कभी लगता था—मैं कुछ हूँ,मुझसे ही सब कुछ होता है,मेरे बिना यह जग सूना,हर कर्म मुझसे संजोता है।
पर आज ठहरकर मन पूछे—मैं क्या हूँ, क्या कर सकता हूँ?इस अनंत समय की धारा में,मैं किस पल तक रहता हूँ?
मुझसे पहले कितने पथिक,आए, ठहरे और चले गए,मुझसे बाद भी कितने आएगे,समय संग सब बहते जाएगें।
मैं तो बस एक लहर क्षणिक,असीम सागर की गहराई में,उठी, चमकी, फिर मिट भी गई,उसकी ही परछाईं में।
करोड़ों जन प्रतीक्षारत हैं,उसकी एक नजर पाने को,एक इशारे की आस लिए,उसकी कृपा में जाने को।
यदि उसकी कृपा की छाया हो,तो क्या अभाव रह जाएगा?उसकी शरण में कण बनकर,मेरा अस्तित्व निखर जाएगा।
अब न अहं का कोई बोझ,न कर्तापन का कोई भ्रम,मैं तो बस एक साधन हूँ,वही आरंभ, वही है अंत।
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।।स्वामी संबोधि आनंद।।