मैं दावे के साथ कहता हूं कि प्राइवेट स्कूलों में भले लिए बच्चों को सूचनाओं से भर दिया जाता हो लेकिन शिक्षा अच्छी नहीं थी जाती।अगर प्राइवेट विद्यालयों की शिक्षा बेहतर है तो आज हर व्यक्ति अपने दायित्वों से भाग क्यों रहा है? क्यों संवेदनशून्य हो रहा है? क्यों व्यक्तिवादी , स्वार्थी हो रहा है। इस चरित्र के जो भी लोग हैं, उनकी पृष्ठभूमि का अवलोकन भी तो कर लो, कि वे किन विद्यालयों की फसल है? सरकारी अधिकारी, कार्मिक और शिक्षक अधिकांशतः प्राइवेट विद्यालयों से निकलकर सरकारी सेवा दे रहे हैं। जैसी सेवा दे रहे हैं वह किसी से छिपा नहीं है। अगर प्राइवेट विद्यालयों ने सही शिक्षा दी होती तो आज वे कामचोरी करते नजर नहीं आ रहे होते। लोग सरकारी सेवकों को कोसते नजर नहीं आ रहे होते। अब बच्चे को बचपन से जैसा सिखाया पढ़ाया गया है। वही तो वह प्रदर्शित करेगा। प्राइवेट विद्यालय कोई समाज सेवा नहीं कर रहे हैं। वे शिक्षा का व्यवसाय कर रहे हैं। क्या कोई व्यक्ति सूचनाओं का संग्रह कर अंक हासिल कर लेने मात्र से शिक्षित हो जाता है? सरकारी विद्यालयों या कार्यालयों में कर रहे कामचोरी की बात छोड़िए प्राइवेट विद्यालयों में पढ़ें लिखे लोग अपने माता पिता व पारिवारिक दायित्वों से बचते नजर आ रहे हैं। वे उन माता पिता को ठोकर मारते नजर आते हैं जिन्होने अपनी सारी उम्र अपने बच्चे को यह सोचकर कर प्राइवेट में पढ़ाते हैं कि बड़ा होकर उनका सहारा बनेगा। जब वह इस काबिल हो जाता है कि वह अपना और अपने परिवार का भरण पोषण कर सकता है तो वह अपने बूढ़े माता पिता को दर दर की ठोकरें खाने को छोड़कर भाग खड़ा होता है। यही हाल बेटियों और बहुओं का है। अध्ययन करके देख लो। उन्हें सिर्फ अपना स्वार्थ और धन नजर आता है। जब प्राइवेट विद्यालय अच्छी शिक्षा दे रहे तो यहां से पढ़े लिखे लोग का एक अच्छा चरित्रवान व्यक्तित्व का निर्माण क्यों नहीं हो पा रहा है ? वे पढ़े तो प्राइवेट विद्यालयों में है लेकिन नौकरी सरकारी स्कूलों में कर रहे हैं। प्राइवेट स्कूलों में पढ़ें शिक्षको का मैंने बहुत नजदीक से अध्ययन किया है कि वे बच्चे से कोई लगाव नहीं रखते, केवल उन्हें अपने वेतन से लगाव रहता है। इसलिए सरकारी विद्यालयों में शिक्षा का स्तर गिरा है। सरकारी विद्यालयों में पढ़ाई न होने का मुख्य कारण प्राइवेट विद्यालयों से पढ़कर निकले शिक्षकों का सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चों से आत्मीय लगाव न होना। अगर किसी सरकारी विद्यालय से पढ़ा कोई शिक्षक अपने कर्तव्य का निर्वहन करता है तो उसे प्राइवेट विद्यालयों से पढ़कर निकले शिक्षक और अधिकारी इतना परेशान कर लेंगे कि वह मजबूर होकर उसी राह पर चलने लगता है। अगर सरकारी सेवाएं समाप्त हो जाती है तो मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि प्राइवेट विद्यालयों से पढ़ें लिखे कामचोर और दायित्वविहीन लोग अपना जीवन यापन गुलामों की तरह न करते नजर आए, तब यह बात कहना कि कौन जीवन कौशल से जोड़कर शिक्षा दे रहा है और कौन दायित्व विहीन बनाने की शिक्षा दे रहा है। प्राइवेट में पढ़ें अधिकांश लोग भावनाओं और संवेदनाओं से शून्य होते हैं। वे हर व्यक्ति को अपना शिकार समझते हैं। अवसर देख सबसे बड़े हितैषी लगेंगे लेकिन जैसे ही काम खत्म वैसे ही पहचान खतम। यही हाल प्राइवेट में पढ़ें शिक्षको ने सरकारी विद्यालयों के कर दिए हैं। जैसा उन्होंने प्राइवेट विद्यालयों से सीखा है वैसा ही वे सरकारी विद्यालयों में सिखाते हैं। समाज को स्वार्थी और संवेदन शून्य बनाते हैं।
शैलेन्द्र कुमार
वरिष्ठ जिला उपाध्यक्ष
राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ
कानपुर नगर
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