Monday, 18 August 2025

राजतंत्र बनाम लोकतंत्र

जब दुनिया में राजतंत्र था तब लोगों को इस बात की कोई चिंता नहीं होती थी कि कौन राजा बनेगा, कौन नहीं । राजाओं को एक दूसरे राजाओं से लड़नेऔर लूटने से आय हुआ करती थी। थोड़ी बहुत आय कृषि से हो जाती थी। जिससे वे अपना और अपनी सेवकों और सेनाओं का पोषण करते थे। लोग भी यह जानते थे कि अधिक धन एकत्र करना उनके लिए खतरा ही था। पता नहीं कब कौन लूटेरा आए और लूट ले जाए। लोग अधिकांश खानाबदोश जीवन जीते थे। वे एक जगह बंधकर नहीं रहते थे। जहां उन्हें भोजन पानी की व्यवस्था मिलती वही अपना डेरा डाल देते। वे पूर्ण रूप से स्वतंत्र और स्वच्छंद जीवन जीते थे। न उन्हें कुछ पाने की लालसा थी न कुछ खोने की। केवल जीवन जीने की जद्दोजहद थी।‌ कौन राजा मारा गया और कौन राजा बना कोई मतलब नहीं था। न ही इन सबका उनके जीवन में कुछ खास प्रभाव था।‌
        शासकों ने लोगों की इस स्वतंत्रता को देखा और सोचा समझा, और लोगों के जीवन में राजनीति का प्रभाव कैसे पड़े इसके लिए कुछ ऐसे कार्य किए जिससे लोगों पहचान सुनिश्चित हो।
1- नामकरण।
2- आवासीय व्यवस्था।
3- पता निर्धारण ।
4- भूमि बंदोबस्त।
5- शैक्षिक व्यवस्था 
6- संवैधानिक व्यवस्था।
7- लोकतंत्र 
8- सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक व्यवस्था।
9- मुद्रा 
10- बैंकिंग व्यवस्था 
इत्यादि व्यवस्था शासकों ने खड़ी की। जिसके माध्यम से लोग धीरे-धीरे कब बंधते चले गये यह उन्हें पता ही नहीं चला। वर्तमान में विकास एक ऐसा शिगूफा है जिसके माध्यम से लोगों में लालसा भरी जाती है और लोगों को धीरे-धीरे शासकों के अधीन रहने को प्रेरित किया जाता है। नगरीकरण इसी प्रेरणा का एक जीता जागता उदाहरण है। जहां हर व्यक्ति पूर्णतः शासन व्यवस्था पर आश्रित है। चाहे वह व्यापार करता हो, सेवा करता हो, नौकरी करता हो, या राजनीति करता हो।सबके सब पूर्ण रूप से बंधे हुए हैं। कहीं भी स्वंतत्रता नजर नहीं आती। कल जो शासक एक दूसरे शासकों को लूटकर अपने राज्य का खर्चा चलाते थे आज उन्हें लूटने की कोई जरूरत नहीं रही। उन्होंने ऐसी व्यवस्था खड़ी कर दी कि लोग विकास केनाम पर रातों दिन मेहनत कर रहे हैं और अपनी कमाई का अधिकांश‌ हिसूकर के रूप में शासकों को स्वेच्छा से दे रहे हैं। जो नहीं देता उसे कर चोरी के नाम पर जेल में कैद कर दिया जाता है। जहां राजतंत्रीय व्यवस्था में लोगों के जीवन में राजाओं के कृत्यों का कुछ खास प्रभाव नहीं पड़ता था। आज वही लोकतांत्रिक व्यवस्था में हर व्यक्ति राजनीति से प्रभावित हो रहा है। कटु सत्य है लेकिन समझ से परे। विकास का मतलब है लोगों की शासकों पर उत्तरोत्तर बढ़ती निर्भरता विकसित का तात्पर्य लोगों की शासकों पर पूर्ण निर्भरता। लोकतंत्र में आप महसूस कर रहे होंगे कि लोगो की निर्भरता शासकों पर बढ़ती ही जा रही है। उनकी निर्भरता का फायदा शासक वर्ग भरपूर फायदा उठा रहा है। लोगों की कमाई से प्राप्त कर से अपनी व्यवस्था को मजबूत करते जा रहे हैं तथा लोगों को रातों-दिन विकास के नाम पर भगा रहे हैं।

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