीचे चित्र में दिखाई दे रही पांच स्तूपिकाएं पंचशील और पंचतत्त्वों के प्रतीक हैं।
        24 अक्टूबर 2020 की सन्ध्या की बेला में हम लोग श्रावस्ती से कपिलवस्तु की ओर रवाना हुए। रास्ते में अंधेरा होने के कारण हम लोग शोहरतगढ़ में रात्रि विश्राम किया। यही शोहरत गढ़ में लूनर एनर्जी और उसके प्रभाव के बारे में स्वामी जी द्वारा बताया गया। इसी लूनर एनर्जी का अद्भुत प्रवाह शरदीय और बसंतीय नवरात्रि के दौरान होता है। जिससे प्रकृति में नवनिर्माण की गति तीव्र होती है। यह ऐसा समय होता है जब एक ओर प्रकृति में विनाशलीला चल रही होती है वहीं दूसरी तरफ नवनिर्माण का प्रारम्भ होता है। स्वामी जी की इस बात से एक सिद्धांत भी स्थापित होता है कि 'विनाश के बिना नव निर्माण नहीं हो सकता, अर्थात विनाश ही नवनिर्माण का जनक है।' यदि हम प्रकृति में होने वाले परिवर्तनों को गौर से देखें और समझे तो पाते हैं कि तीनों ऋतुओं सर्दी, गर्मी, और बरसात के मध्य ( सर्दी और गर्मी के मध्य बसंत ऋतु में प्रकृति में विनाश और नवनिर्माण देखने को मिलेगा) गर्मी और बरसात के मध्य प्रकृति में प्रजनन की क्रिया अधिक देखने को मिलेगी। बरसात और शीत ऋतु के मध्य रोपण अधिक देखने को मिलता है। स्वामी जी द्वारा उक्त विनाश और नवनिर्माण का प्रमुख कारण लूनर एनर्जी को बताया गया। इस समय चंद्र की चांदनी बड़ी ही मनभावक लगती है। इसके प्रभाव में आते ही व्यक्ति पशु पक्षियों में वात्सल्य जागृत होता है। यही वात्सल्य विनाश और नवनिर्माण की ओर पशु, पक्षी,और पेड़ पौधों सभी को प्रोत्साहित करता है। इस गूढ़ रहस्य को जानने और समझने का पहली बार अवसर मिला। उससे पहले तो हम भौतिक संसार में खोते हुए इसी को सब कुछ मानते थे। इस दिन हमें यह ज्ञात हुआ कि " पृथ्वी पर दिखाई देने वाले परिवर्तन वास्तव में आकाशीय परिवर्तनों का परिणाम मात्र है।" 
      25 अक्टूबर को हम लोग सुबह कपिलवस्तु पहुंचे। कपिलवस्तु पहुंच कर हम लोग नाश्ता किया। नाश्ता करने के बाद हम लोग बुद्ध-स्थली गनवरिया गये जहां पर बुद्ध के राजमहल के अवशेषों को देखा और सूक्ष्म अवलोकन किया गया। इन खण्डहरो को देखने के बाद स्वामी जी ने इनके महत्व पर गहराई से चर्चा परिचर्चा की, वहां पर बुद्ध की उस बेचैनी का एहसास भी कराया जिस कारण उन्होंने अपना गृह त्याग करने को बाध्य हुए। इस एहसास के बाद यह भी एहसास हुआ कि सिद्धार्थ बृद्ध, रोगी, या शव को देखकर गृह नहीं त्यागा होगा उसके पीछे प्रकृति में चल रहे उथल-पुथल और वैमनस्यता को शांत करने के उपायों की खोज के लिए यही लूनर एनर्जी ने बुद्ध को प्रेरित किया होगा। यह लूनर एनर्जी ही है जो प्रकृति में संतुलन स्थापित करती है। कपिलवस्तु में ही मातृभूमि की उस शक्ति का एहसास कराया जो हमारे दुख दर्दो को दूर करती है। हालांकि हम लोग कपिलवस्तु में अधिक समय तो नहीं रुक सके लेकिन यही पर हमें कुशीनगर के एक भन्ते जी और एक संभ्रांत नागरिक श्यासुन्दर जी से मुलाकात कराई जिन्होंने स्वामी को सुनने के बाद ऐसे मुरीद हुए कि उन्होंने हम लोगों को कुशीनगर चलने का आग्रह किया। आज ही हम लोग कुशीनगर के लिए रवाना हो गये रात में हम लोग कुशीनगर पहुंच गए। जहां पर भन्ते जी और श्यामसुंदर जी ने हम लोगों का भव्य स्वागत और खातिरदारी की। रात में लघु चर्चा परिचर्चा के बाद विश्राम करने लगे। 
        प्रात:: 25  अक्टूबर 2020 को हम लोग कुशीनगर के विभिन्न बौद्ध स्थल देखें। मेरी बदकिश्मती कहे या उदासीनता या लापरवाही यहां पर हम स्वामी को नहीं सुन सके। साथ में गये बच्चो के बीच उलझे रहना तो एक बहाना हो सकता है। 
स्वामी जी के निम्न भाव अपने आपमें उनके बुद्ध होने का प्रमाण है। हालांकि जिसने स्वामी जी को पास से देखा समझा नहीं है वह उन्हें बहुत रुग्ण और अहंकारी समझेगा लेकिन जिसने उनसे पास से देखा समझा वह उन्हें सन्त समझेगा।
     *झरोखा- जिंदगी का।*
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हमारी जीवनशैली हमारे व्यक्तित्व को बहुत ज्यादा प्रभावित करती है। हम जिस प्रकार के समाज मे जीते हैं उसकी अपनी कमियां व अच्छाइयां होती हैं।
जिस प्रकार मछली तालाब में रहकर अन्य जलीय जन्तुओ के आचरण से अछूती नही रह सकती ठीक उसी प्रकार हमारा परिवेश भी हमे हमेशा तराशता रहता है। जो शरीर रक्षा की दृष्टि से जरूरी हो सकता है मगर भवसागर को समझने व उससे पार उतरने व प्रज्ञा के विकास में सबसे बड़ी बाधा भी बना रहता है।

 यही वह सामाजिक अवस्था है जो हमे एक अदृश्य अंधकूप से बाहर नही निकलने देती। हम अक्सर इसी चारदीवारी को मैं के रूप में स्वीकार किये रहते हैं। जबकि यह दीवारें ही हमारी क़ैदगाह का शबूत हैं फिर भी हम इन्ही की रंगाई पुताई करके खुशनुमा महशुस करते आये हैं।
यह चक्र तब तक चलता है जब तक व्यक्ति को कोई सदमा न लगे। 

