Monday, 2 February 2026

भाव और तरंग परमात्मा द्वारा भेजी गई तरंग मात्र है, परमात्मा के दर्शन नहीं है।

 व्यक्ति स्वयं न तो क्रोध उत्पन्न कर सकता है, न प्रेम, न दया न करुणा, कोई बाहरी तरंग आती है, झकझोरती है, भाव उत्पन्न करती है। जो व्यक्ति इन तरंगों को निष्प्रभावी करने की क्षमता हासिल कर लेता है, उसे हम महात्मा मान लेते हैं। लेकिन जिसे हम महात्मा मानकर उसका अनुसरण करते हैं, वह भी दया, करुणा, क्रोध, भय आदि से प्रभावित होता है। बस बौद्धिक स्तर से उनका नियंत्रण स्थापित करने का अभ्यास होने के कारण प्रदर्शन नहीं करता है। प्रदर्शन पर उसका कठोर अभ्यास के कारण  नियंत्रण हो जाता है। लेकिन वह उन तरंगों से प्रभावित न हो ऐसा नहीं हो सकता। जब क्रोध की तरंग आएगी तो क्रोध ही उत्पन्न होगा, दर्द की तरंग आएगी तो दर्द ही होगा, करुणा की तरंग आएगी तो करुणा से बरसेगी, दुख की तरंग आएगी तो चारों ओर दुख ही दुख नजर आएगा। लेकिन ऐसा नहीं हो सकता कि सदैव एक ही तरंग के अधीन बने रहे । इन तरंगों से निकलने में चेतना मदद करती है। हम जिस तरंग के प्रभाव में होंगे, हमें वैसी ही अनुभूति होती है। क्रोध की तरंग के प्रभाव में दया, करुणा और प्रेम का भाव उत्पन्न नहीं हो सकता है। इन्हीं तरंगों पर नियंत्रण स्थापित करने का अभ्यास और उन्हें अपने अनुसार दिशा देने का अभ्यास योग और साधना है। वहीं योगी होता है।            इससे ऊपर भी एक अवस्था है सहजता की। जब इन तरंगों को आते जाते सहज भाव से देखते है, तो यह हमारी सरलता बन जाती है। यह सहजता और सरलता  इस बात पर निर्भर करती है कि हम अपने अभ्यास के कारण किस तरंग के प्रभाव में ठहरे हुए हैं। हालांकि कि कोई भी तरंग ठहरती नहीं है वह बड़ी ही चंचल और चलायमान होती है,। लेकिन अम्यास से हम उस पर नियंत्रित स्थापित करते है यही कारण है कि एक कसाई बड़ी सहजता से हिंसा कर लेता है। वहीं दया और करुणा की तरंग के प्रभाव में ठहरा व्यक्ति हिंसा नहीं कर पाता। लेकिन एक सामान्य व्यक्ति ( गैर अभ्यासी) इन तरंगों के प्रभाव से प्रभावित होकर अपने प्रदर्शन में बदलाव करता नजर आता है। हम  अक्सर वैसे हो जाते हैं, जैसी संगति और संस्कार का हमें अभ्यास होता है। ये तरंगें कैसे उठती है, कौन भेजता है? कहां से आती है ? यह जानना और देखना कठिन होता है।
नींद और मृत्यु की अवस्था में तरंग निष्प्रभावी हो जाती है और पदार्थ स्थिर हो जाता है।  कटु भाषा में कहें तो यही स्थिरता मुर्दापन है, तरंग उठेगी तो द्वंद होगा, अब उसके  परिणाम सुखद हो सकते या दुखद यही द्वंद जीवंतता है‌। जहां द्वंद नहीं है वहीं या तो मृत्यु होगी, बेहोशी या गहरी निद्रा होगी। होश की अवस्था में इसी को शांति और सुकून समझ लेते हैं। 
