Sunday, 21 March 2021

विश्व व्यवस्था और हमारी आवश्यकता

मैं कई सालों से लोगों से एक ही बात कह रहा हूं कि किसी भी व्यक्ति की प्रथम वरीयता उसकी सुरक्षा होती है। द्वितीय वरीयता उसका स्वास्थ्य होता है। तृतीय वरीयता उसकी आजीविका होती है। इसका अंदाजा वर्तमान में फैली कोरोना महामारी से लगा सकते हैं। इन तीनों आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये हर व्यक्ति, अनेकों प्रयत्न, उपलब्ध संसाधनों के आधार पर करता है। जो व्यक्ति इन तीनों आवश्यकताओं की आपूर्ति करने में सक्षम होता है वहीं सफल माना जाता है। इन तीनों आवश्यकताओं की आपूर्ति के लिये उसे तंत्र (व्यवस्था), मंत्र (योजना) यंत्र (प्रयास/ तकनीकि) करने होते है। जब तक हम इस तरह के कदम नहीं उठायेंगे न तब तक हमारी उपरोक्त आवश्यकताओं की आपूर्ति होना असम्भव है। जब हम इस तरह के कदम उठाने में खुद व्यवस्था नहीं बनाते, खुद योजना बनाकर सार्थक प्रयास नहीं करते तब तक हम अपनी सुरक्षा, स्वास्थ्य और आजीविका प्राप्त नहीं कर सकते। 
       जब कोई व्यक्ति इन लक्ष्यों को हासिल कर लेता है, तो वह स्वत: सामाजिक लक्ष्य शिक्षा, संपत्ति और सत्ता के लिये प्रयास करता है। शिक्षा, संपत्ति, और सत्ता सामाजिक मान्यता का विषय है। जबकि अधिकांश लोग शिक्षा जानकारी व ज्ञान को ही समझकर किताबों में रातों दिन जुटे रहते हैं। जबकि शिक्षा, ज्ञान और जानकारी का पर्याय नहीं है। इसी लिये कबीर ने कहा है " पोथी पढ़-पढ़ जग मुहा, पंडित भया न कोय। ढाई आखर प्यार का, पढ़ें हो पंडित होय। जहां तक शिक्षा के प्रति मेरा मत है कि "अपनी जानकारी और ज्ञान का समुचित प्रयोग करने की क्षमता का विकास ही शिक्षा है।" न कि विद्यालय में जाकर डिग्रियां हासिल करना शिक्षा है। विद्यालयों से जानकारी और ज्ञान हासिल कर डिग्रियां हासिल करना योग्यता है, शिक्षा नही। जबकि योग्यता का पैमाना दूसरा तय करता है। इसलिये हमें शिक्षा के लिये प्रयास करना चाहिते न कि योग्यता के लिये। जानकारी व ज्ञान तब महत्त्वपूर्ण है, जब आप उसे शिक्षा के रूप में रूपांतरित करने में समर्थ हो।
इसी तरह संपत्ति भी एक सामाजिक मान्यता है। समाज जिस वस्तु को सम्पत्ति के रूप में मान्यता दे देता है, वहीं वस्तु सम्पत्ति के रूप में स्थापित हो जाती है। जो हमें हमारी ऊर्जा व्यय और  प्रयास के परिणाम स्वरूप प्राप्त होती है। इसलिये सम्पत्ति हमारे द्वारा मान्यता प्रदान की गयी वस्तु को कहा जाता है। अब आप जिस वस्तु को चाहे उसे सम्पत्ति के रूप में मान्यता दे कर उसे सम्पति के रूप में स्थापित कर सकते हैं। यह आपसी भाव का विषय है।
उपर्युक्त सभी के बाद सत्ता का भाव आता है जो एक प्रकार से अन्य लोगों और खुद को नियंत्रित करें की संगठनात्मक शक्ति है। यदि हम लोगों में स्वनियंत्रण की शक्ति का भाव विकसित कर दे तो उन पर कोई दूसरा नियंत्रण नहीं कर सकता। इसी स्वनियंत्रण को पैदा करने के लिये गौतमबुद्ध ने पंचशील का ज्ञान दिया। कबीर ने इसी स्वनियंत्रण के भाव को विकसित करने के लिये कहा कि "बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय, जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय। जहां तक मेरा मत है कि आत्मनियंत्रण से बड़ी कोई सत्ता नहीं है। जैसे ही हम आत्मनियंत्रण खोते हैं वैसे ही दूसरे के नियंत्रण के प्रभाव में आ जाते हैं। इसीलिये कहा जाता है कि या तो आप स्वनियंत्रित हो जाओ, या नियंत्रण में आ जाओ। नियंत्रण के दो तरीके हैं एक लालच, दूसरा भय।
    अब हमें व्यक्तिगत पहलू और सामाजिक पहलू दोनों को ध्यान में रखकर अपने आचरणों में सुधार कर लेना ही समस्या का समाधान है। अन्यथा समस्या ही समस्या है। 
स्वामी संबोधि आनंद।

No comments:

Post a Comment