ऐसा ही एक अवसर मुझे कानपुर के प्रकाण्ड विद्वान, वैज्ञानिक और आध्यात्मिक गुरू डा० विनोद कुमार ( डा० बोधी आनंद) के सानिध्य में मिला। डा० विनोद कुमार के साथ बौद्ध तीर्थस्थलों की यात्रा करने पर विचार सालों से हो रहा था। कई बार योजना बनी परन्तु कतिपय कारणों से यात्रा की तिथि निश्चित नहीं हो पाई। आखिर 23 अक्टूबर 2020 को महीने में कई बार अनुरोध करने के पश्चात मुझे डाक्टर विनोद जी और अरुण कानपुरी व उनके परिवार के साथ श्रावस्ती, कपिलवस्तु और कुशीनगर की यात्रा करने का शुभ अवसर मिला। 23 अक्टूबर 2020 सायं को हम सभी लोग श्रावस्ती की पावन भूमि पहुंच गये, वहां हमें श्रद्धेय अशोक भन्ते के आवास में ठहरने का अवसर मिला। 24 अक्टूबर 2020 को हम सभी लोगों को बुद्ध की कर्मस्थली श्रावस्वती के जेतवन में जाने का अवसर मिला। जेतवन की पावन धरती पर पैर रखते ही कुछ ऐसी अनुभूति हुई, जैसे शरीर में अजीब सी ऊर्जा का प्रवाह हुआ, शरीर में गजब का आध्यात्मिक भावों का उदय हो गया। मन में उठ रहे विकार भाव विलुप्त से हो गए। डाक्टर विनोद जी द्वारा बुद्ध के आध्यात्मिक जीवन और वहां की पावन धरती और ऐतिहासिक खण्डहरों पर जो प्रकाश डाला गया । उससे ऐसा लगा कि श्रावस्ती पर बने जेतवन को अनाथपिंडक ने 18 करोड़ स्वर्ण मुद्राएं देकर (514-513 ई. वर्ष पूर्व में) यूं ही नहीं खरीदकर बुद्ध को दान दिया होगा। डाक्टर साहब ने पहली बार बुद्ध के तेजस व आध्यात्मिक ज्ञान का जिस प्रकार प्रकाश डाला गया उससे पता चला कि बुद्ध के तेजस और ज्ञान के सामने अनाथपिंडक को 18 करोड़ की धनराशि मामूली लगी होगी।
डाक्टर साहब द्वारा जेतवन विहार के निर्माण और उसकी स्थापत्यकला का वर्णन और उसके वैज्ञानिक आधार का जो वर्णन किया गया उससे यह पता चला कि जेतवन विहार की स्थापत्य कला में वे सभी नीतियों और रणनीतियां प्रतीक रूप में जेतवन के खण्डहरों में निहित है।जिसे अंग्रेजों ने बखूबी समझा और अध्ययन कर पूरी कायनात को नियंत्रण में रखने की शक्ति प्राप्त की।
श्रावस्ती में वर्गाकार रूप में बने बुद्ध स्तूपों, संघाराम, साधना स्थली के स्थापत्यकला उसमें छिपे गूढ़ संदेशों को स्वामी बोधी आनंद जी द्वारा डिकोड किया गया जोकि पूर्णतया गणितीय और वैज्ञानिक, दार्शनिक तथ्यों पर आधारित वास्तुकला है। नीचे दिए गए वृत्ताकार वास्तुकला के चित्र मात्र ईट पत्थरों से बनी इमारत नहीं है। यह प्रकृति की उस व्यवस्था की प्रतीक भी है जो पूरे संसार को एक निश्चित दिशा और दशा दिए हैं। इसी प्राकृतिक व्यवस्था में प्रत्येक प्राणी का अस्तीत्व बनता और बिगड़ता है। श्रावस्ती रूपी विश्व गुरुत्व स्थल पर बने ये प्रतीक विश्व केन्द्रीय शक्ति को प्रतिबिम्बित करते हैं। नीचे चित्र में दिखाई दे रही पांच स्तूपिकाएं पंचशील और पंचतत्त्वों के प्रतीक हैं।
24 अक्टूबर 2020 की सन्ध्या की बेला में हम लोग श्रावस्ती से कपिलवस्तु की ओर रवाना हुए। रास्ते में अंधेरा होने के कारण हम लोग शोहरतगढ़ में रात्रि विश्राम किया। यही शोहरत गढ़ में लूनर एनर्जी और उसके प्रभाव के बारे में स्वामी जी द्वारा बताया गया। इसी लूनर एनर्जी का अद्भुत प्रवाह शरदीय और बसंतीय नवरात्रि के दौरान होता है। जिससे प्रकृति में नवनिर्माण की गति तीव्र होती है। यह ऐसा समय होता है जब एक ओर प्रकृति में विनाशलीला चल रही होती है वहीं