कुछ इसी तरह का हाल हमारे नजरिये का भी है। हम अक्सर दूसरे व्यक्ति को अपनी बनी बनाई दीवार रुपी धारणाओं की कसौटी पर परखते रहते हैं। ऐसा हर रोज हर क्षण होता रहता है। जाहिर है ऐसी स्थिति में हमारी आंखों में दिखने वाला प्रतिबिंब भले ही हमे बाहर से प्रवेश करता हुआ नजर आये मगर यह प्रतिबिंब होता हमेशा खुद के नजरिये का ही है।

नतीजे में इसी झूंठे प्रतिबिंब को हम सच मान जीवनभर रक्षा करते रहते हैं। तमाम चारदीवारी इसी प्रतिबिंब की रक्षा के लिए ही खड़ी करते हैं।
जैसे एक झरोझे के छेद से देखने पर हमें निश्चित दायरा ही दिखाई देता है। जबकि बहुत बड़ी हकीकत हमारे सामने अनछुई खड़ी रहती है। कुछ इसी प्रकार की अनुभूतियां हमारे जीवन की प्रत्येक हरकत को नियंत्रित करती रहती हैं। अक्सर हम दूसरों के बारे में वही देखना चाहते हैं जो हमने अपने मानसपटल पर सही के रूप में पोत रखा है। इसी मानसपटल पर लिखी इबादतें हमारे बात व्यवहार का आधार बन जाती हैं। यही इबादतें हमारे दोश्त दुश्मन को परिभाषित कर दायरे निर्मित करती हैं।

 यही इबादतें वाद-विवाद के रूप में सामने आती रहती हैं। एक समय ऐसा आता है कि यह इबादतें मात्र सच बाकी सब मिथ्या लगने लगता है। हम इसी इबादतगाह को सुकून जन्नत आदि नामो से नमाजते रहते हैं। अक्सर यह इबादतें हमे सुरक्षा व सुकून भले ही देती हों मगर जिन्दगी का यह बेहद  कमजोर व छोटा सा हिस्सा होती हैं। हम बहुत सूक्ष्म को पकड़कर वृहद को तजे जिन्दगी मुखलिसी में गुजार देते हैं।

 हम दूसरों के बारे में जब अपनी इबादतों के झरोखे से देखते हैं तो अक्सर संसार अपने से भिन्न नजर आता है। यह भिन्नता हमारे अंदर खिन्नता व असंतोष की मां बनती है। ऐसा होने पर हमारी जिंदगी में मैत्री भाव नष्ट हो जाता है। हम प्रत्येक नर नारी जीव जंतु वस्तु स्थान आदि को अपनी ही तराजू में तौलने लगते हैं। यह काम ऐसा नही कि हम सोच समझ कर करते हैं। बल्कि यह काम अपने आप ही चलता रहता है। हम आंख खोलते ही तो तमाम संज्ञाएँ दिखती ही हैं। ऐसे में यह नजरिया तुरंत ऑटो मॉड में अपना काम चालू कर देता है। हम विपरीत लिंग धारी को देखकर खयाल बुनने लगते हैं। हम विज्ञापन देखकर खुद को निकृष्ट समझने लगते हैं।
हम दूसरे को तो देखते हैं मगर हाथी के समान खुद को नही देख सकते। इसी में सारा संसार फसा हुआ है। नतीजा हम असंतोष का शिकार होते हैं। यह असंतोष हमारी जिंदगी में अवसाद का रूप ले लेता है। यह अवसाद से छुटकारा पाने के लिए हम अक्सर अलग अलग नशाओं के चंगुल में फसते जाते हैं। कभी हम खुद के इस अवसाद से मुक्ति पाने के लिए दारू सिगरेट गुटखा तम्बाकू पान आदि का सहारा ले रहे होते हैं। तो कभी हम अपने इस अवसाद से मुक्ति के लिए झगड़ा फसाद में उलझे होते हैं।
तो कभी हम बात विमर्श में एक दूसरे को अपनी शेखी बघारने व बात मनवाने में ही सुकून महशुस करने लगते हैं।
अक्सर यह अवसाद हमारी पहुंच व सामर्थ के अनुसार हमारे घरों में इकट्ठा वस्तुओं के रूप में नजर आता है।
यह अवसाद ही हमारे make अप के रूप में नजर आता है।
तो यही अवसाद हमारी कार घर AC TV कपडे आदि रूप में सामने आ ही जाता है।
जाहिर है अवसाद को ठीक करने में यह सारे उपाय फौरी तौर पर राहत भले ही दें मगर यही छोटे अवसाद को विशाल अवसाद में तब्दील करने के लिए काफी भी हैं। जिनका अंत व्यक्ति के अंत के साथ ही अक्सर होता है। 
जबकि इस सारी समस्या का उपाय बेहद सरल है। हम अगर दूसरोँ को अपनी इबादत रूपी झरोखें से न देखकर स्वतंत्र खुले आकाश के रूप में देखना सीखें।
अगर हम शिशु को निहारते समय उसकी गलतियों पर खुशी महशुस करे। अगर हम जो व्यक्ति जैसा है उसे अपनी कसौटी पर खरा उतारने की बजाय जो जैसा है उसे उसी के स्वरूप में स्वीकारें तो असंतोष को संतोष व अवसाद को शाद में तब्दील किया जा सकता है। जिन्दगी में नए रंग प्रवेश करने से कोई नही रोक सकता। ऐसी अवस्था मे आप देखोगे कि दुनिया बेहद हशीन है। हम खुद ही मातृ भूमि की सुंदरता को कचरा के ढेर पर खड़े होकर देख रहे थे इसीलिए हमे सब तरफ कचरा ही कचरा दिख रहा था।
अगर फिर भी कुछ कचरा दिखता है तो उस पर हँसिये। खुद पर मुस्कराइए। इसी कचरे को देख मन मे खिन्नता भरने की बजाय अवसर देखिए। देखिए कि जिंदगी की किस बाड़ी में कचरे रूपी खाद की जरूरत है। कहाँ हमारा अहंकार उफान मार रहा। कौन सी बाडी में खड़ी फसल इस अहंकार की आग में झुलस रही है। ठीक वहीं। जी हां ठीक वहीं पर इस कचरे को उठाकर डाल दीजिए। अहोभाग्य समझ कर जिन्होंने कचरा फैलाया है उन्हें साधुवाद ज्ञापित कीजिए। ऐसा करने में न केवल आपकी बगिया में नए नए स्वादिष्ट सुवास वाले फल फूल खिलेंगे बल्कि जिन्दगी में जीवन पर्यंत समाज व शिक्षा से मिली इबादतें भी ढह जाएगी। तब हम खुद को किसी एक जाति वर्ग क्षेत्र रंग रेस भाषा आदि में न बांधते हुए धरती पुत्र/ पुत्री कहलाने के हकदार होंगे।
यही आने वाले समय की सच्चाई व आवस्यकता है।
यही सम्यक भी है। मिलो भी तो ऐसे जैसे दो शाखें सारे भेद मिटा कर मिलती है। इस वात्सल्य का अपना आनंद है। जिसे मिल गया वह इस आनंद को छोड़ नही सकता।
सीखिए जिंदगी कैसे जी जाए।
आखिर हम सीखने के लिए ही तो इस पृथ्वी पर आएं। दुखी को देखकर दुत्कार देने में अहंकार भले ही प्रफुल्लित होता हो मगर यकीन मानिए आपने एक बेहतरीन अवसर खो दिया अपनी बगिया महकाने का। आप चाहते तो इसी अहंकार को अहोभाग्य में बदल सकते हैं। ऐसा करने से परिवर्तन न केवल हमारे हावभाव में आते हैं बल्कि यही आचरण हमारी शारिरिक केमिस्ट्री को भी बदलते रहते हैं। जहां अहंकार हमारे अंदर गुस्सा व असंतोष का निर्माण करता है वहीं अहोभाग्य रूपी सेवाभाव हमारे शरीर मे खुशियां व सौभाग्य भर देता हैं। आज दुनिया मे अगर किसी चीज की कमी है तो वह है मैत्री व करुणा भाव की।
जिसे हम सबको सीखना समझना ही होगा अन्यथा रोबॉट तो हम बन ही चुके हैं। AI डालने मात्र की कमी है।

