Monday, 26 October 2026

मिट्टी का आनन्द और आत्मबोध क्रंदन


धूल भरी उस सूनी राह पर, बैठी एक बिटिया भोली,
मैली-कुचैली काया उसकी, माटी की पहनी चोली।
चेहरे पर आनंद अनूठा, अधरों पर मुस्काती तान,
तोतली बोली में गाती थी, वह कोई नन्हा गान।
खिसक रही थी उँगलियाँ उसकी, माटी के उस ढेर पर,
हँसती थी वह खिल-खिल करके, हर छोटी सी मुंडेर पर।
दुनिया के सब ऐश्वर्यों से, भारी उसका वो सत्कार,
धूल-धूसरित उस आँगन में, बिखरा था निष्कपट प्यार।
तभी कड़कती बिजली जैसी, भाई की आवाज़ पड़ी,
"चल लड़की, घर के अंदर चल !" डांट वहाँ पर तेज़ पड़ी।
सहम गई वह नन्ही कलिका, सहम गया वो तोतला स्वर,
काँप उठे वो नन्हे काँधे, सहम गया उसका अंबर।
झर-झर-झर-झर आँसू टपके, धूल सने उन गालों पर,
जैसे झरने की धार गिर रही हो, कोमल से उसके  गालों पर।
सिसक उठी वह भोली मूरत, रुँध गया उसका कंठ वहाँ,
उस रुदन में सुलग रही थी, मासूमियत की पावन ल्हा।
सिसकी में कोई रोष नहीं था, न था कोई प्रतिवाद वहाँ,
बस जलती एक हूक उठी थी, मौन हुआ था नाद वहाँ।
माटी का साम्राज्य ढहा था, रोती थी वह ज़ार-ज़ार,
सिसक रही थी उस कोने में, मिटा सलोना एक संसार।
देख बहन का विकल क्रंदन, भाई का दिल काँप उठा,
भीतर सोया प्रेम अचानक, अश्रु बन कर जाग उठा।
लगा सोचने— "मैंने क्यों इस कोमल मन को ठेस दी?
इसकी पावन खुशियों को क्यों, मैंने ऐसी सीख दी?"
दौड़ पड़ा वह, भर बाहों में, रोती उस बहना को उठा,
धूल पोंछकर गालों की, वो खुद भी रोने लगा वहाँ।
"माफ़ मुझे या कर दे बहना," भरी भाई की चेतना में ग्लानि,
हँस दी बहना, रो दिया भाई भर दिल में आत्मग्लानि।।
मेरे जीवन की पहली कविता। जो आज मुझे अपनी डायरी में लिखी मिली। जब मैं बीए द्वितीय वर्ष का छात्र था। एक गली में खेलती चार पांच वर्ष लड़की के आनंद को देखकर रची थी। उसके भाई की डांट से उसके आनंद पर पड़े प्रभाव को देखा और दिल से कविता फूटी। मैं जब भी उस लड़की को याद करता हूं तो उसकी मासूमियत आज भी नजरों से गुजर जाती है। हो सकता है वह लड़की इस समय तीस से बत्तीस वर्ष की हो गई हो। 

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