दूसरी तरफ नवनिर्माण का प्रारम्भ होता है। स्वामी जी की इस बात से एक सिद्धांत भी स्थापित होता है कि 'विनाश के बिना नव निर्माण नहीं हो सकता, अर्थात विनाश ही नवनिर्माण का जनक है।' यदि हम प्रकृति में होने वाले परिवर्तनों को गौर से देखें और समझे तो पाते हैं कि तीनों ऋतुओं सर्दी, गर्मी, और बरसात के मध्य ( सर्दी और गर्मी के मध्य बसंत ऋतु में प्रकृति में विनाश और नवनिर्माण देखने को मिलेगा) गर्मी और बरसात के मध्य प्रकृति में प्रजनन की क्रिया अधिक देखने को मिलेगी। बरसात और शीत ऋतु के मध्य रोपण अधिक देखने को मिलता है। स्वामी जी द्वारा उक्त विनाश और नवनिर्माण का प्रमुख कारण लूनर एनर्जी को बताया गया। इस समय चंद्र की चांदनी बड़ी ही मनभावक लगती है। इसके प्रभाव में आते ही व्यक्ति पशु पक्षियों में वात्सल्य जागृत होता है। यही वात्सल्य विनाश और नवनिर्माण की ओर पशु, पक्षी,और पेड़ पौधों सभी को प्रोत्साहित करता है। इस गूढ़ रहस्य को जानने और समझने का पहली बार अवसर मिला। उससे पहले तो हम भौतिक संसार में खोते हुए इसी को सब कुछ मानते थे। इस दिन हमें यह ज्ञात हुआ कि " पृथ्वी पर दिखाई देने वाले परिवर्तन वास्तव में आकाशीय परिवर्तनों का परिणाम मात्र है।"
25 अक्टूबर को हम लोग सुबह कपिलवस्तु पहुंचे। कपिलवस्तु पहुंच कर हम लोग नाश्ता किया। नाश्ता करने के बाद हम लोग बुद्ध-स्थली गनवरिया गये जहां पर बुद्ध के राजमहल के अवशेषों को देखा और सूक्ष्म अवलोकन किया गया। इन खण्डहरो को देखने के बाद स्वामी जी ने इनके महत्व पर गहराई से चर्चा परिचर्चा की, वहां पर बुद्ध की उस बेचैनी का एहसास भी कराया जिस कारण उन्होंने अपना गृह त्याग करने को बाध्य हुए। इस एहसास के बाद यह भी एहसास हुआ कि सिद्धार्थ बृद्ध, रोगी, या शव को देखकर गृह नहीं त्यागा होगा उसके पीछे प्रकृति में चल रहे उथल-पुथल और वैमनस्यता को शांत करने के उपायों की खोज के लिए यही लूनर एनर्जी ने बुद्ध को प्रेरित किया होगा। यह लूनर एनर्जी ही है जो प्रकृति में संतुलन स्थापित करती है। कपिलवस्तु में ही मातृभूमि की उस शक्ति का एहसास कराया जो हमारे दुख दर्दो को दूर करती है। हालांकि हम लोग कपिलवस्तु में अधिक समय तो नहीं रुक सके लेकिन यही पर हमें कुशीनगर के एक भन्ते जी और एक संभ्रांत नागरिक श्यासुन्दर जी से मुलाकात कराई जिन्होंने स्वामी को सुनने के बाद ऐसे मुरीद हुए कि उन्होंने हम लोगों को कुशीनगर चलने का आग्रह किया। आज ही हम लोग कुशीनगर के लिए रवाना हो गये रात में हम लोग कुशीनगर पहुंच गए। जहां पर भन्ते जी और श्यामसुंदर जी ने हम लोगों का भव्य स्वागत और खातिरदारी की। रात में लघु चर्चा परिचर्चा के बाद विश्राम करने लगे।
प्रात:: 25 अक्टूबर 2020 को हम लोग कुशीनगर के विभिन्न बौद्ध स्थल देखें। मेरी बदकिश्मती कहे या उदासीनता या लापरवाही यहां पर हम स्वामी को नहीं सुन सके। साथ में गये बच्चो के बीच उलझे रहना तो एक बहाना हो सकता है।
स्वामी जी के निम्न भाव अपने आपमें उनके बुद्ध होने का प्रमाण है। हालांकि जिसने स्वामी जी को पास से देखा समझा नहीं है वह उन्हें बहुत रुग्ण और अहंकारी समझेगा लेकिन जिसने उनसे पास से देखा समझा वह उन्हें सन्त समझेगा।
*झरोखा- जिंदगी का।*
