Sunday, 2 April 2023

कागजी मुद्रा अधवा e-rupee/ digital currency हम और हमारी मूर्खता का सच।

*सीबीडीसी -eRupee,हम और हमारी अज्ञानता* 
१ अप्रैल भारतीय अर्थव्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण दिन होता है। इस दिन से लागू अर्थनीति हमारे जीवन को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती है। 1 अप्रैल का एतिहासिक महत्व भी कम नहीं है यह इसलिए कि इसी दिन डा. बी आर अंबेडकर ने अपनी पुस्तक "रुपए की समस्या" लिखकर अंग्रेजों द्वारा थोपी गई कागजी करेंसी की पोल खोलकर रख दी। इसी को ध्यान में रखकर अंग्रेजों ने भारत में आरबीआई बना कर सोने चांदी की मुद्रा के स्थान पर "कागजी" नोट का लेनदेन सन 1935 में स्वीकृत किया गया था। यह कागजी फर्जीवाड़ा जिसे fiat करेंसी कहा जाता है बिना किसी ठोस आधार के ही कितनी भी कभी भी छापी जा सकती है। शुरुआत में इस छपाई की मात्रा का निर्धारण उपलब्ध सोने चांदी की मात्रा से किया जा जाता था, जिसे अब फर्जी डॉलर (कागजी घोषणा मात्र) बिल (fiat करेंसी) के आधार पर रिचर्ड निक्सन राष्ट्रपति काल से कर दिया गया । जिसे हम बड़ी शान- शौकत से इधर उधर खिसकाते रहते हैं। कभी रूपए की रूप में तो कभी डॉलर के रूप में।
 जिसे हाल ही में भारत सहित कई अन्य देशों ने रातोरात डीनोटिफाई कर, कागज को मुद्रा समझ, तिजोरी भरे देशवासियों को रातोरात करेंसी की औकात दिखा दी। मैं तो माननीय प्रधानमंत्री जी को धन्यवाद देना चाहूंगा कि उन्होंने अंग्रेजों द्वारा थोपी गई कागजी मुद्रा की असलियत को सबके सामने ला दिया। प्रधानमंत्री जी द्वारा हम सबके सामने करेंसी की औकात दिखा दी गई फिर भी हम नासमझ  बने रहे यह हमारी मूर्खता नहीं है तो क्या है? उन्होंने दिखा दिया कि देशवासी पूरी तरह मूर्खता में जीवनयापन कर रहे हैं। उनके सामने सच्चाई कितनी भी खोलकर रख दो लेकिन वे अंधे ही रहेंगें। देश की 140 करोड़ लोगों के अंधेपन के अखबार,टीवी है ( जो अंग्रेजों द्वारा बनाए गए Vernacular Press Act-1878  के अधीन स्थापित किए गए)  स्कूल कालेज है (जो लार्ड मैकाले की शैक्षिक सिफारिशों के आधार पर स्थापित किए गए) इत्यादि के द्वारा ब्रेनवाश है। जिसे हम मुद्रा, रूपया, माया, पूंजी समझे बैठे हैं वह १ अप्रैल 1935 को अंग्रेजों द्वारा भारतीय संसाधनों को मुफ्त में उपभोग करने की रणनीति का परिणाम मात्र है। इसी दिन सोने चांदी की मुद्राएं अंग्रेजों ने अपनी तिजारी में बंद कर भारत देश पर उसी तिजोरी के स्वर्ण भंडार के आधार पर कागजी धोखाधड़ी सारे भारतवासियों पर थोपी थी। सोने की चिड़िया कहलाने वाला देश देखते देखते कब कर्ज की गर्त में चला गया इसका अंदाजा हम भारतीयों को आज तक नहीं हो पाया। हलांकि दादाभाई नौरोजी ने अंग्रेजों की चालों को बहुत अच्छे से समझा और1868 ई. में सर्वप्रथम दादाभाई नौरोजी ने ही अंग्रेज़ों द्वारा भारत के धन की निकासी की ओर सभी भारतीयों का ध्यान आकृष्ट किया। फिर भी हम अपनी मूर्खता के चलते आज तक नौरोजी को समझने और करेंसी के माध्यम से प्राप्त सुविधा को तो ध्यान दिया लेकिन करेंसी रुपी सुविधा की चासनी में लिपटी घातक समस्या की ओर कभी भी दृष्टि नहीं घुमाई।  