Tuesday, 6 October 2026
महाभारत हमारे अंदर के द्वंद का प्रतिबिंब है
महाभारत हमारे अंदर के द्वंद का प्रतिबिंब है। कर्म के बिना शरीर नहीं चलता है। कर्म के दो ही स्वरूप है करना या न करना। शरीर करेगा या न करेगा। लेकिन कर्म के दोनों स्वरूप परिणाम जरूर देते हैं। जब हम निज स्वार्थ को ध्यान में रखकर कोई कर्म करते हैं तो वह कर्म पाप बन जाता है और जब हम कोई कर्म संसार हित में रखकर करते हैं तो वहीं कर्म पुण्य बन जाता है। लेकिन जब कोई कर्म बिना परिणाम की आशा रखकर करते हैं तो वहीं कर्म निष्काम हो जाता है। यही निष्काम भाव से किया गया कर्म व्यक्ति को अकर्ता बना देता है। गीता का यह सार व्यक्ति के अंदर चल रहे द्वंद को समाप्त कर परमात्मा के मिलन का रास्ता बना देता है। मेरी दृष्टि में महाभारत कोई घटना नहीं है। न ही पाण्डव और कौरव कोई व्यक्ति है। बल्कि पाण्डव हमारी ज्ञानेन्द्रियो के प्रतीक है और कौरव हमारे अंदर की सैकड़ों बुराइयों की प्रतीक है। महाभारत कोई जमीन में लड़ा गया युद्ध नहीं है, बल्कि हमारी ज्ञानेन्द्रियों द्वारा बुराई से लड़ा गया युद्ध है। महाभारत के पात्र और घटनाएं लोगों को समझाने का एक तरीका है। क्योंकि बुद्धि सदैव अपना एक प्रतिबिंब बनाए बगैर किसी अमूर्त स्वरूप को नहीं समझ सकती है। इसलिए महाकाव्य महाभारत के रचनाकार ने हमारी इंद्रियों और बुराईयो की जंग को काल्पनिक पात्रों के माध्यम से उकेरा। व्यक्ति अपनी ही बुराइयों से घिरा हुआ है। उन्हीं से मित्रता करता है और उन्हीं से शत्रुता करता है। लोभ, मोह, लालच, क्रोध, अहंकार से उस समय तक मित्रता रखता है जब तक कृष्ण ( चेतना) रूपी कोई गुरू उसे यह नहीं बताता है कि तुम अपनी ही बुराइयों के कारण दुखी हो। जैसे जैसे व्यक्ति को अपनी बुराइयों का ज्ञान होता जाता है वैसे वैसे अंदर महाभारत घटित होने लगता है। कोई महाभारत जीत लेता है और कोई इसी चक्रव्यूह में फंसकर लालची, लोभी, अहंकार, हिंसक, मोही हो जाता है। कर्म का स्वभाव है कि आप जब तक संसार के सुख की कामना के साथ कर्म नहीं करते तब तक आप भी सुखी नहीं रह सकते हैं। निज स्वार्थ कर्म आपको सदैव दुख ही देगा। आपकी बुराईयां आपके अंदर ज्ञानेन्द्रियों से महाभारत करती रहेगी। ज्ञानेन्द्रियों का स्वभाव ही ऐसा है कि आपके चाहने या न चाहने से अपने स्वभाव को नहीं बदल सकती है। कान है तो सुनेंगे ही आप के चाहने से नहीं होगा कि वे न सुने। आंख है तो देखेगी ही, आपके चाहने से देखना बंद नहीं करेगी। आपकी ज्ञानेन्द्रियों का जो कार्य है वह करेगी आप उसे रोक नहीं सकते। ज्ञानेन्द्रियो के कर्मो से प्रभावित या अप्रभावित होना आपकी चेतना तय करती है और बुद्धि उसका विश्लेषण करती है। यही संसार का नियम है, यही महाभारत की कथा है और यही गीता का सार है।
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