*नकारात्मक ऊर्जा; सकारात्मक ऊर्जा एक दूसरे के विरोधी नहीं बल्कि पूरक हैं। इन दोनों के प्रभाव के कारण ही इस संसार में संवेदनशीलता और संतुलन कायम है।* संवेदनशीलता और संतुलन की स्थिति में संचलन सम्भव है।
हमारे जीवन में अक्सर अनेकों बार ऐसे पहलू आते हैं कि हम कोई भी सकारात्मक कार्य; नकारात्मक सोच के कारण ही कर पाते है। सकारात्मक और नकारात्मक दोनो तरह के विचार हमारे संतुलित जीवन के लिए आवश्यक है। जहां सकारात्मक विचार हमें किसी कार्य को करने के लिए प्रेरित करते हैं, वहीं नकारात्मक विचार अतिवाद के लिए अवरोधक की तरह काम करते हैं। नकारात्मक विचार या सोच हमारे लिए बाधक नहीं है, बल्कि हमे सुरक्षित और संतुलित रहने में सहयोगी है। हमारा यह सोचना कि सकारात्मक विचार या सोच से हम संतुलित जीवन जी सकते हैं तो यह हमारी महाभूल है। दोनों की अपनी उपयोगिता है। भय, क्रोध,घृणा, हिंसा व लालच निसंदेह नकारत्मक एनर्जी से ओतप्रोत है।लेकिन इन्हें के प्रभाव के कारण ही हम शांत, अहिंसक, वात्सल्य, प्रेम, दया, करुणा, निडर, रूपी सकारात्मक ऊर्जा के प्रभाव में आते हैं। स्थूल रूप से देखें तो सकारात्मक और नकारत्मक ऊर्जा एक दूसरे के विपरीत खड़ी दिखाई देती है। लेकिन सूक्ष्म रूप में दोनों ही ऊर्जाएं एक दूसरे की पूरकता के रूप में कार्य करती है।
विश्व का कोई भी व्यक्ति अपनी सुरक्षा के इंतजाम नकारत्मक ऊर्जा के प्रभाव के कारण ही करता है। कोई भी व्यक्ति अपराध करने से इसलिए नहीं बचता कि उसे सकारात्मक ऊर्जा प्रेरित करती है कि आपको अपराध नहीं करना बल्कि सूक्ष्म में देख तो पाएगे कि हम नकारात्मकता के परिणामों को सोच कर सुरक्षा के इंतजाम करते हैं। अपराध से बचते हैं। हम किसी भी गाड़ी को चलाते समय अपनी गति को इसलिए नियंत्रित करने की व्यवस्था नहीं करते कि हम गति में अवरोध चाहते हैं बल्कि इसलिए गति अवरोधक यंत्र ( नकारात्मकता ) लगाते हैं कि गति ( सकारात्मकता) के कारण दुर्घटना से बच सके। नकारात्मकता और सकारात्मकता में मुझे चोली -दामन का साथ नजर आता है। पता नहीं क्यों लोग ऊर्जा के किसी एक पहलू को देखकर दूसरे पहलू को नजरंदाज करते हैं। Be positive का नारा लगाकर दुर्घटना के शिकार होते रहते हैं। Not be positive, not be negative but be sensitive के भाव को रखना संतुलित जीवन का आधार है।
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