🌹🌹🌹 *व्यवस्थागत परिवर्तनों को देखो और समझो, तब आगे बढ़ो।* 🌹🌹🌹
योजनाकारों की बदलती योजनाएं और पीछे पीछे भागते लोग।
एक समय था जब लोगों वस्तु विनिमय के माध्यम से अपनी दैनिक आवश्यकताओं पूर्ति करते थे। तब लोगों के पास नाना प्रकार की वस्तुएं संजोकर रखते थे। तब भूमि और कृषि उत्पादों की बड़ी महत्ता थी। राजसत्ता में बैठे और उनके कारिंदे लोग हर संभव कृषि उत्पादों और जमीन पर आधिपत्य को लेकर प्रयासरत थे। उनको देखते हुए आम व्यक्ति भी कृषि और कृषिगत उत्पादों व कृषि योग्य जमीन को महत्व देते थे।
समय बदला चालाक और होशियार लोगों ने औद्योगिक क्रांति के महत्व को समझा और कृषिगत उत्पादों और वस्तुओं के एकत्रीकरण को करेंसी रूपी सुविधा में बदलने का खेल शुरू कर दिया। जमीनदारी प्रथा समाप्त कर मेहनत मजदूरी करने वाले लोगों को जमीनें आवंटित कर दी गयी। लोग बड़े खुश हो गये कि सरकार ने उनके लिए जमीनें मुहैया करा दी। नि:संदेह जमीन जीवन के लिए सबसे महत्वपूर्ण अवयव है लेकिन योजनाकारों ने जमीन को महत्वहीन बना मानव निर्मित करेंसी और औद्योगिक उत्पादों को महत्वपूर्ण स्थान देने लगे। क्योंकि इसी महत्व में उनका फायदा और लोगों का शोषण सम्भव था। यह देख लोगो ने औद्योगिक उत्पादों को महत्व और नौकरियों को महत्व देना प्रारम्भ कर दिया। जब तक आम व्यक्ति औद्योगिक उत्पादों और नौकरियों के महत्व को समझता -समझता और इसमें अपना उचित स्थान बनाने का प्रयास शुरू किया। इसके माध्यम से लोग थोड़ा मजबूत होना शुरू क्या हुए उनके सामने सुविधा रूपी एक ऐसा वैभव लाकर खड़ा कर दिया गया कि लोग उसके पीछे भागने लगे और अपनी जमा पूंजी पुन उन्हीं योजनाकारों की ओर प्रवाहित करें लगे। अब जब लोगों ने औद्योगिक उत्पादों और सरकारी नौकरियों के फायदों के चक्कर में फंसकर अपने मूल आत्मनिर्भर व्यवस्था को अपने ही हाथों नष्ट कर गौरवान्वित महसूस करने लगे। उनको यह गौरव महसूस करने के कुछ ही दिन हुए थे कि योजनाकारों ने उदारीकरण लाकर उनके गौरव को इतना छिछियाया कि आज हर तबके का व्यक्ति अंदर उनसे घृणा और द्वेष करने लगा।
लोग धीरे धीरे अपने स्तर से औद्योगाक उत्पादों की ओर बढ़ने लगे। जैसे ही यह रुझान योजनाकारों ने समझा उन्होंने फिर से अपनी योजना बदल दी। जिन औद्योगिक उत्पादों के दम पर वे एक क्षत्र राज चला रहे थे उनका लोकल स्तर पर उत्पादन होने से उनके राज पर संकट मंडराने लगा तो उन्होंने फिर से अपनी योजनाओं को बदल कर उत्पादों को लोकल और मार्केटिंग को वैश्विक बनाने का आनलाइन खेल शुरू कर दिया। जिसका परिणाम लोकल स्तर के उत्पादों की बिक्री प्रभावित होने लगी। तो लोग फिर उसी राह पर चल डगरे जिस राह पर मार्केटिंग कंपनियां और योजनाकार उन्हे ले जाना चाहते हैं।
जब उन्हें कृषिगत मजदूरों की आवश्यकता थी तो जमींदारी लाकर बंधुआ मजदूर बनाए।
जब उन्हें औद्योगिक मजदूरों की जरूरत थी तो नानाप्रकार की शिक्षा दीक्षा के माध्यम से कुशल मजदूर तैयार कराए।
जब उन्हें सरकारी व्यवस्था को मजबूती देनी तो शिक्षा के माध्यम से सरकारी नौकर तैयार करायें।
आज उन्हें ऐसे लोगों की आवश्यकता है जो उनकी मार्केटिंग के अनुसार उनके द्वारा निर्धारित दामों में उन्हें वस्तुएं निर्मित कर दे सके। इसके लिए कौशल विकास आदि की शिक्षा को बढ़ावा देना प्रारम्भ कर दिया है। वह दिन दूर नहीं जब शत प्रतिशत अंक प्राप्त अंकधारी अंक पत्र लिए फिरेंगे लेकिन उन्हें आजीविका नसीब नहीं होगी। अब सुरक्षा, सम्मान व आजीविका ऐसे कुशल लोगों को मिलेगी जो वैश्विक स्तर पर मार्केटिंग कर रही कंपनियों के लिए उत्पादन निर्मित कर सके।
हमें बदलाव के क्रम को समझना होगा। जो उत्पाद कभी वृहद पैमाने पर फैक्ट्रियों में कर लोकल स्तर के दुकानदारों के माध्यम से बेचा कर धनार्जन किया जाता था। आज व
अवस्था उलटकर कुछ ऐसी हो रही है। लोकल स्तर पर उत्पादन कर वैश्विक स्तर पर मार्केटिंग करना।
स्वामी संबोधि आनंद
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