Saturday, 17 October 2020

प्रचलित शिक्षा व्यवस्था मुक्ति नहीं गुलाम बनाए रखने की युक्ति है।

🌸🌸🌸 *प्रचलित शिक्षा और शिक्षा व्यवस्था ही हमें गुलाम बनाए रखने का चिरस्थाई साधन है* 🌺🌺
सा विद्या या विमुक्तये। ( विद्या वही जो लोगों को मुक्ति ( आजादी) दिलाए) लेकिन क्या आपने यह पढ़ा है कि अंग्रेजों ने जब भारत मे स्कूल कालेज खोलना शुरू किया तो उस समय उनकी नीति क्या थी?
उन्होंने शिक्षा क्या उद्देश्य निर्धारित किया गया था? आज तक जारी शिक्षा व्यवस्था का यह उद्देश्य था कि भारत मे शिक्षा के माध्यम से ऐसे लोगों  की ऐसी फौज बनाई जाए जो Indian in BLOOD AND COLOR. अर्थात रंग व खून से तो भारतीय हो मगर
English in taste, opinion, morals and intellect. अर्थात स्वाद से पिज्जा बर्गर चाउमीन आदि के लिए लार बहाने वाली हो।  राय मसविसे से बेबकूफ। मोरल और विकास के नाम पर फूहड़ मुंह ढका हो लेकिन  अर्धनग्न और  खुले बदन वाली फौज तैयार हो और बुद्धि से बुद्धिहीन खाने हगने वाली पशु टाइप की फौज बनाने की रणनीति बनी थी,  जो  आज भी 1835 से बदस्तूर आज तक जारी है।

चूंकि हमारी अश्थि मांस मज्जा खून बुद्धि आदि का निर्माण इसी सडयंत्र रूपी व्यवस्था से हुआ है इसलिए जब तक हम सच्चे अर्थों में "द्विज" नहीं बन जाते तब तक यह सब बाते समझ से परे हैं।

पहले मुझे भी सब हराभरा ही दिखता था।
मगर जब से बुद्धत्व की प्राप्ति हुई तब से दूध का दूध व पानी का पानी अलग अलग हो गया।
इस English in taste opinion morals and intellect का ही नतीजा है कि भारत के संविधान का अनुच्छेद 348 कहता है कि राजकाज व कोर्ट की भाषा अंग्रेजी ही होगी। मगर राज्य चाहें तो अनुवाद कर सकते हैं।


जिस देश मे हर 20 किलोमीटर पर भाषा बदलती हो वहां ऐसी शर्त लगाना अपने आप मे देशवासियों के  खिलाफ जंग है। 
इसीलिए वकीलों व पुलिसकर्मियों की मौज व जनता का  शोषण बदस्तूर जारी है।
    आज शासक वर्ग यू एन ओ, यूनीसेफ, डब्ल्यू टी ओ , आई एम एफ  के निर्देश पर ठीक उसी तरह लोगों पर जबरन डिजटलीकरण आनलाइन लादने के लिए प्रयासरत है जिस तरह अंग्रेजों ने लोगों से सोना चांदी लूट कर कागज की मुद्रा थोपी थी। आनलाइन की स्वीकरोक्ति लोगों को तिल तिल मारेगी। यह सुविधा नहीं फंदा है जो बड़ा ही मनमोहक लग रहा है लेकिन मैकाले की शिक्षा नीति का परिणाम है कि हम इस फंदे को खुली आंखों से नहीं देख पा रहे हैं।

