Tuesday, 13 June 2017

बहुजन समाज की नकारात्मक विचारधारा

मैं एक दशक से बहुजन आंदोलन व बहुजन संघर्ष को देख रहा हूं। जिसमें संघर्ष का मुख्य बिंदु विरोध, आलोचना, और व्यक्तिगत​ छींटाकशी के सिवा कुछ नजर नहीं आता। बसपा सरकार इन्हीं बिन्दुओं की परिणति मात्र थी। जो समय काल के गर्त में डूबते दिख रही है। बहुजन समाज की नकारात्मक चिंतन एवं प्रतिक्रियावादी आन्दोलन/ मिशन, ब्राह्मणवादी​ व्यवस्था को मजबूती प्रदान करने के लिए पर्याप्त है।
     मैं हमेशा इस बात को लेकर चिंतनशील रहता हूं कि आखिर बहुजन समाज सांख्यिकीय​, कामगार, संघर्षशील, सहनशील होने के बावजूद सवर्ण व्यवस्था के विरुद्ध अपनी व्यवस्था क्यों नहीं खड़ी कर पा रहा है? जहां तक उसके निम्नलिखित कारण हो सकते हैं
१- स्वअनुशासन का आभाव।( Personal mastery)
२- व्यवस्था परक चिंतन का आभाव।( System thinking)
३- परम्परागत​ सोच व विचार रखना ।( Creative thought)
४- परिवर्तनशील परिस्थितियों में समायोजन का आभाव। ( Changing nature)
५-  नीतिगत व दूरदर्शी चिंतनशीलता का आभाव।
६- लोकतंत्रात्मक​ स्वभाव  होने के बावजूद लोकतंत्रात्मक व्यवस्था का निर्माण करने में अक्षम।
७- पारस्परिक अन्तर्सम्बन्धों की समझ न होना।
८- मूर्तवादी/ प्रत्यक्षवादी होना।
९- लचीलापन न होना
१०- स्वनिर्मित व्यवस्था न होना।
११- निरन्तर संघर्ष न करना।
१२- आपसी विचारों में विरोधाभास
१३- राजनीति, सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक, न्यायिक, धार्मिक, दार्शनिक चिंतक दल का न होना।
१४- समदर्शी होना
१५- शीघ्र विश्वासी या कट्टर विश्वासी होना।

Monday, 5 June 2017

American President is against globalization​ policy

वैश्वीकरण और अमेरिका​

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पेरिस समझौते के तहत अपनाई गई वैश्वीकरण नीति से अमेरिका को अलग करके, ट्रंप ने बाबा साहब अम्बेदकर की मानवतावादी और सामाजिक व राष्ट्रीय सम्प्रभुता के सिद्धांत पर मुहर लगाई है। अगर वर्तमान परिस्थितियों के अनुसार ट्रंप के इस निर्णय को देखा जाए तो कहीं न कहीं अमेरिका पूंजीवादी नीति से हटकर समाजवादी नीति की ओर चलना भी कहा जा सकता है। जिस प्रकार अमेरिका ने अपने देशवासियों के हितों को ध्यान में रखते हुए पेरिस समझौते से खुद को अलग किया है। वह नयी विश्व व्यवस्था के जाल से मुक्ति का मार्ग भी है, भारत इसी जाल को विकास का नाम देने में जुटा है। मैं अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सराहना करता हूं कि उन्होंने अपने देश हित में वैश्वीकरण की नीति से खुद को हटाने का कार्य किया। इससे वैश्वीकरण ( अप्रत्यक्ष साम्राज्यवाद) को धक्का लगा है, जिसके कारण वैश्वीकरण के समर्थक देश ट्रंप की आलोचना करने में लगे हैं। जबकि वैश्वीकरण की नीति किसी भी देश की संप्रभुता के विरुद्ध होती है।
       कोई देश अपनी जनता के हितों को ध्यान में रख कर, विदेशियों को रोजगार देने में प्रतिबंध लगाता है, तो कौन सा गलत कार्य करता है? भारत को भी अमेरिका की तरह विदेशी कंपनियों व इंजीनियरों को भारत में रोजगार के अवसर देने को प्रतिबंधित करना चाहिए और विदेशों में जाकर अपनी  सेवाएं दे रहे लोगों को वापस बुलाना चाहिए। अगर वे वापस भारत आते हैं और भारत माता के लिए कार्य करते हैं तो निश्चित ही भारत माता का सिर गर्व से ऊंचा होगा। भारत की  संप्रभुता मजबूत होगी। विदेशी तकनीकी​ के भरोसे किये जा रहे भारत विकास को भले ही कुछ दिनों के लिए धक्का लगे परन्तु स्वनिर्मित तकनीकी से भारत के समग्र, संतुलित व स्थाई विकास को बल मिलेगा। भारत में बढ़ रही बेरोजगारी को नियंत्रित किया जा सकेगा। आपने देखा होगा कि भारत ने जब से उदारीकरण निजीकरण,वैश्वीकरण, मशीनीकरण, की नीति अपनाई सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम लगातार नष्ट हो रहे हैं, इस क्षेत्र में मिलने वाले रोजगार समाप्त हो रहे हैं। इतना पढ़ने लिखने के बाद भी  नवयुवकों को रोजगार नहीं मिल रहे, इन सबकी वजह भारत सरकार की निजीकरण वैश्वीकरण मशीनीकरण की नीति है। निजी क्षेत्र में बड़े बड़े पूंजीपति अपने कार्य को सम्पादित कराने के लिए छोटे स्तर से बड़े स्तर तक बड़ी मात्रा में मशीनों की उपयोगिता लगातार बढ़ा रहे है। जिससे नवयुवक नवयुवतियों को रोजगार नहीं मिल पा रहा है। नवयुवकों को रोजगार न मिल पाने के कारण अपराध व आत्महत्याओं का ग्राफ बढ़ रहा है। निजी क्षेत्र की ही देन है कि भारत में लगातार भ्रष्टाचार बढ़ रहा है। निजी क्षेत्र के लिए कार्य करने वाले पूंजीपतियों व कर्मचारियों का मुख्य उद्देश्य किसी भी प्रकार से लाभ लेना होता है उनका देश व समाज हित से कोई सरोकार नहीं होता। यदि भारत ने अमेरिका की तरह उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण, मशीनीकरण की नीति नहीं त्यागी तो वह दिन दूर नहीं कि भारत में, विदेशी निवेशक के माध्यम से, विदेशी सत्ता स्थापित होगी। जिसका सम्पूर्ण उत्तरदायित्व भारत सरकार का होगा। शैलेंद्र कुमार गौतम कानपुर नगर 9455615564