*🌸🌸🌸क्या सो सल मीडिया बहुजन आंदोलन को कुचल रहा है?*🌸🌸🌸
मुझे कभी कभी लगता है कि सोसल मीडिया ने बहुजन आंदोलन को कुचलने का कार्य किया है।
कोई भी आन्दोलन लोगों से मिजरश्रलने, वार्ता करने, बैठक करने, विचारों के आदान-प्रदान, भावनाओं को समझने, से संचालित होता है। जब हम किसी से बात करते हैं तो हमारे शब्द व ध्वनि प्रवाहित होती है। जब हम सोसल मीडिया पर कुछ लिखते हैं तो केवल शब्द स्थानांतरित होते हैं, भावनाएं नहीं। वही लेखक अपने विचारों को प्रवाहित करने में दिल दिमाग दोनों का प्रयोग तो करता है, पर वह भावनाओं को प्रवाहित करने में असफल रहता है। किसी भी व्यक्ति से सम्बन्ध मिलने जुलने से बनते हैं न कि चिठ्ठी पत्री, या सोसल मीडिया में विचार प्रवाह करने से। सोसल मीडिया में विचार प्रवाह करने से आप एक लेखक की तौर पर स्थापित होते हैं आन्दोलनकारी के रूप में नहीं। सोसल मीडिया से वैचारिक जागरूकता अभियान तो तेज हुआ पर आन्दोलन कमजोर हुआ है। किसी भी व्यक्ति में यह प्रवृत्ति पाई जाती है कि वह जो सोचता है लोग वैसा ही सोचें, इस सोच के साथ वह सोसल मीडिया में लिखता है, और जैसे ही वह सोसल मीडिया में लिखता है वैसे ही उसके अन्दर उठा तूफान शांत जाता है। सोसल मीडिया में विचार प्रवाह करते ही व्यक्ति को आनुभूतिक शांति मिल जाती है।
अगर व्यक्ति को अपने विचार व्यक्त करने का अवसर न मिले तो वह अपने विचारों को प्रकट करने के लिए लोगों की तलाश शुरू करेगा, ऐसे प्लेटफार्म की तलाश करेगा, जहां उसे अपने विचार व्यक्त करने का अवसर मिल सके। जिसके लिए उसे घर छोड़कर लोगों के बीच आना पड़ेगा, आन्दोलन का हिस्सा बनना पड़ेगा।
व्यक्ति के इस प्रयास को सोसल मीडिया ने एक झटके में नष्ट कर रख दिया है। सोसल मीडिया ने व्यक्ति के अंदर उठ रहे इस तूफान को शांत करने में महती भूमिका निभाई है। और लोगों से मिलने जुलने में रोक लगाई है जिससे आंदोलन कमजोर हुये है। स्वामी संबोधि आनन्द।
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