Saturday, 15 August 2020

दुनिया वैसी नही है, जैसी दिखती है। दिखया कुछ जाता है असलियत कुछ और होती है।

🌗🌗🌗 *दुनिया की असलियत और आम धारणा* 🌚🌚🌚

भारत में न कभी ब्राम्हण नाम का कोई धर्म रहा, न ही आज जिसे आप धर्म समझते है वह धर्म है। दुनिया में हिन्दू, इस्लाम, ईसाई इत्यादि नाम से फैले धर्म वास्तव में अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति दल मात्र  है। 
आप तत्कालीन प्रचलित सामाजिक सोच को समझे, भारत में जब इन धर्म रूपी राजनीतिक दलों का उदय हुआ उस समय सामान्य जनता प्रकृति पर आश्रित, ईश्वरवादी थी। लोगों का भरोसा ईश्वर और प्रकृति पर था। लोग अपने शरीर को मजबूत  निरोगी रखने पर ध्यान देते थे। जनता की इसी सोच को ध्यान में रखकर चालाक लोगों ने अपने राजनीतिक मंसूबे पूरा करने के लिए, अपने दूतों के माध्यम से लोगों को धर्म  में बांटा। जबकि उस समय के लोगो की जो धार्मिक अवधारणा कुछ अलग थी। लोग प्रकृति और प्राणी के बीच स्थापित अन्तर्सम्बन्धों को धर्म समझते थे, जिसे मजबूती देने के लिए सदैव तत्पर रहते थे।धूर्त और चालाक लोगों ने अपनी राजनीतिक सोच को अमलीजामा पहनाने के उद्देश्य से कुछ नियत धार्मिक दूतों के माध्यम से खुद  को ईश्वर का प्रतिनिधि कहलाया और भोली भाली जनता को उन्हें ईश्वर मानने के लिए बाध्य किया। यही से दुनिया में राजनिति के आधार पर धर्मो का उदय हुआ। जो वास्तव में धर्म नही राजनीतिक दल थे। ठीक यही काम सामाजिक विभाजन कर लोगों को दो वर्णों मे विभाजित किया गया एक शासक दूसरे सेवक। कालान्तर में यही व्यवस्था चार भागों में विभाजित होकर वर्ण के रूप में जनता के समक्ष लाई गई। 
      धीरे धीरे जब कुछ सजग लोग इस षणयंत्र को जाना और समझा तो कुछ समाज सुधारक आगे आये और जनता को इनके षणयंत्रों को बताया जिससे वाद का जन्म हुआ। जब इस वाद का जन्म हुआ तो  लोग वादों से जुड़े  और दुनिया में समाजवाद, साम्यवाद, कम्युनिष्टवाद जैसी वैश्विक वादों को जन्म दिया गया, ठीक उसी तरह जैसे दुनिया को मूलत: तीन भागों ईसाई, इस्लाम, और यहूदी में बांटा था।
       आज उसी सोच को कायम रखने के लिए कांग्रेस, भाजपा, और कम्युनिष्ट जैसी स्वतंत्र राजनीतिक दलों का प्रादुर्भाव हुआ। इसलिए आपको इस विषय में गहराई से अध्ययन और चिंतन मंथन करने की आवश्यकता है। आने वाले समय में इसी सोच को मजबूती देने के लिए नई संकल्पना लाई गई जिसे उदारीकरण (अर्थात ईसाई) निजीकरण (अर्थात- इस्लाम) डिजटलीकरण(अर्थात-यहूदी) कहा गया। यह सब उसी वैश्विक सोच का हिस्सा मात्र है।  इनकी इस विभाजनकारी सोच को अमली जामा पहनाने के लिए भारत में हिन्दू मुसलमान किया जा रहा है। सभी हिन्दू एक न हो उसके लिए जातीय व्यवस्था है। एक तरफ हिन्दू को धर्म के रूप में प्रतिस्थापित किया जा रहा है तो वही दूसरी तरफ हिन्दू धर्म नही है कहा जा रहा है। यह सब इसलिए किया जा रहा है ताकि लोगों का ध्यान धर्म की असली अवधारणा की ओर न जा सके। 'हिन्दू' से तात्पर्र पक्ष विपक्ष में बंटे लोग और हिन्दुत्व से तात्पर्य पक्ष विपक्ष में लोगों को बांटे रहने की व्यवस्था। 
      इन सबसे परे एक और व्यवस्था है जिसको दुनिया से मिटाया जा रहा है वह बुद्धत्व( निष्पक्षता, करुणा, दया, शील, प्रज्ञा, आदर, जो इंसान को इंसान बनाती है )।  बुद्धत्व कोई साधारण सोच नही है। यह वह चमत्कारिक सोच है जिसके धारण करते ही व्यक्ति भय, लोभ, लालच, वासना से स्वत: नष्ट हो जाते है।
स्वामी संबोधि आनंद।

Tuesday, 28 July 2020

पक्ष विपक्ष में उलझाकर, विश्व व्यवस्थापक करते राज

विश्व के अधिकांश लोग प्रतिक्रिया व आलोचना, समर्थन और विरोध करके ही अपने को श्रेष्ठ और ज्ञानी समझते रहते है। जबकि इन्हें यह पता ही नही है कि क्रिया और प्रतिक्रिया , आस्तिक और नास्तिक, सकारात्मक और नकारात्मक, पक्ष और विपक्ष एक ही सिक्के के दो पहलू है। विश्व व्यवस्थापक आम लोगो को आस्तिक व नास्तिक, सकारात्मक व नकारात्मक, पक्ष व-विपक्ष मे उलझाकर वास्तविकता, स्वीकरात्मकता और निष्पक्षता से कोसो दूर कर उन पर क्रमश: अलग अलग कर अपना अपना शिकंजा कसते रहते है। लोग अपने गुण और स्वभाव और वातावरणीय विचारों के अनुसार इसी में उलक्षकर आपस में वाद-विवाद, समर्थन और विरोध करने में अपनी ऊर्जा व्यय करते रहते। जिसका परिणाम वे हमेशा दुखी और परेशान रहते है। 
स्वामी संबोधि आनंद।

Monday, 20 July 2020

बहुजनों का ज्ञान, सवर्णों का जूठन मात्र है।

बहुजनों की विद्वता देखिए। जिस साहित्य को सवर्णो ने लिखा, जिस विषयवस्तु को सवर्णों ने निर्धारित उसी को पढ़कर,  शब्दों का जो अर्थ सवर्णो ने निर्धारित कर दिया उसे उसी रूप में मानकर, सवर्णो ने जो विद्यालय स्थापित किये उन्हीं में पढ़कर, खुद को सबसे बड़ा विद्वान मानते हुए उन्हीं सवर्णों का विरोध और आलोचना करते हुए देखे जा सकते। 
       आज तक जो विषय वस्तु, साहित्य, शब्दों का अर्थ सवर्णों ने स्थापित कर दिये उन्हें बदलने और नवीन अर्थ निकालने और नवीन शब्द गढ़ने की कूबत नही दिखाई देती। जबकि शब्दों का अर्थ, साहित्य, विषयवस्तु सवर्णों ने अपने हित को ध्यान में रखते हुए स्थापित किये है। उन्ही को रट्टा मारकर खुद को ज्ञानी समझ रहे है। उन्ही सवर्णों को चुनौती देते फिर रहे है जिन्होने ये सारा जाल अपने हितों और आपको अंधेरे में रखने के लिए बुना है। कभी कभी आपके अपने व्यक्ति को आगे कर आपको फंसाये रखने के लिए दाना डालते है। आप उनसे नही फंसोगे तो उनके पुतले से तो फंसोगे। जब पुतले से भी नही फंसोगे तो उनके द्वारा उपलब्ध कराई गई सुविधाओं और सहूलियतों से तो फंसोगे। कहीं न कही ब्रम्हजाल में तो फंसोगे। उन्ही द्वारा दी गई फर्जी और झूठी जानकारी को रट्टा मारकर खुद को विद्वान और ज्ञानी कहते फिरने वाले ये बहुजन कितने महान विद्वान है! मैं इनकी विद्वता को सलाम करता हूं। 