जिस तरह हम गहरी नींद के बाद जब उठते हैं तो बिल्कुल शांत और तरोताजा महसूस करते हैं, लेकिन अगर आप किसी तरंग के प्रभाव में सोते हैं तो निश्चित ही आप सोने के बाद भी पीड़ा महसूस करते हैं। ठीक यही स्थाई निंदा , जिसे हम मृत्यु समझते हैं, ऐसा  गहरा अंधकार होती है, जहां न कोई तरंग होती है, न कोई भाव होता है। सिर्फ शून्यता दिखाई देती। इसी शून्यता ( अंधकार) में जीवन को पुनः तरोताजा कर नवीन रूप से तैयार कर नये द्वंद के लिए तैयार किया जाता हैं। यही अंधकार प्रतिक्षण तंरग भेजकर पदार्थ में द्वंद पैदा करता है। इसी द्वंद से ऊर्जा उत्पन्न होती है, जो पदार्थ को संचालित करती है। जब द्वंद चरम पर होता है तो ऊर्जा उदासीन हो जाती है और पदार्थ सुप्तावस्था में चला जाता है। यही सुप्तावस्था गहरी नींद और मृत्यु होती है। लेकिन इसी सुप्तावस्था की तरंग ऊर्जा को फिर से द्वंद के लिए तैयार करती है। जिसे हम न देख पाते हैं न जान पाते हैं। उदाहरणार्थ जब हम सोते हैं तो हमें कभी पता नहीं होता कि हम सो रहे हैं। सिर्फ एक अंधकार घटित होता है। जब हम जागते हैं तब हमें पता चलता है कि हम सो रहे थे, हो रहे हैं यह कभी स्वयं को पता नहीं चलता। जीवन के इसी रहस्य को हम बौद्धिक क्षमता से जानने का प्रयास करते हैं। लेकिन बौद्धिकता, भाव, चेतना इत्यादि सब जीवन के अंग है। और कोई भी अंग सम्पूर्णता को नहीं जान सकता है। तो परमात्मा को कैसे जान पाएंगे? परमात्मा को हम सिर्फ कल्पनाओं और भावनाओं से महसूस करने का नाटक भले करते रहे। इस शरीर ( स्थूल रूप) में रहकर उस परमात्मा को देख ले यह नामुमकिन है। परमात्मा का जो दर्शन हमें भावों, अनुभूतियों के रूप में होता है वह भी उसी परमात्मा की तरंग मात्र है, परमात्मा नहीं है। इस शरीर रूप में रहते हुए परमात्मा को नहीं जाना जा सकता है। जो कहते हैं कि हमें परमात्मा के दर्शन हुए उन्हें मात्र उसकी एक तरंग की उमंग मात्र है। अगर ये उमंग सुखद होती है तो आंनंद की अनुभूति होती है और दुखद होती है तो दुख की अनुभूति होती है। जब न कोई उमंग होती है न कोई तरंग होती है तो शांति की अनुभूति होती है।
धर्म एक ऐसी समग्रता और शून्यता है जहां सब-कुछ लुटकर सब-कुछ मिल जाता है। हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, यहूदी, पारसी और बौद्ध और जैन होना धार्मिकता नहीं है। धार्मिकता तो एक ऐसी समग्रता है जहां मानव का हस्तक्षेप हो ही नहीं सकता है। धर्म अध्यात्म की वह चरम ऊंचाई है, जहां पर प्रेम- घृणा, सुख-दुख, विध्वंस और सृजन, अपना-पराया, छोटा -बड़ा, ऊंच-नीच, अमीर-गरीब क्रोध-अक्रोध और अहंकार- दया -करुणा सब गिरकर चूर चूर हो जाते। सब ठहर जाता है। सब शून्य हो जाता है।‌ व्यक्ति के पास सबकुछ होने के बाद भी बिल्कुल शून्य, खाली, शांत, स्तब्ध हो जाता है। न कोई तरंग उठती है न कोई उमंग जगती है। तरंगों की भयंकर विभीषिका भी उसकी शून्यता को नष्ट नहीं कर पाती है। तब वह धार्मिक हो पाता है। परमात्मा दर्शन इसके ऊपर का चरण है। यहां तो अभी तरंगों की उमंग से मदहोश है। परमात्मा का क्या जानेंगे क्या उसके दर्शन होंगे?
।।स्वामी संबोधित आनंद।।