Wednesday, 16 May 2018

प्रकृति से खिलवाड़, परिणाम भुगतता संसार

वाह रे! मानव तू कहाँ पहुंच गया ? जिन हाथों से सैन्धव सभ्यता से लेकर किले व ताज जैसे महल खड़े कर दिये। आज उन्हीं हाथों से भरोसा कैसे उठ गया? जो मशीनों का सहारा लेने पर भी ऐसे पुल बना जो अल्पावधि तक भी न टिक सके। कभी क्यों नहीं सोचता कि तेरे इस विकास में अपने ही दब रहे हैं। क्यों तेरा हृदय द्रवित नहीं होता है?  जब तेरे विकास के नीचे अपने चिल्लाते है। क्या करूं ? तेरे इस विकास का जहाँ अपने ही दफन हो रहे हो। क्या करूँ तेरी इस ऊंचाई का जहाँ से अपने ही गिर रहे हो। तुझे तो रहने के लिए ईश्वर ने धरती दी थी, सांसो व भोजन के लिए वृक्ष दिये है। फिर क्यों ऊंचाई के लिए तड़प रहा है? दो पग दिये थे चलने के लिए फिर क्यों तेज  भाग रहा है? पानी मिला है मुफ्त में फिर क्यो उसे बांध व बंद कर अपने ही जीवन में जहर घोल रहा है? कभी क्यों नहीं सोचता कि बिन हवा पानी के एक पल जी नहीं सकता, अपनी किस ऊंचाई के लिए नदी,वृक्ष,व धरती को ही नष्ट कर रहा हैं?

स्वामी संबोधि आनंद

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