स्वामी संबोधि आनंद।

Saturday, 13 June 2020

समाज पर राजनीति का कसता शिकंजा, बिखरता सामाजिक परिवेश।

 टूटते परिवार, बिखरता सामाजिक तानाबाना

सामाजिक व्यवस्था जब जब राजनीति के प्रभाव में आई है ,उसने अपना ही नुकसान किया है। सामाजिक व्यवस्था राजनीति के प्रभाव में तभी आती है जब लोगों का आचरण, पारस्परिक नियंत्रण, पारिवारिक व सामाजिक अनुशासन, कर्तव्यबोध, चारित्र का आभाव होता है। आज हम देख रहे है कि हर व्यक्ति हर रिश्ता शक के दायरे में है। क्या यही हमारी सामाजिकता है? आज हर रिश्ता अविस्वास के घेरे में है। हमारी सुरक्षा, संरक्षा और शिक्षा के मौलिक केन्द्र 
        हमने कभी इतनी बड़ी गंम्भीर समस्या पर विचार विमर्श किया ही नही। आज एक राजनीतिक व्यक्ति थाली बजाने का आवाह्न करता है और हम लग जाते थाली बजाने में। जब कि कोई भी राजनीतिक व्यक्ति समाज की मजबूती नही चाहता। कोरोना काल में जो देखा गया कि लोग दर दर की ठोकरे खाते नजर आये, और राजनीतिक लोग उनकी भूख और मजबूरी का खूब दोहन किया। गरीबो मजदूरों की बात करने वाले कम्युनिस्ट अपनी जुबान मे ताला लगाये नजर आये। कोई भी राजनीतिज्ञ कोरोना जैसी बीमारी को लेकर चिंतन मंथन कर लोगों को सच्चाई बताने की कोशिश नही की। जिन नेताओं को हम अपना मानते, और उनका गुणगान करते थकते नही थे आज एक भी नेता आपकी आवाज बनने का प्रयास नही किया। 
     वास्तव में समाज का इन राजनीतिज्ञों पर अटूट भरोसा करना सबसे बड़ी भूल है। इनकी बनाई कोई भी व्यवस्था/नीति सामान्य लोगों के हितों की नही होती। हमें अपनी सामाजिक व्यवस्था वर्तमान परिदृश्य को ध्यान में रखकर मजबूत करनी होगी। 

स्वामी संबोधि आनंद

Monday, 25 May 2020

हम, हमारा परिवेश और दृष्टिकोण

आज मेरा मन एक वातानुकूलित शोरूम में जाने का हुआ। मैने शोरूम में कुछ देर इधर उधर घूमा एक दो वस्तुओं के दाम पूंछे उसी गुणवत्ता की छोटी दुकान से लगभग तीस प्रतिशत अधिक मूल्य बताया। मैने कहा क्यों भाई यह चीज तो इतने की मिलती हैं। सेल्स मैन ने तुरन्त उत्तर दिया भाई यहां नहीं मिलेगी किसी फुटपतिया दुकान में मिलेगी। 
मै भी कहां पीछे रहने वाला मैने तुरन्त दूसरा सवाल दाग दिया क्या इस शोरूम में आ जाने के बाद कोई वस्तु की गुणवत्ता बढ़ जाती है। जो आप उसे मंहगा कर बेच रहे हो ।
दुकानदार ने तुरन्त कहा कि इस शोरूम के मेन्टेनेंस का खर्च कहाँ से आयेगा?
मैने- तो क्या यह शोरूम लोगों को नौ की चीज नब्बे की देने के लिए खोला है। 

कहने का मतलब कोई वस्तु दुकान में रहने या शो रूम में रहने से उसकी गुणवत्ता नही बदलती। 
अगर कुछ बदलता है तो यह हमारा दृष्टिकोण-- 
इसी दृष्टिकोण को बदलना विद्यालय और विज्ञापनों ने किया और लोगों की आत्मनिर्भरता छीन पराश्रित किया गया। आज विद्यालयों से ऐसी शिक्षा दूर कर दी गई जिससे बच्चे परिश्रमी, लगनशील, जिम्मेदार, अनुशासित और नैतिकता विहीन बन लहे है। 

मै एक और छोटा सा उदाहरण अपने बेटे सम्यक नागाल्यायन का देता हूँ, जो कक्षा तीन में पढ़ता है । एक दिन विद्यालय से 
बच्चे को होमवर्क के रूप में पुस्तक के कुछ चित्र फोटोकापी कराने को दिया गया। बच्चे ने अपनी मैडम की आज्ञानुसार मुझसे फोटो कापी कराने की बात कही मैने अपने बच्चे को कई बार समझाने का प्रयास पर बच्चा तो बच्चा है, वह कहाँ मानने वाला, जिद करने लगा, तो मैने कहा कि लाओ यह चित्र मै तुम्हे बनाना सिखाये देता हूँ। पर वह मेरी एक न सुनी। मैने भी जिद पकड़ ली कि मै भी फोटोकॉपी नही कराऊंगा। 
  दूसरे दिन मै विद्यालय पहुंचा और मैडम से कहा कि आपने बच्चों को जो फोटोकापी कराकर  लाने का कार्य दिया है, उससे बच्चे ने क्या सीखा? 
मैडम भी सीधे साधे रूप में जवाब दिया कि पुस्तक में नोट लगा है कि कापी एण्ड पेस्ट इसलिए दिया है। 
फिर मैने कहा कि आप अध्यापिका है कापी एण्ड पेस्ट से बच्चे ने क्या सीखा और उसके मस्तिष्क पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा? मै जो पोस्टग्रेजुएट थी वही 23-24 वय की होगी। निरुत्तर दिखी। 
सवाल मेरा फोटोकॉपी का नहीं था उसके प्रभाव का था। 
उक्त दोनों उदाहरण दृष्टिकोण से जुड़े है। हम अपने बच्चों की इस तरह की छोटी मोटी बातों को ध्यान नहीं देते बल्कि पढ़ाई के नाम पर जो बच्चो टूल बनाया जा रहा है उसे तो समझना बहुत दूर की बात है। हमे इस तरह की घटनाओं या बातों को नजरअंदाज करना ही हमारे बच्चों को गैरजिम्मेदाराना बनाते है। 
हमारी इन्द्रियों को नियंत्रित करने माध्यम है शोरुम न कि गुणवत्ता पूर्ण सामग्री उपलब्ध कराना। 
धन्यवाद!
स्वामी संबोधि आनंद।

Sunday, 29 March 2020

धारणाओं का सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक व धार्मिक आकलन तथा इन धारणाओं से उपजी खुशी और निराशा।

