*धारणाएं व स्वतंत्रता: जीवन का आधार।*
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हमे भले ही इस बात का अहसास न हो मगर धारणाएं हमारे जीवन का आधार हैं। यह वे प्रसंग हैं जो समाज के साथ समय बिताने से बनती हैं। इन्हीं धारणाओं से हमारा आचरण बनता बिगड़ता रहता है। बीतते समय के साथ साथ यह धारणाएं और प्रगाढ़ होती जाती हैं। धीरे धीरे हमे केवल यही धारणाएं ही सच साबित होने लगती हैं। जो जरूरी नहीं कि दूसरे व्यक्ति की धारणाओं से मेल ही खाती हों। समाज में बूढ़े बच्चे जवानों स्त्री पुरुष आदि के बीच होने वाले झगड़े अक्सर इन्हीं अवधारणों को मजबूती से बनाए रखने का संघर्ष मात्र होते हैं। मगर यह धारणाएं होती बहुत बलशाली हैं। अक्सर खून खराबा इन्हीं की मजबूती के लिए ही होता हैं। इन्हीं की सुरक्षा ही हमे अपनी सुरक्षा मालूम होने लगती है। जो किसी मूर्खतापूर्ण संप्रदाय को बनाए रखने के लिए भले ही जरूरी हो, मगर जब आप इन धारणाओं की हकीकत से भली भांति बाकिफ हो जाएं तो इनको मिटाए बिना कोई भी श्रजन कार्य नहीं किया का सकता। यह कार्य जो भी करेगा वह यथास्थिति बनाए रखने को अतुर समुदाय द्वारा निगेटिव माइंड अवश्य कहलाएगा। हमें ऐसे तानो से डरना नहीं चाहिए।
यह नवनिर्माण की अपनी एक प्रक्रिया है। जो पहले युद्ध के रूप हुआ करती थी जिसमे समय के साथ साथ बदलाव आए। और आज यह विषाणुओं जीवाणुओं तक आ पहुंची है। इस मिटाने की प्रक्रिया से अक्सर शांति व सौहार्द में जी रहे कॉलोनी वासियों को बुरा लगता हैं। प्रथमतया तो लोगों को इसका अहसास ही नहीं को पाता कि आखिर यह सब हो क्यों व कैसे रहा है।
उनका अपना घोंसला बिखरता नजर आता है। जो कि एक नवीन परिवर्तन मात्र है। लेकिन हमें बदलाव से डर लगता है। लोग जैसी भी हालात में हैं उसी को बनाए रखने के लिए संघर्षरत रहे यहां तक तो उन्हें अच्छा लगता है।
कुछ यही हाल वर्तमान में बहुसंख्य देशवासियों के साथ भी हुआ है। अक्सर विभिन्न रूप रंग व मुद्दों पर सड़क पर हंगामा करने वाले लोग स्थायित्व के लिए संघर्ष कर रहे होते हैं। यह स्थायित्व हमे अक्सर सुकून देता हैं। हम इसी को सच समझ बैठते और नतीजे में समय हमे पीछे छोड़ आगे निकलने लगता हैं। हम कुछ देर समय की उपेक्षा कर अपनी धारणा में ही बंधे रहना चाहते हैं मगर अस्तित्व पर संकट आते ही जब समय बहुत आगे निकल जाता है तो हम उस समय के पीछे पीछे भागने दौड़ने लगते हैं। इस भाग दौड़ में अक्सर अपनी धारणाओं में बंधे रहने वाले लोग पिछड़ जाते हैं। या हार मान कर अनंत की गहराई में गुम हो जाते हैं।
वर्तमान में यह प्रक्रिया संख्याभारी स्थायित्व वादी समुदाय को बखूबी जकड़े हुए है। इनको लगता है कि हम अपनी अवधारणा की रक्षा कैसे भी हो मगर करे जरूर।