नौरोजी  ने मई, 1867 ई. को लंदन में आयोजित ईस्ट इंडिया एसोसिएशन की बैठक में अपने पत्र, जिसका शीर्षक England Debut To India को पढ़ते हुए पहली बार धन के बहिर्गमन के सिद्धान्त को प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा- भारत का धन ही भारत से बाहर जाता है, और फिर धन भारत को पुनः ऋण के रूप में दिया जाता है, जिसके लिए उसे और धन ब्याज के रूप से चुकाना पड़ता है। यह सब एक दुश्चक्र था, जिसे तोड़ना कठिन था। इसके अतिरिक्त उनकी अन्य पुस्तकें, जिसमें उन्होंने धन के निष्कासन सिद्धान्त की व्याख्या की है, द वान्ट्स एण्ड मीन्स ऑफ़ इण्डिया (1870 ई.), आन दि कामर्स ऑफ़ इण्डिया (1871 ई.) आदि उनकी पुस्तकों में अंग्रेजों की लूट को समझाया हैं। दादाभाई नौरोजी धन के बहिर्गमन के सिद्धान्त के सर्वप्रथम और सर्वाधिक प्रखर प्रतिपादक थे। 1905 ई. में उन्होंने कहा था कि धन का बहिर्गमन समस्त बुराइयों की जड़ है और भारतीय निर्धनता का मुख्य कारण। दादाभाई नौरोजी ने धन निष्कासन को अनिष्टों का अनिष्ट की संज्ञा दी है। धन निष्कासन के इसी रणनीति के कारण बहुराष्ट्रीय कंपनियों के रूप, वही फिरंगी आज 2023 में फिर से फन उठाए घूम रहे। आज इन्ही फिरंगियों ने नया षडयंत्र कर सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी का बबेला खड़ा किया है। जिसमें अग्रणी भूमिका निभा रहा इन्ही फिरंगियों के हाथ की कठपुतली रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया। इस सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी जिसे eRupee कहा जा रहा, *में इस बार सबसे बड़ी बदमाशी यह होगी कि यह अब कोई कागजी घोषणा भी नही होगी। अब केवल आपके हमारे फोन और कंप्यूटर में दर्ज एक संख्या मात्र होगी।* वह भी कोई ऐसी वैसी संख्या नहीं बल्कि डिजिटल माध्यम से reprogrammable होगी अर्थात इसमें आरबीआई जैसी पिट्टू संस्था द्वारा तय की गई सामग्री के अलावा कुछ भी अन्य नही खरीदा जा सकता। इस षणयंत्र में तमाम अमेरिकी fin -tech कंपनियां दशकों से जुटी हैं। अर्थात अगर आरबीआई मुखौटे ने तय कर दिया कि आप अमुक e Rupee से समोसा खरीद सकते हैं तो केवल समोसा ही खरीद पाएंगे। अगर उस e Rupee में आरबीआई ने तय कर दिया कि आप इस e Rupee से अमुक वस्तु ही खरीद सकते है तो केवल वही चीज खरीदी जा सकती है, वह भी निर्धारित मात्रा में। भले ही आपके पास बैंक कंप्यूटर में लाखों रुपए की संख्या दिख रही हो। इस बात की गंभीरता ऐसे समझिए जैसे कि आपके खाते में रुपए तो लाखों दिख रहे और आप बीमार हो गए। अब आपको इलाज के लिए लाखों की जरूरत है। लाखों रूपए आपके खाते में उपलब्ध भी हैं मगर programmed eRupee (CBDC) होने के कारण आप केवल उतने ही रुपए की दवा खरीद सकते हैं जितना आरबीआई ने पहले से तय कर रखा है। *इस प्रकार हमारे पास बैंक बैलेंस खूब होने पर भी। उक्त संख्या हमारी कड़ी मेहनत से अर्जित करने के बावजूद भी उस संख्या रूपी eRupee पर हुकूमत इन्ही फिरंगियों की संस्था आरबीआई की ही चलेगी।