Thursday, 22 June 2023

क्या शिक्षक कार्मिक है? या अध्यात्मिक

राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ (प्रा०संवर्ग) के प्रदेश व्यापी एक दिवसीय सांकेतिक धरने में कानपुर नगर में आयोजित धरने में श्री शैलेन्द्र  द्विवेदी ( माध्यमिक शिक्षा) ने बड़ी ही ध्यानाकर्षित करने वाली   बात कही कि " शासन प्रशासन हम शिक्षकों नौकर बनाकर काम कराना चाहता है या शिक्षा संवर्धक बनाकर देश व राष्ट्र हित    में शिक्षा संवर्धन का दायित्व निर्वहन करने देना चाहता है। शासन प्रशासन पहले यह तय करें। दूसरी महत्वपूर्ण बात आंकड़ा आधारित शैक्षणिक गुणवत्ता चाहता है या प्रदर्शन आधारित शिक्षा। श्री शैलेन्द्र द्विवेदी के ये उद्गार पूरे आंदोलन का सूत्र बन कर शासन प्रशासन की मंशा को जनता के सामने लाने और शिक्षकों को बदनाम करने के वैश्विक षणयंत्र को भी उजागर करके रख देगा।‌
             शिक्षा और शिक्षक के संदर्भ में मैंने कई बार लिखा है कि शिक्षा मात्र शासन-प्रशासन और व्यापार हित की ही न हो, वह राष्ट्र और समाज हित की भी होनी चाहिए। शिक्षा लोगों के मानसिक नियंत्रण का हथियार ही न हो स्वतंत्र बोध व अभिव्यक्ति का भाव भरने वाली भी हो। मैं यह नहीं कहता कि शिक्षा शासन प्रशासन की प्रणाली को संचालित करने में सहायक न हो और यह भी नहीं कहता कि अभिव्यक्ति और बोध की स्वछंदता वाली ही हो। शिक्षा राष्ट्र, समाज, सरकार और परिस्थितियों में अनुकूलता और समायोजन की क्षमता विकसित करने वाली हो। 
        "शिक्षक का पद अध्यात्मिक पद हैं न कि कार्मिक ।" अक्सर मै यह कहता रहता हूं। अगर मेरे इस वक्तव्य को स्वीकार करते हैं तो एक बात और स्पष्ट होती है कि  शिक्षा कोई कर्म नहीं है, जिसे जितनी जल्द हो समाप्त कर इतिश्री प्राप्त कर ली जाए। शिक्षा से लक्ष्य अधीरता और बेचैनी पैदा करके कदापि हासिल नहीं किए जा सकते हैं। यह तो शांत चित्त, धैर्य, साहस और नित नये अनुभवों की प्रक्रिया है जिससे निरंतर  परिणाम आते रहते हैं और प्रक्रिया चलती रहती है। पता नहीं क्यों शासन-प्रशासन ने ऐसा मान लिया कि शिक्षा को एक क्रिया की तरह  झंझट समझकर इस क्रिया से जितनी जल्द हो मुक्ति प्राप्त कर ली जाए। 
     "किसी भी देश-राष्ट्र समाज, सरकार व सभी व्यक्तियों के लिए एक जैसी शिक्षा दे दी जाए यह भी शिक्षा के असली उद्देश्यों  की प्राप्ति नहीं है।"न ही शिक्षा उपलब्धि को आंकड़ों के माध्यम से मापा जा सकता है। जैसा कि वर्तमान में निपुण छात्र बनाने के लिए निर्धारित एप में बच्चा कुछ वाक्य, कहानी या अनुच्छेद पढ़ लें तो वह निपुण हो गया। हालांकि शासन प्रशासन के निपुण की अवधारणा और वास्तविक निपुण की अवधारणा दोनों में जमीन आसमान का अंतर है। निपुणता के क्षेत्र होते हैं। कोई बच्चा खेल में निपुण होता है, तो कोई कृषि कार्य में। कोई व्यवहार में निपुण होता है तो कोई नियम कानून में। कोई पढ़ने में निपुण होता है तो कोई संगीत में। मात्र सहज फाउंडेशन या एक अधिकारी द्वारा निर्मित एप के चंद अनुच्छेद पढ़ लें और बच्चा निपुण मान मान लिया जाए तो यह बात इतनी बचकानी लगती है कि यह तय करने वालों के बौद्धिक स्तर पर हंसी आने के अलावा और कुछ नहीं है। 
       अब बात करते हैं शिक्षा में शिक्षक की भूमिका की। शिक्षक वह नहीं है जिसने मात्र एप के या किसी किताब के चंद अक्षर बच्चे को सिखा दिए तो वह शिक्षक हो गया है।  शिक्षक एक तपस्वी की भांति होता है जो पहले स्वयं को सम- विषम परिस्थितियों से शिक्षा ग्रहण करता है और प्राप्त अनुभवों को शब्दों में पिरोकर अपने शिष्य को भी बोध कराता है। जिससे उसे अपने जीवन को जीने में सहजता और सरलता होती है।‌ क्या एक कार्मिक बनकर चंद किताबों के वाक्य रटा देने वाला व्यक्ति शिक्षक है। अगर ऐसा है तो फिर आधुनिक युग में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और वीडियो, एनीमेशन का निर्माण करके बच्चों को किताबों को रटाया और पढ़ाया जा सकता है। तो फिर सरकार को ऐसे शिक्षकों की क्या जरूरत जो बच्चों को रोबोट की तरह प्राप्त निर्देशों को छात्र के समक्ष उगल दें। यह काम तो मोबाइल टीवी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सोसल मीडिया के माध्यम से भी बिना धन खर्च के किया जा सकता है। क्या जरूरत है शिक्षकों को लाखों रुपए की पगार देने की। 