*धारणाएं व स्वतंत्रता: जीवन का आधार।*
🌹🌹9*4*5☸️☸️☸️☸️🇮🇳
हमे भले ही इस बात का अहसास न हो मगर धारणाएं हमारे जीवन का आधार हैं। यह वे प्रसंग हैं जो समाज के साथ समय बिताने से बनती हैं। इन्हीं धारणाओं से हमारा आचरण बनता बिगड़ता रहता है। बीतते समय के साथ साथ यह धारणाएं और प्रगाढ़ होती जाती हैं। धीरे धीरे हमे केवल यही धारणाएं ही सच साबित होने लगती हैं। जो जरूरी नहीं कि दूसरे व्यक्ति की धारणाओं से मेल ही खाती हों। समाज में बूढ़े बच्चे जवानों स्त्री पुरुष आदि के बीच होने वाले झगड़े अक्सर इन्हीं अवधारणों को मजबूती से बनाए रखने का संघर्ष मात्र होते हैं। मगर यह धारणाएं होती बहुत बलशाली हैं। अक्सर खून खराबा इन्हीं की मजबूती के लिए ही होता हैं। इन्हीं की सुरक्षा ही हमे अपनी सुरक्षा मालूम होने लगती है। जो किसी मूर्खतापूर्ण संप्रदाय को बनाए रखने के लिए भले ही जरूरी हो, मगर जब आप इन धारणाओं की हकीकत से भली भांति बाकिफ हो जाएं तो इनको मिटाए बिना कोई भी श्रजन कार्य नहीं किया का सकता। यह कार्य जो भी करेगा वह यथास्थिति बनाए रखने को अतुर समुदाय द्वारा निगेटिव माइंड अवश्य कहलाएगा। हमें ऐसे तानो से डरना नहीं चाहिए।
 
यह नवनिर्माण की अपनी एक प्रक्रिया है। जो पहले युद्ध के रूप हुआ करती थी जिसमे समय के साथ साथ बदलाव आए। और आज यह विषाणुओं जीवाणुओं तक आ पहुंची है। इस मिटाने की प्रक्रिया से अक्सर शांति व सौहार्द में जी रहे कॉलोनी वासियों को बुरा लगता हैं। प्रथमतया तो लोगों को इसका अहसास ही नहीं को पाता कि आखिर यह सब हो क्यों व कैसे रहा है। 
उनका अपना घोंसला बिखरता नजर आता है। जो कि एक नवीन परिवर्तन मात्र है। लेकिन हमें बदलाव से डर लगता है। लोग जैसी भी हालात में हैं उसी को बनाए रखने के लिए संघर्षरत रहे यहां तक तो उन्हें अच्छा लगता है।

कुछ यही हाल वर्तमान में बहुसंख्य देशवासियों के साथ भी हुआ है। अक्सर विभिन्न रूप रंग व मुद्दों पर सड़क पर हंगामा करने वाले लोग स्थायित्व के लिए संघर्ष कर रहे होते हैं। यह स्थायित्व हमे अक्सर सुकून देता हैं। हम इसी को सच समझ बैठते और नतीजे में समय हमे पीछे छोड़ आगे निकलने लगता हैं। हम कुछ देर समय की उपेक्षा कर अपनी धारणा में ही बंधे रहना चाहते हैं मगर अस्तित्व पर संकट आते ही जब समय बहुत आगे निकल जाता है तो हम उस समय के पीछे पीछे भागने दौड़ने लगते हैं। इस भाग दौड़ में अक्सर अपनी धारणाओं में बंधे रहने वाले लोग पिछड़ जाते हैं। या हार मान कर अनंत की गहराई में गुम हो जाते हैं। 

वर्तमान में यह प्रक्रिया संख्याभारी स्थायित्व वादी समुदाय को बखूबी जकड़े हुए है। इनको लगता है कि हम अपनी अवधारणा की रक्षा कैसे भी हो मगर करे जरूर।

 हमारा घर मकान दुकान आदि सब इसी अवधारणा से बना हुआ है जो अब टूट रही। हम फिर हताश उदाश पराजित भाव से अपना अती सुंदर व महत्वपूर्ण इंसानी जीवन नष्ट कर लेते हैं। 
जबकि होना यह चाहिए कि हम बदलाव का पूर्वानुमान लगाते हुए स्वयं को जरूरत के अनुरूप ढालते रहें। अक्सर इस पूर्वानुमान की कमी की अवस्था में लोग फिर से चिड़ियों के समान अवधारणा बनाने लगते हैं। जैसे आजकल वायरस की अवधारणा है। कोई कोरोना को करो- ना समझे बैठा है तो कोई किराऊना तो बहुत से भले मानस किराना भी समझ रहे हैं।ऐसा केवल इसलिए होता हैं कि हम अक्सर भूत काल को भवसागर मान सच स्वीकार करते हैं। यही हमारी धारणा बना जाता है। जबकि वह मात्र बीता हुआ लमहा है जिसे हमने अक्सर भोगा है। उससे जुड़ी अनुभूतियां हमे गुदगुदाती व रुलाती हैं। जबकि वर्तमान में सच्चाई बीता हुआ समय नहीं बल्कि वर्तमान है। वर्तमान में जीने की एक कला है जो स्कूलों में नहीं धर्माचार्यों के पास है। अर्थात जिस समाज के पास धर्म नहीं हो। जो समुदाय धर्म को अफीम व विज्ञान को भगवान मानता हो वह भला वर्तमान में कैसे जीना सीख सकता है। उसकी वर्तमान में जीने की चाबी तो अब शिक्षा विषयवस्तु निर्धारण करने वालों के हाथ चली गई। 

ठीक यही काम कुछ मिस्लीडर्स के सहयोग से कई दशक पूर्व बहुसंख्यक हकबंचित समुदाय के साथ भी हुआ है। विडम्बना यह कि हक़बंचित समुदाय आज भी उसी चाबी के लिए संघर्ष कर रहा कि इसके पतन का मूल है। जबकि होना चाहिए कि वह वर्तमान में जीना सीखें। अगर संख्याभारी समुदाय या उसका कुछ हिस्सा वर्तमान में जीना सीख लेता है तो वह अपना रास्ता अपनी आवश्यकतानुसार बना सकता है। यह बीते समय को पकड़ने की नाकामी को भुला बिजयी भाव से सर ऊंचा कर जी सकता है। गौरवान्वित महसूस कर सकता है। ऊपरवाले का सुक्रिया अदा कर सकता है कि सर्वोच्च निर्माता की कला का रत्तीभर ही सही मगर अनुसरण तो किया। यकीन मानिए ऐसे लोगों से ईश्वर जरूर खुश होगा। क्यूंकि कोई भी पिता अपनी औलाद को संक्षम होते देख खुश होए बिना कैसे रह सकता है। जन्नत व स्वर्ग का रास्ता यही से जाता होगा। न केवल सर्वोच्च शक्ति को खुश करने का गौरव हासिल किया जा सकता है बल्कि हमारेे अपने साथी जो हैं अटके भूले भटके उनको तारने व खुद तर जाने की जिम्मेदारी का निर्वाह भी होना संभव बनने से कौन रोक सकता है।
*हमें अवधारणाओं का लाभ तभी तक प्राप्त होता है जब तक वे सम सामयिक बनी हुई हैं। अन्यथा वे खुद ही हमारे बुरे वक्त की कारक हो जाती हैं।*
आओ वर्तमान में जीना सीखें। छोड़ दें था में जीना। जो है वहीं सास्वत है। इसी का आलिंगन करें। यही हमारे भविष्य का निर्माता बनेगा। मदद मै करने को तैयार हूं।
छोड़ो कल की बातें कल की बात पुरानी.....