* हम आप इनके हर एक इशारे पर नाचने को मजबूर होंगे। इनकी हां में हां करी तो ठीक अन्यथा कभी भी आपका खाता फ्रीज कर, किसी भी प्रकार के लेनदेन पर एक झटके में रोक लगाई जा सकती है। ऐसा पिछले महीने कनाडा में सरकार के विरुद्ध वैक्सीन पासपीर्ट के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे देशवासियों पर बहुत बड़ी मात्रा में किया भी जा चुका है। जरा इसकी भयाभवता का अंदाजा तो लगाओ कि हमारे पास खूब रुपया है मगर हम उसे उपयोग तभी करेंगे जब कंप्यूटर बाबा इजाजत देगा अन्यथा नहीं। अभी हाल ही तमाम नेता कम्प्यूटर लैपटॉप फोन फ्री डाटा आदि इसी योजना को पूरा करने के ही बांटते नजर इसीलिए आए हैं। 
*भला सोचिए यह कागजी गुलामी जो 1 अप्रैल 1935 में आरबीआई बना कर शुरू की गई थी वह मूर्खता दिवस नहीं तो क्या है❓* इसी करेंसी के आधार पर प्रतिवर्ष आप थोपा जाने वाला बजट रूपी मंहगाई और कर , जिसे हम स्वीकार कर मान्यता दिए हुए हैं, यह हमारी मूर्खता नहीं है तो क्या है। हर वर्ष हमें 1 अप्रैल को मूर्ख बनाया जाता है और हम मूर्ख बन भी जाते हैं। यह मूर्खता दिवस इसलिए भी है क्योंकि आज हमारे हाथ में सारी दुनिया मुट्ठी में आने के बाद भी हम नेताओं अखबारों टीवी में बैठे फिरौतीबाजों के इशारे पर नाच रहे। यह हमारी मूर्खता नहीं है तो क्या है❓
ध्यान रहे यह सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी कोई खयाली पुलाव नहीं बल्कि सख्त हकीकत है जिसे पिछले केंद्रीय बजट 2022 में बाकायदा पास किया चुका है। जिसे हाल में भारत आए बिल गेट्स के हाथों उदघाटित भी कराया जा चुका है। इसी षडयंत्र को अमली जामा पहनाने के लिए दुनियां की बैंके तबाह की जा रही। इसी षडयंत्र को अमलीजामा पहनाने के लिए ही पेटीएम, गूगल पे, रुपे, एमेजॉन पे आदि बाजार में उतारे जा चुके हैं। जिसे हम आज भले ही सुगमता से इस्तेमाल के बहाने मेढक को पानी के डाल धीरे धीरे पानी गर्म किया जा रहा है जिसका हम को कोई अनुमान नहीं। यह सुगमता में भी फीस तामिल कर दी गई हैं।आपका फोन, आपका रिचार्ज,आपका खाता, आपका धन दूसरे के नियंत्रण में है या नहीं। जिसे पेटीएम वाले convenience fee कह कर वसूली शुरू की जा चुकी है। अर्थात हर एक लेनदेन पर सुगमता के नाम पर अलग से जेब कटाई चालू कर दी गई। अपनी जेब कटाई करवाना हमारी मूर्खता नहीं है तो क्या है? मगर हम चुप चाप बर्दास्त करते चले जा रहे। मगर जल्द ही इसी को सीबीडीसी रूपी eRupee में तब्दील कर नकेल और मजबूत कर दी जाएगी। इसी सीबीडीसी को बैंको के cibil score से जोड़ चीनी सोशल क्रेडिट सिस्टम भारत में लागू किया जा रहा। जिसके तहत 2030 तक भारतवासियों को मुद्रा और संपत्ति के अधिकार से विहीन की जाना है। यही नेता ताली बजा बजा कर संसद में यह सब कराएंगे। इसलिए होश में आइए नियंत्रण की जो अमानवीय व्यवस्था खड़ी की जा रही है उसको न समझना तथा  उसका विरोध न करना हमारी मूर्खता नहीं है तो क्या है? । अपने आप पडोस के लोगों से बात कीजिए। सच्चाई से रूबरू होइए। 
आप चाहें तो अब विश्व मूर्खता दिवस की अब बधाई ले- दे सकते हैं।
जय जय भारत भूमि ☸️🇮🇳

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