आज कल हम जिसे शिक्षा समझ कर अपने बच्चों को दिला रहे हैं वास्तव में वह creative education न होकर straight forward education है जहां बच्चे को पढ़ाने लिखाने के नाम पर सब कुछ पका पकाया परोस कर रखा जा रहा है। बच्चे का बौद्धिक स्तर खोजी न होकर आश्रित बनाया जा रहा है।
हो सकता है मेरी यह बात हर किसी के समझ में नहीं आये पर मैं एक शिक्षक होने के नाते यह कहना चाहता हूं कि यदि हम सुविधा भोगी व विलासी पद्धति वाले विद्यालयों से मुंह नहीं मोड़ा तो आने वाले कुछ वर्षों में ही आप का बच्चा पूर्ण भावना रहित उदण्ड प्रवृत्ति के होने से कोई नहीं रोक सकता।
जरा खुद सोचो कि आपको क्या तीन चार वय की उम्र में बतायी गयी कोई बात याद है? जहां तक मेरा निजी अनुभव है कि मुझे तो उक्त उम्र का कुछ भी याद नहीं है। हम यह भूलते जा रहे कि बच्चे की शिक्षा से अधिक महत्वपूर्ण बच्चे की शारीरिक क्षमता का विकास भी है। जोकि अधिक से अधिक आउटडोर गेम्स खेलने से विकसित होती है। जिसे हमने स्वयं बच्चों को घरों में कैद कर समाप्त करने में लगे हैं। यह विषय बहुत ही जटिल और सोचनीय है कि हम बच्चों को क्या सौंप रहे हैं। जरा आप खुद सोचो जब आप बृद्ध या बीमार हो और इस स्थिति में न हो कि एक गिलास पानी उठाकर ले सके तब आपकी सोच यही होगी आपका कोई बेटा बेटी आपके साथ हो और आपकी देखरेख करें पर आपके अपने बेटे आपको सक्षम होते हुए भी एक गिलास पानी देने के लिए आपके पास नहीं होंगे, जानते हैं क्यों? क्यों कि यह सब आपने आधुनिकता व शिक्षा के नाम पर अपने बच्चों को तीन वर्ष की अवस्था में ही जो दिया था वहीं वह आपको वापस कर रहा होता है। जिस तीन वर्ष की उम्र में आपके बच्चे को प्यार दुलार के साथ उछल कूद की आवश्यकता थी उस उम्र में आप अपने बच्चे को शिक्षा के नाम पर उसे विद्यालय भेजकर अपने लाड़-प्यार से दूर रखा और आपने अपने बच्चों के साथ कोई भी हमदर्दी नहीं रखी तो फिर वही बेटा आपके साथ क्यों हमदर्दी रखें। जिस प्रकार आपने अपने बच्चों को सर का बोझ समझकर व्यवसाय में लिप्त आकर्षित करते विद्यालयों को सौंप दिया था जहां वह अबोध बच्चा आपके प्यार व मां की ममता को तरसता रहता होगा ठीक उसी प्रकार जब आप एक गिलास पानी लेने को तरस रहे होते हैं तब वहीं बच्चा जिससे आप एक गिलास पानी की उम्मीद कर रहे होते हैं आपसे बड़े प्यार से कहता है कि पापा नौकर आ गया है जो आवश्यकता हो ले लेना। सोचो उस समय आपके दिल में क्या गुजरती होगी जिस औलाद को आपने इस उम्मीद से पाला था कि मेरे बुढ़ापे का सहारा बनेगा पर वह भी आपकी तरह भावना रहित होकर भौतिक संसाधनों के पीछे दौड़ रहा होता है।
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