🌗🌗🌗 *दुनिया की असलियत और आम धारणा* 🌚🌚🌚
भारत में न कभी ब्राम्हण नाम का कोई धर्म रहा, न ही आज जिसे आप धर्म समझते है वह धर्म है। दुनिया में हिन्दू, इस्लाम, ईसाई इत्यादि नाम से फैले धर्म वास्तव में अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति दल मात्र है।
आप तत्कालीन प्रचलित सामाजिक सोच को समझे, भारत में जब इन धर्म रूपी राजनीतिक दलों का उदय हुआ उस समय सामान्य जनता प्रकृति पर आश्रित, ईश्वरवादी थी। लोगों का भरोसा ईश्वर और प्रकृति पर था। लोग अपने शरीर को मजबूत निरोगी रखने पर ध्यान देते थे। जनता की इसी सोच को ध्यान में रखकर चालाक लोगों ने अपने राजनीतिक मंसूबे पूरा करने के लिए, अपने दूतों के माध्यम से लोगों को धर्म में बांटा। जबकि उस समय के लोगो की जो धार्मिक अवधारणा कुछ अलग थी। लोग प्रकृति और प्राणी के बीच स्थापित अन्तर्सम्बन्धों को धर्म समझते थे, जिसे मजबूती देने के लिए सदैव तत्पर रहते थे।धूर्त और चालाक लोगों ने अपनी राजनीतिक सोच को अमलीजामा पहनाने के उद्देश्य से कुछ नियत धार्मिक दूतों के माध्यम से खुद को ईश्वर का प्रतिनिधि कहलाया और भोली भाली जनता को उन्हें ईश्वर मानने के लिए बाध्य किया। यही से दुनिया में राजनिति के आधार पर धर्मो का उदय हुआ। जो वास्तव में धर्म नही राजनीतिक दल थे। ठीक यही काम सामाजिक विभाजन कर लोगों को दो वर्णों मे विभाजित किया गया एक शासक दूसरे सेवक। कालान्तर में यही व्यवस्था चार भागों में विभाजित होकर वर्ण के रूप में जनता के समक्ष लाई गई।
धीरे धीरे जब कुछ सजग लोग इस षणयंत्र को जाना और समझा तो कुछ समाज सुधारक आगे आये और जनता को इनके षणयंत्रों को बताया जिससे वाद का जन्म हुआ। जब इस वाद का जन्म हुआ तो लोग वादों से जुड़े और दुनिया में समाजवाद, साम्यवाद, कम्युनिष्टवाद जैसी वैश्विक वादों को जन्म दिया गया, ठीक उसी तरह जैसे दुनिया को मूलत: तीन भागों ईसाई, इस्लाम, और यहूदी में बांटा था।
आज उसी सोच को कायम रखने के लिए कांग्रेस, भाजपा, और कम्युनिष्ट जैसी स्वतंत्र राजनीतिक दलों का प्रादुर्भाव हुआ। इसलिए आपको इस विषय में गहराई से अध्ययन और चिंतन मंथन करने की आवश्यकता है। आने वाले समय में इसी सोच को मजबूती देने के लिए नई संकल्पना लाई गई जिसे उदारीकरण (अर्थात ईसाई) निजीकरण (अर्थात- इस्लाम) डिजटलीकरण(अर्थात-यहूदी) कहा गया। यह सब उसी वैश्विक सोच का हिस्सा मात्र है। इनकी इस विभाजनकारी सोच को अमली जामा पहनाने के लिए भारत में हिन्दू मुसलमान किया जा रहा है। सभी हिन्दू एक न हो उसके लिए जातीय व्यवस्था है। एक तरफ हिन्दू को धर्म के रूप में प्रतिस्थापित किया जा रहा है तो वही दूसरी तरफ हिन्दू धर्म नही है कहा जा रहा है। यह सब इसलिए किया जा रहा है ताकि लोगों का ध्यान धर्म की असली अवधारणा की ओर न जा सके। 'हिन्दू' से तात्पर्र पक्ष विपक्ष में बंटे लोग और हिन्दुत्व से तात्पर्य पक्ष विपक्ष में लोगों को बांटे रहने की व्यवस्था।
इन सबसे परे एक और व्यवस्था है जिसको दुनिया से मिटाया जा रहा है वह बुद्धत्व( निष्पक्षता, करुणा, दया, शील, प्रज्ञा, आदर, जो इंसान को इंसान बनाती है )। बुद्धत्व कोई साधारण सोच नही है। यह वह चमत्कारिक सोच है जिसके धारण करते ही व्यक्ति भय, लोभ, लालच, वासना से स्वत: नष्ट हो जाते है।
स्वामी संबोधि आनंद।
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