Monday, 2 November 2026

सितमगर ऐसा मिला मुझे, वह मेरे लिए कुछ खास हो गया।

सितमगर के सितम से प्यार हो गया,
दर पर खड़ा था उसके, फ़ना हो गया।
मर गया उसके दर पर, दो अश्क भी न झलके,
इतना सितम कर दे वो, कब्र में आकर हंस दे,
उसकी हंसी पर मैं वहीं कुर्बान हो गया,
सितमगर के सितम से प्यार हो गया।
भटकती रही रूह दर-दर, कहीं ठिकाना न मिला,
उसके दर पर आने का कोई अब बहाना न मिला।
वो बेवफा हुआ तो क्या, मेरी वफ़ा का भरम रहा,
मिट गए हम मगर वह मेरे दिल पर कुछ करम कर गया।
सितमगर के सितम.....
कब्र की मिट्टी भी अब तो, उसका नाम पुकारती है,
हवाएं जो गुज़रती हैं, उसकी ज़ुल्फ़ें संवारती हैं।
उसे पाना मुकद्दर में नहीं था, तो न सही,
उसकी बेरुखी का ज़हर ही, मेरा आराम हो गया।
सितमगर के सितम से प्यार.......
ज़माने ने पूछा कि क्या मिला तुम्हें मोहब्बत में,
हमने हंस कर कहा, एक हसीं मौत मिल गई सौगात में।
वो दूर होकर भी मेरी हर धड़कन के पास है,
उसका दिया हर ज़ख्म, मेरे लिए सबसे खास है।
न आएगी वह कब्र में भी मेरी, पड़े पड़े कब्र में यह एहसास हो गया।
सितम्बर के सितम .......

अब तो रूह भी सजदे में झुकी रहती है उसकी चाह में,
उम्र गुज़र गई, और मौत खड़ी है अब भी उसी राह में।
जिस राह से वह गुजर गया, वहां का मंजर कुछ खास हो गया......
सितमगर के सितम से...
सितमगर मिला मुझे कुछ ऐसा।
मेरे लिए कुछ खास हो गया।
सितमगर के सितम से प्यार हो गया.....


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