हमारा घर मकान दुकान आदि सब इसी अवधारणा से बना हुआ है जो अब टूट रही। हम फिर हताश उदाश पराजित भाव से अपना अती सुंदर व महत्वपूर्ण इंसानी जीवन नष्ट कर लेते हैं।
जबकि होना यह चाहिए कि हम बदलाव का पूर्वानुमान लगाते हुए स्वयं को जरूरत के अनुरूप ढालते रहें। अक्सर इस पूर्वानुमान की कमी की अवस्था में लोग फिर से चिड़ियों के समान अवधारणा बनाने लगते हैं। जैसे आजकल वायरस की अवधारणा है। कोई कोरोना को करो- ना समझे बैठा है तो कोई किराऊना तो बहुत से भले मानस किराना भी समझ रहे हैं।ऐसा केवल इसलिए होता हैं कि हम अक्सर भूत काल को भवसागर मान सच स्वीकार करते हैं। यही हमारी धारणा बना जाता है। जबकि वह मात्र बीता हुआ लमहा है जिसे हमने अक्सर भोगा है। उससे जुड़ी अनुभूतियां हमे गुदगुदाती व रुलाती हैं। जबकि वर्तमान में सच्चाई बीता हुआ समय नहीं बल्कि वर्तमान है। वर्तमान में जीने की एक कला है जो स्कूलों में नहीं धर्माचार्यों के पास है। अर्थात जिस समाज के पास धर्म नहीं हो। जो समुदाय धर्म को अफीम व विज्ञान को भगवान मानता हो वह भला वर्तमान में कैसे जीना सीख सकता है। उसकी वर्तमान में जीने की चाबी तो अब शिक्षा विषयवस्तु निर्धारण करने वालों के हाथ चली गई।
ठीक यही काम कुछ मिस्लीडर्स के सहयोग से कई दशक पूर्व बहुसंख्यक हकबंचित समुदाय के साथ भी हुआ है। विडम्बना यह कि हक़बंचित समुदाय आज भी उसी चाबी के लिए संघर्ष कर रहा कि इसके पतन का मूल है। जबकि होना चाहिए कि वह वर्तमान में जीना सीखें। अगर संख्याभारी समुदाय या उसका कुछ हिस्सा वर्तमान में जीना सीख लेता है तो वह अपना रास्ता अपनी आवश्यकतानुसार बना सकता है। यह बीते समय को पकड़ने की नाकामी को भुला बिजयी भाव से सर ऊंचा कर जी सकता है। गौरवान्वित महसूस कर सकता है। ऊपरवाले का सुक्रिया अदा कर सकता है कि सर्वोच्च निर्माता की कला का रत्तीभर ही सही मगर अनुसरण तो किया। यकीन मानिए ऐसे लोगों से ईश्वर जरूर खुश होगा। क्यूंकि कोई भी पिता अपनी औलाद को संक्षम होते देख खुश होए बिना कैसे रह सकता है। जन्नत व स्वर्ग का रास्ता यही से जाता होगा। न केवल सर्वोच्च शक्ति को खुश करने का गौरव हासिल किया जा सकता है बल्कि हमारेे अपने साथी जो हैं अटके भूले भटके उनको तारने व खुद तर जाने की जिम्मेदारी का निर्वाह भी होना संभव बनने से कौन रोक सकता है।
*हमें अवधारणाओं का लाभ तभी तक प्राप्त होता है जब तक वे सम सामयिक बनी हुई हैं। अन्यथा वे खुद ही हमारे बुरे वक्त की कारक हो जाती हैं।*
आओ वर्तमान में जीना सीखें। छोड़ दें था में जीना। जो है वहीं सास्वत है। इसी का आलिंगन करें। यही हमारे भविष्य का निर्माता बनेगा। मदद मै करने को तैयार हूं।
छोड़ो कल की बातें कल की बात पुरानी.....