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हमारी जीवनशैली हमारे व्यक्तित्व को बहुत ज्यादा प्रभावित करती है। हम जिस प्रकार के समाज मे जीते हैं उसकी अपनी कमियां व अच्छाइयां होती हैं।
जिस प्रकार मछली तालाब में रहकर अन्य जलीय जन्तुओ के आचरण से अछूती नही रह सकती ठीक उसी प्रकार हमारा परिवेश भी हमे हमेशा तराशता रहता है। जो शरीर रक्षा की दृष्टि से जरूरी हो सकता है मगर भवसागर को समझने व उससे पार उतरने व प्रज्ञा के विकास में सबसे बड़ी बाधा भी बना रहता है।
यही वह सामाजिक अवस्था है जो हमे एक अदृश्य अंधकूप से बाहर नही निकलने देती। हम अक्सर इसी चारदीवारी को मैं के रूप में स्वीकार किये रहते हैं। जबकि यह दीवारें ही हमारी क़ैदगाह का शबूत हैं फिर भी हम इन्ही की रंगाई पुताई करके खुशनुमा महशुस करते आये हैं।
यह चक्र तब तक चलता है जब तक व्यक्ति को कोई सदमा न लगे।
कुछ इसी तरह का हाल हमारे नजरिये का भी है। हम अक्सर दूसरे व्यक्ति को अपनी बनी बनाई दीवार रुपी धारणाओं की कसौटी पर परखते रहते हैं। ऐसा हर रोज हर क्षण होता रहता है। जाहिर है ऐसी स्थिति में हमारी आंखों में दिखने वाला प्रतिबिंब भले ही हमे बाहर से प्रवेश करता हुआ नजर आये मगर यह प्रतिबिंब होता हमेशा खुद के नजरिये का ही है।
नतीजे में इसी झूंठे प्रतिबिंब को हम सच मान जीवनभर रक्षा करते रहते हैं। तमाम चारदीवारी इसी प्रतिबिंब की रक्षा के लिए ही खड़ी करते हैं।
जैसे एक झरोझे के छेद से देखने पर हमें निश्चित दायरा ही दिखाई देता है। जबकि बहुत बड़ी हकीकत हमारे सामने अनछुई खड़ी रहती है। कुछ इसी प्रकार की अनुभूतियां हमारे जीवन की प्रत्येक हरकत को नियंत्रित करती रहती हैं। अक्सर हम दूसरों के बारे में वही देखना चाहते हैं जो हमने अपने मानसपटल पर सही के रूप में पोत रखा है। इसी मानसपटल पर लिखी इबादतें हमारे बात व्यवहार का आधार बन जाती हैं। यही इबादतें हमारे दोश्त दुश्मन को परिभाषित कर दायरे निर्मित करती हैं।
यही इबादतें वाद-विवाद के रूप में सामने आती रहती हैं। एक समय ऐसा आता है कि यह इबादतें मात्र सच बाकी सब मिथ्या लगने लगता है। हम इसी इबादतगाह को सुकून जन्नत आदि नामो से नमाजते रहते हैं। अक्सर यह इबादतें हमे सुरक्षा व सुकून भले ही देती हों मगर जिन्दगी का यह बेहद कमजोर व छोटा सा हिस्सा होती हैं। हम बहुत सूक्ष्म को पकड़कर वृहद को तजे जिन्दगी मुखलिसी में गुजार देते हैं।
हम दूसरों के बारे में जब अपनी इबादतों के झरोखे से देखते हैं तो अक्सर संसार अपने से भिन्न नजर आता है। यह भिन्नता हमारे अंदर खिन्नता व असंतोष की मां बनती है। ऐसा होने पर हमारी जिंदगी में मैत्री भाव नष्ट हो जाता है। हम प्रत्येक नर नारी जीव जंतु वस्तु स्थान आदि को अपनी ही तराजू में तौलने लगते हैं। यह काम ऐसा नही कि हम सोच समझ कर करते हैं। बल्कि यह काम अपने आप ही चलता रहता है। हम आंख खोलते ही तो तमाम संज्ञाएँ दिखती ही हैं। ऐसे में यह नजरिया तुरंत ऑटो मॉड में अपना काम चालू कर देता है। हम विपरीत लिंग धारी को देखकर खयाल बुनने लगते हैं। हम विज्ञापन देखकर खुद को निकृष्ट समझने लगते हैं।
हम दूसरे को तो देखते हैं मगर हाथी के समान खुद को नही देख सकते। इसी में सारा संसार फसा हुआ है। नतीजा हम असंतोष का शिकार होते हैं। यह असंतोष हमारी जिंदगी में अवसाद का रूप ले लेता है। यह अवसाद से छुटकारा पाने के लिए हम अक्सर अलग अलग नशाओं के चंगुल में फसते जाते हैं। कभी हम खुद के इस अवसाद से मुक्ति पाने के लिए दारू सिगरेट गुटखा तम्बाकू पान आदि का सहारा ले रहे होते हैं। तो कभी हम अपने इस अवसाद से मुक्ति के लिए झगड़ा फसाद में उलझे होते हैं।
