Friday, 1 June 2018

निजीकरण और लुटते संसाधन, नष्ट की कगार पर खड़ा सम्पूर्ण प्राणी जगत

जब देश की शासन- प्रशासन की बागडोर सवर्णों के हाथों में थी तो देश में राष्ट्रीयकरण देशप्रेम था। जैसे ही देश के शासन प्रशासन की बागडोर बहुजनों के हाथों मे आने लगी वैसे ही देश के साधन संसाधन निजी हाथों को बेचना देशप्रेम हो गया। प्राकृतिक संसाधनों को निजी हाथों में बेचने से रोकना देशद्रोह व नक्सलवाद हो गया।

आज हमारे देश की सरकार को देश की कंपनियों पर भरोसा नहीं रहा इसीलिए पूरे भारत में विकास के नाम पर जो संसाधनों का दोहन हो रहा है वह सारा का सारा विदेशी कंपनियों के माध्यम से किया जा रहा है। विदेशी कंपनियां जिस तरह भारी भरकम मशीनों द्वारा देश के संसाधनों का दोहन कर देश की अमूल्य धरोहर व लाभांश विदेश लिये जा रहे है ,उससे यही लगता है कि वह दिन दूर नहीं कि भारत एक रेगिस्तान का रूप धारण कर लेगा। इंसान, पशु-पक्षी एक एक बूंद पानी व सांस लेने को तरसते नजर आयेंगे।
जरा सोचो कि जिस प्रकार देश में लम्बी चौड़ी सड़कें, ऊंचे ऊंचे भवन बनाने के लिए प्रतिवर्ष 30000 हेक्टेयर उपजाऊ भूमि विकास के नाम पर की जा रही बर्बाद, लगातार बढ़ती हुई जनसंख्या, टूटते हुये परिवार, सुविधा भोगी होता इंसान, घट रही कार्य क्षमता सम्पूर्ण प्राणी जगत के लिए कितना खतरनाक होगा, इसकी कल्पना मात्र से रोंगटे खड़े हो जाते है।

भाइयों मेरी एक अपील है कि अभी भी समय है कुछ नीचे लिखी अपीलों को गौर करते हुए आने.वाली पीढ़ी को बचा सकते है।
1- सीमित सुविधाओं का प्रयोग करे।
2- अनावश्यक जल बर्बाद न करें।
3- वृक्षारोपण में तेजी लाये।
4- धरातल को पत्थरो में.न बदले।
5- संयुक्त परिवारों को स्थापित करें।
6- संविधान द्वारा निर्धारित मौलिक अधिकारों की अपेक्षा कर्तव्यों पर ध्यान दे।
7- नदियों को प्रदूषित होने से बचायें।
8- कम से मशीनों का उपयोग करे।
9- आवश्यकता से अधिक वस्तुओं का संग्रह न करे।
10-भोजन में फल फूल का अधिक सेवन करें। कंपनी निर्मित भोज्य पदार्थों का त्याग करें।

स्वामी संबोधि आनंद।

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