Saturday, 13 June 2020

समाज पर राजनीति का कसता शिकंजा, बिखरता सामाजिक परिवेश।

 टूटते परिवार, बिखरता सामाजिक तानाबाना

सामाजिक व्यवस्था जब जब राजनीति के प्रभाव में आई है ,उसने अपना ही नुकसान किया है। सामाजिक व्यवस्था राजनीति के प्रभाव में तभी आती है जब लोगों का आचरण, पारस्परिक नियंत्रण, पारिवारिक व सामाजिक अनुशासन, कर्तव्यबोध, चारित्र का आभाव होता है। आज हम देख रहे है कि हर व्यक्ति हर रिश्ता शक के दायरे में है। क्या यही हमारी सामाजिकता है? आज हर रिश्ता अविस्वास के घेरे में है। हमारी सुरक्षा, संरक्षा और शिक्षा के मौलिक केन्द्र 
        हमने कभी इतनी बड़ी गंम्भीर समस्या पर विचार विमर्श किया ही नही। आज एक राजनीतिक व्यक्ति थाली बजाने का आवाह्न करता है और हम लग जाते थाली बजाने में। जब कि कोई भी राजनीतिक व्यक्ति समाज की मजबूती नही चाहता। कोरोना काल में जो देखा गया कि लोग दर दर की ठोकरे खाते नजर आये, और राजनीतिक लोग उनकी भूख और मजबूरी का खूब दोहन किया। गरीबो मजदूरों की बात करने वाले कम्युनिस्ट अपनी जुबान मे ताला लगाये नजर आये। कोई भी राजनीतिज्ञ कोरोना जैसी बीमारी को लेकर चिंतन मंथन कर लोगों को सच्चाई बताने की कोशिश नही की। जिन नेताओं को हम अपना मानते, और उनका गुणगान करते थकते नही थे आज एक भी नेता आपकी आवाज बनने का प्रयास नही किया। 
     वास्तव में समाज का इन राजनीतिज्ञों पर अटूट भरोसा करना सबसे बड़ी भूल है। इनकी बनाई कोई भी व्यवस्था/नीति सामान्य लोगों के हितों की नही होती। हमें अपनी सामाजिक व्यवस्था वर्तमान परिदृश्य को ध्यान में रखकर मजबूत करनी होगी। 

स्वामी संबोधि आनंद

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