      भारत की शिक्षा व्यवस्था में यूनिसेफ पर्याप्त दखल रखती है। भविष्य में तो ऐसा लगता है कि सारी की सारी बागडोर भारतीयों से निकलकर यूनिसेफ के हाथों चली जानी है। यूनिसेफ की नीति है कि लोग शरीर से तो वह अपने देश के हो लेकिन उनकी आत्मा यूनिसेफ द्वारा निर्धारित व्यवस्था के अनुरूप हो। यूनिसेफ  परिसंकल्पनाओं के माध्यम से पूरे विश्व को मानसिक विकलांग बनाने का निर्णय अपने गठन से लेकर आज तक लगातार कर रहा है। उसमें एक एक परिसंकल्पना मीना मंच की है। जिसमें एक प्रतीक तोता है जो इस बात का समर्थक है कि लोगों को साथ, चील, कौआ या शेर नहीं तोता बनाना है। उन्हें जितना रटाया जाए उतना ही रटने की क्षमता हो कुछ अपने अनुभवो और परिस्थितियों से सीखने की क्षमता न हो। यूनिसेफ की देन है कि शिक्षा आज एक बहुत बड़ा व्यापार बनकर रह गई है। हो सकता है कि मेरी इस बात से लोगों को  सहमति न हो कि पूरी दुनिया में यूनिसेफ ने महिलाओं और बच्चों को व्यापार की वस्तु बनाकर रख दिया है। वहीं पुरुषों को WHO, WTO, WEF, IMF ने बंदर बनाकर रख दिया है। शिक्षक भाइयों आपको भारतीय चेतना और संस्कृति की रक्षा के एक बहुत लम्बी और बड़ी लड़ाई लड़ने की जरूरत है। इस लड़ाई को आपके सिवा और नहीं लड़ सकता है और न ही विदेशी संस्थाओं के षणयंत्रों को समझ सकता है। आओ हम भारत की नई आजादी का बिगुल बजाए। सब मिलकर शिक्षा की अलख जलाए। जय भारत जय शिक्षक। 
          शैलेन्द्र कुमार
         (संगठन मंत्री) 
राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ (प्रा० संवर्ग) 
कानपुर नगर

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