धारणाएं हमारे जीवन का एक ऐसा महत्त्वपूर्ण हिस्सा है, जो हमें खुशी और गम देती है। हमारी धारणाएं ही हमें हंसाती और रुलाती है। जब हमारी धारणाओं के अनुरूप हमें प्रतिफल प्राप्त होता तो हमें खुशी होती है। जैसे ही हमारी धारणाओं के विपरीत प्रतिफल मिलता है तो हमें कष्ट होता है। इसी धारणाओं को हम सत्य मानकर अपनी क्रिया प्रतिक्रिया करने से जीवन में सुख-दुख आते हैं । आइये हमारे जीवन के सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और धार्मिक पहलू को ध्यान में रखकर अपनी धारणाओं का आकलन करें।
    आपने अक्सर देखा होगा कि कोई भी व्यक्ति
सामाजिक जीवन में किसी व्यक्ति, वस्तु, स्थान, रिवाज इत्यादि को लेकर एक धारणा बनाकर रखता है। अगर उक्त में से कोई भी उसकी धारणा के अनुरूप परिणाम व प्रदर्शन करता है तो उसे खुशी होती है, लेकिन जैसे ही उसकी धारणा के विपरीत परिणाम और प्रदर्शन होता है तो उसे दुख भी होता है। कभी कभी आपकी किसी के प्रति नकारात्मक धारणा के वितरीत परिणाम और प्रदर्शन प्राप्त होता है तो आपको आश्चर्यजनक उल्लास की अनुभूति होती है। इसी अपेक्षित और अनापेक्षित धारणाओं को लेकर हम प्रेम और ईर्ष्या को जन्म देते। जो हमारे लिये संघर्ष और सदभाव के रास्ते स्थापित करती है। 
     आपने अपने आर्थिक जीवन में न जाने कितने बदलाव, उतार-चढ़ाव अपनी धारणों के अनुरूप और विपरीत देखें होगे। उदाहरणार्थ आपने अपनी निश्चित धारणा के अनुरूप कोई कारोबार‌ प्रारम्भ करते हैं। आपकों आपकी धारणा के विपरीत शीघ्र लाभ प्राप्त होने लगा तो आपको खुशी होगी, लेकिन अचानक आपके कारोबार पर रोक लगा दी जाती है जिसके बारे में आपने सोचा तक नहीं था तो निश्चित ही आपकी धारणा को चोट लगेगी और आपको कष्ट होगा। ये धारणाएं ही हमें गुदगुदाती और रुलाती है। 
    राजनीतिक जीवन में तो हमारी धारणाएं रोज टूटती और बिखरती है। बहुजन समाज के लोगों की एक धारणा है कि संविधान के कारण उनकी सुरक्षा, आजीविका, और शिक्षा है। जिस कारण वे संविधान के विपरीत होते किसी कार्य को‌ जानकर व देखकर उन्हें तकलीफ होती है, वहीं जब उनकी धारणा के अनुरूप कोई कार्य उसी संस्था द्वारा किया जाता है, जो संस्था उनकी धारणा विपरीत कार्य संपादित किया था, तो खुशी होती है। जबकि हमारी धारणाओं के अनुकूल हर कार्य संपादित नहीं होता। 
     धार्मिक जीवन में भी हमारी कुछ ऐसी ही अवधारणाएं बनी है या हमने बना रखी है कि अमुक अनुष्ठान संम्पादित करने से अमुक परिणाम प्राप्त होंगे जब हमारी धारणा के अनुरूप परिणाम प्राप्त होंगे तो हमें‌ खुशी मिलती है,  विपरीत परिणाम की अवस्था में दुख। एक सबसे महत्त्वपूर्ण धारणा की ओर ध्यानाकर्षण करूंगा विश्व में फैले हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, आदि धर्म के रूप में प्रतिस्थापित है जिसको लेकर हमारी अपनी अपनी धारणाएं हैं। जो जरूरी नहीं सही हो। इस्लाम, ईसाई, यहूदी, हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन इत्यादि को लेकर विद्यालय में जो हमारी धारणाएं‌ निर्मित की गई उसमें और स्वनिर्मित धारणा में विरोधाभासी अवधारणाएं है। लेकिन जब मैं अपनी धारणा को लोगों के समक्ष रखता हूं तो लोग उसे स्वीकार नहीं करते क्योंकि उनकी धारणा और मेरी में अंतर है। लोग उपरोक्त को धर्म समझते हैं जबकि मैं विश्व का राजनैतिक बंटवारा जो प्राचीन काल में धर्म के प्रभाव के चलते किया गया था। लेकिन आज वैश्विक बंटवारा जनसंख्या, अमीरी, गरीबी के आधार पर‌ है। 
इस प्रकार आप देखेगेन कि धारणायें‌हमें कितना सुख और कितना दुख देती है। ये सत्य है कि हम अपनी धारणाओं के अनुरूप अपना जीवन दर्शन तैयार करते हैं, जो दूसरे की धारणाओं के अनुरूप हो, यह जरूरी नहीं है। जो अपनी धारणाओं में सदैव लचीलापन रखते हैं वे समय के साथ गतिशील रहते हैं, जो अपनी धारणाओं के प्रति दृढ़ रहते हैं वे हमेशा परेशान और पीछे रहते हैं। जो अपनी धारणाओं को सदैव बनाते बिगाड़ते रहते है वही लोग नवसृजनकर्ता होते हैं। 
इसलिये समय और परिस्थितियों के साथ अपनी धारणाओं को अपडेट करते‌ रहे। अन्यथा ये धारणाएं बहुत ही कष्टकारी साबित होती है। 
जय भारत भूमि
स्वामी संबोधि आनंद


