Thursday, 12 October 2023

निपुणता को एक कसौटी मे नहीं बांधा जा सकता है।

किसी भी व्यक्ति की निपुणता का एक मात्र पैमाना माना लेना उसके स्वतंत्र अध्ययन और चिंतन को रोकना मात्र है।
अगर हमने यह मान लिया होता कि जेम्स वाट इसलिए वैज्ञानिक बना कि उसने केतली में उड़ती भाप की शक्ति को समझकर भाप का इंजन बना दिया।इसलिए वही व्यक्ति निपुण  हैं तो शायद आज मिसाइलमैन ए पी जे अब्दुलकलाम वैज्ञानिक नहीं माने जाते। 
  यदि हम यह मान ले  कि प्रभू ईसा मसीह जिस राह पर चल कर अध्यात्मिक निपुणता हासिल की वहीं आध्यत्मिक निपुणता है, तो शायद आधुनिक आध्यात्मिक गुरू ओशो आध्यात्मिकता में निपुण नहीं माने जाते।
     यदि हम तुलसीदास के कवित्व को ही निपुणता का मानक मान कर ठहर जाते तो शायद आज महादेवी वर्मा, जयशंकर प्रसाद, मुंशी प्रेम चंद्र, और  अटल बिहारी बाजपेयी जैसे निपुण कवियो को कोई मान्यता ही न होती। 
अध्ययन, अध्यापन और चिंतन को किसी निश्चित ढांचे में ढालने का मतलब बौद्धिक विकास को रोकना मात्र है।

      ।। स्वामी संबोधि आनंद।।

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