राजनीति कभी भी नहीं चाहती कि भ्रष्टाचार खत्म हो। वह हमेशा भ्रष्टाचार की नई नई युक्तियां इजाद करती रहती है। भ्रष्टाचार की युक्ति के प्रचलन की जानकारी जैसे ही लोगों को हो जाती है, वैसे ही राजनीति उसे समाप्त करने का भरपूर नाटक करने लगती है। इसी भ्रष्टाचार समाप्ति के नाटक में नवीन तरह के भ्रष्टाचार की नींव रख देती है। जबकि साधारण व्यक्ति इतना भोला होता है प्रारम्भिक दौर पर उन्हें यह नींव नजर नहीं आती, नजर जब आती है जब वह महल बनकर सबके सामने होती है।
राजनीति कभी नहीं चाहती कि लोग चरित्रवान, सदाचारी और ईमानदार हो। क्योंकि इनके प्रभाव के चलते राजनीति व्यक्ति पर शिकंजा कसने से घबराती है। राजनीति को व्यक्ति पर शिकंजा कसने का अवसर तभी मिलता है जब वह चरित्रहीन, दुराचारी और बैईमान हो। इसलिए राजनीति से यह उम्मीद करना कि यह लोगों के बीच से भ्रष्टाचार, चरित्रहीनता, दुराचार, और बेईमानी समाप्त करेंगे । यह सोचना हमारी सबसे बड़ी मूर्खता है।
तो अब सवाल उठता है कि लोगों के मध्य से भ्रष्टाचार, चरित्रहीनता, दुराचार और बेईमानी कौन समाप्त कर सकता है? जहां तक मेरा व्यक्तिगत विचार है कि यह कार्य सिर्फ संत और महात्मा कर सकते हैं। आपका अपना मत जो भी हो। मुझे उसमें कोई आपत्ति नहीं है।
!!स्वामी संबोधि आनंद!!
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