Wednesday, 18 April 2018

जाति धर्म तो बहाना है असली खेल अपने षड्यंत्र छिपाना है ।

रेगिस्तानों को वार्षिक वर्षा के कम अनुपात के आधार पर परिभाषित किया जाता है। यह सामान्य रूप से प्रतिवर्ष 100 मिलीमीटर या इससे कम भी हो सकती है।

शोधकर्ताओं ने अफ्रीका में 1920 से 2013 तक के वर्षा के आंकड़ों का अध्ययन किया और पाया कि महाद्वीप के ज्यादातर उत्तरी भाग में मौजूद सहारा के क्षेत्रफल में इस दौरान 10 फीसदी वृद्धि हुई।

शोधकर्ताओं ने जब इस समय अंतराल में सहारा का विश्लेषण मौसमों के अनुसार किया तो उन्होंने मरुस्थल के क्षेत्रफल में सबसे ज्यादा वृद्धि गर्मियों में दर्ज की।

शोध परिणाम के अनुसार, मानव जनित जलवायु परिवर्तन के साथ-साथ प्राकृतिक परिवर्तनों के कारण मरुस्थल का क्षेत्रफल बढ़ा है। जिस प्रकार  वर्तमान विश्व में विकास का मानक माना गया है और फर्जी विकास की होड़ लगी है इससे साफ जाहिर है कि वह दिन दूर नही कि सम्पूर्ण भारत रेगिस्तान में बदल जायेगा। अगर हम थार मरुस्थल की वार्षिक वृद्धि के  आधार पर कहे तो प्रतिवर्ष आधा किलोमीटर से एक किलो मीटर की दर से  मरुस्थल बढ़ रहा है । इस हिसाब से आप खुद अनुमान लगा सकते है कि आपका क्षेत्र कितने समय बाद रेगिस्तान में बदल जायेगा।
   इसी भौतिक दोहन के के विरुद्ध जो आदिवासी , मूलनिवासी व जनजाति के लोग आंदोलन चला रहे है वह वास्तव में अच्छी तरह से जानते है कि धन व सुख  सुविधाओ के  पिपासु लोगो को यदि प्राकृतिक संसाधनो के अंधाधुंध दोहन को नही रोका गया तो सम्पूर्ण भारत रेगिस्तान मेरे बदलने में देर नही लगेगी । पूंजीवादी व्यवस्था के पोषक लोग भी जल जंगल जमीन पर कब्जा करने व धरती मां की गोद में छिपे संसाधनो के दोहन में कोई कसर नही छोड़ रहे है । इसी क्रम में भारत सरकार में काबिज लोगो ने कृषि सुधार के नाम पर मिजोरम में हजारों हेक्टेयर भूमि इजराइल को दी है। जो कृषि सुधार नही वहां छिपे बेशकीमती संसाधनो का दोहन कर खुद तो मालामाल होगा और भारत भूमि संसाधन विहीन रेगिस्तान में परिवर्तित होगी । अभी भारतीय जनता के पास समय है असली षड्यंत्र को व षड्यंत्रकारियों को समझे। अन्यथा आने वाली पीढियों का अस्तित्व खतरे में होगा ।
शैलेंद्र कुमार बौद्ध कानपुर नगर