Friday, 20 March 2020

व्यक्तिगत और सामाजिक नियोजन और नियंत्रण की व्यवस्था के प्रतीक हैं सितारा( star) और श्रीयंत्र।

इन दो चित्रों में सम्पूर्ण व्यवस्था का रहस्य छिपा है। पहला चित्र व्यक्तिगत नियंत्रण का प्रतीक है और दूसरा चित्र संस्थागत नियंत्रण का प्रतीक है। इन प्रतीकों के गहन अध्ययन के आधार पर मैं कई सालों से लोगों से एक ही बात कह रहा हूं कि लोग दासता का जीवन जी रहे हैं। पहले प्रतीक में व्यक्ति की पांचों ज्ञानेन्द्रियों  को  नियंत्रित करने की तकनीकी छिपी है। दूसरे प्रतीक में ऐसी व्यवस्था की रणनीति छिपी है कि हर व्यक्ति, संस्था, संगठन, शासक, प्रशासक, सरकारें इत्यादि को नियंत्रण और संचालित करने की रणनीति छिपी हुई है। हालांकि इन प्रतीकों को हमारे सामने जिस रूप में स्थापित किया गया है वह बिल्कुल झूठा है। उसका सच्चाई से कोई लेना-देना नहीं है। 
      व्यक्तिगत रूप में व्यक्ति की प्रथम वरीयता उसकी सुरक्षा होती है। द्वितीय वरीयता उसका स्वास्थ्य होता है। तृतीय वरीयता उसकी आजीविका होती है। इसका अंदाजा वर्तमान में फैली कोरोना महामारी से लगा सकते हैं। इन तीनों आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये हर व्यक्ति, अनेकों प्रयत्न, उपलब्ध संसाधनों के आधार पर करता है। जो व्यक्ति इन तीनों आवश्यकताओं की आपूर्ति करने में सक्षम होता है वहीं सफल माना जाता है। इन तीनों आवश्यकताओं की आपूर्ति के लिये उसे तंत्र (व्यवस्था), मंत्र (योजना) यंत्र (प्रयास/ तकनीकि) करने होते है। जब तक हम इस तरह के कदम नहीं उठायेंगे तब तक हमारी उपरोक्त आवश्यकताओं की आपूर्ति होना असम्भव है। जब हम इस तरह के कदम उठाने में खुद व्यवस्था नहीं बनाते, खुद योजना बनाकर सार्थक प्रयास नहीं करते ,तब तक हम अपनी सुरक्षा, स्वास्थ्य और आजीविका प्राप्त नहीं कर सकते। 
       जब कोई व्यक्ति इन लक्ष्यों को हासिल कर लेता है, तो वह स्वत: सामाजिक लक्ष्य शिक्षा, संपत्ति और सत्ता के लिये प्रयास करता है। शिक्षा, संपत्ति, और सत्ता सामाजिक मान्यता का विषय है। जबकि अधिकांश लोग शिक्षा जानकारी व सूचनाओं के संग्रह को ही समझकर किताबों में रातों दिन जुटे रहते हैं। जबकि शिक्षा, सूचनाओं और जानकारी का पर्याय नहीं है। इसी लिये कबीर ने कहा है " पोथी पढ़-पढ़ जग मुहा, पंडित भया न कोय। ढाई आखर प्यार का, पढ़ें हो पंडित होय। जहां तक शिक्षा के प्रति मेरा मत है कि "अपनी जानकारी और ज्ञान का समुचित प्रयोग करने की क्षमता का विकास ही शिक्षा है।" न कि विद्यालय में जाकर डिग्रियां हासिल करना शिक्षा है। विद्यालयों से जानकारी और ज्ञान हासिल कर डिग्रियां हासिल करना योग्यता है, शिक्षा नही। जबकि योग्यता का पैमाना दूसरा तय करता है। इसलिये हमें शिक्षा के लिये प्रयास करना चाहिए न कि योग्यता के लिये। जानकारी व ज्ञान तब महत्त्वपूर्ण है, जब आप उसे शिक्षा के रूप में रूपांतरित करने में समर्थ हो।
इसी तरह संपत्ति भी एक सामाजिक मान्यता है। समाज जिस वस्तु को सम्पत्ति के रूप में मान्यता दे देता है, वहीं वस्तु सम्पत्ति के रूप में स्थापित हो जाती है। जो हमें हमारी ऊर्जा व्यय और  प्रयास के परिणाम स्वरूप प्राप्त होती है। इसलिये सम्पत्ति हमारे द्वारा मान्यता प्रदान की गयी वस्तु व संसाधनों को कहा जाता है। अब आप जिस वस्तु को चाहे उसे सम्पत्ति के रूप में मान्यता दे कर उसे सम्पति के रूप में स्थापित कर सकते हैं। यह आपसी भाव व समझ का विषय है।
उपर्युक्त सभी के बाद सत्ता का भाव आता है जो एक प्रकार से अन्य लोगों और खुद को नियंत्रित करें की संगठनात्मक शक्ति है। यदि हम लोगों में स्वनियंत्रण की शक्ति का भाव विकसित कर दे तो उन पर कोई दूसरा नियंत्रण नहीं कर सकता। इसी स्वनियंत्रण को पैदा करने के लिये गौतमबुद्ध ने पंचशील का ज्ञान दिया। कबीर ने इसी स्वनियंत्रण के भाव को विकसित करने के लिये कहा कि "बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय, जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय। जहां तक मेरा मत है कि आत्मनियंत्रण से बड़ी कोई सत्ता नहीं है। जैसे ही हम आत्मनियंत्रण खोते हैं वैसे ही दूसरे के नियंत्रण के प्रभाव में आ जाते हैं। इसीलिये कहा जाता है कि या तो आप स्वनियंत्रित हो जाओ, या नियंत्रण में आ जाओ। नियंत्रण के दो तरीके हैं एक लालच, दूसरा भय।
    अब हमें व्यक्तिगत पहलू और सामाजिक पहलू दोनों को ध्यान में रखकर अपने आचरणों में सुधार कर लेना ही समस्या का समाधान है। किसी के विरोध व आलोचना से समस्या समाप्त नही होती बल्कि समस्या बढ़ती है। इसलिए खुद में सुधार  करना ही समस्या का समाधान है अन्यथा समस्या ही समस्या है। 

इन दोनों चित्रों का दूसरा पहलू भी है ।  

पहला चित्र तत्वों का नियोजन और नियंत्रण का प्रतीक है। 

दूसरा चित्र तत्वों के तीनों गुणों का नियोजन और नियंत्रण का प्रतीक ।
स्वामी संबोधि आनंद।