Monday, 17 April 2017

नौनिहाल क्यों हो जाते है, अपनो के विरुद्ध

मैं यह नहीं कहता कि हम अपने इतिहास को भूले। पर मैं यह भी नहीं कहता कि इतिहास को ही सब कुछ माने।
हम आज की परिस्थितियों को समझें और भविष्य का प्लान बनाये।
बहुत से लोग मेरी इस बात से इत्तेफाक नहीं रखेंगे। फिर भी मैं कहना चाहूंगा कि। हम जो शिक्षा अपने बच्चों को दें रहे हैं। क्या वह शिक्षा बच्चे को बुद्धजीवी बनाने वाली है, या फिर शासकों​ द्वारा मस्तिष्क नियंत्रण करने वाले शिक्षा दिला रहे हैं।

मैं यह बात यूं ही नहीं कह रहा हूं। आपने देखा होगा कि आपका अपना बच्चा जिसे तीन साल की उम्र में ही पी जी से पढ़ने के लिए मंहगे से मंहगे विद्यालय में भेजते हैं फिर हमारा अपना बच्चा एक निश्चित उम्र में आकर आपकी बात की कद्र नहीं करता है। जानते हैं आपका अपना बच्चा, जिसे आपने पढ़ाने लिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी, वह आपके विरुद्ध खड़ा हो जाता है। उसका सबसे बड़ा कारण आपके द्वारा तीन वर्ष की आयु में विद्यालय भेजना है। जो उम्र में बच्चे की शारीरिक व भावात्मक विकास की होती है उस उम्र में शासकों द्वारा निर्धारित पाठ्यक्रम में फंस जाने के कारण उसका संवेगी विकास प्रभावित होता है। जिस प्रकार आप बच्चे के संवेग को समझें बगैर जबरन तीन साल की उम्र में अपने वात्सल्य से दूर कर उसे संवेदना हीन बनाते हैं, ठीक उसी तरह एक निश्चित उम्र में आकर वह स्वयं आपसे दूर हो जाता है। आज की शिक्षा पूर्णतया सुनियोजित शिक्षा है जो कि विश्व नियंताओं द्वारा निर्धारित की गई है।जिसके माध्यम से वे भावना रहित मानव का निर्माण कर रहे हैं।

आज कल हम जिसे शिक्षा समझ कर अपने बच्चों को दिला रहे हैं वास्तव में वह creative education न होकर tool of controlling education है जहां बच्चे को पढ़ाने लिखाने के नाम पर ऐसी शिक्षा दी जाती है जिससे बच्चे का बौद्धिक स्तर  खोजी न होकर आश्रित हो जाए। 
         हो सकता है मेरी यह बात हर किसी के समझ में न आये या मेरी बात से आप सहमत न हों।  परन्तु मैं एक शिक्षक होने के नाते  बच्चो, नौजवानों और समाज, परिवार का आकलन करने के उपरांत इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि हम अपने बच्चों को शैशवास्था में (2 से 5 वर्ष) ही विद्यालय में भेज देने का परिणाम यह होता है कि बच्चे का शारीरिक और मानसिक विकास बाधित हो जाता है। बच्चे को कम उम्र में ही जानकारियों का भण्डार हो जाता है परन्तु उस जानकारियों का जीवन में उपयोगिता सुनिश्चित करने की क्षमता नष्ट हो जाती है। 

      जरा खुद सोचो कि आपको क्या तीन चार वय की उम्र में बतायी गयी कोई बात या साधारण घटना याद है? जहां तक मेरा निजी अनुभव है कि मुझे तो उक्त उम्र का कुछ भी याद नहीं है। हम यह भूलते जा रहे कि बच्चे की परवरिश, शैक्षिक व बौद्धिक विकास के असली मायने क्या है! जिस उम्र में हम अपने बच्चों को स्कूली शिक्षा के लिए कठोर अनुशासन में विद्यालय को सौंप देते हैं वह उम्र स्कूली शिक्षा से अधिक महत्वपूर्ण बच्चे की सामाजिक, सांस्कृतिक और शारीरिक क्षमता के विकास की उम्र होती है। उपरोक्त विकास अधिक से अधिक आउटडोर गेम्स खेलने, नाते रिश्तेदारों व आप पास के पड़ोसियों, मित्रों से सम्पर्क से होता है। जिसे हमने स्वयं बच्चों को घरों में कैद कर या कक्षा, किताब  तक सीमित क समाप्त करने में लगे हैं। यह विषय बहुत ही जटिल और सोचनीय है कि हम बच्चों को क्या सौंप रहे हैं। आप वर्तमान पीढ़ी का अध्ययन करें असहनशीलता, अपराधी प्रवृत्तियां, डिप्रेशन, समस्याओं का सामना करने की क्षमताओं का पतन तेजी से हो रहा है। यह  सब हमारी सोच और अन्धानुकरण का नतीजा है। जिस उम्र में बच्चे को लाड़-प्यार, दुलार, अपनों का साथ चाहिए उस उम्र में हम उसे व्यवसायिक शिक्षालयों में सौंप देते हैं।  जरा आप खुद सोचो जब आप बृद्ध या बीमार हो और इस स्थिति में न हो कि एक गिलास पानी उठाकर ले सके तब आपकी सोच यही होगी आपका कोई बेटा बेटी आपके साथ हो और आपकी देखरेख करें पर आपके अपने बेटे आपको सक्षम होते हुए भी एक गिलास पानी देने के लिए आपके पास नहीं होंगे, जानते हैं क्यों? क्यों कि यह सब आपने आधुनिकता व शिक्षा के नाम पर अपने बच्चों को दो-तीन वर्ष की अवस्था में ही जो दिया था वहीं वह आपको वापस कर रहा होता है। जिस तीन वर्ष की उम्र में आपके बच्चे को प्यार दुलार के साथ उछल कूद की आवश्यकता थी उस उम्र में आप अपने बच्चे को शिक्षा के नाम पर उसे विद्यालय भेजकर अपने लाड़-प्यार से दूर रखा और आपने अपने बच्चों के साथ कोई भी हमदर्दी नहीं रखी तो फिर वही बेटा आपके साथ क्यों हमदर्दी रखें। जिस प्रकार आपने अपने बच्चों को सर का बोझ समझकर व्यवसाय में लिप्त आकर्षित करते विद्यालयों को सौंप दिया था जहां वह अबोध बच्चा आपके प्यार व मां की ममता को तरसता रहता होगा ठीक उसी प्रकार जब आप एक गिलास पानी लेने को तरस रहे होते हैं तब वहीं बच्चा जिससे आप एक गिलास पानी की उम्मीद कर रहे होते हैं आपसे बड़े प्यार से कहता है कि पापा नौकर आ गया है जो आवश्यकता हो ले लेना। सोचो उस समय आपके दिल में क्या गुजरती होगी जिस औलाद को आपने इस उम्मीद से पाला था कि मेरे बुढ़ापे का सहारा बनेगा पर वह भी आपकी तरह भावना रहित होकर भौतिक संसाधनों के पीछे दौड़ रहा होता है। यह सब हमारी ही सोच और कर्मों का नतीजा है। हमें सोचना होगा कि हमें हमारे बच्चे कैसे हों? हमारा समाज कैसा हो? देश कैसा हो, देश के नागरिक कैसे हो? जैसा हम चाहते हैं पहले हमें खुद वैसा ही बनना पड़ेगा। 
 जय भारत भूमि
सर्वे मंगलं भवतु।।
स्वामी संबोधि आनंद।

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