तो कभी हम बात विमर्श में एक दूसरे को अपनी शेखी बघारने व बात मनवाने में ही सुकून महशुस करने लगते हैं।
अक्सर यह अवसाद हमारी पहुंच व सामर्थ के अनुसार हमारे घरों में इकट्ठा वस्तुओं के रूप में नजर आता है।
यह अवसाद ही हमारे make अप के रूप में नजर आता है।
तो यही अवसाद हमारी कार घर AC TV कपडे आदि रूप में सामने आ ही जाता है।
जाहिर है अवसाद को ठीक करने में यह सारे उपाय फौरी तौर पर राहत भले ही दें मगर यही छोटे अवसाद को विशाल अवसाद में तब्दील करने के लिए काफी भी हैं। जिनका अंत व्यक्ति के अंत के साथ ही अक्सर होता है।
जबकि इस सारी समस्या का उपाय बेहद सरल है। हम अगर दूसरोँ को अपनी इबादत रूपी झरोखें से न देखकर स्वतंत्र खुले आकाश के रूप में देखना सीखें।
अगर हम शिशु को निहारते समय उसकी गलतियों पर खुशी महशुस करे। अगर हम जो व्यक्ति जैसा है उसे अपनी कसौटी पर खरा उतारने की बजाय जो जैसा है उसे उसी के स्वरूप में स्वीकारें तो असंतोष को संतोष व अवसाद को शाद में तब्दील किया जा सकता है। जिन्दगी में नए रंग प्रवेश करने से कोई नही रोक सकता। ऐसी अवस्था मे आप देखोगे कि दुनिया बेहद हशीन है। हम खुद ही मातृ भूमि की सुंदरता को कचरा के ढेर पर खड़े होकर देख रहे थे इसीलिए हमे सब तरफ कचरा ही कचरा दिख रहा था।
अगर फिर भी कुछ कचरा दिखता है तो उस पर हँसिये। खुद पर मुस्कराइए। इसी कचरे को देख मन मे खिन्नता भरने की बजाय अवसर देखिए। देखिए कि जिंदगी की किस बाड़ी में कचरे रूपी खाद की जरूरत है। कहाँ हमारा अहंकार उफान मार रहा। कौन सी बाडी में खड़ी फसल इस अहंकार की आग में झुलस रही है। ठीक वहीं। जी हां ठीक वहीं पर इस कचरे को उठाकर डाल दीजिए। अहोभाग्य समझ कर जिन्होंने कचरा फैलाया है उन्हें साधुवाद ज्ञापित कीजिए। ऐसा करने में न केवल आपकी बगिया में नए नए स्वादिष्ट सुवास वाले फल फूल खिलेंगे बल्कि जिन्दगी में जीवन पर्यंत समाज व शिक्षा से मिली इबादतें भी ढह जाएगी। तब हम खुद को किसी एक जाति वर्ग क्षेत्र रंग रेस भाषा आदि में न बांधते हुए धरती पुत्र/ पुत्री कहलाने के हकदार होंगे।
यही आने वाले समय की सच्चाई व आवस्यकता है।
यही सम्यक भी है। मिलो भी तो ऐसे जैसे दो शाखें सारे भेद मिटा कर मिलती है। इस वात्सल्य का अपना आनंद है। जिसे मिल गया वह इस आनंद को छोड़ नही सकता।
सीखिए जिंदगी कैसे जी जाए।
आखिर हम सीखने के लिए ही तो इस पृथ्वी पर आएं। दुखी को देखकर दुत्कार देने में अहंकार भले ही प्रफुल्लित होता हो मगर यकीन मानिए आपने एक बेहतरीन अवसर खो दिया अपनी बगिया महकाने का। आप चाहते तो इसी अहंकार को अहोभाग्य में बदल सकते हैं। ऐसा करने से परिवर्तन न केवल हमारे हावभाव में आते हैं बल्कि यही आचरण हमारी शारिरिक केमिस्ट्री को भी बदलते रहते हैं। जहां अहंकार हमारे अंदर गुस्सा व असंतोष का निर्माण करता है वहीं अहोभाग्य रूपी सेवाभाव हमारे शरीर मे खुशियां व सौभाग्य भर देता हैं। आज दुनिया मे अगर किसी चीज की कमी है तो वह है मैत्री व करुणा भाव की।
जिसे हम सबको सीखना समझना ही होगा अन्यथा रोबॉट तो हम बन ही चुके हैं। AI डालने मात्र की कमी है।