आपने अक्सर देखा होगा कि कोई भी व्यक्ति
सामाजिक जीवन में किसी व्यक्ति, वस्तु, स्थान, रिवाज इत्यादि को लेकर एक धारणा बनाकर रखता है। अगर उक्त में से कोई भी उसकी धारणा के अनुरूप परिणाम व प्रदर्शन करता है तो उसे खुशी होती है, लेकिन जैसे ही उसकी धारणा के विपरीत परिणाम और प्रदर्शन होता है तो उसे दुख भी होता है। कभी कभी आपकी किसी के प्रति नकारात्मक धारणा के वितरीत परिणाम और प्रदर्शन प्राप्त होता है तो आपको आश्चर्यजनक उल्लास की अनुभूति होती है। इसी अपेक्षित और अनापेक्षित धारणाओं को लेकर हम प्रेम और ईर्ष्या को जन्म देते। जो हमारे लिये संघर्ष और सदभाव के रास्ते स्थापित करती है।
आपने अपने आर्थिक जीवन में न जाने कितने बदलाव, उतार-चढ़ाव अपनी धारणों के अनुरूप और विपरीत देखें होगे। उदाहरणार्थ आपने अपनी निश्चित धारणा के अनुरूप कोई कारोबार प्रारम्भ करते हैं। आपकों आपकी धारणा के विपरीत शीघ्र लाभ प्राप्त होने लगा तो आपको खुशी होगी, लेकिन अचानक आपके कारोबार पर रोक लगा दी जाती है जिसके बारे में आपने सोचा तक नहीं था तो निश्चित ही आपकी धारणा को चोट लगेगी और आपको कष्ट होगा। ये धारणाएं ही हमें गुदगुदाती और रुलाती है।
राजनीतिक जीवन में तो हमारी धारणाएं रोज टूटती और बिखरती है। बहुजन समाज के लोगों की एक धारणा है कि संविधान के कारण उनकी सुरक्षा, आजीविका, और शिक्षा है। जिस कारण वे संविधान के विपरीत होते किसी कार्य को जानकर व देखकर उन्हें तकलीफ होती है, वहीं जब उनकी धारणा के अनुरूप कोई कार्य उसी संस्था द्वारा किया जाता है, जो संस्था उनकी धारणा विपरीत कार्य संपादित किया था, तो खुशी होती है। जबकि हमारी धारणाओं के अनुकूल हर कार्य संपादित नहीं होता।
धार्मिक जीवन में भी हमारी कुछ ऐसी ही अवधारणाएं बनी है या हमने बना रखी है कि अमुक अनुष्ठान संम्पादित करने से अमुक परिणाम प्राप्त होंगे जब हमारी धारणा के अनुरूप परिणाम प्राप्त होंगे तो हमें खुशी मिलती है, विपरीत परिणाम की अवस्था में दुख। एक सबसे महत्त्वपूर्ण धारणा की ओर ध्यानाकर्षण करूंगा विश्व में फैले हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, आदि धर्म के रूप में प्रतिस्थापित है जिसको लेकर हमारी अपनी अपनी धारणाएं हैं। जो जरूरी नहीं सही हो। इस्लाम, ईसाई, यहूदी, हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन इत्यादि को लेकर विद्यालय में जो हमारी धारणाएं निर्मित की गई उसमें और स्वनिर्मित धारणा में विरोधाभासी अवधारणाएं है। लेकिन जब मैं अपनी धारणा को लोगों के समक्ष रखता हूं तो लोग उसे स्वीकार नहीं करते क्योंकि उनकी धारणा और मेरी में अंतर है। लोग उपरोक्त को धर्म समझते हैं जबकि मैं विश्व का राजनैतिक बंटवारा जो प्राचीन काल में धर्म के प्रभाव के चलते किया गया था। लेकिन आज वैश्विक बंटवारा जनसंख्या, अमीरी, गरीबी के आधार पर है।
इस प्रकार आप देखेगेन कि धारणायेंहमें कितना सुख और कितना दुख देती है। ये सत्य है कि हम अपनी धारणाओं के अनुरूप अपना जीवन दर्शन तैयार करते हैं, जो दूसरे की धारणाओं के अनुरूप हो, यह जरूरी नहीं है। जो अपनी धारणाओं में सदैव लचीलापन रखते हैं वे समय के साथ गतिशील रहते हैं, जो अपनी धारणाओं के प्रति दृढ़ रहते हैं वे हमेशा परेशान और पीछे रहते हैं। जो अपनी धारणाओं को सदैव बनाते बिगाड़ते रहते है वही लोग नवसृजनकर्ता होते हैं।
इसलिये समय और परिस्थितियों के साथ अपनी धारणाओं को अपडेट करते रहे। अन्यथा ये धारणाएं बहुत ही कष्टकारी साबित होती है।
जय भारत भूमि
स्वामी संबोधि आनंद